Birth and Death Registration Amendment Bill 2026: जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने का नियम बदला! क्या है धारा 13(3) में नया बदलाव?

जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक 2026 के नियमों को दर्शाती एक इन्फोग्राफिक तालिका (Infographic table showcasing the rules of Birth and Death Registration Amendment Bill 2026).

1. जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026: नागरिक डेटा की सुरक्षा और सुदृढ़ीकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम

किसी भी संप्रभु और आधुनिक राष्ट्र के विकास, शासन और नीति-निर्माण का मूल आधार उसका नागरिक डेटा होता है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में प्रत्येक नागरिक की कानूनी पहचान सुनिश्चित करने के लिए ‘नागरिक पंजीकरण प्रणाली’ (Civil Registration System – CRS) एक बुनियादी स्तंभ के रूप में कार्य करती है। हाल ही में भारतीय संसद ने एक महत्वपूर्ण विधिक कदम उठाते हुए जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026 को पारित किया है। यह विधेयक 29 जुलाई 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था और 4 अगस्त 2026 को इसे राज्यसभा की भी मंजूरी मिल गई।

यह नया कानून मूल ‘जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969’ में व्यापक बदलाव करता है। इसका मुख्य उद्देश्य देश में जन्म और मृत्यु के विलंबित पंजीकरण (Delayed Registration) की प्रक्रियाओं को अधिक सख्त, पारदर्शी और सुरक्षित बनाना है, ताकि फर्जी पहचान और दस्तावेजों के दुरुपयोग को पूरी तरह से रोका जा सके। यह लेख इस विधेयक के विभिन्न पहलुओं, इसके प्रमुख प्रावधानों, इसकी आवश्यकता, इससे होने वाले लाभों और इसके समक्ष आने वाली चुनौतियों का एक विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

2. पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक संदर्भ

भारत में जन्म और मृत्यु के पंजीकरण को विनियमित करने के लिए सबसे पहला व्यापक कानून ‘जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969’ बनाया गया था। इस कानून के तहत देश में होने वाले प्रत्येक जन्म, मृत्यु और मृत-जन्म (Stillbirth) का पंजीकरण कराना अनिवार्य किया गया था। समय के साथ इस प्रणाली का प्रबंधन भारत के महापंजीयक (Registrar General of India – RGI) के अधीन किया गया, जो गृह मंत्रालय के अंतर्गत आता है।

वर्ष 2023 में इस अधिनियम में एक बड़ा संशोधन किया गया था। वर्ष 2023 के संशोधन के माध्यम से जन्म प्रमाण पत्र (Birth Certificate) को एक अत्यंत शक्तिशाली और एकल दस्तावेज (Single Document) बना दिया गया। इसके बाद से स्कूल में दाखिला, मतदाता सूची में नाम जुड़वाना, पासपोर्ट, आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस और सरकारी नौकरियों के आवेदन के लिए जन्म प्रमाण पत्र को जन्म की तिथि और स्थान का सबसे पुख्ता और प्राथमिक प्रमाण मान लिया गया।

चूंकि 2023 के संशोधन के बाद जन्म प्रमाण पत्र की महत्ता अत्यधिक बढ़ गई और यह नागरिक सेवाओं का मुख्य द्वार बन गया, वैसे ही इसके फर्जी तरीके से निर्माण और दुरुपयोग की संभावनाओं में भी भारी वृद्धि देखी गई। कई मामलों में यह पाया गया कि लोग निहित स्वार्थों, अवैध नागरिकता हासिल करने या वित्तीय धोखाधड़ी के लिए कई वर्षों के बाद प्रशासनिक कमियों का फायदा उठाकर फर्जी जन्म या मृत्यु प्रमाण पत्र बनवा लेते थे। इसी सुरक्षा चूक को दूर करने और नागरिक डेटा की प्रामाणिकता बनाए रखने के लिए सरकार द्वारा वर्ष 2026 में यह नया संशोधन विधेयक लाया गया है।

3. विधेयक, 2026 के प्रमुख प्रावधान

जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026 मूल अधिनियम की धारा 13(3) में महत्वपूर्ण संशोधन करता है। इस विधेयक के तहत पंजीकरण की समयसीमा और देरी के आधार पर एक वर्गीकृत और सख्त तंत्र (Graded Mechanism) तैयार किया गया है:

क. निर्धारित समयसीमा (21 दिन के भीतर)

सामान्य नियमों के अनुसार, किसी भी जन्म या मृत्यु की घटना की सूचना स्थानीय रजिस्ट्रार (जैसे नगर निकाय या ग्राम पंचायत) को 21 दिनों के भीतर दी जानी अनिवार्य होती है। इस समयसीमा के भीतर किए जाने वाले पंजीकरण की प्रक्रिया में इस विधेयक द्वारा कोई बदलाव नहीं किया गया है। यह प्रक्रिया पहले की तरह ही स्थानीय स्तर पर बिना किसी मजिस्ट्रेट के हस्तक्षेप के सुचारू रूप से चलती रहेगी।

ख. एक वर्ष से अधिक लेकिन दो वर्ष तक का विलंब

यदि किसी जन्म या मृत्यु की घटना की सूचना इसके घटित होने के एक वर्ष के बाद लेकिन दो वर्ष के भीतर दी जाती है, तो नियमों को पहले से अधिक जवाबदेह बनाया गया है। ऐसे मामलों में पंजीकरण केवल जिला मजिस्ट्रेट (DM), उप-विभागीय मजिस्ट्रेट (SDM) या जिला मजिस्ट्रेट द्वारा विशेष रूप से अधिकृत किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट (Executive Magistrate) की लिखित स्वीकृति और आदेश के बाद ही किया जा सकेगा। इसके अतिरिक्त, अधिकारी को पंजीकरण की अनुमति देने से पहले घटना की सत्यता का पूरी तरह सत्यापन (Verification) करना होगा और निर्धारित विलंब शुल्क भी वसूलना होगा।

ग. दो वर्ष से अधिक का गंभीर विलंब (सबसे महत्वपूर्ण बदलाव)

विधेयक का सबसे क्रांतिकारी और कड़ा प्रावधान दो वर्ष से अधिक की देरी से जुड़े मामलों के लिए है। नए नियमों के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति किसी जन्म या मृत्यु की घटना का पंजीकरण उसके घटित होने के दो वर्ष से अधिक समय के बाद करवाना चाहता है, तो प्रशासनिक अधिकारियों (DM या SDM) के पास अब इसकी अनुमति देने का अधिकार नहीं होगा।

इसके लिए अब देश की न्यायिक प्रणाली का हस्तक्षेप अनिवार्य कर दिया गया है। ऐसे अत्यंत विलंबित मामलों में केवल प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट (Judicial Magistrate First Class – JMFC) के आदेश पर ही पंजीकरण संभव होगा। न्यायिक मजिस्ट्रेट उचित कानूनी प्रक्रियाओं, गवाहों के बयानों और साक्ष्यों की गहन जांच और घटना की प्रामाणिकता के पूर्ण सत्यापन के बाद ही ऐसा आदेश जारी करेंगे।

घ. अनिवार्य सत्यापन प्रक्रिया

विधेयक यह स्पष्ट करता है कि विलंबित पंजीकरण की अनुमति देने से पूर्व नामांकित प्राधिकारी या न्यायिक मजिस्ट्रेट के लिए यह अनिवार्य होगा कि वे संबंधित घटना की सत्यता की पूरी जांच करें। बिना ठोस साक्ष्यों और सत्यापन के किसी भी पुराने रिकॉर्ड को दर्ज नहीं किया जाएगा।

ङ. नए कानूनी ढांचों के साथ सामंजस्य

यह विधेयक भारत के नए आपराधिक कानूनों के साथ प्रशासनिक व्यवस्था को संरेखित करता है। इसमें पुरानी ‘दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973’ के संदर्भों को हटाकर देश की नई ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023’ के प्रावधानों को शामिल किया गया है और उसी के अनुरूप “कार्यपालक मजिस्ट्रेट” की भूमिका को पुनर्परिभाषित किया गया है।

पंजीकरण की स्थितिआवश्यक प्राधिकारी / आदेशसत्यापन की आवश्यकता
21 दिनों के भीतरस्थानीय रजिस्ट्रार (ग्राम पंचायत/नगर निगम)सामान्य प्रक्रिया (अस्पताल या पारिवारिक सूचना)
1 वर्ष से 2 वर्ष के भीतरजिला मजिस्ट्रेट (DM) / उप-विभागीय मजिस्ट्रेट (SDM) / अधिकृत कार्यपालक मजिस्ट्रेटअनिवार्य प्रशासनिक सत्यापन और विलंब शुल्क
2 वर्ष से अधिक की देरीप्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC)गहन न्यायिक जांच, साक्ष्य और अनिवार्य सत्यापन

4. संशोधन की आवश्यकता और उद्देश्य

सरकार द्वारा इस विधेयक को लाने के पीछे कई दूरगामी और रणनीतिक उद्देश्य हैं, जिन्हें निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:

  • फर्जी प्रमाणपत्रों और पहचान के दुरुपयोग पर रोक: चूंकि जन्म प्रमाण पत्र अब आधार, पासपोर्ट और नागरिकता से जुड़े दस्तावेजों का मुख्य आधार बन चुका है, इसलिए कुछ राष्ट्रविरोधी तत्व या जालसाज इसका अनुचित लाभ उठा रहे थे। न्यायिक मजिस्ट्रेट की व्यवस्था आने से पिछले दरवाजे से फर्जी सर्टिफिकेट बनवाने के रास्ते बंद हो जाएंगे।
  • डेटा की शुद्धता और विश्वसनीयता (Data Integrity): राष्ट्रीय नीतियों, जनगणना और जनसांख्यिकीय योजनाओं (Demographic Planning) के लिए सटीक डेटा का होना अनिवार्य है। देर से होने वाले पंजीकरणों में अक्सर त्रुटियों या गलत सूचनाओं की संभावना अधिक होती है। इस कानून से डेटाबेस अधिक विश्वसनीय बनेगा।
  • समय पर पंजीकरण को प्रोत्साहन: जब नागरिकों को यह पता होगा कि देरी करने पर उन्हें अदालतों और कठोर कानूनी प्रक्रियाओं से गुजरना होगा, तो वे जन्म या मृत्यु के तुरंत बाद (21 दिनों के भीतर) स्वतः ही पंजीकरण कराने के लिए प्रेरित होंगे।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करना: भारत की सीमाओं और आंतरिक सुरक्षा के लिहाज से अवैध प्रवासियों द्वारा फर्जी पहचान पत्र बनवाना एक बड़ी चुनौती रहा है। नागरिक पंजीकरण प्रणाली में इस न्यायिक गेटकीपिंग (Gatekeeping) के माध्यम से देश के सुरक्षा तंत्र को मजबूती मिलेगी।

5. संशोधन के सकारात्मक प्रभाव और सामाजिक-आर्थिक महत्व

यह विधेयक केवल एक प्रशासनिक फेरबदल नहीं है, बल्कि इसके भारतीय समाज और शासन व्यवस्था पर गहरे सकारात्मक प्रभाव देखने को मिलेंगे:

क. कल्याणकारी योजनाओं का लक्षित वितरण

भारत सरकार और राज्य सरकारों द्वारा चलाई जा रही विभिन्न सामाजिक सुरक्षा योजनाओं, जैसे- मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य योजनाएं, वृद्धावस्था पेंशन, और राशन वितरण प्रणाली का लाभ सीधे तौर पर नागरिक डेटा पर निर्भर करता है। मृत्यु के सटीक और समय पर पंजीकरण से यह सुनिश्चित होगा कि किसी मृत व्यक्ति के नाम पर सरकारी धन का दुरुपयोग न हो और अपात्र लोग योजनाओं का लाभ न उठा सकें।

ख. मतदाता सूची (Voter Rolls) का शुद्धिकरण

संसद में चर्चा के दौरान गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने स्पष्ट किया कि कई बार मृत व्यक्तियों के नाम वर्षों तक मतदाता सूची में बने रहते हैं, जिसका कुछ राजनीतिक दलों या असामाजिक तत्वों द्वारा अनुचित लाभ उठाया जाता है। मृत्यु पंजीकरण की प्रक्रिया सख्त होने से और इसे डिजिटल डेटाबेस से जोड़ने से मतदाता सूचियों को रीयल-टाइम में अपडेट करना आसान हो जाएगा, जिससे चुनावी पारदर्शिता बढ़ेगी।

ग. डिजिटल इंडिया और नागरिक सेवाओं का सरलीकरण

यह संशोधन आदरणीय प्रधानमंत्री के ‘डिजिटल इंडिया’ के दृष्टिकोण के बिल्कुल अनुकूल है। 2023 से ही सभी पंजीकरण डिजिटल माध्यम से ‘सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम’ (CRS) पोर्टल पर दर्ज किए जा रहे हैं। 2026 के इस संशोधन से डिजिटल डेटा की प्रामाणिकता शत-प्रतिशत सुनिश्चित होगी, जिससे नागरिकों को भविष्य में विभिन्न सरकारी विभागों में बार-बार भौतिक दस्तावेज जमा करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

6. चुनौतियाँ और चिंताएँ

प्रत्येक बड़े विधिक सुधार के अपने कुछ व्यावहारिक कड़े पहलू भी होते हैं। इस विधेयक को लेकर भी अर्थशास्त्रियों, न्यायविदों और विपक्षी दलों द्वारा कुछ चिंताएं व्यक्त की गई हैं:

  • आम और गरीब नागरिकों के लिए प्रशासनिक जटिलता: भारत के ग्रामीण, आदिवासी और दूरदराज के क्षेत्रों में आज भी शिक्षा और जागरूकता का स्तर कम है। यदि किसी गरीब परिवार में किसी कारणवश दो वर्ष तक बच्चे का जन्म प्रमाण पत्र नहीं बन पाया, तो उसे अब न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास जाना होगा। इससे उनके लिए अदालती चक्कर काटने, वकीलों की फीस देने और समय गंवाने की नई समस्या खड़ी हो सकती है।
  • न्यायपालिका पर अतिरिक्त बोझ: भारतीय अदालतें पहले से ही करोड़ों लंबित मामलों के बोझ तले दबी हुई हैं। ऐसे में दो वर्ष से अधिक पुराने लाखों जन्म और मृत्यु के मामलों की जांच और आदेश का जिम्मा प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेटों को सौंपने से निचली अदालतों पर काम का दबाव और अधिक बढ़ जाएगा।
  • क्षेत्रीय असमानताएं: देश के अलग-अलग राज्यों में सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (CRS) के बुनियादी ढांचे में भारी अंतर है। कुछ राज्यों में शत-प्रतिशत पंजीकरण आसानी से हो जाता है, जबकि पिछड़े या पहाड़ी राज्यों में यह प्रक्रिया आज भी सुस्त है। ऐसे में सख्त नियम उन क्षेत्रों के नागरिकों के लिए बड़ी बाधा बन सकते हैं।
  • गोपनीयता और निगरानी की चिंता: कुछ आलोचकों का मानना है कि नागरिक डेटाबेस का अत्यधिक केंद्रीकरण और इसे अन्य सभी महत्वपूर्ण डेटाबेस (जैसे आधार, पासपोर्ट, मतदाता सूची) से जोड़ना नागरिकों की निजता के अधिकार का उल्लंघन कर सकता है, जैसा कि प्रसिद्ध पुट्टास्वामी मामले में चर्चा की गई थी।

7. आगे की राह (Way Forward)

इस कानून के उद्देश्यों को सफलतापूर्वक प्राप्त करने और इसके नकारात्मक प्रभावों को कम करने के लिए सरकार और प्रशासन को निम्नलिखित सुधारात्मक कदमों पर ध्यान देना चाहिए:

  1. अंतिम छोर तक सेवा वितरण (Last-Mile Delivery): ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर मोबाइल पंजीकरण वैन या साझा सेवा केंद्रों (CSCs) के माध्यम से पंजीकरण की सुविधाओं को और अधिक सुलभ बनाया जाना चाहिए ताकि देरी की नौबत ही न आए।
  2. व्यापक जागरूकता अभियान: सरकार को रेडियो, टेलीविजन, सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर आशा (ASHA) कार्यकर्ताओं और आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से ’21 दिनों के भीतर पंजीकरण’ के महत्व और देरी होने पर होने वाली कानूनी पेचीदगियों के बारे में नागरिकों को जागरूक करना चाहिए।
  3. न्यायिक प्रक्रियाओं का डिजिटलीकरण और सरलीकरण: न्यायिक मजिस्ट्रेटों के पास जाने वाले आवेदनों के लिए एक समर्पित एकल-खिड़की (Single Window) या ऑनलाइन पोर्टल होना चाहिए, जहां नागरिक अपने दस्तावेज अपलोड कर सकें। गवाहों के सत्यापन और सुनवाई की प्रक्रिया को भी यथासंभव त्वरित और सरल बनाया जाना चाहिए ताकि आम जनता को प्रताड़ित न होना पड़े।
  4. संस्थागत प्रसव को बढ़ावा: अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में होने वाले जन्मों (Institutional Deliveries) का डेटा स्वतः ही सीधे केंद्रीय पोर्टल पर दर्ज हो जाता है। सरकार को देश में संस्थागत प्रसव की दर को शत-प्रतिशत तक ले जाने का प्रयास करना चाहिए, जिससे जन्म के समय ही पंजीकरण सुनिश्चित हो सके।

8. निष्कर्ष

जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026 भारत के नागरिक सुरक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा और सुशासन के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरदर्शी विधिक मील का पत्थर है। जन्म प्रमाण पत्र की बढ़ती हुई महत्ता को देखते हुए इसके गेटकीपिंग नियमों को सख्त करना समय की मांग थी। न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC) के माध्यम से दो वर्ष से अधिक पुराने पंजीकरणों का सत्यापन कराने का निर्णय फर्जी दस्तावेजों के निर्माण पर एक निर्णायक चोट है।

हालांकि, कानून की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार इसके व्यावहारिक क्रियान्वयन को कितना नागरिक-अनुकूल (Citizen-Friendly) बना पाती है। यदि जागरूकता और प्रशासनिक सुलभता को साथ लेकर चला जाए, तो यह कानून न केवल देश के राष्ट्रीय डेटाबेस को अभेद्य और विश्वसनीय बनाएगा, बल्कि ‘डिजिटल इंडिया’ के माध्यम से पारदर्शी और भ्रष्टाचार-मुक्त समाज के निर्माण के संकल्प को भी सिद्ध करेगा।


जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026 से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs):

📌 सामान्य प्रश्न और मूल उद्देश्य

  • Q1. जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026 का मुख्य उद्देश्य क्या है?
    • Ans: इसका मुख्य उद्देश्य विलंबित पंजीकरण (Delayed Registration) की प्रक्रियाओं को सख्त बनाना है। इससे फर्जी जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र के निर्माण और दुरुपयोग को रोका जा सकेगा।
  • Q2. यह नया कानून किस पुराने कानून की जगह लेता है?
    • Ans: यह मूल ‘जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969’ में संशोधन करता है। इसके प्रशासनिक नियमों को आधुनिक बनाता है।
  • Q3. यह विधेयक संसद में कब और किसने पेश किया?
    • Ans: यह विधेयक 29 जुलाई 2026 को लोकसभा में गृह राज्य मंत्री द्वारा पेश किया गया था। इसे 4 अगस्त 2026 को राज्यसभा की भी मंजूरी मिल गई।

⏱️ समयसीमा और पंजीकरण के नए नियम

  • Q4. जन्म या मृत्यु के कितने दिनों के भीतर पंजीकरण कराना अनिवार्य है?
    • Ans: घटना के 21 दिनों के भीतर स्थानीय रजिस्ट्रार के पास पंजीकरण कराना अनिवार्य है। इस सामान्य समयसीमा में कोई बदलाव नहीं किया गया है।
  • Q5. यदि पंजीकरण में 1 से 2 वर्ष की देरी हो जाए, तो क्या नियम हैं?
    • Ans: इसके लिए जिला मजिस्ट्रेट (DM), उप-विभागीय मजिस्ट्रेट (SDM) या अधिकृत कार्यपालक मजिस्ट्रेट की लिखित अनुमति और अनिवार्य सत्यापन आवश्यक होगा।
  • Q6. यदि पंजीकरण में 2 वर्ष से अधिक की देरी हो जाए, तो नया नियम क्या कहता है?
    • Ans: यह इस विधेयक का सबसे बड़ा बदलाव है। 2 वर्ष से अधिक की देरी होने पर अब प्रशासनिक अधिकारी अनुमति नहीं दे सकते। इसके लिए केवल प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC) के अदालती आदेश पर ही पंजीकरण हो सकेगा।

⚖️ कानूनी और प्रशासनिक बदलाव

  • Q7. 2 वर्ष से अधिक की देरी पर न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC) की आवश्यकता क्यों पड़ी?
    • Ans: जन्म प्रमाण पत्र अब आधार, पासपोर्ट और नागरिकता का प्राथमिक आधार बन चुका है। पिछले दरवाजे से होने वाली धोखाधड़ी और फर्जीवाड़े को रोकने के लिए न्यायिक गेटकीपिंग अनिवार्य की गई है।
  • Q8. इस विधेयक में नए आपराधिक कानूनों का क्या संदर्भ है?
    • Ans: यह विधेयक पुरानी CrPC (1973) के संदर्भों को हटाकर देश की नई ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023’ के प्रावधानों के अनुरूप कार्यपालक मजिस्ट्रेटों की भूमिका को परिभाषित करता है।

💼 नागरिकों और सुरक्षा पर प्रभाव

  • Q9. इस संशोधन से आम जनता को क्या लाभ होगा?
    • Ans: इससे राष्ट्रीय नागरिक डेटाबेस अधिक सुरक्षित और प्रामाणिक बनेगा। सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ सीधे और सही लाभार्थियों तक पहुंचेगा। मतदाता सूची से मृत व्यक्तियों के नाम हटाना आसान होगा।
  • Q10. इस कानून के सामने मुख्य व्यावहारिक चुनौतियाँ क्या हैं?
    • Ans:
      • ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों के गरीब लोगों के लिए अदालती प्रक्रिया जटिल हो सकती है।
      • २ वर्ष से पुराने मामलों के कारण निचली अदालतों (Judicial Courts) पर काम का बोझ बढ़ सकता है।

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