Ganesh Visarjan 2026: 25 सितंबर को है गणेश विसर्जन, जानें सटीक शुभ मुहूर्त, चौघड़िया और विधि
गणेश विसर्जन सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति का एक ऐसा पावन उत्सव है, जो अटूट भक्ति, अपार श्रद्धा, वैराग्य और दार्शनिक चिंतन के अनूठे संगम को प्रस्तुत करता है। भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी (गणेश चतुर्थी) को जिन विघ्नहर्ता भगवान गणेश की स्थापना परम उल्लास के साथ घरों और भव्य सार्वजनिक पंडालों में की जाती है, उन्हें 10 दिनों के बाद अनंत चतुर्दशी के दिन अत्यंत सजल नेत्रों और भारी मन से विदाई दी जाती है ।
“गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ” के गगनभेदी जयकारों, पारंपरिक ढोल-ताशों की गूंज और गुलाल से सराबोर हवाओं के बीच बप्पा को जल की लहरों में सौंपना केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। यह मानव जीवन के सबसे गूढ़ सत्य यानी ‘नश्वरता और अनंतता’ को जीवंत करने वाला महापर्व है। इस विस्तृत एवं शोधपरक लेख में हम वर्ष 2026 में होने वाले गणेश विसर्जन की सही तिथि, सटीक शुभ मुहूर्त (चौघड़िया मुहूर्त), संपूर्ण पौराणिक इतिहास, प्रामाणिक पूजा विधि और सामाजिक-पर्यावरणीय पहलुओं पर एक संपूर्ण और व्यावहारिक मार्गदर्शिका साझा कर रहे हैं।
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गणेश विसर्जन 2026: तिथि और मुख्य पंचांग गणना
वैदिक ज्योतिष और पंचांग की गणना के अनुसार, इस वर्ष 10 दिवसीय गणेशोत्सव का भव्य समापन भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी यानी अनंत चतुर्दशी के दिन हो रहा है। उदयातिथि के सार्वभौमिक सिद्धांतों के अनुसार, मुख्य गणेश विसर्जन की तिथि और समय इस प्रकार निर्धारित हैं:
- विसर्जन की मुख्य तिथि: 25 सितंबर 2026, शुक्रवार
- चतुर्दशी तिथि का प्रारंभ: 24 सितंबर 2026 को रात्रि 11 बजकर 18 मिनट पर
- चतुर्दशी तिथि का समापन: 25 सितंबर 2026 को रात्रि 11 बजकर 06 मिनट पर
शास्त्रों के अनुसार, उदयातिथि में चतुर्दशी विद्यमान होने के कारण 25 सितंबर को पूरे दिन विसर्जन का महापुण्य काल रहेगा।
विसर्जन के लिए सबसे सटीक शुभ मुहूर्त (चौघड़िया समय)
गणेश जी मंगल के दाता और विघ्नहर्ता हैं, इसलिए उनकी विदाई हमेशा शुभ चौघड़िया बेला में की जानी चाहिए। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार उद्वेग, रोग और काल चौघड़िया को टालकर चर, लाभ, अमृत और शुभ चौघड़िया में विसर्जन किया जाता है। Webdunia पंचांग रिपोर्ट तथा प्रामाणिक धार्मिक सूत्रों के अनुसार 25 सितंबर 2026 के विसर्जन मुहूर्त निम्नलिखित हैं:
१. प्रातः काल का महामुहूर्त (चर, लाभ, अमृत)
सुबह का समय घर और छोटे पंडालों के विसर्जन के लिए सर्वोत्तम माना जाता है।
- समय: सुबह 06:11 बजे से सुबह 10:42 बजे तक
- लाभ चौघड़िया: सुबह 07:41 बजे से सुबह 09:12 बजे तक
- अमृत चौघड़िया: सुबह 09:12 बजे से सुबह 10:42 बजे तक
२. दोपहर का शुभ मुहूर्त (अभिजीत एवं शुभ चौघड़िया)
मध्याह्न काल में बप्पा की विदाई करने वाले लोगों के लिए यह अत्यंत भाग्यशाली समय है।
- शुभ चौघड़िया: दोपहर 12:13 बजे से दोपहर 01:43 बजे तक
- विशेष अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 11:48 बजे से दोपहर 12:37 बजे तक
३. अपराह्न (शाम) का मुहूर्त (चर चौघड़िया)
बड़े सार्वजनिक विसर्जन जुलूस जो दोपहर में निकलते हैं, वे इस समय जल के समीप पहुँचते हैं।
- समय: शाम 04:44 बजे से शाम 06:14 बजे तक
४. रात्रि का विशेष मुहूर्त (लाभ, शुभ, अमृत)
जो लोग सुरक्षा या अत्यधिक दूरी के कारण दिन में विसर्जन नहीं कर पाते, वे रात्रि बेला का उपयोग कर सकते हैं।
- प्रथम रात्रि मुहूर्त (लाभ): रात्रि 09:14 बजे से रात्रि 10:43 बजे तक
- मध्यरात्रि मुहूर्त (शुभ, अमृत, चर): रात्रि 12:13 बजे से देर रात 04:42 बजे तक (26 सितंबर की भोर)
विशेष ध्यान दें (वर्जित समय): दोपहर 10:42 बजे से 12:13 बजे के मध्य राहुकाल रहेगा। इस दौरान मुख्य पूजा की शुरुआत या मूर्ति का प्रस्थान करने से बचना चाहिए।
गणेश विसर्जन का गहरा आध्यात्मिक दर्शन
हिंदू धर्म में मूर्ति पूजा और विसर्जन की इस परंपरा के पीछे एक अत्यंत गहरा और वैज्ञानिक जीवन-दर्शन छिपा हुआ है। इस दर्शन को मुख्य रूप से तीन स्तंभों के माध्यम से समझा जा सकता है:
1. साकार से निराकार की यात्रा
सनातन संस्कृति मानती है कि ईश्वर सर्वव्यापी है, वह निराकार (बिना किसी आकार के) है। परंतु एक आम इंसान के लिए निराकार ब्रह्म पर ध्यान केंद्रित करना अत्यंत कठिन होता है। इसलिए, हम मिट्टी से भगवान की एक सुंदर प्रतिमा बनाते हैं (साकार रूप) और उसमें प्राण-प्रतिष्ठा करके ईश्वर के अंश का आवाहन करते हैं। 10 दिनों तक उनकी दिव्य सेवा करने के बाद, हम उस चेतना को पुनः ब्रह्मांड में विलीन कर देते हैं और मिट्टी की मूर्ति को जल में प्रवाहित कर देते हैं। यह प्रक्रिया दर्शाती है कि आत्मा का अंतिम लक्ष्य अंततः उस परमात्मा (निराकार) में ही विलीन होना है।
2. जीवन की नश्वरता का संदेश
मिट्टी से बनी बप्पा की मूर्ति का अंततः जल में मिलकर विलीन हो जाना हमें याद दिलाता है कि हमारा यह भौतिक शरीर भी पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) से बना है। एक न एक दिन इस शरीर को भी मिट्टी में मिलकर विलीन हो जाना है। इसलिए, व्यक्ति को अपने रूप, धन या शक्ति पर कभी अहंकार नहीं करना चाहिए।
3. सुख और दुख का चक्र
गणेश उत्सव के पहले दिन घर में अत्यधिक खुशियाँ और उत्सव का माहौल होता है। वहीं विसर्जन के दिन भक्तों की आँखें नम होती हैं। यह उत्सव हमें सिखाता है कि जीवन में सुख और दुख का चक्र निरंतर चलता रहता है। जो आया है, उसे जाना ही है; और जो गया है, वह ‘अगले बरस’ फिर से नई उम्मीदों के साथ वापस आएगा।
पौराणिक पृष्ठभूमि: विसर्जन की शुरुआत कैसे हुई?
गणेश विसर्जन की परंपरा से जुड़ी कई पौराणिक और ऐतिहासिक कथाएं प्रचलित हैं। शास्त्रों में निहित मुख्य कथा महर्षि वेदव्यास और भगवान श्रीगणेश के महाभारत लेखन से जुड़ी है:
महाभारत लेखन की कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महर्षि वेदव्यास ने महाभारत महाकाव्य की रचना की थी, परंतु उसे लिखने के लिए उन्हें एक ऐसे तीव्र बुद्धि वाले लेखक की आवश्यकता थी जो बिना रुके उनके श्लोकों को समझकर लिख सके। यह कार्य स्वयं अग्रपूज्य भगवान गणेश ने स्वीकार किया।
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन से भगवान गणेश ने महाभारत का लेखन कार्य प्रारंभ किया। महर्षि व्यास लगातार श्लोक बोलते रहे और बप्पा पूरी एकाग्रता के साथ लगातार 10 दिनों तक लिखते रहे। इस निरंतर लेखन के कारण भगवान गणेश के शरीर का तापमान अत्यधिक बढ़ गया। वे पूरी तरह तपने लगे।
जब अनंत चतुर्दशी के दिन (दसवें दिन) महाभारत का लेखन कार्य पूर्ण हुआ, तब वेदव्यास जी ने देखा कि अत्यधिक परिश्रम के कारण बप्पा का शरीर ज्वर (बुखार) से तप रहा है। उनके शरीर को शीतलता प्रदान करने के लिए व्यास जी ने तुरंत उनके पूरे शरीर पर सुगंधित मिट्टी (चंदन और कीचड़) का लेप किया। इसके बाद वे बप्पा को पास के एक पवित्र सरोवर (कुंड) में ले गए और उन्हें जल में स्नान कराया। जल में प्रवेश करते ही बप्पा के शरीर का तापमान सामान्य हुआ और उन्हें परम शांति मिली।
तभी से यह मान्यता चली आ रही है कि 10 दिनों तक भक्तों के घरों में रहकर उनकी मनोकामनाएं लिखने और उनके कष्टों को अपने ऊपर लेने के कारण बप्पा का स्वरूप तप जाता है। उन्हें इसी तपन और कष्ट से मुक्त कर शीतलता प्रदान करने के लिए अनंत चतुर्दशी को जल में विसर्जित किया जाता है।
ऐतिहासिक महत्व: लोकमान्य तिलक और विसर्जन का सार्वजनिक स्वरूप
यद्यपि गणेश पूजा और विसर्जन की परंपरा सदियों पुरानी है, लेकिन इसे एक बड़े सार्वजनिक और सामाजिक आंदोलन का रूप देने का श्रेय लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को जाता है।
वर्ष 1893 से पहले गणेश उत्सव केवल घरों तक सीमित एक व्यक्तिगत पूजा थी। उस समय भारत पर ब्रिटिश शासन (अंग्रेजों) का अधिकार था। अंग्रेजों ने भारतीयों के एक जगह एकत्रित होने और देशप्रेम की चर्चा करने पर प्रतिबंध लगा रखा था। इस सामाजिक प्रतिबंध को तोड़ने के लिए लोकमान्य तिलक ने बुद्धि का उपयोग किया और गणेश उत्सव को सार्वजनिक पंडालों के रूप में मनाना शुरू किया।
तिलक जी जानते थे कि भगवान गणेश एक ऐसे देवता हैं जिन्हें समाज के सभी वर्गों के लोग (चाहे वे अमीर हों या गरीब, किसी भी जाति के हों) समान रूप से पूजते हैं। सार्वजनिक गणेश उत्सव के माध्यम से लोग एकत्रित होने लगे, जहाँ देशभक्ति के गीत गाए जाते थे, स्वतंत्रता संग्राम की योजनाएं बनती थीं और राष्ट्रीय चेतना को जगाया जाता था। उत्सव के अंतिम दिन, जब हज़ारों-लाखों लोग एक साथ सड़कों पर विसर्जन यात्रा के लिए निकलते थे, तो वह जनसैलाब अंग्रेजों के मन में खौफ पैदा कर देता था। इस प्रकार, गणेश विसर्जन राष्ट्रीय एकता का एक बहुत बड़ा माध्यम बना।
गणेश विसर्जन की संपूर्ण और प्रामाणिक पूजा विधि
शास्त्रों के अनुसार, बप्पा को विदा करने से पूर्व उनका पूरे आदर और विधि-विधान से पूजन करना अनिवार्य है, ताकि वे जाते-जाते घर को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देकर जाएं। विसर्जन की सही प्रक्रिया निम्नलिखित है:
[प्रातः काल महाआरती] ➔ [विशेष भोग (मोदक/लड्डू)] ➔ [उत्तरपूजा व क्षमा याचना]
➔ [चौकी की सज्जा व प्रस्थान] ➔ [विसर्जन स्थल पर अंतिम आरती]
- उत्तरपूजा (Final Worship): विसर्जन के दिन सुबह सबसे पहले बप्पा की महाआरती करें। उन्हें ताजे फूल, दूर्वा, अक्षत और सिंदूर अर्पित करें।
- विशेष छप्पन भोग या नैवेद्य: बप्पा को विदाई के भोजन के रूप में उनके प्रिय मोदक, बूंदी के लड्डू, खीर, या पूरनपोली का भोग लगाएं। इसके साथ ही, विदाई के समय सफर के लिए एक पोटली में थोड़ा सा सूखा अनाज (अक्षत), गुड़ और नारियल बांधकर बप्पा के पास रखें (इसे लोक भाषा में ‘शिदोरी’ या विदाई का पाथेय कहा जाता है)।
- क्षमा याचना मंत्र: पूजा के अंत में हाथ जोड़कर बप्पा से अपनी अज्ञानता या इन 10 दिनों की सेवा में हुई किसी भी भूलचूक के लिए क्षमा मांगें:“आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्। पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥”
- प्रतिमा को हिलाना: क्षमा याचना के बाद, मुख्य यजमान को अत्यंत श्रद्धा से भगवान गणेश की मूर्ति को अपनी जगह से कुछ इंच आगे बढ़ाना या हिलाना चाहिए। यह इस बात का संकेत है कि अब बप्पा प्रस्थान के लिए तैयार हैं।
- चौकी की तैयारी: जिस लकड़ी के पाट या चौकी पर बप्पा को विसर्जन स्थल तक ले जाना है, उस पर स्वास्तिक बनाएं, गंगाजल छिड़कें और एक गुलाबी या लाल कपड़ा बिछाएं। मूर्ति को सम्मानपूर्वक उठाकर उस पर विराजमान करें।
- विसर्जन स्थल पर प्रक्रिया: नदी, तालाब या समुद्र तट पर पहुँचने के बाद, पानी में सीधे मूर्ति डालने से पहले एक बार पुनः बप्पा की कर्पूर आरती करें। मूर्ति के आभूषण और प्लास्टिक की सजावट पहले ही हटा लें। इसके बाद बप्पा को आदरपूर्वक जल की लहरों में सौंप दें।
विसर्जन के विभिन्न प्रकार: बदलती जीवनशैली और नए विकल्प
समय और आवश्यकताओं के अनुसार, आज गणेश विसर्जन के तरीकों में भी काफी बदलाव आया है। भक्त अपनी सुविधा और आस्था के अनुसार निम्नलिखित विकल्पों को चुनते हैं:
१. डेढ़ दिन, तीन दिन, पांच दिन या सात दिन का विसर्जन
कई लोग अपनी व्यस्त दिनचर्या या पारिवारिक परंपरा के कारण पूरे 10 दिनों तक बप्पा को घर में नहीं रख पाते। ऐसे में शास्त्रों के अनुसार, गणेश चतुर्थी के अगले दिन (डेढ़ दिन), तीसरे दिन, पांचवें दिन या सातवें दिन भी बप्पा का विसर्जन अत्यंत शुभ माना जाता है।
२. घर के भीतर विसर्जन (Eco-Friendly Eco-Immersion)
पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए आजकल लोग मिट्टी (शाडू माटी) की इको-फ्रेंडली मूर्तियों को लाते हैं। अनंत चतुर्दशी के दिन वे अपने घर के आंगन या बालकनी में एक बड़े टब या साफ बाल्टी में पानी भरकर बप्पा का विसर्जन करते हैं। कुछ ही घंटों में वह मिट्टी पानी में पूरी तरह घुल जाती है। उस पवित्र मिट्टी और जल को घर के गमलों या पौधों में डाल दिया जाता है। इस प्रकार बप्पा पेड़-पौधों के रूप में हमेशा हमारे घर में ही निवास करते हैं।
भारत में गणेश विसर्जन के प्रमुख और भव्य केंद्र
यद्यपि गणेश विसर्जन पूरे भारत में धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन कुछ शहरों का विसर्जन उत्सव पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है:
- मुंबई (महाराष्ट्र): मुंबई का गणेश विसर्जन दुनिया भर में अपनी भव्यता के लिए जाना जाता है। विशेषकर ‘लालबागचा राजा’ (Lalbaugcha Raja) की विसर्जन यात्रा को देखने के लिए लाखों की भीड़ उमड़ती है। गिरगांव चौपाटी, जुहू बीच और दादर चौपाटी जैसे समुद्र तटों पर बप्पा को विदा करने के लिए हज़ारों सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की जाती है। पूरी मुंबई “गणपति बप्पा मोरया” के स्वर से गुंजायमान हो उठती है।
- पुणे (महाराष्ट्र): पुणे का विसर्जन अपनी पारंपरिक संस्कृति के लिए विख्यात है। यहाँ के ‘मानाचे पांच’ (प्रथम पांच सम्मानित गणपति) की विसर्जन यात्रा में पारंपरिक ढोल-ताशा पथक हिस्सा लेते हैं। यहाँ किसी भी प्रकार के आधुनिक डीजे या अश्लील गानों की अनुमति नहीं होती, बल्कि पारंपरिक वेशभूषा में युवा और महिलाएं ढोल बजाते हुए बप्पा को विदा करते हैं।
- हैदराबाद (तेलंगाना): हैदराबाद के खैरताबाद में स्थापित होने वाली विशालकाय गणेश प्रतिमा का विसर्जन हुसैन सागर झील में किया जाता है। इस विशाल मूर्ति को विसर्जित करने के लिए बड़ी-बड़ी क्रेन और विशेष वेल्डिंग मशीनों की मदद ली जाती है, जो अपने आप में एक दर्शनीय नजारा होता है।
सामाजिक समरसता और पर्यावरण संरक्षण की चुनौती
आधुनिक समय में गणेश विसर्जन के धार्मिक महत्व के साथ-साथ कुछ सामाजिक और पर्यावरणीय चुनौतियाँ भी सामने आई हैं, जिन पर ध्यान देना हर सच्चे राष्ट्रभक्त और सनातनी का कर्तव्य है:
| विसर्जन की चुनौतियाँ | समाधान और सुधार के उपाय |
|---|---|
| प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) की मूर्तियाँ | पीओपी की मूर्तियाँ पानी में नहीं घुलतीं और जल स्रोतों को प्रदूषित करती हैं। इसके स्थान पर केवल शाडू माटी (प्राकृतिक मिट्टी) या गाय के गोबर से बनी मूर्तियों का उपयोग करना चाहिए। |
| रासायनिक रंगों का प्रयोग | मूर्तियों पर किए जाने वाले लेड और मर्करी युक्त रंग जलीय जीवों (मछलियों आदि) के लिए जानलेवा होते हैं। हमें हर्बल या प्राकृतिक रंगों से सजी मूर्तियों को प्राथमिकता देनी चाहिए। |
| ध्वनि प्रदूषण (DJ का शोर) | पारंपरिक ढोल-नगाड़ों की जगह तेज आवाज वाले कान फाडू डीजे का प्रयोग बुजुर्गों और बीमार लोगों के लिए हानिकारक है। विसर्जन में सात्विकता और मधुर भजनों को बढ़ावा मिलना चाहिए। |
| जल स्रोतों में कचरा | विसर्जन के बाद नदियों और समुद्र तटों पर प्लास्टिक, थर्माकोल की सजावट बिखर जाती है। प्रशासन द्वारा बनाए गए कृत्रिम विसर्जन कुंडों (Artificial Ponds) का उपयोग करना सबसे बेहतरीन उपाय है। |
निष्कर्ष: बप्पा की विदाई और जीवन में नई शुरुआत
गणेश विसर्जन कोई अंत नहीं है, बल्कि यह एक नई शुरुआत का प्रतीक है। बप्पा जब हमारे घरों से जाते हैं, तो वे हमारे भीतर की नकारात्मकता, अहंकार, आलस्य और समस्त विघ्न-बाधाओं को अपने साथ बहाकर ले जाते हैं। वे हमें आशीर्वाद दे जाते हैं कि हम जीवन के हर क्षेत्र में रिद्धि-सिद्धि (बुद्धि और समृद्धि) के साथ आगे बढ़ें।
सजल नेत्रों से बप्पा को विदा करते हुए हर भक्त का दिल यह उम्मीद संजोए रहता है कि अगले वर्ष फिर से बप्पा का आगमन होगा और घर-आंगन खुशियों से चहक उठेगा। सच्ची गणेश भक्ति यही है कि हम बप्पा के जाने के बाद भी उनके द्वारा सिखाए गए मार्ग—बुद्धि, विवेक, धैर्य और लोक-कल्याण की भावना को अपने भीतर जीवित रखें।
गणेश विसर्जन 2026 की तिथि, शुभ मुहूर्त और धार्मिक नियमों से जुड़े कुछ मुख्य और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs):
1. साल 2026 में गणेश विसर्जन कब है?
साल 2026 में गणेश उत्सव का समापन और मुख्य गणेश विसर्जन 25 सितंबर 2026, शुक्रवार को अनंत चतुर्दशी के पावन अवसर पर किया जा रहा है [Ganesh Visarjan 2026 Shubh Muhurat]。
2. 25 सितंबर 2026 को विसर्जन के लिए सबसे उत्तम शुभ मुहूर्त क्या हैं?
25 सितंबर को पूरे दिन विसर्जन किया जा सकता है, लेकिन शास्त्रों के अनुसार चौघड़िया के आधार पर सबसे उत्तम मुहूर्त निम्नलिखित हैं [Ganesh Visarjan 2026 Shubh Muhurat]:
- प्रातः काल (सुबह): 07:41 बजे से 10:42 बजे तक (लाभ और अमृत चौघड़िया)
- मध्याह्न (दोपहर): 12:13 बजे से 01:43 बजे तक (शुभ चौघड़िया)
- अपराह्न (शाम): 04:44 बजे से 06:14 बजे तक (चर चौघड़िया)
3. क्या गणेश विसर्जन के दिन कोई ऐसा समय भी है जब विसर्जन नहीं करना चाहिए?
जी हाँ, 25 सितंबर 2026 को दोपहर 10:42 बजे से दोपहर 12:13 बजे तक राहुकाल रहेगा। राहुकाल के समय बप्पा की अंतिम उत्तरपूजा, आरती या विसर्जन जुलूस के प्रस्थान की शुरुआत करने से बचना चाहिए।
4. क्या अनंत चतुर्दशी से पहले भी गणेश विसर्जन किया जा सकता है?
हाँ, शास्त्रों में इसकी पूरी अनुमति है। यदि आप किसी कारणवश पूरे 10 दिनों तक बप्पा को घर में नहीं रख सकते, तो अपनी पारिवारिक परंपरा या संकल्प के अनुसार डेढ़ दिन (चतुर्थी के अगले दिन), तीसरे दिन, पांचवें दिन या सातवें दिन भी पूर्ण विधि-विधान से विसर्जन कर सकते हैं।
5. गणेश जी की मूर्ति को विसर्जित करने से ठीक पहले उसे स्थान से क्यों हिलाया जाता है?
विसर्जन से पूर्व की जाने वाली अंतिम पूजा को ‘उत्तरपूजा’ कहा जाता है। उत्तरपूजा संपन्न होने के बाद मूर्ति को उसके स्थान से कुछ इंच आगे खिसकाया जाता है, जो इस बात का प्रतीकात्मक संकेत है कि अब बप्पा ने आपके घर से प्रस्थान करने और विसर्जन स्थल की यात्रा पर निकलने की सहर्ष स्वीकृति दे दी है।
6. ‘शिदोरी’ (विदाई की पोटली) क्या है और इसका क्या महत्व है?
लोक परंपरा और शास्त्रों के अनुसार, बप्पा को जब हम विदा करते हैं, तो उनकी यात्रा (सफर) के भोजन के रूप में एक साफ कपड़े में थोड़ा सा सूखा अनाज (अक्षत), दूर्वा, गुड़ और एक सिक्का बांधकर उनके पास रखा जाता है। इसे ‘शिदोरी’ या पाथेय कहते हैं। इसका महत्व यह है कि माता पार्वती के लाडले बप्पा को विदा करते समय हम उन्हें भूखा या खाली हाथ नहीं भेजते।
7. घर पर इको-फ्रेंडली (Eco-Friendly) विसर्जन करने की सही विधि क्या है?
यदि आपने शाडू माटी या प्राकृतिक मिट्टी की मूर्ति स्थापित की है, तो आप अपने घर के आंगन या बालकनी में एक बड़े साफ टब या बाल्टी में गंगाजल मिश्रित शुद्ध पानी भरकर बप्पा का विसर्जन कर सकते हैं। कुछ ही घंटों में मिट्टी पूरी तरह पानी में घुल जाएगी। इस पवित्र मिट्टी और जल को आदरपूर्वक अपने घर के गमलों या पौधों में डाल दें। इससे जल स्रोतों में प्रदूषण भी नहीं होता और बप्पा प्रकृति के रूप में आपके घर में ही रहते हैं।
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