पुरी जगन्नाथ रथयात्रा कब और क्यों शुरू हुई? जानिए पौराणिक इतिहास और अनूठे रहस्य!
भगवान जगन्नाथ की ऐतिहासिक रथयात्रा: श्रद्धा, परंपरा और अटूट आस्था का महापर्व
भारत सनातन संस्कृति, अटूट आस्था और विविध त्योहारों का देश है। यहाँ हर पर्व के पीछे कोई न कोई गहरा आध्यात्मिक रहस्य, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और सामाजिक समरसता का संदेश छिपा होता है। इन्हीं महापर्वों में से एक सबसे भव्य और विश्व प्रसिद्ध उत्सव है—ओडिशा के पुरी में आयोजित होने वाली भगवान जगन्नाथ जी की रथयात्रा। प्रत्येक वर्ष आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को आयोजित होने वाली यह रथयात्रा मात्र एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह करोड़ों श्रद्धालुओं के हृदय की धड़कन, उनकी अटूट श्रद्धा और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का जीवंत प्रतीक है।
इस लेख के माध्यम से हम भगवान जगन्नाथ जी की इस ऐतिहासिक रथयात्रा के विभिन्न पहलुओं, इसके गौरवशाली इतिहास, परंपरा की शुरुआत, धार्मिक महत्व और इससे जुड़ी कुछ बेहद अनूठी और रहस्यमयी कथाओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
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रथयात्रा का स्वरूप और मुख्य देव
पुरी के मुख्य मंदिर (श्री मंदिर) में भगवान विष्णु के अवतार भगवान जगन्नाथ (ब्रह्मांड के स्वामी), उनके बड़े भाई बलभद्र (बलराम) और उनकी छोटी बहन सुभद्रा की काष्ठ (लकड़ी) की मूर्तियाँ स्थापित हैं। आम तौर पर हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ धातु या पाषाण (पत्थर) की होती हैं, लेकिन पुरी में ये मूर्तियां नीम की पवित्र लकड़ी (दारु) से बनाई जाती हैं।
रथयात्रा के दिन ये तीनों विग्रह अपने गर्भगृह से बाहर आते हैं और अपनी मौसी के घर ‘गुंडीचा मंदिर’ की ओर यात्रा करते हैं। इस यात्रा के लिए तीन विशाल और भव्य रथों का निर्माण किया जाता है:
- नंदीघोष (भगवान जगन्नाथ का रथ): इस रथ का रंग पीला और लाल होता है। इसमें 16 पहिये होते हैं और इसकी ऊंचाई सबसे अधिक होती है।
- तालध्वज (बलभद्र जी का रथ): इस रथ का रंग हरा और लाल होता है। इसमें 14 पहिये होते हैं।
- दर्पदलन या पद्मध्वज (माता सुभद्रा का रथ): इस रथ का रंग काला और लाल होता है। इसमें 12 पहिये होते हैं।
क्या है रथयात्रा का गौरवशाली इतिहास?
भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा का इतिहास उतना ही प्राचीन है, जितना कि स्वयं सनातन धर्म। पौराणिक ग्रंथों जैसे स्कंद पुराण, ब्रह्म पुराण और पद्म पुराण में इस रथयात्रा का विस्तृत वर्णन मिलता है। इतिहासकार और शोधकर्ता मानते हैं कि यह परंपरा हजारों वर्षों से निर्बाध रूप से चली आ रही है।
राजा इंद्रद्युम्न और मंदिर निर्माण की कथा:
पौराणिक इतिहास के अनुसार, मालवा के परम प्रतापी और परम विष्णु भक्त राजा इंद्रद्युम्न ने पुरी में भगवान जगन्नाथ के इस भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था। राजा को स्वप्न में भगवान विष्णु ने दर्शन देकर समुद्र में तैरते हुए एक विशाल नीम के पेड़ के तने (दारु) से मूर्तियाँ बनाने का आदेश दिया था।
जब राजा को वह लकड़ी मिल गई, तब देवताओं के शिल्पी भगवान विश्वकर्मा एक वृद्ध मूर्तिकार के रूप में प्रकट हुए। उन्होंने राजा के सामने एक शर्त रखी कि वे बंद कमरे में 21 दिनों में मूर्तियों का निर्माण करेंगे और इस दौरान कोई भी कमरे का दरवाजा नहीं खोलेगा। यदि किसी ने दरवाजा खोला, तो वे काम अधूरा छोड़ देंगे।
मूर्तियों के निर्माण का कार्य शुरू हुआ। बंद कमरे से हथौड़ी और टांकी की आवाजें आती थीं। लेकिन कुछ दिनों बाद अंदर से आवाज आनी बंद हो गई। राजा की रानी गुंडीचा (जिनके नाम पर गुंडीचा मंदिर है) व्याकुल हो उठीं। उन्हें लगा कि वृद्ध मूर्तिकार भूख-प्यास से मर गए होंगे। रानी के आग्रह पर राजा ने शर्त तोड़ दी और कमरे का दरवाजा खोल दिया।
दरवाजा खुलते ही वृद्ध मूर्तिकार अंतर्ध्यान हो गए और कमरे में तीन अधूरी काष्ठ मूर्तियां मिलीं, जिनके हाथ-पैर पूरे नहीं बने थे और आँखें बड़ी-बड़ी थीं। राजा अपनी भूल पर अत्यंत पश्चाताप करने लगे। तब स्वयं भगवान ने प्रकट होकर कहा कि वे इसी रूप में पृथ्वी पर निवास करना चाहते हैं। इसके बाद राजा इंद्रद्युम्न ने इन मूर्तियों को स्थापित किया और मान्यता है कि तभी से भगवान के नगर भ्रमण यानी रथयात्रा की परंपरा की शुरुआत हुई।
कब से शुरू हुई यह महान परंपरा?
यदि ऐतिहासिक और प्रमाणिक दस्तावेजों की बात करें, तो पुरी के जगन्नाथ मंदिर का पुनर्निर्माण 12वीं शताब्दी में गंग वंश के राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव ने शुरू करवाया था और इसे उनके वंशज राजा अनंगभीम देव ने पूरा किया। राजा अनंगभीम देव ने ही भगवान जगन्नाथ को ओडिशा का राष्ट्र-देवता (पुरुषोत्तम जगन्नाथ) घोषित किया और अपना पूरा साम्राज्य भगवान के चरणों में अर्पित कर दिया।
ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, 12वीं-13वीं शताब्दी से इस रथयात्रा को और अधिक सुव्यवस्थित और भव्य रूप मिला। तब से लेकर आज तक, विदेशी आक्रमणों, प्राकृतिक आपदाओं और प्लेग-कोरोना जैसी महामारियों के बावजूद, यह परंपरा कभी रुकी नहीं। इतिहास में ऐसे भी दौर आए जब मुस्लिम शासकों के आक्रमणों के कारण मूर्तियों को गुफाओं या गुप्त स्थानों पर छिपाना पड़ा, लेकिन जैसे ही स्थिति सामान्य हुई, रथयात्रा पुनः पूरी भव्यता के साथ आयोजित की गई।
रथयात्रा से जुड़ी मुख्य पौराणिक कथाएं
इस ऐतिहासिक रथयात्रा की शुरुआत के पीछे कई सुंदर लोक कथाएं और पौराणिक मान्यताएं प्रचलित हैं:
- सुभद्रा की नगर देखने की इच्छा: सबसे प्रचलित मान्यता के अनुसार, एक बार माता सुभद्रा ने अपने भाइयों (कृष्ण और बलराम) से द्वारका नगरी देखने की इच्छा प्रकट की। अपनी लाडली बहन की इच्छा पूरी करने के लिए भगवान कृष्ण और बलराम ने सुभद्रा को रथ पर बैठाया और पूरे नगर का भ्रमण कराया। इसी घटना की स्मृति में हर साल रथयात्रा निकाली जाती है।
- गुंडीचा माता (मौसी) का निमंत्रण: एक अन्य कथा के अनुसार, राजा इंद्रद्युम्न की रानी गुंडीचा भगवान जगन्नाथ की परम भक्त थीं। उनके प्रेम और भक्ति का सम्मान करते हुए भगवान जगन्नाथ ने उन्हें वचन दिया था कि वे हर साल अपने भाई-बहन के साथ उनके घर (गुंडीचा मंदिर) आएंगे। इसीलिए इस यात्रा को ‘गुंडीचा यात्रा’ भी कहा जाता है।
- कंस के निमंत्रण की कथा: कुछ विद्वानों का मानना है कि जब कंस ने कृष्ण और बलराम को मारने के उद्देश्य से मल्ल युद्ध के बहाने मथुरा आमंत्रित किया था, तब अक्रूर जी रथ लेकर गोकुल आए थे। श्रीकृष्ण और बलराम उसी रथ पर बैठकर मथुरा के लिए प्रस्थान किए थे। श्रद्धालुओं के लिए वह क्षण अत्यंत भावुक था। रथयात्रा उसी प्रस्थान और भगवान के दर्शन की याद दिलाती है।
रथयात्रा की मुख्य रस्में और अनूठी परंपराएं
जगन्नाथ रथयात्रा केवल रथ को खींचने का नाम नहीं है, बल्कि यह हफ्तों तक चलने वाली जटिल और पवित्र धार्मिक रस्मों की एक श्रृंखला है:
1. स्नान पूर्णिमा और भगवान का बीमार होना (अनासर काल)
रथयात्रा से ठीक 15 दिन पहले ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी को मंदिर के स्नान वेदी पर लाकर 108 घड़ों के पवित्र जल से स्नान कराया जाता है। अत्यधिक स्नान करने के कारण भगवान ‘बीमार’ पड़ जाते हैं। वे ज्वर (बुखार) से पीड़ित हो जाते हैं। इसके बाद अगले 15 दिनों तक भगवान को एक विशेष विश्राम गृह में रखा जाता है जिसे ‘अनासर घर’ कहा जाता है। इस दौरान मंदिर के मुख्य कपाट आम जनता के लिए बंद रहते हैं और भगवान को केवल काढ़े और जड़ी-बूटियों का भोग लगाया जाता है।
2. नवयौवन दर्शन
15 दिनों के एकांतवास और उपचार के बाद आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा के दिन भगवान पूरी तरह स्वस्थ होकर भक्तों को दर्शन देते हैं। इसे ‘नवयौवन दर्शन’ या ‘नेत्रोत्सव’ कहा जाता है। अपने आराध्य को 15 दिनों बाद देखकर भक्त आनंद से झूम उठते हैं।
3. छेरा पहरा (Chhera Pahara) – राजा बनते हैं झाड़ूदार
यह रथयात्रा की सबसे खूबसूरत और प्रेरणादायक परंपरा है। जब तीनों रथ सजकर मुख्य मंदिर के सामने खड़े होते हैं, तब पुरी के गजपति महाराज (वहाँ के तत्कालीन राजा के वंशज) एक पालकी में सवार होकर आते हैं। वे सोने की झाड़ू से तीनों रथों के चबूतरे और भगवान के रास्ते की सफाई करते हैं तथा उस पर चंदन का पानी छिड़कते हैं।
यह रस्म संदेश देती है कि भगवान के सामने कोई राजा या रंक नहीं है। ब्रह्मांड के स्वामी जगन्नाथ जी के सामने संसार का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति भी केवल एक सेवक (झाड़ू लगाने वाला) ही है। यह सामाजिक समरसता और अहंकार की मुक्ति का अद्भुत उदाहरण है।
4. गुंडीचा मंदिर में विश्राम और ‘हेरा पंचमी’
रथों को खींचकर श्रद्धालु लगभग तीन किलोमीटर दूर गुंडीचा मंदिर ले जाते हैं। यहाँ भगवान सात दिनों तक विश्राम करते हैं। यात्रा के पांचवें दिन को ‘हेरा पंचमी’ कहा जाता है। इस दिन माता लक्ष्मी (भगवान जगन्नाथ की पत्नी) भगवान जगन्नाथ से नाराज होकर उन्हें ढूंढते हुए गुंडीचा मंदिर आती हैं, क्योंकि भगवान उन्हें अपने साथ यात्रा पर नहीं ले गए थे। गुस्से में माता लक्ष्मी भगवान के रथ का एक हिस्सा तोड़ देती हैं और वापस लौट जाती हैं। यह रस्म मानवीय भावनाओं और भगवान के बीच के मधुर संबंध को दर्शाती है।
5. बहुड़ा यात्रा (Ulta Rath Yatra)
गुंडीचा मंदिर में नौ दिन बिताने के बाद, आषाढ़ शुक्ल एकादशी के दिन भगवान वापस मुख्य मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। भगवान की इस वापसी यात्रा को ‘बहुड़ा यात्रा’ या उलटी रथयात्रा कहा जाता है।
पूरे श्रद्धा और उत्साह का माहौल: जनसैलाब और भक्ति का समंदर
रथयात्रा के दिन पुरी की छटा देखने लायक होती है। देश-विदेश से लाखों (कई बार 10 से 15 लाख से भी अधिक) श्रद्धालु पुरी की ‘बड़ा दांड’ (मुख्य सड़क) पर एकत्र होते हैं। चारों ओर ‘जय जगन्नाथ’, ‘हरे कृष्ण’ और शंखध्वनि की गूंज होती है। झांझ, मंजीरे, मृदंग और ढोल की थाप पर भक्त झूमते और नाचते हैं।
रथ खींचने का महापुण्य:
सनातन धर्म में मान्यता है कि जो व्यक्ति रथयात्रा में शामिल होकर भगवान के रथ को खींचता है, या केवल रथ के रस्सों को छू भर लेता है, उसे जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। स्कंद पुराण में कहा गया है—“रथे तु वामनं दृष्ट्वा पुनर्जन्म न विद्यते” अर्थात रथ पर सवार वामन रूप (जगन्नाथ जी) के दर्शन करने मात्र से मनुष्य का पुनर्जन्म नहीं होता। इसी अटूट विश्वास के कारण लोग भारी भीड़ और गर्मी की परवाह किए बिना रथ की रस्सी थामने के लिए लालायित रहते हैं।
वैज्ञानिक और सामाजिक दृष्टिकोण
जगन्नाथ रथयात्रा का धार्मिक महत्व तो है ही, लेकिन इसके सामाजिक और वैज्ञानिक पहलू भी बेहद प्रासंगिक हैं:
- सामाजिक समरसता का प्रतीक: सामान्य दिनों में मंदिर के गर्भगृह में समाज के हर वर्ग या संप्रदाय के लोगों का जाना वर्जित या सीमित हो सकता है (विशेषकर गैर-हिंदुओं के लिए पुरी मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं है)। लेकिन रथयात्रा के दिन भगवान स्वयं चलकर अपने भक्तों के पास आते हैं। चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, संप्रदाय या देश का हो, सड़क पर खड़े होकर भगवान जगन्नाथ के दर्शन कर सकता है। भगवान का यह रूप ‘पतित पावन’ कहलाता है, यानी पापियों और समाज के वंचितों का उद्धार करने वाला।
- इको-फ्रेंडली निर्माण: इन विशाल रथों का निर्माण पूरी तरह से प्राकृतिक लकड़ी से होता है। इसमें किसी भी प्रकार के लोहे के कील, नट-बोल्ट या आधुनिक रसायनों का उपयोग नहीं किया जाता। रथों को जोड़ने के लिए पारंपरिक लकड़ी की पच्चर और रस्सियों का ही प्रयोग होता है। यात्रा समाप्त होने के बाद इन रथों की लकड़ी का उपयोग मंदिर की विशाल रसोई (महाप्रसाद बनाने) में ईंधन के रूप में किया जाता है।
निष्कर्ष
भगवान जगन्नाथ जी की ऐतिहासिक रथयात्रा मात्र एक परंपरा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की उस विशालता का प्रमाण है जो पूरे विश्व को एक सूत्र में पिरोती है। आज यह रथयात्रा केवल पुरी तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इस्कॉन (ISKCON) और अन्य धार्मिक संस्थाओं के प्रयासों से न्यूयॉर्क, लंदन, मॉस्को, सिडनी और दुबई जैसे दुनिया के सैकड़ों बड़े शहरों में भी उतनी ही श्रद्धा और उत्साह के साथ निकाली जाती है।
यह महापर्व हमें सिखाता है कि भगवान केवल संगमरमर के बंद कमरों या गर्भगृहों में रहने वाले संन्यासी नहीं हैं, बल्कि वे अपनी प्रजा के सुख-दुख को जानने के लिए प्रतिवर्ष सड़क पर उतरने वाले एक सहृदय राजा हैं। श्रद्धा, समर्पण, इतिहास और लोक-परंपरा का यह अनूठा संगम ही जगन्नाथ रथयात्रा को विश्व का सबसे महान और जीवंत उत्सव बनाता है।
भगवान जगन्नाथ जी की ऐतिहासिक रथयात्रा से जुड़े कुछ मुख्य और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs):
1. भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा हर साल कब आयोजित की जाती है?
यह रथयात्रा प्रतिवर्ष हिंदू कैलेंडर के अनुसार आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को आयोजित की जाती है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह समय आमतौर पर जून या जुलाई के महीने में आता है।
2. भगवान जगन्नाथ के रथ का नाम क्या है और तीनों रथों में क्या अंतर है?
रथयात्रा में तीन अलग-अलग रथ होते हैं:
- नंदीघोष: यह भगवान जगन्नाथ का रथ है (पीला और लाल रंग, 16 पहिये)।
- तालध्वज: यह बड़े भाई बलभद्र जी का रथ है (हरा और लाल रंग, 14 पहिये)।
- दर्पदलन (या पद्मध्वज): यह बहन सुभद्रा जी का रथ है (काला और लाल रंग, 12 पहिये)।
3. ‘छेरा पहरा’ (Chhera Pahara) की रस्म क्या है?
यह रथयात्रा की सबसे प्रसिद्ध रस्म है, जिसमें पुरी के गजपति महाराज (राजा) स्वयं सोने की झाड़ू से तीनों रथों के चबूतरे की सफाई करते हैं और चंदन का पानी छिड़कते हैं। यह रस्म दर्शाती है कि भगवान के सामने राजा और सामान्य नागरिक सब बराबर हैं।
4. रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ कहाँ जाते हैं?
भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी मुख्य मंदिर से निकलकर लगभग 3 किलोमीटर दूर अपनी मौसी के घर ‘गुंडीचा मंदिर’ जाते हैं। वहाँ वे लगभग 7 से 9 दिनों तक विश्राम करते हैं, जिसके बाद उनकी वापसी यात्रा (बहुड़ा यात्रा) होती है।
5. भगवान की मूर्तियाँ अधूरी क्यों दिखाई देती हैं और वे किस चीज़ से बनी हैं?
पौराणिक कथा के अनुसार, देव-शिल्पी विश्वकर्मा जी बंद कमरे में मूर्तियाँ बना रहे थे, लेकिन राजा इंद्रद्युम्न ने शर्त तोड़कर कमरा खोल दिया, जिससे मूर्तियाँ अधूरी रह गईं। ये मूर्तियाँ धातु या पत्थर की नहीं, बल्कि नीम की पवित्र लकड़ी (जिसे ‘दारु’ कहा जाता है) से बनी होती हैं।
6. ‘अनासर काल’ या भगवान के बीमार होने की परंपरा क्या है?
रथयात्रा से 15 दिन पहले (ज्येष्ठ पूर्णिमा को) भगवान को 108 घड़ों के पानी से स्नान कराया जाता है। इसके बाद माना जाता है कि भगवान को बुखार आ गया है। इस 15 दिनों की अवधि को ‘अनासर’ कहा जाता है, जिसमें मंदिर के कपाट बंद रहते हैं और भगवान को केवल काढ़े का भोग लगाया जाता है। इसके बाद ‘नवयौवन दर्शन’ के दिन वे पूरी तरह स्वस्थ होकर भक्तों को दर्शन देते हैं।
7. पुरी मंदिर की रसोई और ‘महाप्रसाद’ की क्या विशेषता है?
पुरी जगन्नाथ मंदिर की रसोई को दुनिया की सबसे बड़ी रसोई माना जाता है। यहाँ मिट्टी के 7 बर्तनों को एक के ऊपर एक रखकर लकड़ी के चूल्हे पर प्रसाद पकाया जाता है। रहस्य की बात यह है कि जो बर्तन सबसे ऊपर होता है, उसका खाना सबसे पहले पकता है। इस प्रसाद को ‘महाप्रसाद’ या ‘अबाधा’ कहा जाता है।
8. क्या गैर-हिंदुओं को इस रथयात्रा में शामिल होने की अनुमति है?
सामान्य दिनों में पुरी के मुख्य जगन्नाथ मंदिर में गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है। लेकिन रथयात्रा के दिन भगवान स्वयं मंदिर से बाहर सड़क पर आते हैं, ताकि किसी भी जाति, धर्म या देश का व्यक्ति बिना किसी भेदभाव के उनके दर्शन कर सके। इसीलिए भगवान को इस रूप में ‘पतित पावन’ भी कहा जाता है।
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