टिकोरे से खटाई तक: जानिए सुतुही से छिलने वाली नर्म कल्ली की खटाई की निर्माण प्रक्रिया और बचपन की यादें!

tikore-se-khatai-making-process

टिकोरे से खटाई तक: ग्रामीण रसोई की दूरदर्शिता, दोपहर का संघर्ष और यादों की खटास

भारतीय ग्रामीण जीवन की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि यहाँ प्रकृति से मिलने वाली छोटी से छोटी वस्तु को भी व्यर्थ नहीं जाने दिया जाता। हर मौसम की अपनी एक व्यावहारिक योजना होती है और गृहणियाँ अपनी पारंपरिक सूझबूझ से आने वाले पूरे साल के खान-पान की सुरक्षा तय करती हैं। गर्मियों का मौसम आते ही गांवों में एक अलग ही सुगबुगाहट शुरू हो जाती है। यह समय सिर्फ आम के पकने का इंतज़ार करने का नहीं होता, बल्कि कच्चे आमों (टिकोरो) से लेकर बड़े और कड़े आमों को तरह-तरह के अचार, गलका और ‘खटाई’ में तब्दील करने का एक लंबा, श्रमसाध्य उत्सव होता है।

इस पूरे घरेलू उद्योग के केंद्र में होती हैं घर की मां और दादियां, जिनकी सयानी आँखें हवा से गिरे एक भी टिकोरे को ज़मीन पर सड़ने नहीं देतीं। आइए, हवा से गिरे टिकोरों से बनने वाली नर्म कल्ली की खटाई, दोपहर के समय लग्गी से आम तोड़ने की कला, पेड़ पर चढ़ने का संघर्ष और बच्चों की उन दोपहरिया यादों को गहराई से महसूस करते हैं।

हवा के झोंके और मां की सुतुही: नर्म कल्ली की खटाई

वैशाख और जेठ के महीनों में दोपहर के समय चलने वाली तेज हवा, चिलचिलाती लू या अचानक आए आंधी-तूफान के कारण पेड़ों से छोटे-छोटे कच्चे आम टूटकर नीचे गिर जाते हैं। इसके अलावा, पेड़ों पर बसेरा करने वाली गौरैया, तोते और अन्य चिड़ियाँ भी अक्सर आम के इन छोटे-छोटे टिकोरों को अपनी चोंच से काटकर नीचे गिरा देती हैं।

इन गिरे हुए टिकोरों को सहेजने का काम घर की मां पूरी निष्ठा के साथ करती हैं। वे प्रतिदिन सुबह और शाम बगीचे से इन टिकोरों को बटोरकर लाती हैं। इसके बाद शुरू होता है एक पारंपरिक अनुष्ठान। मां आंगन में बैठकर ‘सुतुही’ (सीप या धातु का एक पारंपरिक छोटा छिलका-यंत्र) की मदद से इन छोटे-छोटे टिकोरों को बेहद बारीकी से छिलती हैं। छीलने के बाद इन्हें बीच से काटकर पतली-पतली कल्लियों (फांकों) में तब्दील कर दिया जाता है। फिर इन कल्लियों को चारपाई या जमीन पर सूती कपड़ा बिछाकर तेज धूप में सूखने के लिए फैला दिया जाता है।

इस शुरुआती मौसम में गिरने वाले टिकोरों की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि इनके भीतर की गुठली अभी पूरी तरह कठोर (कड़ी) नहीं हुई होती। इस अवस्था में गुठली एकदम नर्म और लचीली होती है, जिसे आसानी से काटा जा सकता है। इसी वजह से इन टिकोरों से सूखकर जो खटाई तैयार होती है, उसे ‘नर्म कल्ली की खटाई’ कहा जाता है। यह खटाई बेहद बहुउपयोगी होती है क्योंकि इसमें कोई कड़ा रेशा या लकड़ी जैसी गुठली नहीं होती।

नर्म कल्ली की खटाई के अद्भुत उपयोग:

  • दैनिक चटनी में: पुदीना, धनिया और हरी मिर्च के साथ इस नर्म खटाई को पीसने पर जो स्वाद आता है, वह किसी भी रेडीमेड अमचूर पाउडर में नहीं मिल सकता। यह पूरी तरह घुल जाती है।
  • भरवां मिर्च के अचार में: सर्दियों में बनने वाले बनारसी या अवधी लाल भरवां मिर्च के मसाले में इसी खटाई को ओखली में कूटकर मिलाया जाता है। यह मसाले को वो पारंपरिक खट्टापन और सोंधापन देती है जिसके लिए मिर्च का अचार प्रसिद्ध है।
  • सुरन (जिमीकंद) के अचार में: सुरन का अचार बनाते समय उसमें तीखापन और गले की खराश को काटने के लिए अत्यधिक खटास की जरूरत होती है। इस नर्म कल्ली की खटाई को कूटकर सुरन में मिलाने से अचार का स्वाद कई गुना बढ़ जाता है।

गांवों में सबसे ज्यादा खट्टे और कड़े देशी आमों का चुनाव विशेष रूप से अचार और इसी प्रकार की पारंपरिक खटाई बनाने के लिए ही किया जाता है।

मां का नियम: “जब तक जलिया न जाए, टिकोरा नहीं तोड़ा जाता”

ग्रामीण लोक-संस्कृति में प्रकृति के साथ एक गहरा अनुशासन जुड़ा होता है। जब तक पेड़ पर लगा आम पूरी तरह ‘जलिया’ नहीं जाता (यानी जब तक आम के भीतर की गुठली मजबूत और कड़क नहीं हो जाती), तब तक जानबूझकर पेड़ से एक भी टिकोरा तोड़ा नहीं जाता। मां हमेशा कहती हैं कि “पेड़ पर लगे छोटे टिकोरे को अकारण तोड़ना पाप है, वह आने वाले समय की फसल है।”

यही कारण है कि जब तक आम छोटा रहता है, केवल हवा या चिड़ियों के काटने से खुद-ब-खुद गिरे हुए आमों का ही उपयोग नर्म कल्ली की खटाई बनाने के लिए किया जाता है। प्रकृति के नियमों का यह आदर ही ग्रामीण जीवन को संतुलित बनाए रखता है।

दुपहरिया का मिशन: लग्गी से आमों की चिनवाई

जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती है और जेठ का महीना अपने चरम पर पहुंचता है, पेड़ों पर लटके आम आकार में बड़े और कड़े होने लगते हैं। उनके भीतर की गुठली (जलिया) पूरी तरह मजबूत हो जाती है। अब समय आता है बड़े पैमाने पर खटाई बनाने का।

तपती दुपहरिया में, जब पूरा गांव सो रहा होता है, घर के पुरुष और महिलाएं हाथ में ‘लग्गी’ (बांस का एक बहुत बड़ा और लंबा डंडा जिसके शीर्ष पर लोहे की दरांती या फंसा लगा होता है) लेकर बागों की तरफ रुख करते हैं। लग्गी की मदद से ऊंचे पेड़ों की डालियों पर लटके बड़े-बड़े कच्चे आमों को बेहद सावधानी से काटा जाता है। नीचे खड़े लोग उन्हें कपड़ों या टोकरियों में लपकते हैं ताकि वे ज़मीन पर गिरकर फूटें नहीं।

इस तरह दोपहर भर की मेहनत में एक बोरा, दो बोरा आम तोड़कर घर लाया जाता है। फिर घर के सभी सदस्य, पड़ोसी और बच्चे मिलकर उन आमों को छीलने, काटने और सुखाने के काम में जुट जाते हैं। इस समय बनने वाली खटाई आकार में बड़ी होती है और इसे साल भर के लिए बड़े-बड़े बर्तनों या कनस्तरों में भरकर सुरक्षित रख लिया जाता है।

पेड़ पर चढ़ने का संघर्ष और ‘माटा’ का खौफ

जहां खटाई बनाने के लिए लग्गी से तोड़े गए या नीचे गिरे आम काम आ जाते हैं, वहीं ‘अचार’ बनाने का नियम बिल्कुल अलग और कड़ा होता है। दादी-नानियां हमेशा हिदायत देती हैं कि अचार के लिए इस्तेमाल होने वाले आमों में एक भी दाग, खरोंच या चोट नहीं होनी चाहिए। अगर लग्गी से गिरा आम जमीन पर जरा भी टकरा गया या उस पर अंदरूनी चोट (काले निशान) आ गई, तो वह पूरे अचार के डिब्बे को सड़ा सकता है।

इसलिए, अचार का आम हमेशा पेड़ पर चढ़कर, एक-एक करके हाथ से बेहद कोमलता से तोड़ा जाता है। लेकिन पेड़ पर चढ़ना कोई आसान काम नहीं है; यह अपने आप में एक बड़ा संघर्ष और कला है।

  1. पेड़ पर चढ़ने का हुनर: पहली बात तो यह कि हर किसी को आम के विशाल और टेढ़े-मेढ़े पेड़ों पर संतुलन बनाकर चढ़ना नहीं आता। इसके लिए शारीरिक फुर्ती और अभ्यास की जरूरत होती है।
  2. पतली डालियों की हिम्मत: सबसे बेहतरीन और बेदाग आम अक्सर पेड़ के सबसे ऊपरी हिस्सों और बेहद पतली डालियों के सिरों पर लटके होते हैं। उन पतली डालियों तक रेंगते हुए जाने और वहां बैठकर आम तोड़ने के लिए गजब के हौसले और संतुलन की आवश्यकता होती है।
  3. ‘माटा’ का खौफनाक पहरा: इस पूरे संघर्ष की सबसे बड़ी चुनौती होते हैं ‘माटा’ (आम के पत्तों को आपस में जाले से जोड़कर घर बनाने वाले बड़े, भूरे और आक्रामक चींटे)। आम तोड़ते समय जैसे ही किसी डाली या पत्ते को हाथ लगता है, ये सैकड़ों माटा एक साथ शरीर पर टूट पड़ते हैं। इनका काटना इतना तेज और जलन पैदा करने वाला होता है कि अच्छे-अच्छे हिम्मत हार जाते हैं। जो व्यक्ति इन माटा के काटने के दर्द को सहते हुए, बिना विचलित हुए आम तोड़कर नीचे सुरक्षित टोकरी में पहुंचा देता है, वही असली खिलाड़ी माना जाता है।

बच्चों की दोपहरिया आवारागर्दी और मीठी डांट

आम के इस पूरे सीजन में बच्चों की अपनी एक समानांतर दुनिया चल रही होती है। कड़कड़ाती धूप, लू के थपेड़े और बड़ों की मनाही के बावजूद, बच्चों की टोलियां दोपहर के बारह-एक बजे ही चुपके से घरों से निकलकर बागों में मंडराने लगती थीं।

पूरी दुपहरिया धूल भरी पगडंडियों पर घूम-घूम कर, पेड़ों के नीचे छिपे पत्तों को लाठियों से हटा-हटा कर टिकोरे बीनना बच्चों का सबसे पसंदीदा शगल होता था। जेबें और शर्ट के दामन इन छोटे-छोटे टिकोरों से भर जाते थे। जब ये बच्चे शाम को थके-हारे, धूल से सने और लाल आँखें लेकर घर लौटते थे, तो सबसे पहले मां या दादी की ज़ोरदार डांट पड़ती थी—“इतनी धूप में मर रहे थे, लू लग जाएगी तो कौन दवा कराएगा!”

लेकिन इस डांट के तुरंत बाद एक असीम ममता छिपी होती थी। मां बच्चों के हाथ से वो धूल भरे टिकोरे ले लेती थीं, उन्हें पानी से साफ करती थीं और फिर उन्हीं टिकोरों को छीलकर उनके हिस्से की भी खटाई बना देती थीं। कभी-कभी उन ताजे टिकोरों पर नमक और पिसी मिर्च लगाकर बच्चों को खाने के लिए दिया जाता था, जिसका तीखा-खट्टा स्वाद आज भी जुबान पर याद बनकर तैरता है।

निष्कर्ष – सुतुही का जादू, दोपहर का संघर्ष और हमारे बचपन की यादों का सोंधापन बसा है!

टिकोरे से खटाई बनने का यह सफर सिर्फ एक खाद्य पदार्थ के निर्माण की प्रक्रिया नहीं है। यह भारतीय ग्रामीण समाज की उस आत्मनिर्भरता का प्रतीक है, जहाँ प्रकृति के हर उपहार को सहेजने का सलीका मालूम है। आज भले ही बाज़ारों में पैकेट बंद अमचूर और रेडीमेड अचार आसानी से मिल जाते हैं, लेकिन धूप में सुखाई गई उस नर्म कल्ली की खटाई में जो मां के हाथों की सुतुही का जादू, दोपहर का संघर्ष और हमारे बचपन की यादों का सोंधापन बसा है, उसकी तुलना दुनिया के किसी भी आधुनिक पकवान से नहीं की जा सकती।

#TikoreKiKhatai, #SutuhiSeAam, #MangoSeason, #VillageNostalgia, #RuralKitchen, #IndianAchar, #GraminJivan, #GondaBasti, #AwadhCulture, #ChildhoodMemories, #TraditionalCooking, #DesiRasoi, #IndianTraditions, #HomeMadeAchar, #EcoFriendlyFood, #VocalForLocal, #IncredibleIndia, #SummerNostalgia, #AamKaAchar, #HandmadeWithLove

Leave a Reply