Kandaura (कंडौरा) क्या है? जानिए कंडा-चिपरी सहेजने की पारंपरिक तकनीक और ग्रामीण भारत में ईंधन सुरक्षा का बेहतरीन तरीका!
कंडौरा: ग्रामीण जीवन में ईंधन सुरक्षा और लोक-परंपरा का अनूठा ढांचा
आधुनिक रसोई गैस (LPG) और इंडक्शन चूल्हों के इस दौर में भी भारतीय ग्रामीण अंचलों की अपनी एक आत्मनिर्भर जीवनशैली है। शहरों से दूर, गांवों में आज भी पारंपरिक संसाधनों का उपयोग बेहद समझदारी और दूरदर्शिता के साथ किया जाता है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था और दैनिक जीवन में पशुधन का बहुत बड़ा महत्व है। गाय और भैंस के गोबर से तैयार होने वाले उपले (कंडी या चिपरी) केवल एक ईंधन मात्र नहीं हैं, बल्कि यह पूरे वर्ष की रसोई को सुचारू रूप से चलाने का मुख्य आधार होते हैं।
उत्तर प्रदेश के गोण्डा, बस्ती और आसपास के अवध-पूर्वांचल क्षेत्रों में इन उपलों को साल भर की बारिश और सीलन से सुरक्षित रखने के लिए एक विशेष पारंपरिक ढांचा बनाया जाता है, जिसे ‘कंडौरा’ (कंडौर या कंडेरी) कहा जाता है। कंडौरा बनाना, उपलों को संचित करना और इस दौरान होने वाले सामूहिक ग्रामीण अनुभव हमारी समृद्ध लोक-संस्कृति की एक अनूठी कहानी बयां करते हैं। आइए, कंडा-चिपरी के बनने, भीटहुर की परंपरा, इसे उजाड़ने के रोमांच और कंडौरे की अनूठी निर्माण तकनीक को गहराई से समझते हैं।

कंडा और चिपरी: मौसम के चक्र से जुड़ा निर्माण
ग्रामीण क्षेत्रों में बारिश का मौसम खत्म होते ही और सर्दियों की आहट के साथ, यानी अक्टूबर-नवंबर के महीने से उपले बनाने का काम तेजी से शुरू हो जाता है। गोण्डा और बस्ती जिलों की अपनी एक क्षेत्रीय विशेषता है कि यहाँ गोबर से दो अलग-अलग आकारों के उपले तैयार किए जाते हैं, जिनके नाम और उपयोग भी अलग होते हैं:
- कंडी (लम्बे उपले): गोबर को हाथों से एक लंबा, बेलनाकार या थपकीनुमा आकार देकर धूप में सुखाया जाता है। इन्हें यहाँ ‘कंडी’ या ‘कंडा’ कहा जाता है। ये आकार में बड़े और मोटे होते हैं, जो लंबे समय तक धीमी आंच देने के लिए उपयुक्त माने जाते हैं।
- चिपरी (गोल उपले): गोबर को हथेली से गोल और चपटा आकार देकर दीवारों या जमीन पर थापा जाता है। छोटे आकार के इन गोल उपलों को ‘चिपरी’ कहते हैं। ये बहुत जल्दी सूखते हैं और चूल्हा तुरंत सुलगाने या तेज आंच की जरूरत के लिए बेहतरीन ईंधन माने जाते हैं।
पूरी सर्दियों भर ग्रामीण महिलाएं सुबह-शाम खेतों, बागों और आंगनों में इन्हें थापती हैं। जब ये कंडे और चिपरियां अच्छी तरह धूप में सूख जाती हैं, तो इन्हें खेतों या बागों में ही एक अस्थाई ऊंचे ढेर के रूप में जमा किया जाता है, जिसे ‘भीटहुर’ या ‘बिटौड़ा’ कहा जाता है।
बसंत पंचमी और ‘भीटहुर’ का धार्मिक व व्यावहारिक नियम
ग्रामीण जीवन पूरी तरह प्रकृति और त्योहारों के चक्र से बंधा हुआ है। बसंत पंचमी का दिन इस पूरे चक्र में एक महत्वपूर्ण मोड़ लेकर आता है। इस दिन गांवों में सार्वजनिक स्थानों पर ‘होलिका’ गाड़ी जाती है। इसी पावन दिन पर खेतों में खड़े उपलों के ढेरों यानी ‘भीटहुर’ को पूजकर उनका मुंह बंद करने की एक बेहद खूबसूरत लोक-परंपरा है।
इस दिन भीटहुर के शीर्ष पर आम के हरे पल्लव (पत्ते), तीसी (अलसी) के पौधे और जौ की बालियां गाड़कर या बांधकर उसका मुंह पूरी तरह बंद कर दिया जाता है। इस धार्मिक अनुष्ठान का एक बहुत बड़ा व्यावहारिक संदेश होता है। इसका सीधा मतलब यह होता है कि अब कंडे-चिपरी बनाने का मौसमी समय समाप्त हो चुका है। अब आने वाले महीनों में गर्मी बढ़ेगी और पशुओं के गोबर को उपले बनाने के बजाय सीधे खेतों के लिए ‘गोबर खाद’ (कम्पोस्ट) के रूप में गड्ढों में इकट्ठा किया जाएगा ताकि आगामी फसलों को प्राकृतिक पोषण मिल सके। हमारी परंपराएं कितनी वैज्ञानिक और प्रकृति के अनुकूल हैं, यह भीटहुर की इस रीत से साफ पता चलता है।
भीटहुर उजाड़ना: रोमांच, खतरा और बचपन की यादें
गेहूं की कटाई (कटिया) समाप्त होने और कटी हुई फसल से भूसा तैयार कर उसे सुरक्षित स्थानों (जैसे मंडिला) में रखने के बाद, ग्रामीण जीवन का अगला सबसे बड़ा मिशन होता है—बाग-बगीचों से उपलों को घर लाना। कड़ाके की धूप में भीटहुर को उजाड़ना और उपलों को घर तक पहुंचाना पूरे परिवार, विशेषकर बच्चों के लिए एक बड़े उत्सव और रोमांच जैसा होता था।
भीटहुर को उजाड़ना बेहद जोखिम भरा काम माना जाता था। महीनों से खेतों या बागों में एक जगह स्थिर रहने के कारण उस उपलों के ढेर के नीचे और बीच के खोखले हिस्सों में ढेरों छोटे-बड़े कीड़े-मकोड़े, बिच्छू और यहाँ तक कि जहरीले सांप अपना बसेरा बना लेते थे। इसलिए, भीटहुर को कोई भी बच्चा या नौसिखिया हाथ नहीं लगाता था। घर के बड़े-बुजुर्ग बेहद सावधानी से हाथ में एक लंबा ‘हंसिया’ या लाठी लेकर भीटहुर को धीरे-धीरे ऊपर से उजाड़ते थे। जैसे ही कोई बिच्छू या सांप निकलता, उसे तुरंत हटाया जाता था।
इस खतरे के बीच बच्चों की अपनी अलग ही टोली तैयार रहती थी। बड़े-बुजुर्ग उपले नीचे गिराते जाते और बच्चे फुर्ती से उन्हें हाथ-ठेला (लकड़ी या लोहे की रेहड़ी) पर तरतीब से सजाकर रखते थे। जब ठेला उपलों से पूरी तरह भर जाता, तो उसे खींचकर घर तक पहुंचाया जाता था। इस काम का सबसे मजेदार हिस्सा तब शुरू होता था जब ठेला घर पर उपले खाली करके वापस बाग की तरफ जाता था। खाली ठेले पर मोहल्ले के सारे बच्चे लद जाते थे और हंसते-खेलते, शोर मचाते हुए वापस बाग पहुंचते थे। यह कड़ी मेहनत भी बच्चों के सामूहिक खेल और आनंद में बदल जाती थी।
कंडौरे की निर्माण तकनीक: इंजीनियरिंग और समझदारी का नमूना
बाग से घर लाए गए हजारों उपलों को सीधे जमीन पर या खुले में नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि मानसूनी बारिश की एक ही बौछार इन्हें गलाकर दोबारा गोबर कीचड़ में बदल सकती है। इसलिए, इन्हें सुरक्षित रखने के लिए घर के पिछवाड़े या सुरक्षित स्थान पर ‘कंडौरा’ तैयार किया जाता है। इसकी बनावट किसी बेहतरीन सिविल इंजीनियरिंग से कम नहीं होती:
- जमीन से ऊंचाई (ईंटों का आधार): सबसे पहले कंडौरे की जमीन तैयार की जाती है। जमीन पर चारों तरफ ईंटें बिछाई जाती हैं ताकि पूरा ढांचा जमीन की सतह से थोड़ा ऊंचा रहे। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि भारी बारिश के दौरान अगर जमीन पर पानी भरे या जलजमाव हो, तो पानी नीचे ही रहे और ऊपर रखे उपलों तक न पहुँच पाए।
- लकड़ियों का ठाठ: ईंटों के इस ऊंचे आधार के ऊपर मोटी-मोटी मजबूत लकड़ियों का एक जालनुमा ढांचा (ठाठ) बनाया जाता है। यह ठाठ उपलों के भारी वजन को संभालता है और जमीन की सीलन को पूरी तरह रोक देता है।
- उपलों की तरतीबवार चिनवाई: इस ठाठ के ऊपर कंडे और चिपरियों को एक के ऊपर एक बेहद सलीके से दीवारों की तरह चीना (सजाया) जाता है। चिनवाई इस तरह की जाती है कि पूरा ढांचा हवा के झोंके से गिरे नहीं।
- छप्पर का सुरक्षा कवच: जब सारे उपले रख दिए जाते हैं, तब कंडौरे के सबसे ऊपर फूंस, पुआल या गन्ने की सूखी पत्तियों से बना एक मजबूत छप्पर (छत) रख दिया जाता है। यह ढलवां छप्पर बारिश के पानी को सीधे नीचे गिरा देता है और उपले अंदर पूरी तरह सूखे और सुरक्षित बने रहते हैं।
इस पारंपरिक तरीके से निर्मित कंडौरे के भीतर बंद होकर कंडे-चिपरी पूरे वर्ष भर के लिए सुरक्षित हो जाते हैं।
निष्कर्ष: ईंधन की आत्मनिर्भरता और सुकून
एक बार जब घर के कोने में कंडौरा बनकर तैयार हो जाता था, तो ग्रामीण गृहणियों और पूरे परिवार के सिर से एक बहुत बड़ी चिंता उतर जाती थी। अब पूरे एक साल के लिए—चाहे कितनी भी मूसलाधार बारिश हो, बाढ़ आए या आंधियां चलें—घर में जलावन (ईंधन) की कोई चिंता नहीं रहती थी।
कंडौरे से रोज सुबह-शाम जरूरत के अनुसार कंडे निकाले जाते, जिससे चूल्हा सुलगता और पूरियां, रोटियां, दाल और पारंपरिक व्यंजन पकते थे। कंडौरा सिर्फ गोबर के उपलों का ढेर नहीं है, बल्कि यह विपरीत मौसम से लड़ने की इंसानी तैयारी, मेहनत की कमाई को सहेजने की कला और सामूहिक ग्रामीण संस्कृति का एक बेहद खूबसूरत और जीवंत दस्तावेज है।
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