बेना (Bena) क्या है? बिजली कटने पर आज भी गांवों का सहारा है यह हाथ का पंखा!
बेना (Bena): हमारी लोक-संस्कृति और ग्रामीण जीवन का आधार, आधुनिकता की चकाचौंध और तकनीकी विकास ने हमारे जीवन को बेहद आरामदायक बना दिया है। आज शहरी क्षेत्रों में गर्मी से बचने के लिए एयर कंडीशनर (AC), कूलर और आधुनिक पंखे हर घर का हिस्सा हैं। बिजली जाने पर भी बैकअप के रूप में इन्वर्टर और जनरेटर पलक झपकते ही सेवा में हाजिर हो जाते हैं। लेकिन इस आधुनिक युग में भी एक ऐसी पारंपरिक वस्तु है, जो न केवल ग्रामीण क्षेत्रों में भीषण गर्मी से राहत दिलाती है, बल्कि हमारी लोक-संस्कृति और समृद्ध इतिहास को भी अपने भीतर समेटे हुए है। इस अनूठी और बेहद उपयोगी कलाकृति का नाम है—’बेना’ (हाथ से बनाया जाने वाला पंखा)।
बेना केवल हवा करने का एक साधन मात्र नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण महिलाओं के हुनर, धैर्य, कड़ी मेहनत और हमारी सदियों पुरानी परंपराओं का जीवंत प्रतीक है। आइए, बेना के बनने की जटिल प्रक्रिया, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, दैनिक जीवन में इसकी महत्ता और हमारी विवाह परंपराओं में इसके स्थान को गहराई से समझते हैं।
बेना बनाने की अद्भुत और श्रमसाध्य प्रक्रिया
एक सुंदर और टिकाऊ बेना तैयार करना कोई आसान काम नहीं है। यह पूरी तरह से हस्तशिल्प पर आधारित है, जिसमें अत्यधिक धैर्य और शारीरिक श्रम की आवश्यकता होती है। बेना बनाने की शुरुआत प्रकृति से मिलने वाली ‘सेंठा’ (सरकंडे) की सींकों से होती है। इसकी निर्माण प्रक्रिया को निम्नलिखित चरणों में समझा जा सकता है:
- सींकों का संचयन और तैयारी: सबसे पहले सेंठा की मजबूत और लंबी सींकों को चुनकर तोड़ा जाता है। इसके बाद, हंसिया या तेज चाकू की मदद से बेहद सावधानीपूर्वक इन सींकों को बीच से फाड़कर दो बराबर भागों (सींकों) में विभाजित किया जाता है।
- नमी और लचीलापन देना: फटी हुई इन सूखी सींकों को कुछ समय के लिए पानी में भिगोकर रखा जाता है। पानी में भीगने से सींकें नर्म और लचीली हो जाती हैं, जिससे उन्हें मोड़ना या बुनना आसान हो जाता है और वे टूटती नहीं हैं।
- सफाई और चपटा करना: नर्म हो चुकी सींकों को समतल सतह पर रखकर घरेलू बेलन की मदद से बेला जाता है ताकि वे पूरी तरह चपटी हो जाएं। इसके साथ ही, खुरपे की मदद से सींक के अंदर के अनचाहे गूदे को छीलकर साफ किया जाता है। इस अत्यधिक मेहनत के बाद बेना बुनने के लिए बुनियादी ‘बल्ला’ (स्ट्रिप) तैयार होता है।
- रंगाई और बुनाई (डिजाइन): तैयार बल्ले को कलाकार अपनी पसंद के आकर्षक रंगों में रंगते हैं। इसके बाद, इन रंग-बिरंगे बल्लों को आपस में एक निश्चित ज्यामितीय पैटर्न या मनपसंद कलात्मक डिजाइन में गूंथा (बुना) जाता है। यही वह चरण है जहां बनाने वाले की रचनात्मकता निखर कर सामने आती है।
- कटाई और सिलाई: जब बेना का मुख्य हिस्सा बुनकर तैयार हो जाता है, तब उसे एक निश्चित और सुंदर आकार (प्रायः चौकोर या गोल) में रखा जाता है। बाकी बचे हुए अतिरिक्त बल्लों को बराबर दूरी से काट दिया जाता है। इसके बाद, बेना को मजबूती देने के लिए दर्जी की दुकान से लाए गए रंग-बिरंगे सूती कपड़ों की कतरन (बचे हुए टुकड़े) से इसके तीनों किनारों को सिल दिया जाता है।
- साटा और पोंगी का संयोजन: बेना को पकड़ने और घुमाने के लिए इसके एक तरफ ‘साटा’ और ‘पोंगी’ लगाई जाती है। साटा वास्तव में बांस की एक पतली, लचीली और मजबूत टहनी से बनता है। वहीं पोंगी के रूप में साइकिल के पैडल में लगने वाली पतली लोहे या प्लास्टिक की नली का उपयोग किया जाता है। इसे पकड़कर बेना को आसानी से गोल-गोल घुमाया या हांका जा सकता है।
- झालर से अंतिम श्रृंगार: बेना पूरी तरह सिलकर तैयार हो जाने के बाद, उसके किनारों पर बची हुई रंग-बिरंगी कतरनों से सुंदर झालर बनाई जाती है। यह झालर न केवल बेना के धागों को छुपाती है, बल्कि हवा करते समय उसकी सुंदरता में चार चांद लगा देती है।
ग्रामीण जीवन में बेना की अपरिहार्य उपयोगिता
आज के समय में शहरों में बेना की आवश्यकता लगभग समाप्त हो चुकी है। शहरी जीवन पूरी तरह बिजली और इन्वर्टर पर निर्भर है। परंतु भारतीय ग्रामीण क्षेत्रों की वास्तविकता आज भी काफी अलग है। गांवों में बिजली की स्थिति पहले से बेहतर जरूर हुई है, लेकिन आज भी वहां हर घर में इन्वर्टर की सुविधा उपलब्ध नहीं है। जिन संपन्न घरों में इन्वर्टर हैं भी, वहां भीषण गर्मी के दिनों में बिजली का लंबा कट लगने के कारण इन्वर्टर पूरी तरह चार्ज नहीं हो पाते। ऐसे में इन्वर्टर ज्यादा देर तक बैकअप नहीं दे पाते और जवाब दे जाते हैं।
इसके अलावा, ग्रामीण क्षेत्रों में गर्मियों और मानसून के मौसम में आंधी-तूफान आना आम बात है। गांवों के दूर-दूर बसे होने के कारण बिजली के खंभों के बीच की दूरी बहुत अधिक होती है। तेज आंधी में अक्सर पेड़ गिरने या खिंचाव के कारण बिजली के तार टूट जाते हैं। चूंकि ये क्षेत्र मुख्य केंद्रों से दूर होते हैं, इसलिए तकनीकी खराबी को ठीक करने और बिजली बहाल होने में कभी-कभी तीन से चार दिन या उससे भी अधिक का समय लग जाता है। ऐसी विकट और दमघोंटू गर्मी की स्थिति में, यही हाथ का पंखा (बेना) ग्रामीणों के लिए राहत और जीवन जीने का एकमात्र सहारा बनता है। यह बिना किसी बिजली या बैटरी के, केवल मानवीय ऊर्जा से ठंडी हवा प्रदान कर गर्मी से मुक्ति दिलाता है।
दैनिक घरेलू कार्यों में बेना की भूमिका – बेना केवल हवा खाने का साधन नहीं है, बल्कि ग्रामीण जीवन के कई रोजमर्रा के कामों में इसकी अत्यंत महत्वपूर्ण और सक्रिय भूमिका होती है:
- मच्छर भगाने के लिए (धुइन्हर सुलगाना): गांवों में शाम के समय जब पालतू पशुओं (गाय, भैंस, बैल) को खेतों से लाकर उनके आराम करने के स्थान (खूंटे) पर बांधा जाता है, तब उन्हें मच्छरों और मक्खियों के प्रकोप से बचाने के लिए ‘धुइन्हर’ (सूखे उपले, नीम के पत्ते और भूसे से किया जाने वाला धुआं) किया जाता है। इस धुइन्हर की आग को सुलगने और धुएं को चारों तरफ फैलाने के लिए बेना से लगातार हवा दी जाती है।
- पारंपरिक चूल्हा और रसोई: ग्रामीण रसोई में आज भी पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद बेना का मोहताज है। यदि आग पर मक्की (भुट्टा) सेकना हो, या उत्तर भारत का प्रसिद्ध पारंपरिक व्यंजन ‘लिट्टी-चोखा’ बनाना हो, तो कोयले या उपले की आग को लगातार प्रज्वलित रखने के लिए बेना से ही हवा दी जाती है। बेना की मदद से आग की आंच को नियंत्रित किया जाता है, जिससे भोजन पूरी तरह और स्वादिष्ट पकता है।
सांस्कृतिक महत्व: विवाह परंपरा और विदाई का उपहार
समय के साथ भले ही बेना का स्थान ‘अति महत्वपूर्ण’ से घटकर ‘जरूरत’ पर आ गया हो, लेकिन इसका सांस्कृतिक और भावनात्मक मूल्य आज भी उतना ही अटूट है। हमारे समाज में, विशेषकर ग्रामीण और कस्बाई अंचलों में, जब कोई बेटी विवाह के बंधन में बंधकर पहली बार अपने ससुराल (दुल्हनिया बनकर) आती है, तो उसके साथ आने वाले साजो-सामान में बेना का होना अनिवार्य माना जाता है।
परंपरा के अनुसार, वधू पक्ष की ओर से दुल्हन के साथ ढेर सारी पारंपरिक मिठाइयों के अलावा कुछ विशेष हस्तशिल्प की वस्तुएं भेजी जाती हैं। इनमें वाडिया (विशेष कलात्मक टोकरी), मौनी (घास या सींक से बनी छोटी डलिया), सिकाहुली (सिक्कों या धागों से बनी सजावटी वस्तु) और ‘बेना’ विशेष रूप से शामिल होते हैं। ससुराल आते समय दुल्हन अपने साथ कम से कम पांच या सात बेना जरूर लाती है।
यदि दुल्हन खुद हुनरमंद (गुणवान या शिल्पकला में निपुण) है, तो वह अपने मायके में अपने हाथों से सिलाई, बुनाई और कढ़ाई करके बेहद खूबसूरत डिजाइन वाले दर्जनों बेना तैयार करती है और उन्हें अपने साथ ससुराल लाती है। इन हाथ के पंखों को ससुराल के बुजुर्गों, ननद और अन्य रिश्तेदारों को उपहार स्वरूप भेंट किया जाता है। यह दुल्हन के सलीके, धैर्य और कलात्मक कौशल का परिचय देता है। ससुराल के लोग इन सुंदर पंखों को देखकर नई वधू के गुणों की प्रशंसा करते हैं, जिससे दोनों परिवारों के बीच स्नेह और बढ़ता है।
निष्कर्ष
संक्षेप में कहें तो, बेना महज सींक और कपड़े के टुकड़ों से बना एक साधारण पंखा नहीं है। यह भारत की उस आत्मनिर्भर और रचनात्मक ग्रामीण संस्कृति का हिस्सा है, जो अनुपयोगी और प्राकृतिक चीजों (जैसे सेंठा की सींक और कपड़े की कतरन) से भी एक अत्यंत उपयोगी और सुंदर वस्तु का निर्माण कर लेती है।
आज के यंत्रीकृत युग में भले ही बिजली के उपकरणों ने हमारे कमरों को ठंडा कर दिया हो, लेकिन बेना की ठंडी हवा में जो सोंधी खुशबू, मां-दादी का दुलार और हमारी लोक-परंपराओं का अहसास छिपा है, वह किसी भी एयर कंडीशनर में नामुमकिन है। यह हमारी धरोहर है, जिसे बचाए रखना और इसके कलाकारों को सम्मान देना हम सबका कर्तव्य है।
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