कहानी एक महत्त्वाकांक्षी महिला उद्यमी की

कोई व्यक्ति फंसा हुआ महसूस कर रहा है, निराश है और प्रगति करने में असमर्थ है? वास्तव में, बहुत काम पूरा करने की तलाश में हर कोई अंधेरे में चारों ओर ठोकर खा रहा है। आपके शुरुआती 20 के दशक में ऐसा क्यों महसूस होता है कि आपके जीवन के केवल 5 साल बचे हैं, जिसमें आपको जितना संभव हो उतना हासिल करने की आवश्यकता है? – इस तरह के प्रश्न अक्सर हमें महसूस कराते हैं कि हमारे पास सफलता की अंतिम समय सीमा है।

समाज ने उन नियमों और प्रभुत्व को तय किया है जो हममें संदेह और भय की भावना पैदा करते हैं। भय जंग की तरह है: यह आपको नष्ट कर देता है। सौभाग्य से, ऐसे लोगों का एक समूह है, जिन्होंने एक कला रूप में ‘न जाने-अनजाने और वैसे भी आश्चर्यजनक चीजें’ बनाई हैं। “समाज में, जो महिलाएं बाधाओं को तोड़ती हैं, वे हैं जो सीमाओं की अनदेखी करते हैं” – अर्नोल्ड श्वार्ज़नेगर। इसलिए, यहां एक लड़की की कहानी ने समाज के अवरोधों को तोड़ने का फैसला किया है ताकि वह इस बारे में भावुक हो जाए कि “कला”। उसका सपना है कि उसने सफलतापूर्वक निष्पादित किया और इसे “डी-रिफ्लेक्चुअशन” नाम दिया। पूरी तरह से काम करने से लेकर 10 से अधिक लोगों की टीम के साथ काम करने और अभी भी गिनती के लिए।

D-RefleQtion एक डिज़ाइन स्टूडियो के संस्थापक की एंटरप्रेन्योरियल यात्रा, दुनिया भर के ग्राहकों के साथ व्यवहार करना, टीम की टीम बनाना और टीम भावना का निर्माण करना, बहुत कम उम्र में निर्णय लेना है। एक ऐसी दुनिया में जहाँ हर कोई नौकरी पाने के लिए बाहर दिख रहा है। , उसने एक जॉब क्रिएटर बनना चुना। उसकी उद्यमिता यात्रा को उन बाधाओं को स्वीकार करने के लिए कहा जाना चाहिए जहां उसने आज की बाधाओं को दूर करने के लिए, अपनी दृष्टि और समाज को सकारात्मक रूप से प्रभावित करने की इच्छा पर प्रकाश डाला, और अंत में वह कैसे रास्ते में बाधाओं को तोड़ दिया।

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मुझे चित्र बनाने का शौक बचपन से ही था पर कभी मैंने इसे गंभीरता से नहीं लिया था। स्कूली शिक्षा की ओर मेरा रुझान आरंभ से ही कम था ,इसी के चलते कक्षा 6 की परीक्षा में गणित विषय में अनुत्तीर्ण भी हो गई। अभ्यास सफलता की कुंजी है इस कहावतको नगण्य मानते हुए मेरे लिए “स्वयं पर विश्वास ही व्यक्ति को सफल बनाता है “अधिक उपयुक्त साबित हुआ। अपने पर विश्वास कायम रखने के सिद्धांत पर अमल करते हुए मैंने 10वीं 12वीं की बोर्ड परीक्षा सर्वोच्च अंकों के साथ उत्तीर्ण की। मेरा स्वप्न हमेशा से कुछ अलग , कुछ अद्वितीय करने का ही रहा जिसके लिए मैं भयातुर ,परंतु निरंतर प्रयासरत रही।

स्कूली शिक्षा समाप्त होने पर थोड़ा राहत का अनुभव जरूर हुआ परंतु साथ ही भविष्य की चिंता अपार होने लगी। स्वयं पर पश्चाताप होने लगा कि अभी हम इतने अपरिपक्व हैं ! भविष्य का कोई प्रारूप अब तक हमारे समक्ष नहीं है। हमारी शिक्षा पद्धति हमें शैक्षणिक योग्यता की अनिवार्यता की ओर ही बाधित करती है। पर यह शिक्षा पद्धति एक मार्गदर्शक हो सकती है परंतु मंजिल तक पहुंचने का कायण तो हमें खुद ही करना है ।हमारी एक भूल से हम राह भटक सकते हैं। उस समय सदैव मन में भय रहता कि समय की गति से हम पिछड़ ना जाये। ऐसे समय में मेरी मां ने मेरा संबल बढाया। उन्होंने ही जीने की इतनी बड़ी सीख दी कि इंसान गलतियों से ही तो सीखता है।

कश्मक़श के इस दौर में मैंने रुचि के अनुरूप एक राह तो चुन ली,परंतु यह मेरी मंज़िल नहीं थी जिसका एहसास मेरी अंतरात्मा को परीक्षा के दौरान शीघ्र ही हो गया। तदन्तर मुझे ज्ञात हुआ कि यह उलझन, यह कश्मक़श ,यह अनिश्चितता और कुछ नहीं मेरी अंतरात्मा की आवाज़ की अस्वीकृती ही थी। मेरा शौक ही मेरा जुनून है, यह एहसास मुझे अब जाकर हुआ, जबकक मेरा अधिकांश समय इसी में व्यतीत होता था, परंतु इसे स्वीकारने में मुझे थोड़ा वक़्त लग गया।

अपनी मां से विचार विमर्श करने के पश्चात हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि हमें वर्तमान स्थिति में परिवर्तन की आवश्यकता है। अपनी कला से अपने विचारों को जीवित करना ही मेरे जीवन का उद्देश्य है। मेरी मां ने मेरी पथ प्रदर्शक, मेरी मित्र के रुप में मेरा साथ दिया तथा आगे की राह सरल करने के लिए सोशल नेटवर्किंग को माध्यम बनाया । धीरे धीरे लिंकडइन और इंस्टाग्राम जैसे माध्यमों से लोग मुझे जानने लगे। मेरे काम, मेरे विचारों, मेरी कला को पहचान मिलने लगी। कई कंपनियों ने मुझे पूर्णकालिक कार्य के लिए संपर्क करना प्रारंभ कर दिया। यह मेरे लिए सम्मान का विषय है परंतु विचारणीय यह है कि मेरी इन उपलब्धियों के पीछे किसी ‘मान्यता प्राप्त डिग्री’ का हाथ नहीं है। यह केवल स्वयं पर विश्वास और लगन का परिणाम है।

मास्टर शेफ विकास खन्ना, रणवीर बरार और विनीत भाटिया जैसे बडी हस्तियों से प्रोत्साहन मिलना उत्साह वर्धक रहा रहा। मुझे दो बातों का अहसास हुआ, पहला कि कार्य कभी भी विशिष्ट या असामान्य नहीं होते। कभी-कभी सामान्य कार्य करते हुए आप बहुत विशशष्ट बन जाते हैं। दूसरा कि असफलता सफलता की सीढ़ीमात्र है। इन सीढ़ियों को एक के बाद एक पार करते ही हम सफलता प्राप्त करते हैं। मैंने भी अगर गलत चुनाव ना किया किया होता तो मुझे अपने जुनून के विषय का कभी पता ना चलता। हम अपने संपूर्ण जीवन की रूपरेखा का निर्माण एक बार में नहीं कर सकते ।समय के साथ उसमें परिवर्तन आते रहते हैं। समयानुसार ही हमें उसमें सुधार करके आगे बढते रहना चाहिए।

‘D-RefleQtion’, वैसे तो यह नाम मेरे ‘आर्ट पेज’ का है ,जिसे मैंने बिना सोचे विचारे यूं ही रख दिया था। परंतु आज जब मैं इसे देखती हूं तो मुझे प्रतिपल यही अहसास होता है कि D-RefleQtion मेरा ही प्रतिरूप है। जो यात्रा मैंने आर्ट-पेज से आरंभ की वह आज एक डिजाइन स्टूडियो के रूप में आगे बढ चुकी है। एक सफल उद्यमी के रूप में स्वयं को देखकर एक संतुष्टि का अनुभव तो जरूर होता है, परंतु यह तो अभी बस आगाज़ है, मंज़िल तो अभी दूर खड़ी राह तक रही है। बहुत से लक्ष्यों को पाना अभी बाकी है । मैं चली तो अकेले थी मगर लोग जुडते गए और कारवां बनता गया। प्रशंसा ,प्रोत्साहन लगातार मिलता गया जो मुझे उन्नति के पथ पर अग्रसर करता गया।

लेखिका-
देवांशी सरावगी

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