स्वयं सहायता समूह योजनाएं उत्तर प्रदेश: ग्रामीण महिलाओं के लिए वरदान बनीं ये सरकारी योजनाएं

उत्तर प्रदेश में स्वयं सहायता समूह की महिलाएं अपने कुटीर उद्योग के उत्पाद प्रदर्शित करते हुए (Self-Help Group women in Uttar Pradesh showcasing their cottage industry products)

Table of Contents

उत्तर प्रदेश में स्वयं सहायता समूह (SHG) योजनाएं: ग्रामीण विकास, महिला सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता का महा-अभियान

१. प्रस्तावना (Introduction)

भारत जैसे विशाल देश की प्रगति का मार्ग इसके गांवों से होकर गुजरता है। उत्तर प्रदेश, जो देश की सर्वाधिक जनसंख्या वाला राज्य है, यहाँ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति दिए बिना देश को आत्मनिर्भर बनाना असंभव है। पिछले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश के ग्रामीण और अर्ध-शहरी अंचलों में एक मूक क्रांति का सूत्रपात हुआ है, और इस क्रांति की अग्रदूत हैं—ग्रामीण क्षेत्र की महिलाएं। इस सामाजिक और आर्थिक बदलाव का सबसे बड़ा माध्यम स्वयं सहायता समूह (Self-Help Groups – SHGs) बने हैं।

उत्तर प्रदेश में संचालित विभिन्न स्वयं सहायता समूह योजनाएं केवल वित्तीय सहायता प्रदान करने का जरिया नहीं हैं, बल्कि यह महिलाओं के सामाजिक उत्थान, नेतृत्व क्षमता के विकास और गरीबी उन्मूलन का एक सुदृढ़ संगठनात्मक ढांचा बन चुकी हैं। राज्य सरकार और केंद्र सरकार के संयुक्त प्रयासों से चल रही ये योजनाएं ‘अन्त्योदय’ (लाइन में खड़े अंतिम व्यक्ति का उदय) के विजन को धरातल पर साकार कर रही हैं।


२. स्वयं सहायता समूह (SHG) क्या है और इसका वैचारिक आधार क्या है?

स्वयं सहायता समूह सामान्यतः समान सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि वाली १० से २० ग्रामीण महिलाओं का एक स्वैच्छिक संगठन होता है। ये महिलाएं अपनी मर्जी से एक समूह बनाती हैं, नियमित रूप से छोटी-छोटी बचत (जैसे १०, २० या ५० रुपये प्रति सप्ताह) करती हैं, और उस एकत्रित राशि को समूह के बैंक खाते में जमा करती हैं।

जब किसी सदस्य को घरेलू जरूरतों, बीमारी, बच्चों की शिक्षा या कोई छोटा व्यवसाय शुरू करने के लिए धन की आवश्यकता होती है, तो वह इसी सामूहिक कोष से बेहद कम ब्याज दर पर ऋण लेती है। इस पूरी व्यवस्था का मूल मंत्र है—“संगठन में शक्ति है और स्वावलंबन ही सुरक्षा है।” यह व्यवस्था ग्रामीण गरीबों को स्थानीय साहूकारों और सूदखोरों के चंगुल से पूरी तरह मुक्त कराती है।


३. उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (UPSRLM) की भूमिका

उत्तर प्रदेश में स्वयं सहायता समूहों को एक सुदृढ़ और व्यापक संस्थागत ढांचा प्रदान करने का श्रेय उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (UPSRLM – Uttar Pradesh State Rural Livelihoods Mission) को जाता है। यह मिशन केंद्रीय ‘दीनदयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन’ (DAY-NRLM) के अंतर्गत राज्य के सभी ७५ जिलों, ८२६ विकास खंडों (ब्लॉकों) और हजारों ग्राम पंचायतों में पूरी सक्रियता से संचालित हो रहा है।

UPSRLM का मुख्य कार्य गांवों के अत्यंत गरीब, भूमिहीन, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अल्पसंख्यक परिवारों की पहचान करना और उन्हें अनिवार्य रूप से स्वयं सहायता समूहों के नेटवर्क में शामिल करना है। मिशन इन समूहों को न केवल बैंकों से जोड़ता है, बल्कि उन्हें व्यावसायिक प्रशिक्षण और बाजार भी उपलब्ध कराता है।


४. स्वयं सहायता समूहों के संचालन का आधार: ‘पंचसूत्र’

उत्तर प्रदेश में किसी भी स्वयं सहायता समूह की सफलता और उसकी पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए ‘पंचसूत्र’ (Five Golden Rules) के सिद्धांत को अनिवार्य रूप से लागू किया गया है। यह पंचसूत्र समूहों को अनुशासित और वित्तीय रूप से मजबूत बनाए रखने की रीढ़ की हड्डी है:

  1. नियमित साप्ताहिक बैठक (Regular Weekly Meeting): समूह की सभी सदस्य महिलाएं हर सप्ताह एक निश्चित दिन और समय पर बैठक करती हैं। इसमें केवल वित्तीय लेन-देन ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक समस्याओं पर भी चर्चा होती है।
  2. नियमित साप्ताहिक बचत (Regular Weekly Saving): प्रत्येक बैठक में सभी सदस्यों द्वारा तय की गई एक छोटी राशि अनिवार्य रूप से बचाकर समूह के कोष में जमा की जाती है।
  3. नियमित आंतरिक ऋण (Regular Internal Lending): जरूरत पड़ने पर सदस्यों को सामूहिक निर्णय के आधार पर बहुत ही सरल शर्तों और न्यूनतम ब्याज पर समूह के अंदर से ही ऋण दिया जाता है।
  4. नियमित ऋण वापसी (Regular Repayment): लिए गए ऋण की किस्तों और ब्याज को तय समय सीमा के भीतर ईमानदारी से समूह में वापस जमा करना होता है, ताकि धन का चक्र घूमता रहे।
  5. नियमित बही-खाता संधारण (Regular Book-keeping): समूह के सभी वित्तीय लेन-देन, जमा, निकासी और बैठकों की कार्यवाही को एक रजिस्टर में पारदर्शी रूप से दर्ज किया जाता है।

५. उत्तर प्रदेश में SHG के तहत संचालित प्रमुख अभिनव योजनाएं

उत्तर प्रदेश सरकार ने पारंपरिक स्वयं सहायता समूहों के दायरे को व्यापक बनाते हुए उन्हें अत्याधुनिक तकनीकों, सेवाओं और सरकारी विभागों से जोड़ा है। वर्तमान में राज्य में निम्नलिखित प्रमुख योजनाएं और पहलें धूम मचा रही हैं:

क) लखपति दीदी योजना (Lakhpati Didi Yojana)

प्रधानमंत्री के संकल्प के अनुरूप उत्तर प्रदेश सरकार इस योजना को मिशन मोड में चला रही है। इस योजना का मुख्य लक्ष्य स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक क्षमता को इस स्तर तक ले जाना है कि उनकी वार्षिक पारिवारिक आय कम से कम १ लाख रुपये (अर्थात ₹८,००० से ₹१०,००० प्रति माह) से अधिक हो जाए।

  • इसके तहत महिलाओं को मशरूम की खेती, मधुमक्खी पालन, डेयरी फार्मिंग, सिलाई बुटीक, और ई-कॉमर्स जैसे क्षेत्रों के लिए उन्नत प्रशिक्षण दिया जाता है।
  • सरकार इन महिलाओं को ‘ड्रोन दीदी’ के रूप में भी तैयार कर रही है, जहां वे खेतों में कीटनाशकों और खादों के छिड़काव के लिए आधुनिक ड्रोन उड़ाने का प्रशिक्षण प्राप्त कर रही हैं।

ख) बैंकिंग कॉरेस्पॉन्डेंट सखी (BC Sakhi) योजना

वित्तीय समावेशन के क्षेत्र में यह योजना उत्तर प्रदेश की सबसे सफल और अनुकरणीय पहलों में से एक है।

  • प्रत्येक ग्राम पंचायत में एक प्रशिक्षित स्वयं सहायता समूह की महिला को ‘बीसी सखी’ के रूप में तैनात किया गया है।
  • ये सखियां अपने पास मौजूद डिजिटल पॉइंट-ऑफ-सेल (POS) मशीनों और स्मार्टफोन के माध्यम से ग्रामीणों के घर-द्वार तक बैंकिंग सेवाएं पहुंचाती हैं।
  • ग्रामीण बुजुर्गों की वृद्धावस्था पेंशन, विधवा पेंशन और किसानों के सम्मान निधि की राशि अब गांव में ही मिल जाती है। इससे महिलाओं को न केवल कमीशन के रूप में नियमित आय होती है, बल्कि समाज में उनका सम्मान भी बढ़ा है।

ग) विद्युत सखी (Bijli Sakhi) योजना

ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली के बिलों के भुगतान को सरल बनाने और बिजली विभाग के राजस्व संग्रह को दुरुस्त करने के लिए विद्युत सखी योजना की शुरुआत की गई।

  • इसके तहत समूहों की महिलाएं गांवों में घर-घर जाकर बिजली के बिल वितरित करती हैं और ऑनलाइन माध्यम से मौके पर ही बिल की राशि एकत्र करती हैं।
  • इस कार्य के बदले उन्हें प्रत्येक बिल के भुगतान पर सरकार द्वारा एक निश्चित प्रोत्साहन राशि (कमीशन) दी जाती है, जो ग्रामीण महिलाओं की आय का एक मजबूत जरिया बन चुकी है।

घ) टेक होम राशन (THR) निर्माण इकाइयाँ

कुपोषण के खिलाफ लड़ाई और ग्रामीण रोजगार को जोड़ने का यह उत्तर प्रदेश सरकार का एक क्रांतिकारी मॉडल है।

  • पहले आंगनवाड़ी केंद्रों में बच्चों और गर्भवती महिलाओं को बांटे जाने वाले पोषाहार की आपूर्ति निजी ठेकेदारों द्वारा की जाती थी, जिसमें अक्सर गुणवत्ता की शिकायतें रहती थीं।
  • अब सरकार ने ब्लॉक स्तर पर ‘टेक होम राशन उत्पादन इकाइयाँ’ स्थापित की हैं, जिनका पूरा प्रबंधन और संचालन स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं द्वारा किया जा रहा है। ये महिलाएं पूरी शुद्धता के साथ दलिया, लड्डू प्री-मिक्स और न्यूट्रीशियस सप्लीमेंट्स तैयार करती हैं, जिससे उन्हें बड़े पैमाने पर नियमित रोजगार मिला है।

ङ) आजीविका ग्रामीण एक्सप्रेस योजना (AGEY)

ग्रामीण अंचलों में सार्वजनिक परिवहन की भारी किल्लत को दूर करने के लिए इस योजना के तहत स्वयं सहायता समूहों के सदस्यों को कम ब्याज दर या बिना ब्याज के वाहन (जैसे ई-रिक्शा या थ्री-व्हीलर) खरीदने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। इसके संचालन से ग्रामीण कनेक्टिविटी सुधरी है और समूह के परिवारों को एक स्थायी रोज़गार प्राप्त हुआ है।

च) कृषि सखी और पशु सखी (Krishi and Pashu Sakhi)

ग्रामीण उत्तर प्रदेश में कृषि और पशुपालन आजीविका के मुख्य आधार हैं।

  • कृषि सखी: समूहों की चुनिंदा महिलाओं को आधुनिक एवं जैविक खेती, उन्नत बीजों के चयन और प्राकृतिक खेती का विशेष प्रशिक्षण देकर ‘कृषि सखी’ बनाया जाता है, जो गांवों में जाकर अन्य महिला किसानों का मार्गदर्शन करती हैं।
  • पशु सखी: ये महिलाएं पशुओं के स्वास्थ्य, प्राथमिक उपचार, समय पर टीकाकरण और उचित पोषण के संबंध में ग्रामीणों को जागरूक करती हैं, जिससे ग्रामीण दुग्ध उत्पादन में भारी वृद्धि दर्ज की गई है।

६. स्वयं सहायता समूहों को मिलने वाली वित्तीय सहायता एवं अनुदान

उत्तर प्रदेश सरकार और बैंकों के सहयोग से स्वयं सहायता समूहों को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए चरणबद्ध तरीके से वित्तीय मदद प्रदान की जाती है:

  • रिवॉल्विंग फंड (Revolving Fund – RF): जब कोई समूह सफलतापूर्वक ३ महीने पूरे कर लेता है और पंचसूत्र का पालन करता है, तो उसके बैंक खाते में ₹१०,००० से ₹१५,००० का रिवॉल्विंग फंड ट्रांसफर किया जाता है। इसका उद्देश्य समूह के आंतरिक लेन-देन को गति देना होता है।
  • सामुदायिक निवेश कोष (Community Investment Fund – CIF): समूहों के बड़े संघों (ग्राम संगठन) के माध्यम से प्रत्येक पात्र समूह को ₹१,१०,००० तक का आजीविका कोष (CIF) प्रदान किया जाता है, ताकि सदस्य महिलाएं अपने छोटे व्यवसाय या कृषि कार्य को बड़े स्तर पर शुरू कर सकें।
  • कैश क्रेडिट लिंकेज (Bank Credit Linkage – CCL): समूहों की साख और उनके अच्छे वित्तीय ट्रैक रिकॉर्ड को देखकर बैंक उन्हें ₹१ लाख से लेकर ₹६ लाख तक का नकद ऋण (CCL) स्वीकृत करते हैं। इसकी ब्याज दरें बेहद कम और रियायती होती हैं।

७. स्वयं सहायता समूह योजनाओं के सामाजिक-आर्थिक प्रभाव

इन योजनाओं के क्रियान्वयन से उत्तर प्रदेश के ग्रामीण समाज में अभूतपूर्व बदलाव आए हैं, जिन्हें निम्नलिखित आयामों में देखा जा सकता है:

१. वित्तीय आत्मनिर्भरता और सशक्तिकरण

पूर्व में ग्रामीण महिलाओं के पास अपनी व्यक्तिगत जरूरतों के लिए भी पुरुषों पर निर्भर रहना पड़ता था। समूहों से जुड़ने के बाद, वे न केवल खुद पैसे कमा रही हैं, बल्कि संकट के समय अपने परिवार को आर्थिक संबल भी प्रदान कर रही हैं। इससे समाज और परिवार के भीतर महिलाओं की निर्णय लेने की क्षमता (Decision Making Power) में भारी वृद्धि हुई है।

२. ग्रामीण उद्यमिता (Rural Entrepreneurship) का उदय

उत्तर प्रदेश के गांवों में अब महिलाएं केवल श्रमिक नहीं रहीं, बल्कि वे उद्यमी बन गई हैं। आज राज्य के विभिन्न हिस्सों में समूहों द्वारा:

  • ‘एक जिला एक उत्पाद’ (ODOP) के तहत पारंपरिक हस्तशिल्प और कलाकृतियों का निर्माण।
  • दोना-पत्तल, अगरबत्ती, मोमबत्ती और एलईडी बल्ब का निर्माण।
  • जैविक खाद (वर्मीकंपोस्ट), अचार, पापड़, मसाले और दुग्ध उत्पादों का प्रसंस्करण (Processing)।

३. डिजिटल साक्षरता और वित्तीय समावेशन

हजारों बीसी सखियों और डिजिटल उपकरणों के उपयोग ने ग्रामीण महिलाओं को तकनीक के मामले में बेहद स्मार्ट बना दिया है। स्मार्टफोन चलाना, बायोमेट्रिक ऑथेंटिकेशन करना, यूपीआई (UPI) और क्यूआर कोड के जरिए लेन-देन करना अब उनके बाएं हाथ का खेल बन चुका है।

४. सामाजिक कुरुतियों के खिलाफ एकजुटता

स्वयं सहायता समूहों के मंच ने महिलाओं को एक सामाजिक शक्ति भी दी है। गांवों में बाल विवाह रोकने, घरेलू हिंसा के खिलाफ आवाज उठाने, बालिकाओं की शिक्षा सुनिश्चित करने और गांवों में स्वच्छता अभियान चलाने में ये समूह अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं।


८. मुख्य चुनौतियाँ और व्यावहारिक बाधाएँ

इतनी शानदार सफलताओं के बावजूद, उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और विविधताओं से भरे राज्य में इन योजनाओं के संचालन में कुछ चुनौतियाँ भी विद्यमान हैं:

  • मार्केट लिंकेज और ब्रांडिंग की समस्या: ग्रामीण महिलाएं बेहतरीन उत्पाद तो बना लेती हैं, लेकिन आधुनिक और प्रतिस्पर्धी बाजार में पैकेजिंग, आकर्षक ब्रांडिंग और सही मार्केटिंग रणनीति न होने के कारण उन्हें अपने उत्पादों का उचित मूल्य नहीं मिल पाता।
  • बैंकों का असहयोगात्मक रुख: कई दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों में बैंक शाखाएं स्वयं सहायता समूहों के खाते खोलने या उनके लोन (CCL) पास करने में अनावश्यक देरी करती हैं, जिससे महिलाओं का उत्साह प्रभावित होता है।
  • क्षेत्रीय असंतुलन: पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों की तुलना में बुंदेलखंड, पूर्वांचल के सुदूर इलाकों या तराई क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे और साक्षरता की कमी के कारण समूहों का विकास अपेक्षाकृत कम और धीमा है।
  • कौशल और तकनीकी ज्ञान का अभाव: आधुनिक उद्योगों या डिजिटल बाजारों (जैसे ई-कॉमर्स) से जुड़ने के लिए ग्रामीण महिलाओं को जिस उच्च स्तरीय तकनीकी प्रशिक्षण की आवश्यकता है, उसकी पहुंच अभी भी सीमित है।

९. भविष्य की राह और आवश्यक सुधार (Way Forward)

उत्तर प्रदेश में स्वयं सहायता समूह आंदोलन को और अधिक प्रभावी और वैश्विक स्तर का बनाने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जाने आवश्यक हैं:

  1. ई-कॉमर्स और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म से जुड़ाव: ग्रामीण महिलाओं के उत्पादों को ‘अमेज़न सहेली’, ‘फ्लिपकार्ट समर्थ’ और सरकार के ‘जेम पोर्टल’ (GeM) जैसी ई-कॉमर्स वेबसाइटों से बड़े पैमाने पर जोड़ा जाना चाहिए ताकि उनके उत्पादों को वैश्विक बाजार मिल सके।
  2. आधुनिक पैकेजिंग और कॉर्पोरेट ब्रांडिंग: सरकार को समूहों के उत्पादों के लिए एक साझा ब्रांड नेम (जैसे ‘सरस’ या ‘यूपी आजीविका’) के तहत व्यावसायिक पैकेजिंग और गुणवत्ता नियंत्रण की व्यवस्था करनी चाहिए।
  3. सिंगल विंडो सिस्टम: बैंकों में समूहों के लोन और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के त्वरित निपटान के लिए एक समर्पित ‘सिंगल विंडो क्लियरेंस सिस्टम’ होना चाहिए, ताकि भ्रष्टाचार और देरी पर लगाम लगाई जा सके।
  4. फ्यूचर स्किल्स पर ध्यान: महिलाओं को सिर्फ पारंपरिक आचार-पापड़ तक सीमित न रखकर सोलर पैनल असेंबलिंग, कोडिंग के बुनियादी गुर, डेटा एंट्री, और फूड प्रोसेसिंग टेक्नोलॉजी जैसे आधुनिक क्षेत्रों में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।

१०. निष्कर्ष (Conclusion)

निष्कर्षतः, उत्तर प्रदेश में संचालित स्वयं सहायता समूह योजनाएं ग्रामीण विकास और नारी शक्ति के प्रकटीकरण का एक मील का पत्थर साबित हुई हैं। इन योजनाओं ने न केवल गांवों से गरीबी मिटाने का खाका तैयार किया है, बल्कि ग्रामीण महिलाओं को घूंघट और चौके-चूल्हे की चहारदीवारी से बाहर निकालकर आर्थिक स्वावलंबन के आकाश में उड़ने के पंख दिए हैं।

‘लखपति दीदी’ से लेकर ‘बीसी सखी’ तक का सफर इस बात का जीवंत प्रमाण है कि जब ग्रामीण महिलाओं को सही अवसर, संसाधन और संगठनात्मक मंच मिलता है, तो वे कमाल कर सकती हैं। आने वाले समय में ये स्वयं सहायता समूह उत्तर प्रदेश को “वन ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी” (One Trillion Dollar Economy) बनाने और भारत को एक विकसित राष्ट्र के रूप में स्थापित करने में सबसे महत्वपूर्ण और सशक्त स्तंभ साबित होंगे।


उत्तर प्रदेश में स्वयं सहायता समूह (SHG) योजनाओं से जुड़े कुछ सबसे महत्वपूर्ण और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs):

  • प्रश्न १: उत्तर प्रदेश में स्वयं सहायता समूह (SHG) योजना का मुख्य उद्देश्य क्या है?
    • उत्तर: इस योजना का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों की गरीब और मध्यम वर्गीय महिलाओं को छोटे-छोटे समूहों (१० से २० सदस्य) में संगठित करना है। इसके माध्यम से उनमें बचत की आदत डालना, आत्मनिर्भर बनाना, वित्तीय सहायता प्रदान करना और रोजगार के नए अवसर सृजित कर गरीबी उन्मूलन करना है।
  • प्रश्न २: एक नया स्वयं सहायता समूह (SHG) बनाने के लिए पात्रता क्या है?
    • उत्तर:
      • समूह के सभी सदस्य उत्तर प्रदेश के ग्रामीण या अर्ध-शहरी क्षेत्र के निवासी होने चाहिए।
      • समूह में केवल महिलाएं ही शामिल हो सकती हैं (एक परिवार से केवल एक ही महिला)।
      • सदस्य एक ही सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि (आमतौर पर गरीब या हाशिए पर रहने वाले परिवार) से होने चाहिए।
  • प्रश्न ३: आजीविका मिशन के तहत समूह को मिलने वाला ‘रिवॉल्विंग फंड’ (RF) क्या है?
    • उत्तर: जब कोई समूह सफलतापूर्वक ३ से ६ महीने तक ‘पंचसूत्र’ (नियमित बैठक, बचत, आंतरिक ऋण, पुनर्भुगतान और बही-खाता) का पालन करता है, तो सरकार उसके बैंक खाते में ₹१०,००० से ₹१५,००० का रिवॉल्विंग फंड देती है। यह राशि समूह के शुरुआती आंतरिक लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए एक अनुदान (Grant) होती है।
  • प्रश्न ४: सामुदायिक निवेश कोष (CIF) और बैंक क्रेडिट लिंकेज (CCL) में क्या अंतर है?
    • उत्तर:
      • सामुदायिक निवेश कोष (CIF): यह पैसा सरकार द्वारा ‘ग्राम संगठन’ के माध्यम से समूहों को व्यवसाय या आजीविका शुरू करने के लिए ऋण के रूप में दिया जाता है (सामान्यतः ₹१,१०,००० तक)।
      • बैंक क्रेडिट लिंकेज (CCL): यह समूहों के अच्छे ट्रैक रिकॉर्ड को देखकर बैंकों द्वारा स्वीकृत की जाने वाली एक कैश क्रेडिट लिमिट (लोन खाता) है, जो ₹१ लाख से शुरू होकर ₹६ लाख या उससे अधिक तक जा सकती है।
  • प्रश्न ५: उत्तर प्रदेश की ‘ड्रोन दीदी’ (Drone Didi) योजना क्या है?
    • उत्तर: यह ‘लखपति दीदी’ अभियान के तहत शुरू की गई एक आधुनिक पहल है। इसके अंतर्गत स्वयं सहायता समूह की चुनिंदा महिलाओं को कृषि क्षेत्र में ड्रोन उड़ाने, डेटा विश्लेषण करने और खेतों में कीटनाशकों व खादों का कुशलतापूर्वक छिड़काव करने का उन्नत तकनीकी प्रशिक्षण और ड्रोन दिए जाते हैं। इससे महिलाओं की आय में भारी वृद्धि होती है।
  • प्रश्न ६: स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के लिए आवेदन कैसे और कहाँ करें?
    • उत्तर: इसके लिए इच्छुक महिलाएं अपने नजदीकी विकास खंड (Block Office) में जाकर ब्लॉक मिशन प्रबंधन इकाई (BMMU) के अधिकारियों या ‘समूह सखी’ से संपर्क कर सकती हैं। इसके अलावा ग्राम पंचायत स्तर पर कार्यरत ‘ग्राम संगठन’ के माध्यम से भी आवेदन फॉर्म भरकर नए समूह का पंजीकरण कराया जा सकता है।

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