राष्ट्रीय गणित दिवस: श्रीनिवास रामानुजन का जीवन, संख्या 1729 का रहस्य और योगदान

राष्ट्रीय गणित दिवस का एक भव्य डिजिटल बैनर जिसमें एक तरफ महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन का गरिमापूर्ण चित्र है और दूसरी तरफ गणितीय सूत्रों, ज्यामितीय आकृतियों व संख्या 1729 को एक चमकदार डिजिटल लेआउट में दिखाया गया है।

Table of Contents

राष्ट्रीय गणित दिवस (National Mathematics Day): इतिहास, श्रीनिवास रामानुजन का असाधारण जीवन, और आधुनिक भारत में गणित की प्रासंगिकता

संख्याओं (Numbers) और समीकरणों (Equations) का विज्ञान यानी ‘गणित’ केवल एक अकादमिक विषय या स्कूल-कॉलेज की परीक्षा पास करने का ज़रिया नहीं है। यह ब्रह्मांड की मूल भाषा है। आकाश में टिमटिमाते तारों की गति से लेकर हमारे मोबाइल फोन में काम करने वाले जटिल कंप्यूटर एल्गोरिदम तक, हमारे जीवन का हर एक पहलू गणित के नियमों पर ही टिका है। राष्ट्रीय गणित दिवस (National Mathematics Day) हर साल 22 दिसंबर को पूरे भारत में अत्यंत गर्व, सम्मान और शैक्षणिक उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह दिन केवल एक दिवस मनाने का अवसर नहीं है, बल्कि यह आधुनिक इतिहास के सबसे महान और विस्मयकारी गणितीय जीनियस श्रीनिवास रामानुजन (Srinivasa Ramanujan) की असाधारण जीवन यात्रा को नमन करने, उनके महान योगदान को सराहने और भारत की समृद्ध गणितीय विरासत को पुनर्जीवित करने का एक देशव्यापी उत्सव है।

भारत की धरती हमेशा से ही महान गणितज्ञों की जननी रही है। शून्य (Zero) की खोज करने वाले आर्यभट्ट, पाई (π) का सटीक मान बताने वाले भास्कराचार्य और क्रमपरिवर्तन (Permutations) के नियमों को समझाने वाले ब्रह्मगुप्त की इस पावन भूमि पर रामानुजन ने संख्याओं के साथ जो चमत्कार किए, उसने दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिकों को दाँतों तले उँगली दबाने पर मजबूर कर दिया। इस विस्तृत लेख में हम राष्ट्रीय गणित दिवस के इतिहास, श्रीनिवास रामानुजन के प्रेरणादायक जीवन, हार्डी-रामानुजन संख्या (1729) का रहस्य, गणित के क्षेत्र में उनके ऐतिहासिक योगदान, और 2026 के इस आधुनिक युग में गणितीय साक्षरता की प्रासंगिकता का 1500 से अधिक शब्दों में व्यापक और व्यावहारिक विश्लेषण करेंगे।


📜 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: मनमोहन सिंह की घोषणा और दिवस की शुरुआत

भारत में राष्ट्रीय गणित दिवस को मनाए जाने की शुरुआत साल 2012 में हुई थी, जब समूचा राष्ट्र श्रीनिवास रामानुजन की 125वीं जयंती मना रहा था।

                  [राष्ट्रीय गणित दिवस: वैधानिक शुरुआत]
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  |         26 फरवरी 2012: मद्रास विश्वविद्यालय में ऐतिहासिक घोषणा      |
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            v (मुख्य मील का पत्थर)                     v (आधिकारिक शुरुआत)
  - तत्कालीन पीएम डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा घोषणा          - 22 दिसंबर 2012 को पहला गणित दिवस मनाया गया
  - वर्ष 2012 को 'राष्ट्रीय गणित वर्ष' घोषित किया गया     - हर साल स्कूलों-कॉलेजों में क्विज़ व सेमिनार का आयोजन

स्थापना का इतिहास:

  • मद्रास विश्वविद्यालय में घोषणा: 26 फरवरी 2012 को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने मद्रास विश्वविद्यालय में रामानुजन की 125वीं जयंती समारोह के उद्घाटन के दौरान एक ऐतिहासिक घोषणा की। उन्होंने रामानुजन के जन्मदिन यानी 22 दिसंबर को हर साल ‘राष्ट्रीय गणित दिवस’ के रूप में समर्पित किया।
  • राष्ट्रीय गणित वर्ष (2012): केंद्र सरकार ने इसके साथ ही पूरे वर्ष 2012 को ‘राष्ट्रीय गणित वर्ष’ (National Mathematical Year) के रूप में घोषित किया था।
  • मुख्य उद्देश्य: इस दिवस की स्थापना का प्राथमिक उद्देश्य युवाओं में गणित के प्रति भय (Maths Phobia) को दूर करना, तार्किक सोच और समस्या-समाधान (Problem-solving) की क्षमता को बढ़ावा देना, और रामानुजन के सिद्धांतों को शोध के मुख्यधारा में लाना है। आज यह दिन पूरे भारत के स्कूलों, विश्वविद्यालयों और वैज्ञानिक संस्थानों में विशेष गणितीय प्रदर्शनियों, क्विज़ प्रतियोगिताओं और व्याख्यानों के माध्यम से मनाया जाता है।

🧑‍ुलभ असाधारण जीवन यात्रा: इरोड की गलियों से कैंब्रिज के शिखरों तक

श्रीनिवास रामानुजन का जीवन इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि यदि आपके भीतर किसी विषय के प्रति सच्ची लगन और विलक्षण प्रतिभा है, तो गरीबी, संसाधनों का अभाव और औपचारिक शिक्षा की कमी भी आपके पंखों को उड़ान भरने से नहीं रोक सकती।

1. प्रारंभिक जीवन और कड़ा संघर्ष

श्रीनिवास रामानुजन का जन्म 22 दिसंबर 1887 को तमिलनाडु के इरोड (Erode) शहर में एक बेहद गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता एक कपड़े की दुकान में क्लर्क थे और माँ एक गृहिणी थीं। उनका बचपन कुंभकोणम के एक छोटे से घर में बीता। बचपन से ही रामानुजन का व्यवहार आम बच्चों से बिल्कुल अलग था। जब उनके साथी खेल रहे होते थे, तब वे ब्रह्मांड की सीमाओं और शून्य के महत्व के बारे में सोचते थे।

मात्र 11 वर्ष की आयु में उन्होंने अपने घर पर रहने वाले कॉलेज के दो छात्रों को गणित में मात दे दी थी। 13 वर्ष की आयु तक पहुँचते-पहुँचते उन्होंने बिना किसी बाहरी मदद के एस.एल. लोनी द्वारा लिखित एडवांस्ड ट्रिग्नोमेट्री (Advanced Trigonometry) के जटिल सिद्धांतों को पूरी तरह से हल कर लिया था।

2. ‘सिनॉप्सिस’ पुस्तक और गणित का जादू

रामानुजन के जीवन में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब उन्हें 16 वर्ष की आयु में एक मित्र के जरिए जी.एस. कार की लिखी पुस्तक ‘अ सिनॉप्सिस ऑफ एलिमेंट्री रिजल्ट्स इन प्योर एंड एप्लाइड मैथमेटिक्स’ (A Synopsis of Elementary Results in Pure and Applied Mathematics) मिली। इस पुस्तक में गणित के लगभग 5,000 जटिल प्रमेय (Theorems) और सूत्र बिना किसी विस्तृत प्रमाण के दिए गए थे। रामानुजन के लिए यह पुस्तक कोई साधारण किताब नहीं, बल्कि ज्ञान का एक महासागर साबित हुई। उन्होंने अपनी स्लेट पर दिन-रात काम करके इन सभी प्रमेयों को खुद हल किया और इसी प्रक्रिया में अपने स्वयं के हजारों नए सूत्रों की खोज कर डाली।

गणित के प्रति उनकी दीवानगी इतनी बढ़ गई कि वे स्कूल और कॉलेज में इतिहास, अंग्रेजी और विज्ञान जैसे अन्य सभी विषयों में अनुत्तीर्ण हो गए क्योंकि परीक्षा के दौरान भी वे अपनी कॉपी पर केवल गणित के समीकरण हल करते रहते थे। इसके कारण उनकी कॉलेज की स्कॉलरशिप छीन ली गई और उन्हें भयंकर वित्तीय संकट का सामना करना पड़ा।

3. मद्रास पोर्ट ट्रस्ट और जी.एच. हार्डी को वो ऐतिहासिक पत्र

अपनी आजीविका चलाने के लिए रामानुजन ने मद्रास पोर्ट ट्रस्ट में एक मामूली क्लर्क के रूप में काम करना शुरू किया। उनके शुभचिंतकों और वरिष्ठ अधिकारियों (जैसे सर फ्रांसिस स्प्रिंग) ने उनकी असाधारण गणितीय प्रतिभा को पहचाना और उन्हें इंग्लैंड के वैज्ञानिकों से संपर्क करने की सलाह दी।

रामानुजन ने 16 जनवरी 1913 को कैंब्रिज विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध गणितज्ञ प्रोफेसर जी.एच. हार्डी (G.H. Hardy) को एक लंबा पत्र भेजा, जिसमें उन्होंने अपने द्वारा खोजे गए लगभग 120 जटिल गणितीय सूत्र और प्रमेय संलग्न किए थे। प्रोफेसर हार्डी ने जब उस पत्र को देखा, तो वे दंग रह गए। शुरुआत में उन्हें लगा कि यह कोई धोखाधड़ी या मज़ाक है, लेकिन जब उन्होंने कैंब्रिज के अन्य बड़े वैज्ञानिकों (जैसे जे.ई. लिटलवुड) के साथ उन सूत्रों का गहन अध्ययन किया, तो उन्होंने स्वीकार किया कि—“ये सूत्र इतने जटिल और अद्वितीय हैं कि इन्हें केवल एक सर्वोच्च श्रेणी का गणितीय जीनियस ही लिख सकता है, जिसकी कल्पना भी आम वैज्ञानिक नहीं कर सकते।”

                [रामानुजन का कैंब्रिज में ऐतिहासिक उदय]
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  |          1914: प्रोफेसर हार्डी के निमंत्रण पर इंग्लैंड प्रस्थान       |
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            v (ऐतिहासिक मील का पत्थर)                 v (सर्वोच्च सम्मान)
  - ट्रिनिटी कॉलेज, कैंब्रिज में शोध कार्य शुरू हुआ       - 1918 में रॉयल सोसाइटी (FRS) के सदस्य चुने गए
  - हार्डी के साथ मिलकर कई शोध पत्र प्रकाशित किए     - कैंब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज के पहले भारतीय फेलो बने

🔢 हार्डी-रामानुजन संख्या ‘1729’ का जादुई रहस्य

गणित के इतिहास में संख्या 1729 को ‘हार्डी-रामानुजन संख्या’ (Hardy-Ramanujan Number) या ‘टैक्सीकैब संख्या’ (Taxicab Number) के नाम से जाना जाता है। इस संख्या के पीछे एक बेहद दिलचस्प और प्रसिद्ध किस्सा है जो रामानुजन की संख्याओं को देखने की अद्वितीय दृष्टि को उजागर करता है।

जब रामानुजन इंग्लैंड की कड़ाके की ठंड और शाकाहारी भोजन न मिलने के कारण गंभीर रूप से बीमार हो गए, तो उन्हें लंदन के पुटनी (Putney) स्थित एक अस्पताल में भर्ती कराया गया। प्रोफेसर हार्डी उनसे मिलने एक टैक्सी में बैठकर अस्पताल पहुंचे। हार्डी ने कमरे में प्रवेश करते ही उदास मन से कहा—“रामानुजन, जिस टैक्सी में मैं आया हूँ, उसका नंबर बेहद नीरस और मनहूस था—1729। मुझे उम्मीद है कि यह कोई अपशकुन नहीं है।”

रामानुजन ने बिना एक पल गंवाए तुरंत अस्पताल के बिस्तर से मुस्कुराते हुए जवाब दिया—“नहीं हार्डी! यह कोई नीरस या मनहूस संख्या नहीं है। यह एक बेहद दिलचस्प और चमत्कारी संख्या है। यह वह सबसे छोटी संख्या है जिसे हम दो अलग-अलग तरीकों से दो संख्याओं के घनों (Cubes) के योग के रूप में लिख सकते हैं।”

$$\text{तरीका 1: } 1729 = 1^3 + 12^3 \quad (1 + 1728 = 1729)$$
$$\text{तरीका 2: } 1729 = 9^3 + 10^3 \quad (729 + 1000 = 1729)$$

अस्पताल के उस संकरे कमरे में बिना किसी कैलकुलेटर या कंप्यूटर के, संख्याओं के इस खेल को इतनी तेज़ी से डिकोड करना प्रोफेसर हार्डी के लिए किसी जादू से कम नहीं था। यह घटना दर्शाती है कि रामानुजन के लिए हर एक संख्या एक जीवित मित्र की तरह थी जिसके चरित्र को वे गहराई से जानते थे।


🔬 गणित विज्ञान में रामानुजन का ऐतिहासिक योगदान

मात्र 32 वर्ष की अल्पायु में 26 अप्रैल 1920 को इस दुनिया को अलविदा कहने से पहले, रामानुजन ने अपनी तीन नोटबुक्स (रामानुजन की खोई हुई नोटबुक – Lost Notebook) में लगभग 3,900 से अधिक प्रमेयों और सूत्रों को दर्ज किया था। उनके जीवनकाल में खोजी गई विधाओं पर आज एक सदी बाद भी दुनिया भर के वैज्ञानिक शोध कर रहे हैं:

  • इन्फिनिट सीरीज़ (Infinite Series) और पाई (π): रामानुजन ने पाई (π) का अत्यंत सटीक मान निकालने के लिए ऐसी इन्फिनिट सीरीज़ की खोज की, जो आज के अत्याधुनिक सुपरकंप्यूटरों में एल्गोरिदम का आधार हैं। इनकी मदद से आज पाई के मान को दशमलव के खरबों स्थानों तक सटीकता से निकाला जा सकता है।
  • मॉक थीटा फंक्शंस (Mock Theta Functions): अपने जीवन के अंतिम दिनों में जब वे मृत्यु की शैया पर थे, तब उन्होंने ‘मॉक थीटा फंक्शंस’ की एक पूरी श्रृंखला खोजी। उस समय के गणितज्ञ इसे समझ नहीं पाए थे, लेकिन आधुनिक युग में वैज्ञानिकों ने पाया कि रामानुजन के ये सूत्र ब्रह्मांड के सबसे बड़े रहस्यों—ब्लैक होल्स (Black Holes) और क्वांटम फिजिक्स के व्यवहार को समझने में मुख्य भूमिका निभाते हैं।
  • विभाजन कार्य (Partition Function): किसी संख्या को अन्य संख्याओं के जोड़ के रूप में कितने तरीकों से लिखा जा सकता है (जैसे संख्या 4 को 4, 3+1, 2+2, 2+1+1, 1+1+1+1 यानी 5 तरीकों से लिखा जा सकता है), इसके लिए उन्होंने प्रोफेसर लिटलवुड के साथ मिलकर ‘हार्डी-रामानुजन-रेडेमाकर फॉर्मूला’ दिया, जिसने नंबर थ्योरी (Number Theory) का चेहरा बदल दिया।

💻 आधुनिक युग (2026) में गणित की प्रासंगिकता: ‘मैथ्स फोबिया’ से जंग

आज के इस डिजिटल, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और डेटा साइंस (Data Science) के दौर में गणित का महत्व इतिहास में सबसे उच्चतम स्तर पर पहुँच चुका है।

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|                     आधुनिक तकनीकों में गणित का सीधा अनुप्रयोग                    |
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| तकनीकी क्षेत्र                     | प्रयुक्त होने वाले गणितीय सिद्धांत           |
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| 1. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI)     | रैखिक बीजगणित (Linear Algebra) और कैलकुलस    |
| 2. डेटा साइंस और बिग डेटा          | सांख्यिकी (Statistics) और संभाव्यता सिद्धांत |
| 3. साइबर सुरक्षा और ब्लॉकचेन       | संख्या सिद्धांत (Number Theory) और क्रिप्टोग्राफी|
| 4. अंतरिक्ष विज्ञान (ISRO)          | डिफरेंशियल इक्वेशंस और ऑर्बिटल मैकेनिक्स      |
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भारत में ‘मैथ्स फोबिया’ की चुनौती और समाधान:

इतनी समृद्ध विरासत के बावजूद, आज भारत के स्कूलों में एक बड़ी समस्या देखने को मिलती है जिसे हम ‘मैथ्स एंग्जायटी’ या ‘मैथ्स फोबिया’ (गणित का डर) कहते हैं। छात्र गणित को एक उबाऊ और रटने वाला विषय मान लेते हैं, जिसके कारण वे रटकर परीक्षा तो पास कर लेते हैं, लेकिन उनकी तार्किक सोच (Logical Reasoning) विकसित नहीं हो पाती।

  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020): भारत सरकार ने इस डर को दूर करने के लिए शिक्षा नीति में व्यावहारिक गणित (Applied Mathematics), कोडिंग, और वेदिक गणित (Vedic Mathematics) को शामिल किया है, जिससे छात्र खेल-खेल में गणनाएँ करना सीख रहे हैं।
  • डिजिटल ऐप्स और विजुअल लर्निंग: एआई-संचालित शैक्षणिक ऐप्स और इंटरैक्टिव ग्राफिक्स के माध्यम से अब ज्यामिति (Geometry) और बीजगणित को अमूर्त सूत्रों के बजाय 3D मॉडल के रूप में विजुअली पढ़ाया जा रहा है, जिससे विषय काफी रोचक हो गया है।

🤝 शिक्षकों और अभिभावकों की ज़िम्मेदारी: गणित को मजेदार बनाने के उपाय

गणित का विकास केवल वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में नहीं हो सकता; इसके लिए बुनियादी स्तर पर बदलाव की जरूरत है। शिक्षक और अभिभावक मिलकर बच्चों के मन से इस डर को पूरी तरह निकाल सकते हैं।

                     [गणित शिक्षण का व्यावहारिक चक्र]
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  |            गणित को रोचक बनाने के 5 नागरिक सूत्र            |
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         v (दैनिक जीवन में अनुप्रयोग)              v (सकारात्मक मानसिकता)
  - बाज़ार में खरीदारी करते समय बच्चों से    - बच्चों को सूत्रों को रटाने के बजाय उनके पीछे
     दुकानदार के बिल का हिसाब लगवाएं।         छिपे 'क्यों' और 'कैसे' के विज्ञान को समझाएं।
  - पहेलियों (Puzzles) और सुडोकू (Sudoku)   - बच्चों के सामने कभी भी "गणित बहुत कठिन विषय है"
     जैसे खेलों के जरिए तार्किक क्षमता बढ़ाएं।    जैसी नकारात्मक बातें न दोहराएं।

🎯 निष्कर्ष: रामानुजन की विरासत और आत्मनिर्भर भारत का संकल्प

राष्ट्रीय गणित दिवस केवल एक महान वैज्ञानिक के जन्मदिन का स्मरणोत्सव नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र भारत के युवाओं के लिए एक वैचारिक आह्वान है। श्रीनिवास रामानुजन ने यह साबित किया कि बिना किसी अत्याधुनिक प्रयोगशाला, बिना किसी भारी-भरकम कंप्यूटर और बिना किसी अकूत धन-संपत्ति के, केवल एक स्लेट, एक पेंसिल और अपने मस्तिष्क की असीम एकाग्रता के दम पर भी दुनिया के विज्ञान को हिलाया जा सकता है।

जैसे-जैसे भारत अंतरिक्ष विज्ञान (ISRO के चंद्रयान और गगनयान मिशन), डिजिटल इकॉनमी (UPI और फिनटेक) और विनिर्माण के क्षेत्र में एक वैश्विक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है, हमें लाखों नए रामानुजनों की आवश्यकता होगी। आइए, इस 22 दिसंबर को हम सब मिलकर गणित के महत्व को समझें, अपनी तार्किक सोच को मजबूत करें, और रामानुजन के उस अमर कथन को हमेशा याद रखें—“मेरे लिए किसी ऐसे समीकरण का कोई मूल्य नहीं है, जो ईश्वर के विचार को व्यक्त न करता हो।”जय हिन्द! भारत माता की जय!


❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. राष्ट्रीय गणित दिवस कब और क्यों मनाया जाता है?

यह दिवस हर साल 22 दिसंबर को पूरे भारत में मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य भारत के महान और विलक्षण गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन के जन्मदिन को याद करना, उनके ऐतिहासिक योगदान को सम्मान देना और युवाओं में गणित के प्रति रुचि बढ़ाना है।

2. इस दिवस को मनाने की घोषणा कब और किसने की थी?

तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने 26 फरवरी 2012 को मद्रास विश्वविद्यालय में रामानुजन की 125वीं जयंती समारोह के दौरान हर साल 22 दिसंबर को ‘राष्ट्रीय गणित दिवस’ के रूप में मनाने की आधिकारिक घोषणा की थी। पहला गणित दिवस 22 दिसंबर 2012 को मनाया गया था।

3. ‘हार्डी-रामानुजन संख्या’ (1729) का क्या महत्व है?

संख्या 1729 को हार्डी-रामानुजन संख्या या टैक्सीकैब नंबर कहा जाता है। यह वह सबसे छोटी संख्या है जिसे दो अलग-अलग तरीकों से दो संख्याओं के घनों (Cubes) के योग के रूप में लिखा जा सकता है (1729 = 1³ + 12³ और 1729 = 9³ + 10³)।

4. रामानुजन के शोध आधुनिक विज्ञान (जैसे ब्लैक होल्स) में कैसे मदद करते हैं?

रामानुजन द्वारा अपने जीवन के अंतिम दिनों में खोजे गए ‘मॉक थीटा फंक्शंस’ (Mock Theta Functions) के जटिल सूत्र आज एक सदी बाद वैज्ञानिकों को अंतरिक्ष के सबसे बड़े रहस्य यानी ब्लैक होल्स (Black Holes) के भीतर क्वांटम व्यवहार और स्पेस-टाइम की विकृति को समझने में मदद कर रहे हैं।

5. श्रीनिवास रामानुजन को इंग्लैंड में क्या सर्वोच्च सम्मान मिले थे?

रामानुजन को उनके अभूतपूर्व गणितीय शोधों के लिए वर्ष 1918 में ब्रिटेन की प्रसिद्ध वैज्ञानिक संस्था रॉयल सोसाइटी का फेलो (FRS) चुना गया था, वह यह सम्मान पाने वाले सबसे कम उम्र के वैज्ञानिकों में से एक थे। इसके साथ ही वे कैंब्रिज विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी कॉलेज के फेलो चुने जाने वाले पहले भारतीय भी बने थे।


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