कृषि यंत्र अनुदान योजना उत्तर प्रदेश: 80% तक सब्सिडी, पारदर्शी ई-लॉटरी और आधुनिक खेती का नया डिजिटल युग
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उत्तर प्रदेश कृषि यंत्र अनुदान योजना: फार्म मैकेनाइजेशन, पारदर्शी ई-लॉटरी और किसानों की आर्थिक समृद्धि का डिजिटल मार्ग
१. प्रस्तावना (Introduction)
भारतीय कृषि क्षेत्र पारंपरिक तौर-तरीकों से निकलकर आधुनिकता की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा है। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और सघन जनसंख्या वाले राज्य में, जहाँ देश की एक बहुत बड़ी आबादी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है, खेती को घाटे के सौदे से उबारकर मुनाफे के व्यवसाय में बदलना एक बड़ी चुनौती रहा है। पारंपरिक रूप से की जाने वाली खेती में अत्यधिक शारीरिक श्रम, समय की बर्बादी और उच्च उत्पादन लागत (Cost of Production) जैसी समस्याएं आम थीं। इसके अतिरिक्त, बुवाई और कटाई के व्यस्त सीजन में मजदूरों की भारी कमी किसानों के संकट को और बढ़ा देती थी।
इन सभी समस्याओं का एकमात्र और सबसे प्रभावी समाधान है—कृषि यंत्रीकरण (Farm Mechanization)। आधुनिक कृषि यंत्रों जैसे ट्रैक्टर, रोटावेटर, कंबाइन हार्वेस्टर और लेजर लैंड लेवलर का उपयोग न केवल समय और श्रम की बचत करता है, बल्कि फसलों की उत्पादकता में भी १५ से २० प्रतिशत तक की वृद्धि करता है। परंतु, भारत के अधिकांश किसानों, विशेषकर लघु और सीमांत (Small and Marginal) किसानों की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं होती कि वे इन महंगे आधुनिक उपकरणों को बाजार मूल्य पर खरीद सकें।
इसी अंतर को पाटने और राज्य के प्रत्येक छोटे-बड़े किसान तक आधुनिक तकनीक की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार के कृषि विभाग ने ‘कृषि यंत्र अनुदान योजना’ (Krishi Yantra Anudan Yojana – UP Farm Machinery Subsidy Scheme) की शुरुआत की है। ‘पारदर्शी किसान सेवा पोर्टल’ के माध्यम से पूरी तरह डिजिटल मोड में संचालित यह योजना आज सूबे के किसानों को सशक्त, आधुनिक और आत्मनिर्भर बनाने का एक सबसे मजबूत आधार बन चुकी है।
२. योजना की पृष्ठभूमि और प्रशासनिक ढांचा
उत्तर प्रदेश में कृषि यंत्रों पर सब्सिडी देने की व्यवस्था पहले भी थी, लेकिन पूर्व की प्रणालियों में भारी विसंगतियां थीं। पहले ‘पहले आओ-पहले पाओ’ के नियम के कारण केवल वही रसूखदार या जागरूक किसान लाभ उठा पाते थे जिनकी पहुंच सरकारी दफ्तरों तक थी। सुदूर गांवों में रहने वाले छोटे किसान इस दौड़ में पीछे छूट जाते थे।
इस व्यवस्था में क्रांतिकारी सुधार करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने इस योजना को ‘सबमिशन ऑन एग्रीकल्चर मैकेनाइजेशन’ (SMAM) और राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) जैसी केंद्रीय योजनाओं के साथ एकीकृत किया। सबसे बड़ा बदलाव इसे कृषि विभाग के आधिकारिक डिजिटल प्लेटफॉर्म (upagriculture.com) पर लाकर किया गया। वर्तमान में, इस योजना के तहत आवेदन से लेकर, टोकन जनरेशन, भौतिक सत्यापन (Physical Verification) और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) के माध्यम से सब्सिडी का भुगतान पूरी तरह से ऑनलाइन और पारदर्शी तरीके से किया जाता है।
३. कृषि यंत्र अनुदान योजना के मुख्य उद्देश्य (Core Objectives)
इस महत्वाकांक्षी योजना को राज्य भर में व्यापक स्तर पर लागू करने के पीछे निम्नलिखित महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक और तकनीकी उद्देश्य निहित हैं:
- आधुनिक तकनीकों का लोकतंत्रीकरण: महंगे कृषि उपकरणों को छोटे और सीमांत किसानों के लिए भी वित्तीय रूप से सुलभ बनाना, ताकि यंत्रीकरण का लाभ समाज के अंतिम छोर तक पहुंचे।
- उत्पादन लागत में कमी: आधुनिक यंत्रों के उपयोग से खेतों की तैयारी, बुवाई, और कटाई में लगने वाले समय तथा मजदूरों पर होने वाले खर्च को न्यूनतम करना।
- समयबद्ध कृषि कार्य (Timeliness of Operations): मौसम में तेजी से हो रहे बदलावों के बीच फसलों की बुवाई और कटाई सही समय पर पूरी करना, जिससे प्राकृतिक आपदाओं के कारण होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।
- पराली प्रबंधन (Crop Residue Management): पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए धान की कटाई के बाद खेतों में पराली जलाने की प्रथा को रोकने के लिए इन-सिटू (In-situ) उपकरणों (जैसे हैप्पी सीढर, सुपर सीडर, स्ट्रॉ रीपर, मल्चर) पर विशेष रूप से भारी सब्सिडी देकर किसानों को जागरूक करना।
- कस्टम हायरिंग सेंटर्स (CHC) के माध्यम से ग्रामीण रोजगार: गांवों में युवाओं और किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) को व्यावसायिक स्तर पर कस्टम हायरिंग सेंटर स्थापित करने के लिए प्रेरित करना, ताकि वे दूसरे किसानों को किराए पर यंत्र देकर खुद भी अच्छी आय अर्जित कर सकें।
४. योजना के अंतर्गत कवर होने वाले प्रमुख कृषि यंत्र और सब्सिडी का ढांचा
उत्तर प्रदेश सरकार किसानों की विभिन्न आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए बुवाई से लेकर कटाई और फसल प्रबंधन तक के दर्जनों छोटे-बड़े कृषि उपकरणों पर ४० प्रतिशत से लेकर ८० प्रतिशत तक का भारी अनुदान प्रदान करती है। उपकरणों को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है:
क) लघु और मध्यम कृषि यंत्र (४०% से ५०% सब्सिडी)
- रोटावेटर (Rotavator): मिट्टी को भुरभुरा और समतल बनाने के लिए।
- पावर टिलर (Power Tiller): छोटे खेतों और बागवानी के कार्यों के लिए।
- सीड ड्रिल / मल्टीक्रॉप प्लांटर: फसलों की सटीक दूरी और गहराई पर बुवाई करने के लिए।
- पॉवर चैफ कटर (Chaff Cutter): पशुओं के चारे को काटने की आधुनिक मशीन।
- पॉवर स्प्रेयर: फसलों पर कीटनाशकों के सुरक्षित और त्वरित छिड़काव के लिए।
ख) भारी एवं अत्याधुनिक कृषि उपकरण (४०% से ५०% सब्सिडी या अधिकतम सीमा तय)
- ट्रैक्टर (Tractor): विभिन्न हॉर्सपावर (HP) श्रेणियों के अनुसार।
- कंबाइन हार्वेस्टर (Combine Harvester): फसलों की कटाई और मड़ाई एक साथ करने के लिए।
- लेजर लैंड लेवलर (Laser Land Leveler): खेतों को पूरी तरह समतल करने के लिए, जिससे सिंचाई में ३०% तक पानी की बचत होती है।
ग) पराली प्रबंधन और पर्यावरण-अनुकूल यंत्र (५०% से ८०% तक विशेष सब्सिडी)
- सुपर सीडर (Super Seeder) और हैप्पी सीडर (Happy Seeder): पराली को बिना जलाए सीधे गेहूं की बुवाई करने के लिए।
- मल्चर (Mulcher) और श्रेडर: पराली के छोटे-छोटे टुकड़े कर मिट्टी में मिलाने के लिए।
- स्ट्रॉ बेलर (Straw Baler): पराली के बंडल बनाकर व्यावसायिक उपयोग हेतु तैयार करने के लिए।
- इन यंत्रों पर यदि व्यक्तिगत किसान आवेदन करता है तो ५०% और यदि कोई किसान समूह या FPO ‘कस्टम हायरिंग सेंटर’ स्थापित करता है, तो उसे कुल प्रोजेक्ट लागत पर ८०% तक की विशाल सब्सिडी मिलती है।
५. पात्रता के मानदंड और आवश्यक दस्तावेज (Eligibility & Documents)
योजना का लाभ केवल वास्तविक और उत्तर प्रदेश के मूल निवासी किसानों को ही मिले, इसके लिए निम्नलिखित पात्रता शर्तें तय की गई हैं:
- वैध किसान पंजीकरण: आवेदक किसान का उत्तर प्रदेश कृषि विभाग के ‘पारदर्शी किसान सेवा पोर्टल’ पर ‘किसान पंजीकरण’ (Farmer ID) होना अनिवार्य है।
- भूमि का मालिकाना हक: किसान के पास अपने नाम की वैध खतौनी (भूलेख रिकॉर्ड) होनी चाहिए।
- निश्चित समयावधि का नियम: यदि किसी किसान ने पिछले ३ से ५ वर्षों के भीतर किसी विशिष्ट कृषि यंत्र पर सरकारी सब्सिडी का लाभ लिया है, तो वह उसी यंत्र पर दोबारा सब्सिडी पाने का पात्र नहीं होगा। हालांकि, वह किसी अन्य श्रेणी के यंत्र के लिए आवेदन कर सकता है।
- अनिवार्य दस्तावेज:
- आधार कार्ड (मोबाइल नंबर से लिंक)
- बैंक खाता पासबुक (डीबीटी और एनपीसीआई मैपिंग अनिवार्य)
- भूमि के कागजात (खतौनी)
- किसान पंजीकरण संख्या (Farmer ID)
६. पारदर्शी ‘टोकन जनरेशन’ और ‘ई-लॉटरी’ (E-Lottery) चयन प्रक्रिया
उत्तर प्रदेश कृषि यंत्र अनुदान योजना की सबसे बड़ी ताकत इसकी शत-प्रतिशत पारदर्शी चयन प्रक्रिया है, जिसने प्रशासनिक भ्रष्टाचार और सिफारिशी संस्कृति को पूरी तरह खत्म कर दिया है। सरकार ने इसके लिए ‘ई-लॉटरी प्रणाली’ को अनिवार्य बनाया है।
आवेदन और आवंटन की पूरी चरण-दर-चरण प्रक्रिया:
- विज्ञप्ति और ऑनलाइन बुकिंग: कृषि विभाग द्वारा जिलों के अनुसार लक्ष्यों की घोषणा की जाती है। इसके बाद निर्धारित तिथि पर पोर्टल पर ‘टोकन जनरेट करें’ का विकल्प खुलता है। किसान अपनी पसंद के यंत्र के लिए ऑनलाइन टोकन बुक करते हैं।
- जमानत धनराशि (Token Money) जमा करना: गंभीर आवेदकों को ही योजना का लाभ मिले और फर्जी बुकिंग रोकी जा सके, इसके लिए सरकार ने यंत्रों की कीमत के अनुसार जमानत राशि तय की है। ₹१०,००० से कम सब्सिडी वाले यंत्रों के लिए कोई जमानत राशि नहीं होती, लेकिन ₹१०,००० से अधिक की सब्सिडी वाले यंत्रों के लिए ₹२,५०० से ₹५,००० तक की जमानत राशि (टोकन मनी) चालान या ऑनलाइन बैंकिंग के माध्यम से निश्चित समय सीमा (आमतौर पर १ सप्ताह) में जमा करनी होती है।
- पारदर्शी ई-लॉटरी (E-Lottery): यदि किसी जिले में प्राप्त आवेदनों की संख्या सरकार द्वारा निर्धारित लक्ष्यों से अधिक (जो कि अमूमन होती है) होती है, तो कंप्यूटर द्वारा पूरी तरह से रैंडम ई-लॉटरी निकाली जाती है। यह प्रक्रिया जनपद स्तर पर जिलाधिकारी (DM) की अध्यक्षता में गठित समिति और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति में होती है, जिसकी लाइव रिकॉर्डिंग भी की जाती है।
- यंत्र की खरीद: ई-लॉटरी में जिन किसानों का नाम चयनित (चयनित सूची) या प्रतीक्षा सूची (Waiting List) के शीर्ष पर आता है, उन्हें कृषि विभाग द्वारा पंजीकृत किसी भी अधिकृत वेंडर या डीलर से अपनी पसंद का यंत्र पूरी कीमत चुकाकर खरीदना होता है। किसान को पक्का जीएसटी (GST) बिल और यंत्र के साथ अपनी फोटो पोर्टल पर अपलोड करनी होती है।
- भौतिक सत्यापन (Physical Verification): ब्लॉक या तहसील स्तर के कृषि अधिकारी (जैसे ADO Ag) किसान के खेत पर जाकर यंत्र का भौतिक सत्यापन करते हैं। वे यंत्र पर अंकित चेसिस नंबर/सीरियल नंबर की जांच करते हैं और सुनिश्चित करते हैं कि उपकरण बिल्कुल नया और मानकों के अनुरूप है।
- डीबीटी (DBT) के माध्यम से सब्सिडी: भौतिक सत्यापन की रिपोर्ट ऑनलाइन सबमिट होने के बाद, स्वीकृत सब्सिडी की राशि सीधे किसान के आधार-लिंक्ड बैंक खाते में ट्रांसफर कर दी जाती है और उसकी जमा की गई टोकन मनी भी वापस कर दी जाती है।
७. ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि परिदृश्य पर दूरगामी प्रभाव
इस डिजिटल और पारदर्शी योजना के क्रियान्वयन से उत्तर प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में व्यापक बदलाव देखने को मिले हैं:
१. छोटे किसानों के लिए आधुनिकता का द्वार
अतीत में रोटावेटर या लेजर लैंड लेवलर जैसी मशीनें केवल बड़े जमींदारों के खेतों में ही दिखती थीं। इस योजना की पारदर्शी ई-लॉटरी प्रणाली के कारण आज उत्तर प्रदेश के छोटे और सीमांत किसान भी शान से अपने खेतों में इन आधुनिक मशीनों का उपयोग कर रहे हैं। इससे ग्रामीण समाज में तकनीकी असमानता दूर हुई है।
२. कृषि इनपुट लागत में कमी और लाभ में वृद्धि
यंत्रों के उपयोग से खेतों की तैयारी और बुवाई का काम जो पहले दिनों में होता था, अब घंटों में पूरा हो जाता है। मजदूरों पर होने वाला अत्यधिक खर्च घटने और समय पर बुवाई होने से फसलों की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। इसके परिणामस्वरूप किसानों की शुद्ध बचत और मुनाफे में भारी वृद्धि हुई है।
३. ‘कस्टम हायरिंग सेंटर्स’ (CHC) से ग्रामीण उद्यमिता का विकास
योजना के तहत FPOs और ग्रामीण युवाओं को कस्टम हायरिंग सेंटर स्थापित करने के लिए ४०% से ८०% तक की जो मदद मिल रही है, उसने गांवों में रोजगार का एक नया मॉडल खड़ा कर दिया है। ये युवा खुद के यंत्रों से दूसरों के खेतों की जुताई-कटाई किराए पर करते हैं। इससे न केवल उन युवाओं को एक बेहतरीन बिजनेस मिला है, बल्कि जिन गरीब किसानों के पास खुद के यंत्र नहीं हैं, उन्हें भी बहुत ही कम किराए पर आधुनिक मशीनें अपने गांव में ही मिल जाती हैं।
४. पराली के धुएं से मुक्ति और भूमि स्वास्थ्य में सुधार
इन-सिटू (In-situ) पराली प्रबंधन उपकरणों (जैसे सुपर सीडर) पर मिलने वाली भारी सब्सिडी के कारण उत्तर प्रदेश के जिलों (विशेषकर पश्चिमी यूपी) में पराली जलाने की घटनाओं में भारी कमी आई है। पराली को खेत में ही दबाकर खाद के रूप में परिवर्तित करने से मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों (Organic Matter) की मात्रा बढ़ी है, जिससे जमीन की उर्वरा शक्ति (Soil Health) में सुधार हुआ है।
८. योजना के संचालन में मुख्य चुनौतियाँ
यद्यपि यह योजना कृषि कल्याण के क्षेत्र में एक मील का पत्थर है, परंतु इसके सुचारू संचालन में कुछ व्यावहारिक और तकनीकी बाधाएं भी सामने आती हैं:
- डिजिटल साक्षरता और सर्वर क्रैश की समस्या: जब पूरे राज्य में एक साथ कृषि यंत्रों के टोकन खुलते हैं, तो पोर्टल पर लाखों किसानों का ट्रैफिक एक साथ आने के कारण सर्वर डाउन या क्रैश हो जाता है। इसका फायदा उठाकर कुछ चालाक साइबर कैफे संचालक अवैध सॉफ्टवेयरों के जरिए तुरंत टोकन बुक कर लेते हैं, और आम अशिक्षित किसान वंचित रह जाता है।
- वित्तीय तरलता (Upfront Capital) का संकट: डीबीटी प्रणाली का नियम है कि किसान को पहले यंत्र की पूरी कीमत अपनी जेब से डीलर को चुकानी होती है, और सब्सिडी बाद में आती है। कई अत्यंत गरीब सीमांत किसानों के पास शुरुआत में पूरी रकम (जैसे रोटावेटर के लिए ₹१ लाख से अधिक) नकद जमा करने की क्षमता नहीं होती, जिसके कारण वे ई-लॉटरी में नाम आने के बाद भी यंत्र नहीं खरीद पाते।
- डीलर और वेंडर्स का सिंडिकेट: कई बार स्थानीय स्तर पर कृषि यंत्रों के डीलर एक सिंडिकेट (गठबंधन) बना लेते हैं और सब्सिडी वाले यंत्रों की कीमतें बाजार के सामान्य मूल्य से कृत्रिम रूप से बढ़ा देते हैं, जिससे सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी का वास्तविक लाभ आंशिक रूप से कम हो जाता है।
९. भविष्य की राह और संधारणीय सुधार (Way Forward)
उत्तर प्रदेश कृषि यंत्र अनुदान योजना को भविष्य में और अधिक पारदर्शी, सुलभ और प्रभावी बनाने के लिए निम्नलिखित सुधारात्मक कदम उठाए जाने की आवश्यकता है:
- ‘लोन-लिंक्ड सब्सिडी’ (Loan-Linked Subsidy) मॉडल: अत्यंत गरीब किसानों की वित्तीय समस्या को दूर करने के लिए सरकार को बैंकों के साथ मिलकर एक ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जहां किसान को केवल अपना ‘कृषक अंश’ (जैसे ४० या ५०%) ही नकद देना पड़े, और शेष सब्सिडी की राशि सरकार सीधे बैंक के माध्यम से डीलर को ट्रांसफर कर दे। इससे किसान पर एकमुश्त पूरी रकम जुटाने का दबाव नहीं रहेगा।
- ब्लॉकचेन और तकनीकी ट्रैकिंग: कृषि यंत्रों की कालाबाजारी और एक ही यंत्र पर बार-बार सब्सिडी लेने के फर्जीवाड़े को रोकने के लिए प्रत्येक यंत्र के सीरियल नंबर को ब्लॉकचेन तकनीक (Blockchain) या क्यूआर कोड (QR Code) के माध्यम से परमानेंटली ट्रैक किया जाना चाहिए। भौतिक सत्यापन की प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी बनाने के लिए जियो-टैग्ड (Geo-tagged) वीडियो अनिवार्य होने चाहिए।
- विकेंद्रीकृत सर्वर और मोबाइल ऐप: टोकन बुकिंग के समय सर्वर क्रैश होने की समस्या से निपटने के लिए कृषि विभाग को मंडलवार (Divisional) या मंडल आधारित अलग-अलग तिथियों पर टोकन खोलने चाहिए। साथ ही, एक समर्पित मोबाइल ऐप विकसित किया जाना चाहिए जो कम इंटरनेट स्पीड पर भी आसानी से काम कर सके।
- महिला किसानों के लिए विशेष कोटा: ग्रामीण महिलाओं की कृषि में भागीदारी को देखते हुए, स्वयं सहायता समूहों (SHGs) की महिला किसानों के लिए ई-लॉटरी में एक निश्चित प्रतिशत का विशेष आरक्षण (कोटा) होना चाहिए, जिससे महिला सशक्तिकरण को और अधिक बल मिल सके।
१०. निष्कर्ष (Conclusion)
निष्कर्षतः, उत्तर प्रदेश कृषि यंत्र अनुदान योजना राज्य के कृषि क्षेत्र में सुशासन, डिजिटलीकरण और तकनीकी क्रांति का एक सबसे जीवंत दस्तावेज है। इस योजना ने पारंपरिक खेती की सुस्ती और लाचारी को आधुनिक कृषि यंत्रीकरण की गति और गरिमा में बदल दिया है। प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) और ई-लॉटरी प्रणालियों के मजबूत पहरे के कारण आज उत्तर प्रदेश का आम गरीब किसान भी बिना किसी बिचौलिये या रिश्वत के सीधे सरकारी सब्सिडी का पूर्ण हकदार बन रहा है।
यद्यपि, सर्वर की क्षमता बढ़ाने और छोटे किसानों के लिए शुरुआती पूंजी की व्यवस्था करने जैसी व्यावहारिक ढांचागत चुनौतियों पर निरंतर नीतिगत सुधारों की आवश्यकता बनी रहेगी, परंतु कृषि यंत्रीकरण के इस महा-अभियान ने उत्तर प्रदेश के गांवों में तकनीकी समृद्धि का जो बीज बोया है, वह अद्वितीय है। यह डिजिटल कृषि क्रांति आने वाले समय में उत्तर प्रदेश के अन्नदाताओं को न केवल आर्थिक रूप से समृद्ध बनाएगी, बल्कि राज्य की समग्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था को देश के विकास के सबसे मजबूत इंजन के रूप में स्थापित करने में मील का पत्थर साबित होगी।
उत्तर प्रदेश की कृषि यंत्र अनुदान योजना से जुड़े कुछ सबसे महत्वपूर्ण और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs):
- प्रश्न १: उत्तर प्रदेश कृषि यंत्र अनुदान योजना क्या है?
- उत्तर: यह उत्तर प्रदेश सरकार के कृषि विभाग द्वारा संचालित एक डिजिटल योजना है। इसके तहत राज्य के किसानों को आधुनिक कृषि उपकरण (जैसे रोटावेटर, सीड ड्रिल, लेजर लैंड लेवलर, और पराली प्रबंधन के यंत्र) खरीदने पर ४०% से लेकर ८०% तक की भारी सब्सिडी सीधे उनके बैंक खातों में दी जाती है।
- प्रश्न २: योजना का लाभ लेने के लिए मुख्य पात्रता शर्तें क्या हैं?
- उत्तर:
- आवेदक किसान उत्तर प्रदेश का मूल निवासी होना चाहिए।
- किसान का ‘पारदर्शी किसान सेवा पोर्टल’ (upagriculture.com) पर वैध पंजीकरण (Farmer ID) होना अनिवार्य है।
- किसान के नाम पर वैध कृषि भूमि (खतौनी) होनी चाहिए।
- किसान ने पिछले ३ से ५ वर्षों में उसी विशिष्ट यंत्र पर सरकारी सब्सिडी का लाभ न लिया हो।
- उत्तर:
- प्रश्न ३: कृषि यंत्रों पर सब्सिडी के लिए ‘टोकन’ (Token) कैसे जनरेट किया जाता है?
- उत्तर: कृषि विभाग जब जिलों के अनुसार लक्ष्यों की घोषणा करता है, तब किसानों को आधिकारिक पोर्टल पर जाकर अपनी किसान आईडी के माध्यम से ऑनलाइन टोकन बुक करना होता है। यह प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल होती है।
- प्रश्न ४: टोकन बुकिंग के लिए जमानत राशि (Token Money) क्यों और कितनी जमा करनी होती है?
- उत्तर: केवल गंभीर और जरूरतमंद किसान ही आवेदन करें और फर्जी बुकिंग को रोका जा सके, इसके लिए सरकार ने जमानत राशि तय की है। ₹१०,००० से कम सब्सिडी वाले यंत्रों के लिए कोई राशि नहीं लगती, लेकिन ₹१०,००० से अधिक की सब्सिडी वाले यंत्रों के लिए ₹२,५०० से ₹५,००० तक की जमानत राशि चालान या ऑनलाइन माध्यम से १ सप्ताह के भीतर जमा करनी होती है, जो बाद में रिफंड हो जाती है।
- प्रश्न ५: ई-लॉटरी (E-Lottery) प्रणाली क्या है और चयन कैसे होता है?
- उत्तर: जब किसी जिले में कृषि यंत्रों के लक्ष्यों से अधिक आवेदन या टोकन प्राप्त होते हैं, तो शत-प्रतिशत पारदर्शिता बनाए रखने के लिए कंप्यूटर द्वारा पूरी तरह से रैंडम ई-लॉटरी निकाली जाती है। यह प्रक्रिया जिलाधिकारी (DM) की अध्यक्षता में गठित समिति के सामने लाइव की जाती है।
- प्रश्न ६: कस्टम हायरिंग सेंटर (CHC) क्या है और इस पर कितनी सब्सिडी मिलती है?
- उत्तर: यह ग्रामीण युवाओं, किसान समूहों या FPOs द्वारा स्थापित किया जाने वाला एक ‘कृषि यंत्र बैंक’ होता है, जहाँ से छोटे किसान किराए पर आधुनिक मशीनें ले सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में कस्टम हायरिंग सेंटर या फार्म मशीनरी बैंक स्थापित करने पर सरकार द्वारा कुल प्रोजेक्ट लागत पर ८० प्रतिशत तक का भारी अनुदान (सब्सिडी) दिया जाता है।
- प्रश्न ७: यंत्र खरीदने के बाद सब्सिडी का पैसा किसान के खाते में कैसे आता है?
- उत्तर: ई-लॉटरी में नाम आने के बाद किसान को अधिकृत डीलर से यंत्र पूरा पैसा देकर खरीदना होता है और उसका पक्का बिल पोर्टल पर अपलोड करना होता है। इसके बाद ब्लॉक स्तर के कृषि अधिकारी खेत पर जाकर यंत्र का भौतिक सत्यापन (Physical Verification) करते हैं और रिपोर्ट सही होने पर सब्सिडी की राशि सीधे किसान के आधार-लिंक्ड बैंक खाते में डीबीटी (DBT) के माध्यम से ट्रांसफर कर दी जाती है।
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