Navratri Day 6: कैसे करें मां कात्यायनी की पूजा और कल्पारंभ, नवरात्रि का छठा दिन, महत्व और संपूर्ण पूजा विधि
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मां कात्यायनी पूजा एवं कल्पारंभ: नवरात्रि का छठा दिन, महत्व, महिषासुर वध की कथा, पूजा विधि, मंत्र और आरती
सनातन धर्म में चैत्र और शारदीय नवरात्रि को आत्मिक चेतना के परिष्कार, शक्ति संचय और आसुरी प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करने का सबसे पावन काल माना जाता है। नवदुर्गा के नौ स्वरूप चेतना के विभिन्न स्तरों, दिव्य गुणों और पराक्रम को प्रकट करते हैं। नवरात्रि के छठे दिन (षष्ठी तिथि) को महाशक्ति के अत्यंत पराक्रमी और महिमामयी स्वरूप मां कात्यायनी की पूजा-अर्चना की जाती है।
इसके साथ ही, आश्विन मास की शरद नवरात्रि की षष्ठी तिथि का बंगाली समाज और पूर्वी भारत में एक विशेष ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व है, क्योंकि इसी दिन से मुख्य ‘दुर्गा पूजा’ (Durga Puja) का औपचारिक आरंभ होता है, जिसे ‘कल्पारंभ’ (Kalparambha) कहा जाता है।
जहाँ पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा से साधक के भीतर वात्सल्य और शांति का उदय होता है, वहीं छठे दिन मां कात्यायनी का स्वरूप भक्त को अचूक इच्छाशक्ति, अद्भुत ओज और धर्म की रक्षा के लिए तत्पर रहने का साहस प्रदान करता है। महर्षि कात्यायन की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर उनके घर पुत्री रूप में जन्म लेने के कारण ही इन्हें ‘कात्यायनी’ कहा जाता है।
इस विस्तृत पौराणिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक लेख में हम मां कात्यायनी के दिव्य स्वरूप, महिषासुर वध की अमर कथा, कल्पारंभ (दुर्गा पूजा प्रारंभ) का रहस्य, ज्योतिषीय व आध्यात्मिक महत्व, संपूर्ण पूजा विधि, शक्तिशाली मंत्रों, प्रिय भोग और पावन आरती के बारे में सविस्तार चर्चा करेंगे।
1. मां कात्यायनी का अलौकिक व सिंहवाहिनी स्वरूप (Divine Form of Maa Katyayani)
मां कात्यायनी का विग्रह अत्यंत चमकीला, ओजस्वी और तेज से परिपूर्ण है। वे स्वर्ण के समान आभा वाली दिव्य देवी हैं, जिनका मुखमंडल भक्तों के लिए परम दयालु और दुष्टों के लिए काल के समान भयानक है।

- चतुर्भुजी स्वरूप: माता कात्यायनी की चार भुजाएं हैं। वे अपने दाहिने तरफ की ऊपर वाली भुजा से भक्तों को अभय (डर से मुक्ति) प्रदान करती हैं और नीचे वाली भुजा से वरदान (वरमुद्रा) देती हैं। वाम (बाईं) तरफ की ऊपर वाली भुजा में वे चमकीली खड्ग (तलवार) धारण करती हैं और नीचे वाली भुजा में सुंदर कमल का पुष्प सुशोभित है।
- सिंह की सवारी: माता का वाहन एक अत्यंत विशाल और पराक्रमी सिंह है, जो धर्म की स्थापना के लिए उनके तीव्र वेग और अदम्य साहस को दर्शाता है।
- ब्रह्मांडीय तेज: देवी कात्यायनी का स्वरूप इतना प्रखर है कि उनकी केवल उपस्थिति मात्र से ही आसपास की नकारात्मक शक्तियां और आसुरी विचार तत्क्षण भस्म हो जाते हैं।
2. पौराणिक कथा: महर्षि कात्यायन की तपस्या और महिषासुर का संहार (Legend of Maa Katyayani)
पौराणिक ग्रंथों और श्रीदुर्गासप्तशती के अनुसार, प्राचीन काल में कत नाम के एक प्रसिद्ध महर्षि थे। उनके पुत्र महर्षि कात्य हुए। इसी कात्य गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन का जन्म हुआ था। वे भगवती आदिशक्ति के परम उपासक थे और वर्षों तक उन्होंने कठोर व्रत-नियमों का पालन किया।
महर्षि की इच्छा और माता का वरदान
महर्षि कात्यायन की इच्छा थी कि भगवती साक्षात उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें। उनकी इस घोर तपस्या से प्रसन्न होकर माता दुर्गा ने उन्हें दर्शन दिए और उनकी इच्छानुसार उनके घर पुत्री रूप में अवतरित होने का वरदान दिया।
महिषासुर के आतंक का समय
उसी कालखंड में महिषासुर नाम के राक्षस का अत्याचार तीनों लोकों में अत्यंत बढ़ गया था। उसके आतंक से व्याकुल होकर जब ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने अपने तेज को सम्मिलित किया, तब आश्विन कृष्ण चतुर्दशी के दिन महर्षि कात्यायन के आश्रम में एक दिव्य चेतना ने जन्म लिया। महर्षि कात्यायन ने आश्विन शुक्ल सप्तमी, अष्टमी और नवमी तक तीन दिनों तक इस कन्या की भावपूर्ण पूजा की।
कात्यायनी का रणचंडी स्वरूप और वध
दशमी तिथि के दिन मां कात्यायनी ने महिषासुर की युद्ध भूमि में ललकार का सामना किया। सिंह पर सवार होकर जब माता युद्ध के मैदान में उतरीं, तो उन्होंने अपने खड्ग के एक ही प्रहार से दुष्ट महिषासुर का मस्तक धड़ से अलग कर दिया। महिषासुर का वध करने के कारण ही माता को ‘महिषासुरमर्दिनी’ भी कहा जाता है। महर्षि कात्यायन की पुत्री होने के कारण संसार ने उन्हें ‘कात्यायनी’ के नाम से पूजा।
3. कल्पारंभ: दुर्गा पूजा का भव्य प्रारंभ (What is Kalparambha?)
शारदीय नवरात्रि की षष्ठी तिथि को पूर्वी भारत, विशेषकर पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम और त्रिपुरा में ‘कल्पारंभ’ (Kalparambha) के रूप में मनाया जाता है। यह मुख्य पांच दिवसीय दुर्गा पूजा उत्सव की औपचारिक शुरुआत का प्रतीक है।
कल्पारंभ (षष्ठी तिथि) के मुख्य अनुष्ठान
[घट स्थापना] ---> [देवी का आवाहन और कल्प संकल्प]
[बोधन विधि] ---> [विल्व वृक्ष (बेल पेड़) पूजन]
- बोधन (Awakening): पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, शरद ऋतु में देवता शयन काल (सोते हुए) में होते हैं। इसलिए, पूजा शुरू करने से पहले माता दुर्गा को मंत्रों द्वारा जगाया जाता है, जिसे ‘देवी बोधन’ कहते हैं।
- विल्व वृक्ष पूजन (Adhivasa): षष्ठी की शाम को बेल के पेड़ (विल्व वृक्ष) के नीचे जाकर माता दुर्गा का आवाहन किया जाता है। माना जाता है कि माता सबसे पहले बेल के वृक्ष में ही प्रवेश करती हैं।
- संकल्प: इस दिन तांबे या मिट्टी के कलश में पवित्र जल भरकर कल्पारंभ का संकल्प लिया जाता है कि आने वाले दिनों में माता की पूजा पूरे विधि-विधान से संपन्न होगी।
4. ज्योतिषीय और आध्यात्मिक महत्व (Astrological & Spiritual Significance)
नवरात्रि के छठे दिन की साधना मनुष्य को आंतरिक विकारों से मुक्त कर जीवन में सही निर्णय लेने की अद्भुत शक्ति देती है।
आज्ञा चक्र का जागरण (Awakening of Ajna Chakra)
योग साधना और चक्र विज्ञान के अनुसार, नवरात्रि की षष्ठी तिथि पर साधक का मन ‘आज्ञा चक्र’ (Ajna Chakra) में प्रवेश करता है। यह चक्र हमारे दोनों भोहों (Eyebrows) के बीच, मस्तक के केंद्र में स्थित होता है, जिसे ‘तीसरी आंख’ या ‘त्रिनेत्र’ भी कहा जाता है।
- मां कात्यायनी की आराधना से आज्ञा चक्र सक्रिय और जाग्रत होता है।
- इसके जाग्रत होने से साधक की अंतःप्रेरणा (Intuition), मानसिक स्पष्टता और दूरदर्शिता अत्यधिक बढ़ जाती है।
- व्यक्ति का मन पूरी तरह से एकाग्र हो जाता है और वह मायावी बंधनों को चीरकर आत्मज्ञान की ओर बढ़ जाता है।
बृहस्पति ग्रह की शांति (Astrological Remedy for Jupiter)
ज्योतिष शास्त्र के दृष्टिकोण से मां कात्यायनी बृहस्पति ग्रह (Jupiter / गुरु) को नियंत्रित और संचालित करती हैं।
- जिन जातकों की कुंडली में गुरु ग्रह कमजोर हो, विवाह में लगातार अड़चनें आ रही हों, या भाग्य साथ न दे रहा हो, उन्हें इस दिन माता की विशेष पूजा करनी चाहिए।
- शीघ्र विवाह के लिए उपाय: मान्यताओं के अनुसार, द्वापर युग में ब्रज की गोपियों ने भगवान कृष्ण को पति रूप में प्राप्त करने के लिए यमुना तट पर मां कात्यायनी की ही पूजा की थी। इसलिए विवाह योग्य कन्याओं के लिए माता की पूजा अत्यंत फलदायी मानी जाती है।
- इसके प्रभाव से वैवाहिक जीवन की बाधाएं दूर होती हैं, उत्तम जीवनसाथी मिलता है और ज्ञान व धन-धान्य में वृद्धि होती है।
5. मां कात्यायनी की संपूर्ण पूजा विधि (Complete Step-by-Step Puja Vidhi)
नवरात्रि की षष्ठी तिथि और कल्पारंभ के दिन पूजा की प्रक्रिया इस प्रकार होनी चाहिए:
- प्रातः कालीन स्नान और संकल्प: सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि करें। इस दिन लाल (Red) या चमकीले सुनहरे (Golden) रंग के वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
- कलश व विग्रह पूजन: पूजा स्थान पर बैठकर पूर्व दिनों की भांति कलश देवता, भगवान गणेश और स्थापित नवग्रहों का पूजन करें। इसके बाद मां कात्यायनी के चित्र या मूर्ति के सम्मुख घी का दीपक जलाएं।
- गंगाजल से अभिषेक: माता की मूर्ति पर गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें। माता को कुमकुम, सिंदूर, लाल चंदन और अक्षत का तिलक लगाएं।
- श्रृंगार सामग्री: माता कात्यायनी को लाल रंग की चुनरी ओढ़ाएं और श्रृंगार की वस्तुएं जैसे सिंदूर, चूड़ियां, बिंदी आदि अर्पित करें।
- पुष्प अर्पण: माता को पीले और लाल रंग के फूल बेहद प्रिय हैं। उन्हें गेंदे के फूल, लाल गुलाब, या गुड़हल के फूल अर्पित करें।
- दुर्गा पूजा बोधन (शाम के समय): यदि आप कल्पारंभ कर रहे हैं, तो शाम के समय बेल के पेड़ के पास जाकर धूप-दीप जलाएं, जल अर्पित करें और देवी दुर्गा का आवाहन करें।
- मंत्र जाप: शांत चित्त होकर माता के सिद्ध मंत्रों या बीज मंत्रों का कम से कम 108 बार जाप अवश्य करें।
- आरती और क्षमा याचना: पूजा के समापन पर माता की कपूर और घी के दीपक से आरती करें, शंख बजाएं और अनजाने में हुई भूलों के लिए हाथ जोड़कर क्षमा याचना करें।
6. माता का प्रिय भोग और शुभ रंग (Favorite Bhog and Color)
माता कात्यायनी को प्रसन्न करने के लिए षष्ठी तिथि पर इन विशेष वस्तुओं का चयन करें:
- प्रिय भोग: मां कात्यायनी को शहद (Honey) का भोग लगाना अत्यंत प्रिय और शुभ माना गया है। इस दिन माता को शुद्ध शहद अर्पित करने से या शहद से बनी वस्तुओं का भोग लगाने से साधक की सुंदरता, ओज और धन-संपत्ति में अभूतपूर्व वृद्धि होती है।
- शुभ रंग: नवरात्रि के छठे दिन के लिए लाल (Red) रंग को सर्वोत्तम माना जाता है। लाल रंग शक्ति, पराक्रम, प्रेम और ऊर्जा का प्रतीक है। इस दिन लाल वस्त्र पहनने से माता की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
7. मां कात्यायनी के सिद्ध मंत्र (Powerful Mantras)
पूजा के समय इन पवित्र मंत्रों का श्रद्धापूर्वक उच्चारण करने से सभी प्रकार के संकट दूर होते हैं और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है:
ध्यान मंत्र (Dhyan Mantra)
वंदे वांछित कामार्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहारूढ़ा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्विनीम्॥
प्रार्थना मंत्र (Prarthana Mantra)
चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद् देवी दानवघातिनी॥
स्तुति (Stuti)
या देवी सर्वभूतेषु मां कात्यायनी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै nmo नमः॥
शीघ्र विवाह के लिए कात्यायनी मंत्र (Mantra for Early Marriage)
कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरी।
नन्दगोपसुतं देवी पतिं मे कुरु ते नमः॥
8. मां कात्यायनी की पावन आरती (Maa Katyayani Aarti)
जय जय अम्बे कात्यायनी माता।
संकट हरनी सुख की दाता॥महर्षि कात्यायन के घर आई।
देवों ने मिलकर खुशी मनाई॥सिंह वाहिनी अद्भुत रूपा।
छवि देखत जन का मन मोहे रूपा॥चार भुजाएं अस्त्र-शस्त्र धारी।
दुष्टों का संहारक अवतारी॥महिषासुर का वध है कीन्हा।
देवताओं को सुख वर दीन्हा॥आज्ञा चक्र तुम्हारा वासा।
पूरण कीजो मेरी आसा॥शहद का भोग जो जन लगावे।
सुख-संपत्ति वह जीवन में पावे॥शरण पड़े की लाज बचाना।
संकट से माता पार लगाना॥
निष्कर्ष (Conclusion)
मां कात्यायनी और कल्पारंभ की आराधना हमें यह सिखाती है कि जब समाज में अन्याय और अधर्म की सीमाएं लांघने लगें, तो आंतरिक शक्तियों को संगठित कर रणचंडी का रूप धारण करना आवश्यक हो जाता है। माता का यह स्वरूप सांसारिक जीवन के सबसे बड़े अवरोधों जैसे विवाह में देरी, मानसिक भ्रम और शत्रुओं के भय को पल भर में समाप्त कर देता है।
जो भी श्रद्धालु नवरात्रि की षष्ठी तिथि पर पूर्ण श्रद्धा, पवित्रता और विश्वास के साथ मां कात्यायनी का पूजन करते हैं और कल्पारंभ का संकल्प लेते हैं, उनका जीवन आत्मबल, ओज, ऐश्वर्य और असीम विजय के प्रकाश से सराबोर हो जाता है।
मां कात्यायनी पूजा, कल्पारंभ और नवरात्रि षष्ठी से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)::
1. मां कात्यायनी को ‘कात्यायनी’ क्यों कहा जाता है?
भगवती आदिशक्ति की घोर तपस्या करने वाले परम उपासक महर्षि कात्यायन की इच्छा थी कि माता उनके घर पुत्री रूप में जन्म लें। माता ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और उनके आश्रम में अवतरित हुईं। महर्षि कात्यायन की पुत्री होने के कारण ही उन्हें ‘मां कात्यायनी’ कहा गया।
2. कल्पारंभ (Kalparambha) क्या है और इसका क्या महत्व है?
आश्विन मास की शरद नवरात्रि की षष्ठी तिथि को ‘कल्पारंभ’ कहा जाता है। यह मुख्य रूप से पूर्वी भारत (जैसे पश्चिम बंगाल) में मनाए जाने वाले पांच दिवसीय भव्य दुर्गा पूजा (Durga Puja) उत्सव की औपचारिक शुरुआत का प्रतीक है। इस दिन घट स्थापना करके पूजा का कल्प (संकल्प) लिया जाता है।
3. ‘देवी बोधन’ अनुष्ठान षष्ठी तिथि को क्यों किया जाता है?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, शरद ऋतु में सभी देवी-देवता शयन काल (सोती हुई अवस्था) में होते हैं। इसलिए, दुर्गा पूजा का आरंभ करने से पहले षष्ठी की शाम को मंत्रोच्चार और विल्व वृक्ष (बेल के पेड़) के नीचे जाकर माता दुर्गा को प्रतीकात्मक रूप से जगाया जाता है, जिसे ‘देवी बोधन’ (Awakening) कहते हैं।
4. नवरात्रि के छठे दिन माता को किस चीज का विशेष भोग लगाना चाहिए?
मां कात्यायनी को शहदमिश्री (Honey) का भोग लगाना सबसे प्रिय और शुभ माना गया है। षष्ठी तिथि पर माता को शुद्ध शहद अर्पित करने से साधक के तेज, सौंदर्य और आर्थिक समृद्धि में वृद्धि होती है।
5. शीघ्र विवाह के लिए मां कात्यायनी की पूजा क्यों की जाती है?
भागवत पुराण के अनुसार, द्वापर युग में ब्रज की गोपियों ने भगवान श्री कृष्ण को पति रूप में प्राप्त करने के लिए यमुना नदी के तट पर पूरे मार्गशीर्ष माह में मां कात्यायनी की ही बालू की मूर्ति बनाकर पूजा की थी। इसी कारण विवाह योग्य कन्याओं के शीघ्र और मनचाहे विवाह के लिए माता की पूजा अचूक मानी जाती है।
6. कुंडली के किस ग्रह को मजबूत करने के लिए छठे दिन पूजा की जाती है?
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, मां कात्यायनी बृहस्पति ग्रह (Jupiter / गुरु) को नियंत्रित करती हैं। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में गुरु कमजोर हो, जिसके कारण भाग्य साथ न दे रहा हो या विवाह में अड़चनें आ रही हों, तो उन्हें इस दिन माता की विशेष आराधना करनी चाहिए।
7. योग साधना और चक्र विज्ञान में षष्ठी तिथि का क्या महत्व है?
नवरात्रि के छठे दिन साधक का ध्यान मस्तक के केंद्र (भोहों के बीच) स्थित ‘आज्ञा चक्र’ (Ajna Chakra) पर केंद्रित होता है, जिसे तीसरी आंख भी कहते हैं। मां कात्यायनी की कृपा से यह चक्र जाग्रत होता है, जिससे व्यक्ति की अंतःप्रेरणा (Intuition), मानसिक एकाग्रता और दूरदर्शिता अत्यधिक बढ़ जाती है।
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