सितंबर 2026 व्रत-त्योहार: पितृ पक्ष, जीतिया और नवरात्रि की तिथियां और महत्व

हिंदू कैलेंडर वर्ष 2026 में पितृ पक्ष, जीवित्पुत्रिका व्रत और शारदीय नवरात्रि की मुख्य तिथियों की तालिका।

Table of Contents

सितंबर और अक्टूबर 2026 के प्रमुख व्रत-त्योहार: पितृ पक्ष (श्राद्ध), जीवित्पुत्रिका (जीतिया) व्रत और शारदीय नवरात्रि की सम्पूर्ण तिथियाँ व महत्व

हिंदू पंचांग और सनातन धर्म में आश्विन मास का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। यह समय आत्म-शुद्धि, पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता, संतानों की लंबी आयु की कामना और शक्ति स्वरूपा माँ दुर्गा की आराधना का महापर्व लेकर आता है। वर्ष 2026 में सितंबर और अक्टूबर का महीना धार्मिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण होने वाला है। इस अवधि में पितृ पक्ष (श्राद्ध) की शुरुआत 26 सितंबर 2026 से हो रही है, जबकि माताओं का सबसे कठिन जीवित्पुत्रिका (जीतिया) व्रत 3 अक्टूबर 2026 को रखा जाएगा। इसके तुरंत बाद, शारदीय नवरात्रि का भव्य शुभारंभ 11 अक्टूबर 2026 से होने जा रहा है।

इस विस्तृत लेख में हम इन तीनों महापर्वों की तिथियों, शुभ मुहूर्त, धार्मिक महत्व, और पूजा-विधि के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे ताकि आप समय रहते अपने अनुष्ठानों की सही तैयारी कर सकें।


1. पितृ पक्ष (श्राद्ध) 2026: पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का पर्व

हिंदू धर्म में मान्यता है कि हमारे पूर्वज या पितर देव स्वरूप होते हैं। उनकी आत्मा की शांति और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक के 16 दिनों की अवधि को ‘पितृ पक्ष’ या ‘महालय’ कहा जाता है।

तिथि और शुभ मुहूर्त

वर्ष 2026 में पितृ पक्ष 26 सितंबर 2026 (शनिवार) से शुरू होकर 10 अक्टूबर 2026 (शनिवार) तक चलेगा।

  • पूर्णिमा श्राद्ध (प्रारंभ): 26 सितंबर 2026
  • सर्वपितृ अमावस्या (समापन): 10 अक्टूबर 2026

श्राद्ध कर्म या तर्पण हमेशा दोपहर के समय (अपराह्न काल) में करना सबसे उपयुक्त माना जाता है। देव कार्य सुबह होते हैं, लेकिन पितृ कार्य के लिए कुतुप मुहूर्त (सुबह 11:48 से दोपहर 12:36) और रोहिना मुहूर्त (दोपहर 12:36 से दोपहर 01:24) सर्वश्रेष्ठ माने गए हैं।

सम्पूर्ण 16 दिवसीय श्राद्ध कैलेंडर (2026)

नीचे दी गई तालिका के माध्यम से आप अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध के दिन की पहचान कर सकते हैं:

श्राद्ध तिथिअंग्रेजी कैलेंडर दिनांकदिनविशेष महत्व
पूर्णिमा श्राद्ध26 सितंबर 2026शनिवारभाद्रपद पूर्णिमा पर देहांत होने वालों के लिए
प्रतिपदा श्राद्ध27 सितंबर 2026रविवारनाना-नानी के श्राद्ध के लिए भी उपयुक्त
द्वितीया श्राद्ध28 tobacco 2026सोमवारद्वितीय तिथि के पितरों हेतु
तृतीया श्राद्ध29 सितंबर 2026मंगलवारमहा भरणी श्राद्ध (विशेष फलदायी)
चतुर्थी श्राद्ध30 सितंबर 2026बुधवारचतुर्थी तिथि को मृत परिजनों के लिए
पंचमी श्राद्ध30 सितंबर 2026बुधवार(तिथि संचय के अनुसार)
षष्ठी श्राद्ध01 अक्टूबर 2026गुरुवारषष्ठी तिथि के पितरों के लिए
सप्तमी श्राद्ध02 अक्टूबर 2026शुक्रवारसप्तमी तिथि के लिए
अष्टमी श्राद्ध03 अक्टूबर 2026शनिवारअष्टमी तिथि के लिए (इसी दिन जीतिया भी है)
नवमी श्राद्ध04 अक्टूबर 2026रविवारमातृ नवमी / अविधवा नवमी (माताओं और सुहागिनों हेतु)
दशमी श्राद्ध05 अक्टूबर 2026सोमवारदशमी तिथि के पितरों के लिए
एकादशी श्राद्ध06 अक्टूबर 2026मंगलवारसंन्यासियों के श्राद्ध के लिए उत्तम
द्वादशी श्राद्ध07 अक्टूबर 2026बुधवारमघा श्राद्ध / संन्यासी पितरों हेतु
त्रयोदशी श्राद्ध08 अक्टूबर 2026गुरुवारमृत बच्चों के श्राद्ध के लिए
चतुर्दशी श्राद्ध09 अक्टूबर 2026शुक्रवारघात चतुर्दशी (अकाल मृत्यु या दुर्घटना में मृत लोगों हेतु)
अमावस्या श्राद्ध10 अक्टूबर 2026शनिवारसर्वपितृ अमावस्या (ज्ञात-अज्ञात सभी पूर्वजों के लिए)

धार्मिक महत्व और नियम

वैदिक ज्योतिष के अनुसार, जब सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करता है, तब पितृलोक और भूलोक के बीच की दूरी कम हो जाती है और पूर्वज हवा या सूक्ष्म रूप में अपने वंशजों से मिलने आते हैं। श्राद्ध के मुख्य तीन अंग होते हैं:

  1. तर्पण: हाथ में कुशा, अक्षत, जौ और काला तिल लेकर पितरों को जल अर्पित करना।
  2. पिंडदान: पके हुए चावल या जौ के आटे के गोले (पिंड) बनाकर श्रद्धापूर्वक अर्पित करना।
  3. ब्राह्मण भोज और पंचबलि: विद्वान ब्राह्मणों को सात्विक भोजन कराना और भोजन का अंश कौआ, कुत्ता, गाय, देव और चींटियों (पंचबलि) के लिए निकालना।

यदि किसी को अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि याद न हो, तो वे 10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या के दिन तर्पण कर सकते हैं, जिससे पूरे कुल के पितर तृप्त होते हैं और ‘पितृ दोष’ से मुक्ति मिलती है।


2. जीवित्पुत्रिका (जीतिया) व्रत 2026: मातृत्व और संतानों की दीर्घायु का महासंकल्प

पितृ पक्ष के दौरान ही अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जीवित्पुत्रिका व्रत रखा जाता है, जिसे बोलचाल की भाषा में ‘जीतिया’ या ‘जिउतिया’ भी कहते हैं। यह मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में बेहद श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। माताओं द्वारा अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और सुख-समृद्धि के लिए यह व्रत रखा जाता है।

तिथि और पारण समय

जीतिया व्रत भी छठ पर्व की तरह ही तीन दिनों तक चलने वाला एक अत्यंत कठिन अनुष्ठान है, जिसमें लगभग 36 घंटे तक निर्जला (बिना पानी के) उपवास रखा जाता है।

  • नहाय-खाय (पहला दिन): 2 अक्टूबर 2026 (शुक्रवार)
  • खुर जीतिया / निर्जला व्रत (दूसरा दिन): 3 अक्टूबर 2026 (शनिवार)
  • व्रत पारण (तीसरा दिन): 4 अक्टूबर 2026 (रविवार) – सुबह 07:29 बजे के बाद (स्थानीय सूर्योदय और अष्टमी तिथि की समाप्ति के अनुसार)।

पूजा विधि और परंपराएं

  1. नहाय-खाय: इस दिन महिलाएं स्नान करके शुद्ध सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं। पारंपरिक रूप से इस दिन ‘नोनी का साग’, ‘मडुआ (रागी) की रोटी’ और ‘झिंगनी (तोरई)’ की सब्जी खाने की विशेष परंपरा है।
  2. जीमूतवाहन पूजा: व्रत वाले दिन (3 अक्टूबर) को शाम के समय राजा जीमूतवाहन की कुशा से बनी मूर्ति की पूजा की जाती है। मिट्टी और गाय के गोबर से चील और सियारिन की आकृतियां बनाई जाती हैं और उन्हें सिंदूर का टीका लगाया जाता है।
  3. कथा श्रवण: पूजा के समय जीमूतवाहन की त्यागपूर्ण कथा और चील-सियारिन की पौराणिक कथा सुनी जाती है। इसके बाद संतान की सुरक्षा के लिए गले में ‘जीतिया का लाल धागा’ (लोकेट के साथ) धारण किया जाता है।

यह व्रत महिलाओं के मानसिक संकल्प और शारीरिक सहनशक्ति की पराकाष्ठा है, जो भारतीय संस्कृति में माँ के अटूट प्रेम को दर्शाता है।


3. शारदीय नवरात्रि 2026: शक्ति साधना और माँ दुर्गा का आगमन

पितृ पक्ष के समाप्त होते ही आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से ‘शारदीय नवरात्रि’ की शुरुआत होती है। यह अधर्म पर धर्म और महिषासुर पर माँ शक्ति की विजय का प्रतीक है।

कलश स्थापना और शुभ मुहूर्त (11 अक्टूबर 2026)

वर्ष 2026 में शारदीय नवरात्रि की शुरुआत 11 अक्टूबर 2026 (रविवार) से हो रही है। इसी दिन सुबह घटस्थापना (कलश स्थापना) की जाएगी:

  • घटस्थापना का प्रातः मुहूर्त: सुबह 06:19 बजे से सुबह 10:12 बजे तक (अवधि: 3 घंटे 52 मिनट)
  • अभिजीत मुहूर्त (सर्वश्रेष्ठ समय): दोपहर 11:44 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक

नवरात्रि 2026 की नौ रातें और देवियों के स्वरूप

इस वर्ष तिथियों के गणितीय फेरबदल के कारण महाअष्टमी और महानवमी का पूजन एक ही दिन यानी 19 अक्टूबर को संपन्न होगा। आइए जानते हैं किस दिन माँ के किस स्वरूप की पूजा होगी और उनका शुभ रंग क्या है:

दिनतिथिअंग्रेजी कैलेंडर दिनांकदेवी का स्वरूपशुभ रंग
दिन 1प्रतिपदा11 अक्टूबर 2026 (रविवार)माँ शैलपुत्री (घटस्थापना)नारंगी (Orange)
दिन 2द्वितीया12 अक्टूबर 2026 (सोमवार)माँ ब्रह्मचारिणीसफेद (White)
दिन 3तृतीया13 अक्टूबर 2026 (मंगलवार)माँ चंद्रघंटालाल (Red)
दिन 4चतुर्थी14 अक्टूबर 2026 (बुWednesday)माँ कूष्मांडारॉयल ब्लू (Royal Blue)
दिन 5पंचमी15 अक्टूबर 2026 (गुरुवार)माँ स्कंदमातापीला (Yellow)
दिन 6षष्ठी16 अक्टूबर 2026 (शुक्रवार)माँ कात्यायनीहरा (Green)
दिन 7सप्तमी17 अक्टूबर 2026 (शनिवार)माँ कालरात्रिग्रे/स्लेटी (Grey)
दिन 8अष्टमी19 अक्टूबर 2026 (सोमवार)माँ महागौरी (महाअष्टमी / कन्या पूजन)मयूर हरा / गुलाबी
दिन 9नवमी19 अक्टूबर 2026 (सोमवार)माँ सिद्धिदात्री (महानवमी / हवन)बैंगनी (Purple)
दशमीदशमी20 अक्टूबर 2026 (मंगलवार)विजयदशमी / दशहरा (प्रतिमा विसर्जन)सात्विक / उत्सव रंग

(नोट: 18 अक्टूबर को तिथियों के उतार-चढ़ाव के कारण प्रमुख पूजन अनुष्ठान 19 अक्टूबर को ही महाअष्टमी और महानवमी के रूप में एक साथ किए जाएंगे। भक्त अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार संधि पूजा का समय देख सकते हैं)।

घर पर कलश स्थापना की संक्षिप्त विधि

नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके लिए निम्नलिखित कदम उठाएं:

  1. स्थान का शुद्धिकरण: उत्तर-पूर्व दिशा (ईशान कोण) को साफ कर वहां लकड़ी की चौकी रखें और लाल कपड़ा बिछाएं।
  2. माँ दुर्गा की स्थापना: चौकी पर माँ दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
  3. जौ बोना: एक मिट्टी के बड़े और उथले पात्र में साफ मिट्टी डालकर उसमें जौ (जवारे) के बीज बोएं।
  4. कलश की तैयारी: तांबे या मिट्टी के कलश में स्वच्छ जल भरें। उसमें गंगाजल, सिक्का, अक्षत, सुपारी और कलावा बांधें। कलश के मुख पर आम या अशोक के 5 या 7 पत्ते रखें।
  5. नारियल रखना: एक पानी वाले नारियल पर चुनरी लपेटकर उसे कलावा से बांधें और कलश के ऊपर स्थापित कर दें।
  6. संकल्प और आरती: अखंड ज्योति या सामान्य दीपक जलाकर ९ दिनों के व्रत और पूजा का संकल्प लें और दुर्गा सप्तशती का पाठ शुरू करें।

निष्कर्ष: आध्यात्मिक चेतना और संयम का काल

सितंबर के अंत से लेकर अक्टूबर 2026 के मध्य तक का यह समय सनातन धर्मावलंबियों के लिए मात्र त्योहारों की कतार नहीं, बल्कि गहरे आध्यात्मिक कायाकल्प का अवसर है। पितृ पक्ष जहां हमें हमारी जड़ों, माता-पिता और पूर्वजों के प्रति ‘कृतज्ञ’ होना सिखाता है, वहीं जीतिया व्रत मातृशक्ति के अदम्य साहस और संतान के प्रति निस्वार्थ त्याग का दर्शन कराता है। इसके तुरंत बाद आने वाली शारदीय नवरात्रि हमारे भीतर की नकारात्मक ऊर्जा का संहार कर नई चेतना, सात्विकता और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करती है।

इन सभी व्रतों का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब इन्हें सही तिथियों, शुद्ध मन और उचित नियमों के साथ संपन्न किया जाए। वर्ष 2026 की इन प्रामाणिक तिथियों के आधार पर आप अपनी पूजा-अर्चना और अनुष्ठानों की योजना पहले से ही बना सकते हैं।


पितृ पक्ष, जीवित्पुत्रिका (जीतिया) व्रत और शारदीय नवरात्रि 2026 से जुड़े कुछ मुख्य और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs):

1. पितृ पक्ष (श्राद्ध) से जुड़े FAQs

  • प्रश्न: यदि पूर्वज की मृत्यु तिथि याद न हो, तो श्राद्ध किस दिन करना चाहिए?
    • उत्तर: यदि आपको अपने पितरों की मृत्यु तिथि याद नहीं है, तो आप 10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या के दिन उनका श्राद्ध, तर्पण या दान कर सकते हैं। इस दिन किया गया श्राद्ध सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों तक पहुँचता है।
  • प्रश्न: मातृ नवमी क्या है और इसका श्राद्ध कब है?
    • उत्तर: मातृ नवमी के दिन परिवार की मृत माताओं, नानी, दादी या सुहागिन महिलाओं का श्राद्ध किया जाता है। वर्ष 2026 में मातृ नवमी श्राद्ध 4 अक्टूबर 2026 (रविवार) को रखा जाएगा।
  • प्रश्न: क्या पितृ पक्ष में नई वस्तुओं की खरीदारी की जा सकती है?
    • उत्तर: पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, पितृ पक्ष पूर्वजों के प्रति शोक और कृतज्ञता प्रकट करने का समय होता है। इसलिए इस अवधि में नए घर, कार, सोने-चांदी के आभूषण या शुभ मांगलिक कार्यों की शुरुआत को टाल दिया जाता है।

2. जीवित्पुत्रिका (जीतिया) व्रत से जुड़े FAQs

  • प्रश्न: वर्ष 2026 में जीतिया व्रत का मुख्य निर्जला उपवास किस दिन है?
    • उत्तर: जीतिया का मुख्य 36 घंटे का निर्जला व्रत 3 अक्टूबर 2026 (शनिवार) को रखा जाएगा। इसका समापन (पारण) अगले दिन 4 अक्टूबर की सुबह होगा।
  • प्रश्न: नहाय-खाय के दिन ‘मडुआ की रोटी’ और ‘नोनी का साग’ क्यों खाया जाता है?
    • उत्तर: नोनी के साग में भरपूर पोषण होता है, जो अगले 36 घंटे के कठिन निर्जला व्रत के लिए शरीर को ऊर्जा देता है। धार्मिक रूप से मडुआ और नोनी के साग को अत्यंत सात्विक और शुद्ध माना जाता है।
  • प्रश्न: क्या यह व्रत केवल पुत्रों के लिए रखा जाता है?
    • उत्तर: आधुनिक समय में माताएं अपनी सभी संतानों (पुत्र और पुत्री दोनों) की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और सुरक्षित भविष्य के लिए यह कठिन संकल्प लेती हैं।

3. शारदीय नवरात्रि 2026 से जुड़े FAQs

  • प्रश्न: वर्ष 2026 में कलश स्थापना (घटस्थापना) का सबसे उत्तम मुहूर्त क्या है?
    • उत्तर: 11 अक्टूबर 2026 (रविवार) को सुबह 06:19 बजे से सुबह 10:12 बजे तक कलश स्थापना का सबसे उत्तम मुहूर्त है। यदि आप सुबह नहीं कर पाते हैं, तो दोपहर 11:44 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक (अभिजीत मुहूर्त) में भी स्थापना कर सकते हैं।
  • प्रश्न: इस साल अष्टमी और नवमी एक ही दिन क्यों पड़ रही हैं?
    • उत्तर: हिंदू पंचांग में तिथियों का घटना और बढ़ना सूर्योदय के समय पर निर्भर करता है। वर्ष 2026 में तिथियों के गणितीय योग के कारण 19 अक्टूबर को महाअष्टमी और महानवमी की पूजा एक साथ संपन्न की जाएगी।
  • प्रश्न: नवरात्रि व्रत का पारण और दशहरा (विजयदशमी) कब मनाया जाएगा?
    • उत्तर: इस वर्ष विजयादशमी का महापर्व और माँ दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन 20 अक्टूबर 2026 (मंगलवार) को किया जाएगा। इसी दिन ९ दिनों के व्रत रखने वाले जातक पारण करेंगे।

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