India’s 1st Hydrogen Train to Launch: जींद-सोनीपत रूट पर चलेगी देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन, जानिए खासियतें!

India's first hydrogen-powered passenger train standing at Jind railway station platform ready for its inaugural run.

भारतीय रेलवे का नया स्वर्णिम अध्याय: जींद–सोनीपत रूट पर दौड़ने वाली देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन पर विस्तृत विशेष लेख


Table of Contents

भविष्य के परिवहन की ओर भारत का कदम

वैश्विक स्तर पर जब भी औद्योगिक क्रांति या परिवहन के साधनों के आधुनिकीकरण की बात आती है, तो भारत अब एक मूक दर्शक नहीं, बल्कि दुनिया का नेतृत्व करने वाले अग्रणी देशों की कतार में खड़ा नजर आता है। भारतीय रेलवे के इतिहास में 17 जुलाई की तारीख एक ऐसी ही ऐतिहासिक क्रांति के रूप में दर्ज होने जा रही है। देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हरियाणा के जींद रेलवे स्टेशन से भारत की पहली हाइड्रोजन ईंधन आधारित यात्री ट्रेन (Hydrogen-powered Passenger Train) को हरी झंडी दिखाकर रवाना करेंगे।

यह कोई सामान्य ट्रेन सेवा की शुरुआत नहीं है, बल्कि यह भारत के परिवहन क्षेत्र को पूरी तरह से कार्बन-मुक्त (Decarbonize) करने और ‘नेट-जीरो’ उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में एक युगांतरकारी कदम है। जींद से सोनीपत के बीच चलने वाली यह ट्रेन न केवल भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन होगी, बल्कि अपनी विशाल क्षमता और अद्वितीय तकनीक के कारण इसे दुनिया की सबसे शक्तिशाली हाइड्रोजन ट्रेनों में से एक माना जा रहा है। आइए इस अभूतपूर्व परियोजना के हर एक पहलू, इसकी तकनीकी बारीकियों, इसके रणनीतिक महत्व और पर्यावरण पर इसके दूरगामी प्रभावों को विस्तार से समझते हैं।


1. रूट और परिचालन का विवरण

देश की इस पहली स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन (HEMU – Hydrogen-Electric Multiple Unit) के पहले कमर्शियल रन के लिए हरियाणा के जींद–सोनीपत रेलखंड को चुना गया है।

  • दूरी और समय: यह ट्रेन जींद जंक्शन और सोनीपत जंक्शन के बीच लगभग 89 से 90 किलोमीटर की दूरी तय करेगी। वर्तमान में इस गैर-विद्युतीकृत रूट पर पारंपरिक ट्रेनों (DEMU) को यह दूरी तय करने में लगभग दो से ढाई घंटे का समय लगता है, लेकिन यह अत्याधुनिक हाइड्रोजन ट्रेन इस सफर को करीब 2 घंटे में पूरा कर लेगी।
  • दैनिक फेरे (Round Trips): शुरुआती योजना के अनुसार, यह ट्रेन प्रतिदिन दो राउंड ट्रिप (दो बार आना और दो बार जाना) करेगी। इसका मतलब है कि यह ट्रेन हर रोज कुल 356 किलोमीटर का सफर तय करेगी।
  • रूट चयन का कारण: भारतीय रेलवे के अनुसार, इस विशिष्ट रूट का चयन इसलिए किया गया है ताकि घनी आबादी वाले और नियमित परिचालन वाले क्षेत्र में हाइड्रोजन ईंधन तकनीक की परिचालन व्यवहार्यता (Operational Viability), यात्रियों की सुरक्षा और समयबद्धता की विश्वसनीयता का वास्तविक परीक्षण किया जा सके।

2. ट्रेन की अभूतपूर्व क्षमता और विशेषताएं

इस हाइड्रोजन ट्रेन को वैश्विक मानकों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है, जिसकी विशेषताएं इसे दुनिया की अन्य हाइड्रोजन ट्रेनों से अलग और अधिक प्रभावशाली बनाती हैं:

  • विशाल यात्री क्षमता: जहां दुनिया के अन्य देशों (जैसे जर्मनी या चीन) में चलने वाली शुरुआती हाइड्रोजन ट्रेनों में केवल 2 से 4 कोच होते हैं, वहीं भारत की इस ट्रेन में 10 कोच की लंबी संरचना तैयार की गई है। इसमें 8 यात्री कोच और 2 ड्राइविंग पावर कार (इंजन कोच) शामिल हैं। ट्रेन में कुल 682 बैठने की सीटें हैं, लेकिन खड़े होने वाले यात्रियों को मिलाकर इसकी कुल वहन क्षमता करीब 2,638 यात्री (लगभग 2,600) है। यात्रियों की क्षमता के मामले में यह दुनिया की सबसे बड़ी हाइड्रोजन यात्री ट्रेनों में से एक है।
  • शक्तिशाली इंजन और पावर: ट्रेन की कुल पावर क्षमता लगभग 2,400 किलोवाट (kW) है, जो इसे दुनिया के सबसे शक्तिशाली हाइड्रोजन ट्रेनसेट्स की सूची में शीर्ष पर खड़ा करती है। इसमें स्थापित प्रोपल्शन सिस्टम बहुत ही उन्नत और उच्च प्रदर्शन देने वाला है।
  • रफ्तार और गति: परीक्षणों के दौरान इस तकनीक ने 110 से 120 किमी/घंटा तक की उच्च गति हासिल की है। हालांकि, नियमित यात्री सुरक्षा और रूट की बनावट को देखते हुए शुरुआत में इस रूट पर इसकी अधिकतम परिचालन गति 75 किलोमीटर प्रति घंटा तय की गई है।
  • किराया और आम जनता को लाभ: इस आधुनिक तकनीक के बावजूद रेलवे ने आम नागरिकों की जेब का पूरा ध्यान रखा है। ट्रेन का किराया सामान्य पैसेंजर ट्रेनों के बराबर ही रखा गया है, जो न्यूनतम ₹5 से अधिकतम ₹25 तक होगा। इससे दैनिक यात्रियों और नौकरीपेशा लोगों को बहुत कम खर्च में एक प्रीमियम और प्रदूषण मुक्त यात्रा का अनुभव मिलेगा।

3. कैसे काम करती है हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक?

आम लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि बिना डीजल और बिना ओवरहेड बिजली के तारों (ओएचई) के यह ट्रेन कैसे पटरियों पर दौड़ सकती है? इसका उत्तर है—हाइड्रोजन फ्यूल सेल प्रोपल्शन आर्किटेक्चर। यह ट्रेन वास्तव में एक “चलता-फिरता पावर प्लांट” है, जो अपनी बिजली खुद बनाती है।

[हाइड्रोजन टैंक (H2)] + [वायुमंडल से ऑक्सीजन (O2)] 
                     │
                     ▼
       [फ्यूल सेल (Fuel Cell)] ──> रासायनिक प्रक्रिया (Chemical Reaction)
                     │
         ┌───────────┴───────────┐
         ▼                       ▼
   [विद्युत ऊर्जा (Electricity)]   [जलवाष्प / भाप (Water Vapor)]
         │                       │
         ▼                       ▼
[ट्रेन के मोटर्स का संचालन]      [एग्जॉस्ट से बाहर (शून्य प्रदूषण)]
  1. ईंधन का भंडारण: ट्रेन के पावर कार में विशेष रूप से डिजाइन किए गए सुरक्षित टैंकों में हाइड्रोजन गैस को अत्यधिक दबाव पर संग्रहित किया जाता है।
  2. रासायनिक प्रतिक्रिया: जब ट्रेन को ऊर्जा की आवश्यकता होती है, तो इन टैंकों से हाइड्रोजन को ‘फ्यूल सेल’ में भेजा जाता है। यहाँ वायुमंडल से ली गई ऑक्सीजन और हाइड्रोजन के बीच एक रासायनिक प्रक्रिया होती है।
  3. बिजली का उत्पादन: इस रासायनिक प्रक्रिया के परिणामस्वरूप भारी मात्रा में विद्युत ऊर्जा (Electricity) उत्पन्न होती है, जिसका उपयोग ट्रेन के ट्रैक्शन मोटर्स को चलाने के लिए किया जाता है। इसके साथ ही, ट्रेन में लगी लिथियम-आयन बैटरी इस बिजली को स्टोर भी करती हैं ताकि जरूरत के समय अतिरिक्त पावर बैकअप मिल सके।
  4. बाय-प्रोडक्ट (उत्पाद): इस पूरी प्रक्रिया में डीजल इंजनों की तरह कोई हानिकारक धुआं, कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड या पर्टिकुलेट मैटर (PM 2.5) पैदा नहीं होता। इस प्रक्रिया का एकमात्र सह-उत्पाद (By-product) शुद्ध जलवाष्प (Water Vapor) यानी पानी की भाप होती है, जो एग्जॉस्ट पाइप से बाहर निकलती है।

4. जींद में स्थापित हुआ देश का पहला ‘हाइड्रोजन इकोसिस्टम’

केवल हाइड्रोजन ट्रेन बना देना ही काफी नहीं था, बल्कि उसे नियमित रूप से चलाने के लिए ईंधन की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करना सबसे बड़ी चुनौती थी। इसके लिए भारतीय रेलवे ने हरियाणा के जींद में देश का पहला और सबसे बड़ा एकीकृत रेलवे हाइड्रोजन रिफ्यूलिंग प्लांट (Integrated Hydrogen Railway Ecosystem) स्थापित किया है।

  • इलेक्ट्रोलेसिस प्रक्रिया से उत्पादन: इस प्लांट में पानी (H₂O) को बिजली की मदद से स्प्लिट करके (Electrolysis) ग्रीन हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का उत्पादन किया जाता है।
  • हाई-प्रेशर स्टोरेज: उत्पादित हाइड्रोजन को 500 बार (bar) के दबाव पर विशाल टैंकों में सुरक्षित रूप से स्टोर किया जाता है।
  • त्वरित रिफ्यूलिंग सुविधा: ट्रेन में ईंधन भरने के लिए 350 बार के प्रेशर वाले दो स्वतंत्र डिस्पेंसर लगाए गए हैं। इससे ट्रेन की दोनों पावर कारों में एक साथ बेहद कम समय में हाइड्रोजन भरी जा सकती है, जिससे टर्नअराउंड समय कम हो जाता है।
  • भंडारण क्षमता: इस संयंत्र की कुल भंडारण क्षमता लगभग 3,000 किलोग्राम हाइड्रोजन की है, जिसे पेट्रोलियम और विस्फोटक सुरक्षा संगठन (PESO) द्वारा पूरी तरह से प्रमाणित और स्वीकृत किया गया है। एक बार पूरी तरह से रिफ्यूल होने पर यह ट्रेन आसानी से 250 किलोमीटर तक का सफर तय कर सकती है।

5. ‘मेक इन इंडिया’ और स्वदेशी आत्मनिर्भरता का प्रतीक

यह ट्रेन भारत के इंजीनियरिंग कौशल और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के संकल्प का एक जीवंत उदाहरण है। इस ट्रेनसेट को पूरी तरह से भारत में ही डिजाइन, इंजीनियर और एकीकृत किया गया है:

  • आरडीएसओ का नेतृत्व: रेलवे के तकनीकी विंग अनुसंधान अभिकल्प और मानक संगठन (RDSO), लखनऊ ने इसके तकनीकी विनिर्देशों को तैयार किया और सुरक्षा जांच को मंजूरी दी है।
  • आईसीएफ चेन्नई की भूमिका: इस ट्रेन के आधुनिक इंटीरियर, शानदार बॉडी डिजाइन और एयरोडायनामिक बाहरी बनावट को चेन्नई की प्रसिद्ध इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF) में निर्मित किया गया है।
  • तकनीकी एकीकरण: ट्रेन के उन्नत फ्यूल सेल प्रोपल्शन सिस्टम के एकीकरण में घरेलू दिग्गजों और मेधा सर्वो ड्राइव्स (Medha Servo Drives) जैसे तकनीकी साझेदारों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

यह स्वदेशी विकास इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह विदेशी तकनीकी निर्भरता को समाप्त करता है और भविष्य में इस प्रकार की ग्रीन ट्रेनों के बड़े पैमाने पर उत्पादन की लागत को काफी कम कर देता है।


6. सुरक्षा के चाक-चौबंद इंतजाम

चूंकि हाइड्रोजन एक अत्यधिक ज्वलनशील गैस है, इसलिए इसके सुरक्षित परिवहन और उपयोग को लेकर रेलवे ने सुरक्षा की कई परतों (Multi-layer Safety Systems) का जाल बिछाया है:

  1. लीक डिटेक्शन सेंसर (Leak Detectors): ट्रेन के हर उस हिस्से में जहां से हाइड्रोजन गुजरती है, वहां अत्याधुनिक हाइड्रोजन गैस डिटेक्शन सेंसर लगाए गए हैं। यदि गैस का एक अंश भी लीक होता है, तो सिस्टम तुरंत अलर्ट जारी कर देगा और मुख्य वाल्व को स्वचालित रूप से बंद कर देगा।
  2. चौबीसों घंटे मॉनिटरिंग: रिफ्यूलिंग प्लांट से लेकर चलती ट्रेन के भीतर तक के डेटा की 24/7 लाइव मॉनिटरिंग की जाएगी।
  3. विशेष रूप से प्रशिक्षित स्टाफ: इस ट्रेन के संचालन के लिए लोको पायलटों, सहायक लोको पायलटों और गार्ड्स को चेन्नई और गुजरात के विशेष केंद्रों में क्रायोजेनिक और उच्च-दबाव गैस प्रणालियों को संभालने की गहन ट्रेनिंग दी गई है।

7. पर्यावरण और भारतीय रेलवे के लिए इसके दूरगामी लाभ

जींद-सोनीपत रूट पर इस ट्रेन का चलना केवल एक तकनीकी प्रदर्शन नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक व्यापक पर्यावरणीय और आर्थिक दृष्टिकोण है:

  • शून्य प्रत्यक्ष कार्बन उत्सर्जन (Zero Direct Emissions): यात्रा के दौरान यह ट्रेन वायुमंडल में एक ग्राम भी जहरीली गैस नहीं छोड़ती। यह पूरी तरह से पर्यावरण-अनुकूल और ‘जीरो-इमिशन’ परिवहन सुनिश्चित करती है।
  • ध्वनि प्रदूषण से मुक्ति: डीजल इंजनों की तुलना में हाइड्रोजन फ्यूल सेल से चलने वाली ट्रेनें लगभग मूक (Silent) होती हैं। इससे न केवल यात्रियों को शांतिपूर्ण सफर मिलता है, बल्कि रेलवे ट्रैक के आसपास के रिहायशी इलाकों और वन्यजीवों को भी ध्वनि प्रदूषण से राहत मिलती है।
  • डीजल पर निर्भरता में कमी: भारतीय रेलवे सालाना करोड़ों लीटर डीजल का उपयोग करता है। इस तरह की गैर-विद्युतीकृत लाइनों पर हाइड्रोजन ट्रेनों के आ जाने से महंगे आयातित जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) पर देश की निर्भरता घटेगी, जिससे विदेशी मुद्रा की भारी बचत होगी।
  • ‘राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन’ को बल: भारत सरकार के नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन (National Green Hydrogen Mission) का लक्ष्य देश को वैश्विक हाइड्रोजन हब बनाना है। रेलवे द्वारा इस तकनीक को अपनाना इस मिशन की सफलता की दिशा में सबसे बड़ा व्यावहारिक उदाहरण है।

8. वैश्विक परिदृश्य: भारत कहाँ खड़ा है?

वैश्विक स्तर पर हाइड्रोजन रेल परिवहन अभी भी अपनी शुरुआती अवस्था में ही है। दुनिया में वाणिज्यिक रूप से हाइड्रोजन यात्री ट्रेन शुरू करने वाला पहला देश जर्मनी था, जिसने 2018 में एल्सटॉम की ‘कोराडिया आईलिंट’ ट्रेन उतारी थी। इसके बाद फ्रांस, जापान, अमेरिका और चीन जैसे चुनिंदा देशों ने ही इस तकनीक के सीमित पायलट प्रोजेक्ट शुरू किए हैं।

17 जुलाई को इस सफल लॉन्चिंग के साथ ही भारत दुनिया के उन गिने-चुने और विशिष्ट देशों के ‘एलीट क्लब’ में शामिल हो जाएगा, जिनके पास अपनी खुद की स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन तकनीक और उसका पूरा इकोसिस्टम मौजूद है। यह वैश्विक स्तर पर भारत के तकनीकी नेतृत्व की धाक जमाने जैसा है।


9. भविष्य की योजना: ‘हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज’

जींद-सोनीपत का यह पायलट प्रोजेक्ट भारतीय रेलवे के एक बहुत बड़े मास्टर प्लान की शुरुआत मात्र है। इस परियोजना से मिलने वाले परिचालन अनुभवों और आंकड़ों के आधार पर रेलवे देश के अन्य हिस्सों में भी इसका विस्तार करेगा:

  • 35 और हाइड्रोजन ट्रेनें: रेलवे की महत्वाकांक्षी ‘हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज’ (Hydrogen for Heritage) योजना के तहत देश के प्रमुख ऐतिहासिक, पर्यटन और पहाड़ी रेल मार्गों पर कुल 35 और हाइड्रोजन ट्रेनें चलाने की योजना है।
  • संभावित रूट्स: भविष्य में हमें कालका-शिमला रेलवे, दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे, नीलगिरी माउंटेन रेलवे, माथेरान हिल रेलवे और कांगड़ा घाटी जैसे खूबसूरत और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील रूटों पर भी प्रदूषण-मुक्त हाइड्रोजन ट्रेनें चलती हुई दिखाई देंगी। इससे इन नाजुक पहाड़ी पारिस्थितिक तंत्रों (Ecosystems) को प्रदूषण से बचाया जा सकेगा।

निष्कर्ष: विकसित भारत की नई रफ्तार

हरियाणा के जींद की धरती से शुरू होने वाली यह हाइड्रोजन ट्रेन देश की प्रगति और पर्यावरणीय चेतना के अद्भुत संगम का प्रतीक है। लगभग 2,400 किलोवाट की असीमित शक्ति और 2,600 से अधिक यात्रियों को एक साथ सफर कराने की अपनी अनूठी क्षमता के साथ यह ट्रेन भारतीय इंजीनियरिंग के नए युग का शंखनाद कर रही है।

यह ट्रेन हमें यह विश्वास दिलाती है कि आर्थिक विकास और पर्यावरण का संरक्षण दोनों एक साथ संभव हैं। जब 17 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस ट्रेन को हरी झंडी दिखाएंगे, तो वह केवल एक ट्रेन को आगे नहीं बढ़ा रहे होंगे, बल्कि वे आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वच्छ, हरित और आत्मनिर्भर ‘विकसित भारत’ की नींव को और मजबूत कर रहे होंगे। भारतीय रेलवे का यह ‘ग्रीन सफर’ निश्चित रूप से आने वाले समय में विश्व परिवहन के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होगा।


भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन (जींद-सोनीपत रूट) से जुड़े कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs):

1. भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन कब और कहाँ से शुरू हो रही है?

यह ट्रेन 17 जुलाई को हरियाणा के जींद रेलवे स्टेशन से हरी झंडी दिखाकर रवाना की जाएगी। यह ट्रेन जींद और सोनीपत के बीच (लगभग 89-90 किलोमीटर लंबे रेलखंड पर) नियमित रूप से संचालित होगी।

2. इस ट्रेन की कुल यात्री क्षमता और इंजन की पावर कितनी है?

यह दुनिया की सबसे शक्तिशाली हाइड्रोजन ट्रेनों में से एक है। इसकी कुल पावर क्षमता लगभग 2,400 किलोवाट (kW) है। 10 कोच वाली इस ट्रेन में एक बार में करीब 2,638 यात्री (लगभग 2,600) आसानी से यात्रा कर सकते हैं।

3. हाइड्रोजन ट्रेन पर्यावरण के लिए कैसे फायदेमंद है?

यह ट्रेन हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक पर काम करती है। इसमें हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की रासायनिक प्रक्रिया से बिजली बनती है। पारंपरिक डीजल इंजनों की तरह इसमें से कोई भी जहरीला धुआं या कार्बन उत्सर्जन नहीं होता। इसका एकमात्र बाय-प्रोडक्ट शुद्ध जलवाष्प (पानी की भाप) होती है, जिससे यह पूरी तरह से प्रदूषण मुक्त (Zero Emission) है।

4. इस रूट पर ट्रेन की रफ्तार क्या होगी और यह कितना समय लेगी?

सुरक्षा और ट्रैक की क्षमता को ध्यान में रखते हुए इस रूट पर इसकी अधिकतम परिचालन गति 75 किलोमीटर प्रति घंटा तय की गई है। इस गति से यह ट्रेन जींद से सोनीपत का सफर लगभग 2 घंटे में पूरा कर लेगी, जो पारंपरिक ट्रेनों से कम समय है।

5. क्या इस ट्रेन का किराया सामान्य ट्रेनों से ज्यादा होगा?

नहीं, भारतीय रेलवे ने आम जनता की सहूलियत का पूरा ध्यान रखा है। अत्याधुनिक तकनीक होने के बावजूद इसका किराया सामान्य पैसेंजर ट्रेनों के बराबर ही होगा, जो दूरी के हिसाब से न्यूनतम ₹5 से अधिकतम ₹25 तक रखा गया है।

6. ट्रेन के लिए हाइड्रोजन ईंधन कहाँ से आएगा और इसे भरने में कितना समय लगेगा?

हरियाणा के जींद में देश का पहला समर्पित रेलवे हाइड्रोजन रिफ्यूलिंग प्लांट स्थापित किया गया है। यहाँ पानी से इलेक्ट्रोलेसिस प्रक्रिया द्वारा ग्रीन हाइड्रोजन बनाई और स्टोर की जाएगी। ट्रेन के दोनों तरफ के इंजनों में एक साथ ईंधन भरने की अत्याधुनिक व्यवस्था है, जिससे कुछ ही मिनटों में रिफ्यूलिंग पूरी हो जाती है। एक बार फुल टैंक होने पर यह लगभग 250 किमी तक चल सकती है।

7. हाइड्रोजन गैस के उपयोग को देखते हुए इसमें सुरक्षा के क्या इंतजाम हैं?

ट्रेन और रिफ्यूलिंग प्लांट दोनों जगह Multi-layer Safety Systems लगाए गए हैं। पूरे सिस्टम में अत्याधुनिक हाइड्रोजन लीक डिटेक्शन सेंसर लगे हैं, जो गैस का जरा सा भी रिसाव होने पर मुख्य वाल्व को स्वचालित रूप से बंद कर देते हैं। इसके अलावा, लोको पायलटों और तकनीकी स्टाफ को क्रायोजेनिक गैस हैंडलिंग की विशेष ट्रेनिंग दी गई है।

8. रेलवे की भविष्य की ‘हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज’ योजना क्या है?

जींद-सोनीपत रूट के सफल परीक्षण के बाद, रेलवे का लक्ष्य देश के विभिन्न ऐतिहासिक, पहाड़ी और पर्यटन रूटों पर ऐसी 35 और हाइड्रोजन ट्रेनें चलाने का है। इसमें कालका-शिमला, दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे और नीलगिरी माउंटेन जैसे पर्यावरण के प्रति संवेदनशील क्षेत्र शामिल हैं।


HydrogenTrain, #IndianRailways, #GreenEnergy, #MakeInIndia, #SustainableTransport, #JindSonipatTrain, #EcoFriendlyNews, #IndianInnovation, #ZeroEmission, #NetZeroIndia

Leave a Reply