टिकूई फेरना क्या है? जानें गांव की शादी की यह अनोखी रस्म और लोक परंपरा

टिकूई फेरना: गांव की गली में गूंजता पारंपरिक ब्याह – यूपी-बिहार की शादियों में क्यों महत्वपूर्ण है ‘टिकूई फेरना’ और फूफा जी का नेग?

बारात सज चुकी है। दुआर पर गामड़ गामड़ बाजा बज रहा है। आजी सर पर मौर धरे, आंचरा लल्ला के सर पर रख कर मांड्ये में बैठी हुई हैं। यह दृश्य किसी हिंदी फिल्म का नहीं, बल्कि गांव के एक रचे-बसे ब्याह का है, जहाँ रस्में सिर्फ औपचारिकता नहीं, बल्कि उत्सव होती हैं। माहौल में आलता और रंग की महक है। नाउन काकी के हाथों की फुर्ती पैरों में आलता सजा रही है, तो बुआ-फूफाजी मिलकर दुल्हे राजा को सजाने-संवारने में लगे हैं। कोई बनियान पहना रहा है तो कोई क्रीम-पाउडर लगा रहा है, और किशोर वय की टोली बाजे पर झूम रही है।

गांव की शादी का असली तमाशा: टिकूई फेरना, उखल-धान और पारंपरिक गाली गीत

फूफा जी की ‘टिकूई’ और नेग की रस्म

इन सब हँसी-मजाक और सज-धज के बीच होता है रस्मों का असली दौर। जब सब फुर्सत में होते हैं, तब फूफा, बड़के जीजा, छोटके जीजा और छोटके फूफा—यानी पांच जने—कच्चा सूत पकड़ कर टिकूई फेरते हैं। यह पारंपरिक रस्म दूल्हे को बुरी नजर से बचाने और उनके सुखद वैवाहिक जीवन की कामना के लिए की जाती है।

टिकूई के बाद फूफा जी की अहम भूमिका शुरू होती है। वे उखल में डाले धान को एक पहरूवा मार कर, जोर से रगड़ कर चावल निकालते हैं। पहले तो इस रस्म के बदले नेग में अक्सर पड़िया या भैंस ली जाती थी, जो पशुधन का महत्व दर्शाता था। लेकिन अब वक्त बदला है, तो नेग भी आधुनिक हो गया है और अक्सर सोने की कोई चीज ली जाती है। यह रस्म रिश्तेदारियों में ‘नेग’ के महत्व और सम्मान को दर्शाती है।

देवी-देवताओं का आशीर्वाद और लुटाती खुशियां

मंड़ये के रीति-रिवाज खत्म होते ही, दूल्हा आजी के संग गोड़ धरने (आशीर्वाद लेने) निकलता है। कुआं, काली माई, डिवहारे बाबा, सम्मय माई—गाँव के हर देवता को मनाया जाता है। साथ में बैंड-बाजे और गाती-नाचती महिलाओं की टोली। इस दौरान बुआ, भौजी, मामी, दीदी टॉफी, बतासे और सिक्के लुटाती हैं, जिसे छोटे बच्चे दौड़-दौड़ कर लूटते हैं। यह सिर्फ टॉफी नहीं, बल्कि गाँव की खुशियां हैं जो सबके साथ बांटी जा रही हैं।

विदाई का शोर और बुआ-फूफा का ‘असली तमाशा

शाम होते ही घर के मुखिया का पारा चढ़ने लगता है, “अब जल्दी करो, आधी रात यही कर दोगे क्या?” तब जाकर बाराती गाड़ियों में बैठते हैं। जिम्मेदार लोग सबको व्यवस्थित करके विदा करते हैं। बारात विदा होती है, लेकिन रस्मों का एक सबसे मजेदार पहलू अभी बाकी है।

जैसे ही महिलाएं वापस लौटती हैं, बड़की और छोटकी बुआ—और कुछ अन्य महिलाएं—जल्दी से अंदर जाकर दरवाजा बंद कर लेती हैं। अब असली तमाशा शुरू होता है—गाली गीत का दौर। बाहर के लोग (दूल्हे के करीबी) और अंदर की महिलाएं (दुल्हन पक्ष की) लोकगीतों के माध्यम से एक-दूसरे को खूब गालियां देती हैं। बुआ लोग द्वार खोलने के लिए नेग मांगती हैं। आजी, बड़की मां, काकी—सब जब तक कुछ-कुछ रुपए नहीं देतीं, तब तक दरवाजा नहीं खुलता। यह तमाशा, यह हँसी-मजाक, रिश्ते को और गहरा और यादगार बना देता है।

गांव की इस शादी में प्यार, हंसी, नेग और रस्में—सब कुछ एक-दूसरे में गुंथा हुआ है, जो इसे शहर की यांत्रिक शादियों से बहुत अलग और खास बनाता है।

पारंपरिक ब्याह के लोकगीत (गाली और नेग गीत)

उत्तर प्रदेश और बिहार के ग्रामीण अंचलों में बारात विदाई के बाद जब बुआ/बहनें किवाड़ (दरवाजा) छेंकती (रोकती) हैं, तब इस तरह के हास्य-व्यंग्य और गाली गीत गाए जाते हैं:

1. किवाड़ छेंकने का नेग गीत (द्वार रुकवाई):

“काहे लागी रोकेलू दुआरी ऐ बुआ,काहे लागी रोकेलू दुआरी…भैया तोहार देवे सोनरवा के छल्ला,भौजी देवे रुपिया हजारी, खोलू दुआरी बुआ खोलू दुआरी…”

2. समधी/फूफा के लिए पारंपरिक गाली गीत (हँसी-मजाक):

“जेवनार बैठलें समधी (या फूफा जी) बड़के दमाद हो,खीर परोसलो त गाल फुलावें, मांगेले पड़िया औ भैंस हो…अइसन लोभी दमाद के नाहीं देखली, जेकरा धन के पियास हो…”

3. बारात विदाई के समय का एक और लोकप्रिय लोकगीत:

“गामड़-गामड़ बाजे बजनवा ऐ राम,मड़वे में सोहे दीदी-बुआ के सुहाग हो…सब देवतन के गोड़ धरी दुल्हा चले बारात हो…”

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