महिला सशक्तिकरण की आवश्यकता एवं महत्व – आत्मनिर्भरता एवं निर्णय लेने की क्षमता

महिला सशक्तिकरण का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को निर्णय लेने की क्षमता, आर्थिक स्वतंत्रता, शिक्षा और समानता प्रदान कर उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाना है

 महिला सशक्तिकरण की बात हर ओर गूंजती है। महिला सशक्तिकरण का प्रयास जो समाज में हुआ है, वह सफल रहा है।  आज के समय में महिलाएं अपने घरों की दहलीज के बाहर ही नहीं आई है अपितु  राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त की हैं।  परंतु अभी भी निम्न वर्गीय महिलाओं के सशक्तिकरण पर ध्यान देने की आवश्यकता है। क्योंकि वर्तमान में भी महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। यदि बात करें मध्यम वर्गीय एवं उच्च वर्गीय महिलाओं की तो इन वर्गों की महिलाएं सशक्त हुई हैं और उनमें स्वतंत्रता भी आई है। 

“अति की भली न बरसना, अति की भली न धूप। 

अति की भली न बोलना,  अति की भली न धूप।। “

 सशक्तिकरण हो या स्वतंत्रता किसी भी चीज की अति (अधिकता ) अच्छी नहीं। अनुशासन के साथ ही इस स्वतंत्रता की सार्थकता है। प्रकृति में महिलाओं को एक दायित्व सौंपा है,  “जननी” बनने का।  परंतु अपने करियर को संवारने  के चलते कुछ महिलााओं ने गर्भधारण की आयु को पीछे धकेल दिया है।  जिसका नकारात्मक प्रभाव होने वाले बच्चे (आने वाली पीढ़ी) पर पड़ता है। चिकित्सा विज्ञान कहता है कि गर्भधारण के लिए सबसे अच्छी आयु 20 से 30 वर्ष है 35 वर्ष के बाद अंडे की गुणवत्ता एवं संख्या में तेजी से कमी आती है जिसे गर्भधारण में कठिनाई अथवा बच्चों में कमी हो सकती है। अतः महिलाओं के सशक्तिकरण से तात्पर्य केवल महिलाओं का आर्थिक रूप से संपन्न सशक्त एवं स्वतंत्र होना ही नहीं है बल्कि अपने प्राकृतिक दायित्व का समय से अच्छी तरह निर्वहन करना भी है।  ताकि अगली पीढ़ी की महिलाएं (आज की होने वाली बेटियां ) भी सशक्त बन सके।

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