सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़कर हुई 38: लंबित मामलों के निपटारे में मिलेगी अभूतपूर्व तेजी
नई दिल्ली: भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में एक बड़ा और दूरगामी कदम उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाकर अब 38 कर दी गई है। देश की सर्वोच्च अदालत पर मुकदमों के बढ़ते बोझ को कम करने की दिशा में इस फैसले को एक मील का पत्थर माना जा रहा है। कानून के विशेषज्ञों और कानूनी गलियारों में इस निर्णय का पुरजोर स्वागत किया गया है।
न्याय प्रणाली को मिलेगी नई ताकत
सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ने से सबसे बड़ा फायदा देश के आम नागरिकों को होगा। वर्तमान में शीर्ष अदालत में हजारों मामले लंबित हैं, जिसके कारण न्याय मिलने में देरी होती है। पीठ (Benches) की संख्या बढ़ने से अब विभिन्न श्रेणियों के मामलों की सुनवाई एक साथ और अधिक तेजी से हो सकेगी।
विशेषज्ञों ने किया फैसले का स्वागत
कानून के वरिष्ठ विशेषज्ञों और न्यायविदों का मानना है कि यह निर्णय समय की मांग था। विशेषज्ञों के अनुसार:
- त्वरित सुनवाई: जजों की संख्या में वृद्धि से संवैधानिक मामलों के साथ-साथ दीवानी और आपराधिक अपीलों पर तुरंत सुनवाई हो सकेगी।
- लंबित मामलों में कमी: अदालतों पर बैकलॉग (पेंडेंसी) का जो भारी दबाव है, उसे कम करने में सीधे मदद मिलेगी।
- गुणवत्तापूर्ण न्याय: जजों पर काम का बोझ कम होने से वे प्रत्येक मामले को अधिक समय दे पाएंगे, जिससे न्याय की गुणवत्ता और बेहतर होगी।
क्यों जरूरी था यह कदम?
भारत की बढ़ती आबादी और कानूनी जागरूकता के कारण सुप्रीम कोर्ट में आने वाले मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। कई महत्वपूर्ण संवैधानिक मामलों को बड़ी पीठों (Constitution Benches) के गठन की आवश्यकता होती है, जिसमें अधिक जजों की जरूरत पड़ती है। जजों की संख्या 38 होने से अब बड़ी पीठों का गठन आसान होगा और देश के महत्वपूर्ण नीतिगत मामलों पर फैसले जल्दी आ सकेंगे।
यह ऐतिहासिक निर्णय देश में ‘जल्दी न्याय, सबको न्याय’ के संकल्प को मजबूत करने की दिशा में एक बेहद सराहनीय कदम है।
सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाकर 38 करने का फैसला ‘सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अध्यादेश, 2026’ के जरिए लिया गया है। इस ऐतिहासिक फैसले के पीछे की पूरी कानूनी प्रक्रिया और लंबित मामलों के वास्तविक आंकड़े निम्नलिखित हैं:
1. संख्या बढ़ाने की कानूनी प्रक्रिया (Legal Process)
भारतीय संविधान के तहत सुप्रीम कोर्ट के जजों की संख्या बढ़ाने की शक्ति पूरी तरह से संसद के पास सुरक्षित है:
- संवैधानिक प्रावधान: संविधान के अनुच्छेद 124(1) के तहत, मूल रूप से सुप्रीम कोर्ट में केवल 8 जज (1 मुख्य न्यायाधीश और 7 अन्य) थे। संविधान ने यह अधिकार संसद को दिया कि वह कानून बनाकर इस संख्या को बदल सकती है।
- मुख्य न्यायाधीश की सिफारिश: मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस ने लगातार बढ़ रहे मुकदमों के बोझ को देखते हुए केंद्र सरकार को जजों की संख्या बढ़ाने का औपचारिक प्रस्ताव भेजा था।
- केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी: प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने 5 मई 2026 को जजों की स्वीकृत संख्या को 34 से बढ़ाकर 38 करने के विधेयक (Amendment Bill, 2026) को हरी झंडी दी।
- राष्ट्रपति द्वारा अध्यादेश (Ordinance): चूंकि संसद का सत्र अभी नहीं चल रहा था, इसलिए 17 मई 2026 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत अध्यादेश जारी कर इसे तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया। इस अध्यादेश ने मुख्य कानून—सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956—की धारा 2 में संशोधन कर जजों की संख्या (CJI को छोड़कर) 33 से बढ़ाकर 37 कर दी है।
2. लंबित मामलों के आंकड़े (Pendency Statistics)
जजों की संख्या में यह वृद्धि बढ़ती मुकदमों की पेंडेंसी को समाप्त करने के लिए अनिवार्य हो गई थी:
- कुल लंबित मामले: [नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (NJDG)](1.1.2, 1.2.3) के हालिया आंकड़ों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों का आंकड़ा 92,000 से अधिक (लगभग 93,000) तक पहुंच चुका है।
- संवैधानिक पीठों का संकट: सुप्रीम कोर्ट में 5-जजों की बेंच के 22 मामले, 7-जजों की बेंच के 5 मामले और 9-जजों की बेंच के 2 बड़े संवैधानिक मामले लंबित हैं। जजों की कमी के कारण महत्वपूर्ण नीतिगत फैसलों के लिए बार-बार बड़ी बेंचों का गठन नहीं हो पा रहा था।
- लक्ष्य: नए जजों की नियुक्ति से अब कोर्ट में बिना रूकावट के पूरे साल स्थाई संविधान पीठ (Permanent Constitution Bench) चलाई जा सकेगी, जिससे आम नागरिकों के सामान्य मामलों की सुनवाई प्रभावित हुए बिना बड़े संवैधानिक मामलों का तुरंत निपटारा हो सकेगा।
सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति कॉलेजियम प्रणाली के माध्यम से की जाती है और इसके इतिहास में जजों की स्वीकृत संख्या मूल रूप से केवल 8 थी जो अब बढ़कर 38 हो चुकी है। इस पूरी व्यवस्था और इसके क्रमिक विकास को निम्नलिखित दो महत्वपूर्ण बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:
1. जजों की नियुक्ति की कॉलेजियम प्रणाली (The Collegium System)
भारत के उच्चतर न्यायपालिका (सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट) में जजों की नियुक्ति और तबादले के लिए कॉलेजियम प्रणाली उत्तरदायी है:
- संरचना: सुप्रीम कोर्ट का कॉलेजियम 5 सदस्यीय निकाय होता है। इसकी अध्यक्षता देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) करते हैं और इसमें सुप्रीम कोर्ट के 4 अन्य वरिष्ठतम जज शामिल होते हैं।
- उत्पत्ति: यह प्रणाली संविधान या संसद के किसी कानून द्वारा नहीं बनाई गई है। इसकी शुरुआत सुप्रीम कोर्ट के तीन ऐतिहासिक फैसलों (Three Judges Cases – 1981, 1993, 1998) के जरिए हुई है। 1993 के ‘सेकंड जजेस केस’ में यह तय हुआ कि न्यायिक नियुक्तियों में न्यायपालिका की राय सर्वोपरि होगी।
- प्रक्रिया: कॉलेजियम उपयुक्त नामों की सिफारिश केंद्र सरकार के कानून मंत्रालय को भेजता है। सरकार चाहे तो किसी नाम पर आपत्तियां दर्ज करा सकती है, लेकिन यदि कॉलेजियम दोबारा उन्हीं नामों की सिफारिश भेजता है (Reiteration), तो सरकार उन जजों की नियुक्ति करने के लिए बाध्य होती है। अंततः, राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से जजों की नियुक्ति होती है।
2. सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या का इतिहास (Evolution of Judge Strength)
समय के साथ मुकदमों की बढ़ती संख्या को देखते हुए संसद ने ‘सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956’ में समय-समय पर संशोधन कर जजों की संख्या को बढ़ाया है:
वर्ष स्वीकृत संख्या (मुख्य न्यायाधीश सहित)ऐतिहासिक संदर्भ / संशोधन
1950: 8 (1 CJI + 7 अन्य जज) भारत के मूल संविधान के तहत स्थापित संख्या।
1956: 11 (1 CJI + 10 अन्य जज) पहली बार अधिनियम बनाकर संख्या में वृद्धि की गई।
1960: 14 (1 CJI + 13 अन्य जज) मुकदमों के बढ़ते दबाव के कारण दोबारा विस्तार।
1977: 18 (1 CJI + 17 अन्य जज) आपातकाल के बाद मुकदमों की संख्या बढ़ने पर वृद्धि।
1986: 26 (1 CJI + 25 अन्य जज) एक दशक बाद जजों की संख्या में बड़ा इजाफा किया गया।
2009: 31 (1 CJI + 30 अन्य जज) लंबित मामलों के निपटारे की गति बढ़ाने के लिए संशोधन।
2019: 34 (1 CJI + 33 अन्य जज) पूर्व में किया गया आखिरी संशोधन।
2026: 38 (1 CJI + 37 अन्य जज) वर्तमान ऐतिहासिक संशोधन, जहां जजों की संख्या में 4 की बढ़ोतरी की गई है।
#SupremeCourt #IndianJudiciary #SupremeCourtOfIndia #LegalReform #JusticeDelayedIsJusticeDenied #CollegiumSystem #JudicialAppointments #PendencyOfCases #LegalNewsIndia #सुप्रीम_कोर्ट #न्यायपालिका #कानूनी_सुधार

