सतुआ: अवध का पारंपरिक सुपरफूड, स्वाद और सेहत का अनमोल खजाना – सतुआ (सत्तू) का इतिहास: स्वाद, सेहत और अवधी संस्कृति का बेजोड़ संगम!
“मां को पता है कि मुझे भोजन में देशी चीजें ज्यादा पसंद हैं, इसलिए अगले दिन ही मां ने मुझसे कहा कि सतुआ खाओगी?”
मैंने तुरंत हां तो कर दिया, लेकिन हर दिन रसोई में कुछ न कुछ नया और आधुनिक बनता रहता था, जिसके कारण सतुआ खाने की बारी ही नहीं आ पाती थी। अक्सर हमारी पारंपरिक चीजें आधुनिक पकवानों की चकाचौंध में पीछे छूट जाती हैं। लेकिन एक दिन अचानक सुबह का नाश्ता थोड़ा भारी हो गया। दोपहर तक भूख बहुत कम लगी थी और पेट में हल्का-हल्का दर्द भी महसूस हो रहा था। तब मैंने मां से कहा कि आज दोपहर के भोजन में कुछ और नहीं, बल्कि सिर्फ सतुआ ही खाना है।
मां ने तुरंत मेरी पसंद का ख्याल रखा। उन्होंने आंगन से आम के ताजे टिकोरे (कच्ची अमिया) तोड़े और सिलबट्टे पर पुदीना, मिर्च और नमक के साथ एक चटपटी सी चटनी पीसी। जब मैं सतुआ जिमने (खाने) बैठी, तो बचपन की यादें ताजा हो गईं। सतुआ के बारे में एक बात मशहूर है कि इसे सामान्य भोजन की तरह खाया नहीं, बल्कि चाटा जाता है। इसे पानी डालकर गाढ़ा घोला जाता है और फिर तीखी चटनी, कच्चा प्याज और गन्ने के सिरके के साथ उंगलियों से चाटकर स्वाद लेकर खाया जाता है। सतुआ घोलते समय एक बात बड़ी हैरान करती है कि यह बहुत ज्यादा पानी सोखता है। खैर, उस दिन दोपहर में सतुआ खाने के बाद जो चमत्कार हुआ, उसने मुझे हैरान कर दिया। पता नहीं सतुआ के गुणों के कारण या मां के हाथ के जादू से, मेरा पेट दर्द थोड़ी ही देर में गायब हो गया और पेट एकदम हल्का और शांत महसूस होने लगा।
1. इतिहास के झरोखे से: सतुआ का साथ
जब मैंने पेट ठीक होने की बात मां को बताई, तो उन्होंने सतुआ से जुड़ा एक बेहद दिलचस्प ऐतिहासिक किस्सा सुनाया। मां ने बताया कि परदादा जी के समय में परिवार पर कुछ जमीनी मुकदमे चल रहे थे। उन दिनों आवागमन के साधन नहीं थे। जब भी अदालत की तारीख पड़ती थी, तो परदादा जी को अपने गांव से कचहरी के लिए पैदल ही पैरवी करने जाना पड़ता था।
उस लंबी और थका देने वाली यात्रा में उनका सबसे वफादार साथी कोई इंसान नहीं, बल्कि सतुआ होता था। परदादा जी अपने साथ एक पोटली में सतुआ, एक लोटा, डोरी और एक पीतल का कटोरा बांधकर निकलते थे। राह चलते-चलते जब भी दोपहर होती और भूख सताती, तो वे किसी घने पेड़ की छांव और पानी का कुआं देखकर रुक जाते थे। लोटा-डोरी की मदद से कुएं से ठंडा पानी निकालते, कटोरे में सतुआ डालते, पानी मिलाकर उसे सानते और बड़े चाव से खाकर अपनी भूख मिटा लेते थे। यह एक ऐसा सफर का साथी था जो कभी खराब नहीं होता था और बिना आग जलाए तुरंत पेट भर देता था।
2. कचहरी और ‘भुजाइन’ का ऐतिहासिक व्यापार
मां ने पुराने समय के समाज और रोजगार से जुड़ा एक और अनोखा संस्मरण साझा किया। उन दिनों कचहरी के पास ही एक भाड़ (अनाज भूनने वाली जगह) था, जिसे एक ‘भुजैन’ (भुर्जिन) चलाती थी। उस भुजैन के पास हमेशा ताजा सतुआ, तीखी चटनी और नमक तैयार रहता था।
कचहरी में दूर-दूर के गांवों से गरीब किसान, मजदूर और फरियादी आते थे। कई बार लोगों के पास इतने पैसे नहीं होते थे कि वे किसी बड़े होटल या हलवाई की दुकान पर जाकर पूड़ी-सब्जी या मिठाई खा सकें। ऐसे में जब भी किसी को तेज भूख लगती, तो वे सीधे उस भुजाइन के पास चले जाते थे। वह बेहद कम पैसों में या कभी-कभी अनाज के बदले भी भरपेट सतुआ और चटनी दे देती थी। उस दौर में यह भुजाइन का मुख्य व्यापार और आजीविका का साधन था। यह इस बात का प्रमाण है कि सतुआ ने सदियों से अमीर-गरीब हर वर्ग के लोगों का पेट भरने में एक सामाजिक रक्षक की भूमिका निभाई है।
3. सतुआ खाने के विविध और पारंपरिक तरीके
अवध के ग्रामीण अंचलों में सतुआ को केवल एक ही तरीके से नहीं खाया जाता था, बल्कि समय और पसंद के अनुसार इसे खाने के कई अद्भुत तरीके प्रचलित थे:
- राब और सतुआ का ‘ककरौन’: मां बताती हैं कि शाम के वक्त जब बाबा लोग (बुजुर्ग) खेतों से काम करके लौटते थे और उन्हें हल्की भूख लगती थी, तो वे गन्ने के गाढ़े रस यानी ‘राब’ में सतुआ को अच्छी तरह मसलवाते थे। इससे सूखा सा ‘ककरौन’ तैयार किया जाता था। ककरौन को हाथ से सुखा-सुखा ही बुकाया (फांका) जाता था, जिसका स्वाद लाजवाब होता था।
- पिंडी बनाकर खाना: जब राब की मात्रा थोड़ी ज्यादा रखी जाती थी, तो सतुआ को सानकर गोल-गोल लड्डू जैसा आकार दिया जाता था, जिसे ‘पिंडी’ कहते थे। यह बच्चों और बड़ों का पसंदीदा मीठा स्नैक होता था।
- नमकीन और गाढ़ा घोल: दोपहर के समय इसे नमक, पानी, प्याज और चटनी के साथ गाढ़ा सानकर उंगलियों से चाटकर खाया जाता था।
- पतला शर्बत: गर्मियों के दिनों में सत्तू को पानी में एकदम पतला घोलकर, उसमें भुना जीरा, काला नमक और नींबू मिलाकर पिया जाता था, जो लू और डिहाइड्रेशन से बचाता था।
4. कैसे बनता था असली ‘सातंजा सत्तू’? (मेहनत और शुद्धता की कहानी)
आज बाजार में जो सत्तू मिलता है, वह पैकेट बंद होता है और आमतौर पर केवल एक या दो अनाजों से बना होता है। लेकिन पुराने समय में हमारी दादी-नानी जो सत्तू बनाती थीं, उसे ‘सातंजा सत्तू’ कहा जाता था। यह सात तरह के शुद्ध और मोटे अनाजों को मिलाकर तैयार किया जाता था:
बनाने की कठिन पारंपरिक प्रक्रिया
- अनाजों को भिगोना और सुखाना: सबसे पहले इन सातों अनाजों को साफ करके पानी में भिगोया जाता था और फिर धूप में अच्छी तरह सुखाया जाता था।
- जौ की विशेष मेहनत: सातों अनाजों में ‘जौ’ को साफ करने में सबसे ज्यादा मेहनत लगती थी। जौ को पहले पानी से भिगोकर ओखली में हल्के हाथों से कूटा जाता था ताकि उसका ऊपरी कड़ा छिलका उतर जाए। छिलका उतरने के बाद ही उसे अन्य अनाजों के साथ मिलाया जाता था।
- भाड़ में सेकवाना: सूखे हुए अनाजों को गांव के पारंपरिक ‘भाड़’ में बालू के साथ अच्छी तरह भूनकर (सेकवाकर) तैयार किया जाता था। भूनने से अनाजों में सोंधापन आ जाता था।
- जांत में पिसाई: भुने हुए गर्म अनाजों को घर के ‘जांत’ (पत्थर की हाथ से चलने वाली चक्की) में पीसकर बारीक आटा बनाया जाता था। इस तरह तैयार हुआ मोटा और सोंधा सत्तू अत्यंत पौष्टिक और स्वादिष्ट होता था।
5. आधुनिक सत्तू बनाम पारंपरिक सातंजा: क्या बदला?
आज के समय में खान-पान के तौर-तरीके पूरी तरह बदल चुके हैं। अब हमें बाजार में सातों अनाजों का मिक्स सत्तू मिलना लगभग नामुमकिन हो गया है। आज व्यावसायिक रूप से केवल अलग-अलग अनाज का सत्तू मिलता है, जिसमें चना सत्तू और जौ सत्तू मुख्य हैं।
पुराने समय के सातंजा सत्तू की तुलना में आज के सत्तू में वह सोंधापन और स्वाद नहीं रह गया है। पहले के लोग मोटे और प्राकृतिक अनाजों का सेवन करते थे, जिसके कारण उनका पाचन तंत्र मजबूत रहता था और उन्हें गैस, एसिडिटी या पेट दर्द जैसी बीमारियां छू भी नहीं पाती थीं।
निष्कर्ष
सतुआ सिर्फ एक भोजन नहीं, बल्कि हमारी समृद्ध अवधी संस्कृति, इतिहास और स्वास्थ्य विज्ञान का एक बेजोड़ हिस्सा है। परदादा जी के मुकदमों के सफर से लेकर बाबा के शाम के ‘ककरौन’ तक, सतुआ ने हमारी कई पीढ़ियों को पालने और स्वस्थ रखने का काम किया है। आज भले ही हम कितने भी आधुनिक पिज्जा, बर्गर या डिब्बाबंद सप्लीमेंट्स खा लें, लेकिन जो तृप्ति और ठंडक मां के हाथ की सिलबट्टे वाली चटनी और सतुआ को चाटने में मिलती है, वह दुनिया के किसी पांच सितारा होटल के व्यंजन में नहीं मिल सकती। हमें अपनी इस देशी विरासत को सहेजना चाहिए और अपनी थाली में इसे फिर से वही सम्मानजनक स्थान देना चाहिए।
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