दुआर वाला चूल्हा: संयुक्त परिवार के सुख-दुख, रसोई का संकट और बयार की मिठास
आज का दौर एकल परिवारों और मॉडर्न किचन का है, जहाँ चिमनी और एलपीजी स्टोव की मदद से बंद कमरों में खाना पकता है। लेकिन उत्तर प्रदेश के गोण्डा, बस्ती और अवध-पूर्वांचल के ग्रामीण अंचलों की पुरानी यादों में झांकें, तो वहाँ घर के मुख्य दरवाजे यानी ‘दुआर’ पर रखे एक छोटे, मिट्टी के चूल्हे की बेहद महत्वपूर्ण भूमिका दिखाई देती है। इसे हमारी क्षेत्रीय भाषा में ‘इकलिया चूल्हा’ या ‘चूल्हकी’ कहा जाता था।
यह इकलिया चूल्हा सिर्फ मिट्टी का एक ढांचा मात्र नहीं था, बल्कि यह बड़े संयुक्त परिवारों (ज्वाइंट फैमिली) के भीतर की जरूरतों, आपसी तालमेल, बच्चों की जल्दबाजी, बुजुर्गों के दुलार और घर के स्वाद के संतुलन का मुख्य केंद्र हुआ करता था। आइए, दुआर वाले इस इकलिया चूल्हे की महत्ता, घमंजा तरकारी का बेमिसाल स्वाद, मौसमी पकवान और संयुक्त परिवार के खट्टे-मीठे अनुभवों को इस लेख के जरिए गहराई से जीते हैं।
इकलिया चूल्हा: सुबह की आपाधापी का तारणहार
पुराने समय में जब गांवों में बड़े और संयुक्त परिवार एक साथ एक ही छत के नीचे रहते थे, तो सुबह की रसोई किसी बड़े युद्ध स्तर की तैयारी जैसी होती थी। परिवार में सदस्यों की संख्या बीस-पच्चीस या उससे भी अधिक होना आम बात थी। घर के भीतर बने मुख्य बड़े चूल्हे पर सुबह का भोजन पकने में लंबा समय लगता था। दाल, चावल और भारी मात्रा में सब्जी बनते-बनते सूरज सिर पर आ जाता था।
ऐसे में जिन बच्चों को सुबह समय पर स्कूल जाना होता था या जिन पुरुषों को खेतों और नौकरियों पर निकलना होता था, उनके लिए समय पर भोजन तैयार करना एक बड़ी चुनौती बन जाता था। इसी सुबह की आपाधापी और संकट से उबारने का काम करता था दुआर पर रखा यह इकलिया चूल्हा।
जब भीतर की रसोई में देरी हो रही होती, तब घर की आजी (दादी) या बिट्टू (घर की बेटी या बहू) फुर्ती से दुआर वाले चूल्हे पर कंडे और लकड़ियाँ सुलगती थीं। आजी जल्दी से परात में आटा गूंथकर रोटी सेंकना शुरू कर देती थीं। इस चूल्हे का आकार छोटा होने के कारण इस पर बेहद तेजी से रोटियां सिकती थीं और काम पर जाने वालों को गरम-गरम भोजन समय से मिल जाता था।
‘घमंजा तरकारी’: प्रकृति का ताज़ा उपहार और तवे का जादू
इस सुबह की जल्दबाजी में जब अलग से सब्जी बनाने का समय नहीं होता था, तब आजी अपनी पारंपरिक सूझबूझ का परिचय देती थीं। वे घर के पीछे लगी ‘अरई विरवा’ (घरेलू शाक-सब्जी की बाड़ी या मचान) में दौड़कर जाती थीं। वहां पौधों पर जो कुछ भी थोड़ा-बहुत तैयार मिलता, उसे तोड़ लाती थीं।
बाड़ी में से चार-छह भिंडी, दो-चार सतपुतिया (तोरई की एक प्रजाति), दो-चार नेनुआ और एकाध चिचिन्हा (साँप लौकी) जो भी हाथ लगता, उसे लाकर तुरंत धोया और फटाफट काट दिया जाता था। अलग-अलग प्रजातियों की इन मिक्स सब्जियों के मेल को गांव में ‘घमंजा तरकारी’ कहा जाता था।
सब्जी कटने के बाद बिट्टू का जादू शुरू होता था। रोटी बनाने के बाद, गर्म तवे पर ही थोड़ा सा सरसों का तेल डाला जाता था और उसमें लहसुन-हरी मिर्च का तीखा तड़का (छौंक) लगाया जाता था। इसके बाद उस कटी हुई घमंजा तरकारी को तवे पर ही छौंक दिया जाता था। बिना किसी हल्दी, धनिया या गरम मसाले के, सिर्फ नमक डाल कर बनाई गई यह सूखी तरकारी लोहे के तवे पर इतनी सोंधी और स्वादिष्ट पकती थी कि खाने वाला उंगलियाँ चाटता रह जाता था। इस ताजी और सादी सब्जी का स्वाद इतना लाजवाब होता था कि भूख न होने पर भी इंसान दो रोटी ज्यादा खा जाए।
मौसम का मिजाज और चूल्हे के बदलते पकवान
दुआर वाला यह चूल्हा मौसम के बदलने के साथ-साथ अपने पकवानों का रंग भी बदल लेता था। साल के बारह महीने इस पर कुछ न कुछ विशेष पकता रहता था:
- गर्मियों में बुआ का गलका: आम के सीजन में जब पेड़ों से कच्चे आम (टिकोरे) भारी मात्रा में गिरते थे, तब घर की बुआ इसी चूल्हे पर बड़े बर्तनों में ‘गलका’ (गुड़ और कच्चे आम की खट्टी-मीठी लौंजी) बनाया करती थीं। इसकी धीमी-धीमी आंच पर पकने वाले गुड़ की महक पूरे दुआर को महका देती थी।
- सर्दियों में धान की भुजिया: कड़ाके की ठंड के दिनों में आजी इस चूल्हे को सुबह से ही सुलगा लेती थीं। इस पर बड़े बर्तनों में धान को उबाला और भूना जाता था, जिसे ‘धान की भुजिया’ करना कहते थे। इसके बाद इसी से नए चावल कूटकर निकाले जाते थे।
- बारिश में जोनहरी का लावा: जब सावन-भादों की रिमझिम बारिश होती थी, तब दुआर के छप्पर के नीचे इस चूल्हे पर मिट्टी की ‘खपरी’ (मिट्टी का उथला बर्तन) चढ़ाई जाती थी। गर्म बालू में मक्के के दाने डाले जाते और गर्म-गर्म ‘जोनहरी का लावा’ (पॉपकॉर्न) भूना जाता था, जिसे पूरा परिवार एक साथ बैठकर चाव से खाता था।
संयुक्त परिवार की राजनीति और ‘छिनछिनिहा’ सदस्य का नखरा
संयुक्त परिवार की अपनी एक अलग सामाजिक व्यवस्था और चुनौतियाँ होती हैं। जब बीस-पच्चीस लोगों के लिए एक साथ बड़े बर्तनों में दाल और तरकारी बनती है, तो जाहिर सी बात है कि उसका स्वाद वैसा कढ़ा हुआ और सटीक नहीं बन पाता जैसा दो या तीन लोगों के छोटे परिवार के लिए बनता है। इतने बड़े पैमाने पर बनने वाले भोजन में तेल, मसाले और छौंक का सही अंदाज़ा लगाना बेहद मुश्किल काम होता था। दाल अक्सर थोड़ी पतली (पानी जैसी) हो जाती थी और सब्जी भी साधारण बनती थी।
ऐसे बड़े परिवारों में एकाध ‘छिनछिनिहा’ (बेहद तुनकमिजाज, बात-बात पर रूठने वाले या नखरेबाज) सदस्य जरूर होता था। ऐसा सदस्य हफ्ते में दो-तीन दिन जरूर रसोई की कमियां निकालकर भोजन न करने की कड़क घोषणा कर देता था—“हम न खाब ई पानी एस दाल और बिन तेल मसाले वाली तरकारी! (हम यह पानी जैसी दाल और बिना तेल-मसाले की सब्जी नहीं खाएंगे!)”
ऐसे समय में उस रूठे हुए सदस्य की पत्नी तो लोक-लाज और डर के मारे अलग से कुछ नहीं बना पाती थी, लेकिन घर की ‘मां’ का दिल नहीं मानता था। मां अपने बेटे को भूखा नहीं देख सकती थी। वह डरते-डरते, छिपते-छिपाते इसी दुआर वाले इकलिया चूल्हे पर उस रूठे हुए बेटे के लिए थोड़ी सी अलग से अच्छी सब्जी या स्वादिष्ट खिचड़ी बना लिया करती थी।
यह देखकर घर के बाकी सदस्य अक्सर तंज और कटाक्ष करते थे—“आज फलाने के लिए फिर चूल्हकी चढ़ी है। इनके नखरे ही कम नहीं होते हैं।” यह चूल्हकी चढ़ना संयुक्त परिवार के भीतर के छोटे-मोटे मनमुटाव, अधिकार और प्रेम का एक जीवंत नाटक हुआ करता था।
गर्मियों की शाम और बयार (हवा) का सुख
जब जेठ-वैशाख के महीनों में भीषण गर्मी पड़ती थी और घर के भीतर के कमरे या रसोईघर तपते हुए ओवन जैसे बन जाते थे, तब शाम के समय दुआर का यह चूल्हा वरदान साबित होता था।
शाम होते ही आंगन और दुआर पर पानी का छिड़काव किया जाता था, जिससे मिट्टी की सोंधी खुशबू उठती थी। इसके बाद इस चूल्हे को अच्छी तरह से लीप-पोतकर साफ किया जाता था और रात का भोजन (सब्जी, रोटी, भात) यहीं खुले में बनाया जाता था। दुआर पर होने के नाते, शाम को जैसे ही थोड़ी सी भी ‘बयार डोलती’ (ठंडी हवा चलती) थी, वह सीधे शरीर को लगती थी और दिन भर की थकान व गर्मी से राहत देती थी। खुले आसमान के नीचे, तारों की छांव में इस चूल्हे के पास बैठकर खाना बनाने और खाने का सुख अतुलनीय था।
सावधानी हटी, दुर्घटना घटी: ‘कुत्ता महराज’ का पहरा
दुआर पर खाना बनाने का जहाँ अपना एक अलग आनंद था, वहीं इसके साथ एक बहुत बड़ा जोखिम और परेशानी भी जुड़ी हुई थी। दुआर पूरी तरह खुला हुआ क्षेत्र होता था, इसलिए यहाँ ‘सावधानी हटी, दुर्घटना घटी’ वाला नियम हर पल लागू रहता था।
खाना बनाते समय या खाना बनाकर बर्तन ढककर रखने के बाद, चूल्हे पर लगातार कड़ी नजर रखनी पड़ती थी। अगर गृहणी जरा सा भी इधर-उधर हुई या पानी लेने अंदर गई, तो गांव के आवारा ‘कुत्ता महराज’ तुरंत ताक लगाकर दुआर में घुस आते थे। जरा सी चूक होते ही वे चूल्हे या भोजन के बर्तनों को छू लेते (भ्रष्ट कर देते) थे।
उस दौर में शुद्धता और छुआछूत के नियम बहुत कड़े होते थे। यदि कुत्ते ने भोजन को छू लिया, तो वह पूरा का पूरा बना-बनाया भोजन अपवित्र मान लिया जाता था। ऐसी स्थिति में घर का कोई भी सदस्य उस अन्न को हाथ नहीं लगाता था। वह सारा का सारा कीमती भोजन गाय और भैंसों के नाद में डाल दिया जाता था।
उस रात पूरे परिवार को सजा भुगतनी पड़ती थी। कोई दोबारा खाना नहीं बनाता था, बल्कि पूरा परिवार सत्तू को पानी और नमक-मिर्च के साथ सानकर खाकर किसी तरह रात बिताता था। इसलिए दुआर के चूल्हे पर खाना बनाना एक गहरी एकाग्रता और पहरेदारी की मांग करता था।
निष्कर्ष – यह चूल्हा हमारे ग्रामीण समाज की आत्मीयता का प्रतीक था
समय का पहिया घूमा और गांवों में भी अब बड़े संयुक्त परिवार टूटकर छोटे हो गए। दुआर के छप्परों की जगह पक्के कमरों और पोर्च ने ले ली है। इसके साथ ही दुआर पर सजने वाला वह ‘इकलिया चूल्हा’ या ‘चूल्हकी’ भी इतिहास के पन्नों में कहीं खो गई है।
आज हमारे पास हर तरह के बेहतरीन पकवान और उन्हें बनाने के आधुनिक साधन मौजूद हैं, लेकिन तवे पर छौंकी गई उस ताजी ‘घमंजा तरकारी’ का स्वाद, अपनों को मनाने के लिए मां का चोरी-छिपे चूल्हकी चढ़ाना और दुआर पर बहती ठंडी बयार के बीच भोजन पकाने का वह ठेठ देसी अहसास आज के किसी भी आधुनिक किचन में ढूंढ पाना नामुमकिन है। यह चूल्हा हमारे ग्रामीण समाज की आत्मीयता का प्रतीक था।
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