राष्ट्रीय दुग्ध दिवस 2026(National Milk Day): श्वेत क्रांति का इतिहास, महत्व और डॉ. वर्गीज कुरियन का योगदान | National Milk Day

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राष्ट्रीय दुग्ध दिवस (National Milk Day): भारत की श्वेत क्रांति, डॉ. वर्गीज कुरियन का योगदान और डेयरी क्षेत्र का आर्थिक-सामाजिक महत्व
प्रस्तावना
भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहाँ प्राचीन काल से ही गोधन और दुग्ध उत्पादन को अत्यंत पवित्र और आर्थिक समृद्धि का प्रतीक माना गया है। आधुनिक भारत के इतिहास में दुग्ध उत्पादन केवल एक कृषि गतिविधि नहीं, बल्कि एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन और आर्थिक आत्मनिर्भरता की सबसे बड़ी मिसाल बनकर उभरा है। इस अभूतपूर्व बदलाव को सम्मान देने और इसके महत्व को जन-जन तक पहुँचाने के लिए हर साल 26 नवंबर को पूरे देश में ‘राष्ट्रीय दुग्ध दिवस’ (National Milk Day) मनाया जाता है। यह विशेष दिन भारत में ‘श्वेत क्रांति’ (White Revolution) के जनक और ‘मिलकमैन ऑफ इंडिया’ के नाम से प्रसिद्ध डॉ. वर्गीज कुरियन की जयंती के उपलक्ष्य में मनाया जाता है।
दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में भारत की यात्रा किसी चमत्कार से कम नहीं है। एक समय वह था जब 1950 और 1960 के दशक में भारत अपनी दुग्ध आवश्यकताओं के लिए पूरी तरह से आयातित दूध और दुग्ध उत्पादों (विशेष रूप से विदेशों से आने वाले पाउडर) पर निर्भर था। लेकिन आज, भारत दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है, जो वैश्विक दुग्ध उत्पादन में 24 प्रतिशत से अधिक की हिस्सेदारी रखता है। राष्ट्रीय दुग्ध दिवस का यह अवसर हमें इस ऐतिहासिक यात्रा की याद दिलाता है और उन करोड़ों ग्रामीण पशुपालकों, किसानों और सहकारिता से जुड़े लोगों के प्रति आभार व्यक्त करने का माध्यम बनता है, जिन्होंने भारत को इस गौरवशाली मुकाम पर पहुँचाया है।
राष्ट्रीय दुग्ध दिवस का इतिहास और महत्व
राष्ट्रीय दुग्ध दिवस को मनाने की शुरुआत वर्ष 2014 में हुई थी। भारत के डेयरी इतिहास में इस दिन की महत्ता को देखते हुए देश की प्रमुख डेयरी संस्थाओं—जिसमें राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB), भारतीय डेयरी संघ (IDA) और गुजरात सहकारी दुग्ध विपणन महासंघ (GCMMF – जो अमूल ब्रांड का संचालन करता है) शामिल हैं—ने सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया कि डॉ. वर्गीज कुरियन के जन्मदिन यानी 26 नवंबर को ‘राष्ट्रीय दुग्ध दिवस’ के रूप में घोषित किया जाए。
विश्व दुग्ध दिवस और राष्ट्रीय दुग्ध दिवस में अंतर
अक्सर लोग राष्ट्रीय दुग्ध दिवस और विश्व दुग्ध दिवस को लेकर असमंजस में रहते हैं। यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि:
- विश्व दुग्ध दिवस (World Milk Day): यह प्रत्येक वर्ष 1 जून को वैश्विक स्तर पर मनाया जाता है。 इसकी शुरुआत संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) द्वारा वर्ष 2001 में की गई थी, जिसका उद्देश्य वैश्विक खाद्य श्रृंखला में दूध के महत्व को रेखांकित करना है。
- राष्ट्रीय दुग्ध दिवस (National Milk Day): यह पूरी तरह से भारत केंद्रित है और 26 नवंबर को मनाया जाता है。 यह डॉ. वर्गीज कुरियन के प्रति एक राष्ट्रीय श्रद्धांजलि है और भारत को दुग्ध उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने की गाथा को समर्पित है。
इस दिवस का महत्व केवल उत्सव मनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य दूध और दुग्ध उत्पादों के पोषण संबंधी लाभों के बारे में जागरूकता फैलाना, डेयरी उद्योग को बढ़ावा देना और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में रीढ़ की हड्डी माने जाने वाले पशुपालकों के अधिकारों और कल्याण पर चर्चा करना भी है。
डॉ. वर्गीज कुरियन: ‘मिलकमैन ऑफ इंडिया’ की अमर गाथा
राष्ट्रीय दुग्ध दिवस की चर्चा डॉ. वर्गीज कुरियन के बिना अधूरी है。 26 नवंबर 1921 को केरल के कोझिकोड (कैलिकट) में जन्मे डॉ. वर्गीज कुरियन एक प्रख्यात इंजीनियर और सामाजिक उद्यमी थे。 उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा अमेरिका के मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी से मैकेनिकल इंजीनियरिंग और मेटलर्जी में पूरी की थी。 भारत लौटने पर, सरकारी छात्रवृत्ति की शर्तों के अनुसार, उन्हें गुजरात के आणंद (Anand) नामक एक छोटे से कस्बे में सरकारी अनुसंधान क्रीमरी में अपनी सेवाएं देनी थीं。
आणंद में उनका आगमन भारतीय डेयरी उद्योग के भाग्य को बदलने वाला साबित हुआ。 उस समय, आणंद और आसपास के क्षेत्रों के गरीब किसान स्थानीय व्यापारियों और बिचौलियों (जैसे पोल्सन डेयरी) के हाथों गंभीर शोषण का शिकार हो रहे थे。 सर्दियों के दिनों में जब दूध का उत्पादन अधिक होता था, तो व्यापारी दूध की कीमतें बेहद कम कर देते थे, जिससे किसानों को भारी नुकसान होता था。 त्रिभुवनदास पटेल, जो एक स्थानीय स्वतंत्रता सेनानी और नेता थे, किसानों को एकजुट कर एक सहकारी संस्था बनाने का प्रयास कर रहे थे。 डॉ. कुरियन ने किसानों की इस लाचारी को देखा और सरकारी नौकरी छोड़कर किसानों की मदद करने का फैसला किया。 यहीं से ‘कैरा जिला सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ लिमिटेड’ की नींव पड़ी, जिसे आज हम पूरी दुनिया में ‘अमूल’ (AMUL – Anand Milk Union Limited) के नाम से जानते हैं。
डॉ. कुरियन के क्रांतिकारी आविष्कार और योगदान
- भैंस के दूध से मिल्क पाउडर का निर्माण: 1950 के दशक तक दुनिया के सभी विकसित देशों (जैसे न्यूजीलैंड, हॉलैंड आदि) का मानना था कि दुग्ध पाउडर और कंडेंस्ड मिल्क केवल गाय के दूध से ही बनाया जा सकता है。 चूंकि भारत में मुख्य रूप से भैंस का दूध प्रचुर मात्रा में उपलब्ध था, इसलिए विदेशी विशेषज्ञ इसे नामुमकिन मानते थे。 डॉ. वर्गीज कुरियन और उनके सहपाठी व जीनियस इंजीनियर एच.एम. दलाया ने दुनिया की इस धारणा को गलत साबित किया。 उन्होंने तकनीकी नवाचार के माध्यम से पहली बार भैंस के दूध से मिल्क पाउडर और स्किम्ड मिल्क पाउडर बनाने की तकनीक विकसित की。 इस एक आविष्कार ने भारतीय डेयरी उद्योग का चेहरा बदल दिया और भारत को विदेशी आयात पर निर्भरता से मुक्त करने की राह दिखाई。
- सहकारी मॉडल (The Amul Model): डॉ. कुरियन ने एक ऐसा लोकतांत्रिक ढांचा तैयार किया जहाँ बिचौलियों की कोई जगह नहीं थी。 दूध उत्पादक किसान ही इस सहकारी संस्था के मालिक थे और लाभ का एक बड़ा हिस्सा सीधे किसानों की जेब में जाता था。 इस मॉडल ने न केवल आर्थिक समृद्धि सुनिश्चित की बल्कि ग्रामीण समाज में जाति, धर्म और लिंग के बंधनों को तोड़कर समानता की भावना का संचार किया。
ऑपरेशन फ्लड (Operation Flood): भारत की श्वेत क्रांति
डॉ. वर्गीज कुरियन के अमूल मॉडल की सफलता से प्रभावित होकर तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने चाहा कि इस मॉडल को पूरे देश में लागू किया जाए。 इसके लिए 1965 में राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) की स्थापना की गई और डॉ. कुरियन को इसका अध्यक्ष बनाया गया。 इसके बाद, वर्ष 1970 में दुनिया के सबसे बड़े डेयरी विकास कार्यक्रम की शुरुआत हुई, जिसे ‘ऑपरेशन फ्लड’ (Operation Flood) या ‘श्वेत क्रांति’ कहा जाता है。
ऑपरेशन फ्लड को तीन चरणों में लागू किया गया, जिसने भारत को दूध की कमी वाले देश से निकालकर दुनिया का अग्रणी दुग्ध उत्पादक देश बना दिया:
प्रथम चरण (1970 – 1980):
इस चरण की शुरुआत विश्व खाद्य कार्यक्रम (World Food Programme) के माध्यम से यूरोपीय संघ द्वारा दान किए गए स्किम्ड मिल्क पाउडर और बटर ऑयल की बिक्री से प्राप्त धन से हुई थी。 इस चरण के तहत देश के 18 प्रमुख दुग्ध शेडों (Milk Sheds) को भारत के चार प्रमुख महानगरों (दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई) के उपभोक्ताओं से जोड़ा गया。 आनंद मॉडल के आधार पर आधुनिक डेयरी प्लांट स्थापित किए गए。
द्वितीय चरण (1981 – 1985):
इस चरण में दुग्ध शेडों की संख्या 18 से बढ़ाकर 136 कर दी गई。 देश भर के कस्बों और शहरों में दुग्ध बिक्री केंद्रों की संख्या में भारी वृद्धि हुई。 1985 तक, लगभग 43,000 ग्रामीण दुग्ध सहकारी समितियां अस्तित्व में आ चुकी थीं, जिससे 42 lakh से अधिक दुग्ध उत्पादक जुड़ चुके थे。 इस चरण के दौरान घरेलू दूध उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की गई और भारत प्रत्यक्ष विदेशी सहायता से मुक्त होने लगा。
तृतीय चरण (1985 – 1996):
इस चरण ने डेयरी सहकारी समितियों को और अधिक मजबूत और आत्मनिर्भर बनाया。 पशु स्वास्थ्य, पशु पोषण और कृत्रिम गर्भाधान जैसी सेवाओं का व्यापक विस्तार किया गया ताकि पशुओं की उत्पादकता में सुधार हो सके。 इस चरण के अंत तक, भारत में दुग्ध शेडों की संख्या बढ़कर 173 हो गई और सहकारी समितियों की संख्या 75,000 से अधिक हो गई。
परिणाम: श्वेत क्रांति के सफल कार्यान्वयन का ही परिणाम था कि वर्ष 1998 में भारत ने संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) को पछाड़कर दुनिया के सबसे बड़े दुग्ध उत्पादक देश का खिताब हासिल कर लिया。
भारतीय अर्थव्यवस्था और ग्रामीण समाज में डेयरी क्षेत्र की भूमिका
दुग्ध उत्पादन केवल स्वास्थ्य और पोषण का विषय नहीं है, बल्कि यह भारतीय अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा है。 भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) और कृषि अर्थव्यवस्था में इसका योगदान अतुलनीय है。
आर्थिक योगदान और सकल मूल्य वर्धित (GVA)
कृषि क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सभी घटकों में दुग्ध उत्पादन का हिस्सा सबसे बड़ा है。 भारत में दूध का आर्थिक मूल्य धान और गेहूं के संयुक्त मूल्य से भी अधिक है。 कृषि और संबद्ध क्षेत्रों के सकल मूल्य वर्धित (GVA) में पशुधन क्षेत्र का योगदान लगभग 30% है, जिसमें से अधिकांश हिस्सा अकेले दुग्ध उत्पादन का है。 यह क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था को मंदी के दौर में भी स्थिरता प्रदान करता है。
ग्रामीण रोजगार और आजीविका की सुरक्षा
भारत में लगभग 8 करोड़ से अधिक ग्रामीण परिवार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दुग्ध उत्पादन और डेयरी गतिविधियों से जुड़े हुए हैं。 भारत की अधिकांश कृषि जोत छोटी या सीमांत है, जहाँ किसानों के पास 2 हेक्टेयर से कम भूमि होती है。 ऐसी स्थिति में, केवल फसलों पर निर्भर रहना जोखिम भरा होता है क्योंकि फसलें मानसून और बाजार के उतार-चढ़ाव पर निर्भर करती हैं。 पशुपालन और दुग्ध उत्पादन किसानों को दैनिक या साप्ताहिक आय प्रदान करता है, जिससे उनकी तत्काल नकदी की जरूरतें पूरी होती हैं。 इसे ग्रामीण भारत का ‘एटीएम’ (ATM) भी कहा जाता है。
महिला सशक्तिकरण का सबसे बड़ा माध्यम
भारतीय डेयरी क्षेत्र की सबसे खूबसूरत और मजबूत विशेषता यह है कि इसमें महिलाओं की भागीदारी अत्यधिक है。 डेयरी उद्योग से जुड़े कार्यबल में लगभग 70 प्रतिशत से अधिक महिलाएं हैं。 ग्रामीण भारत में लाखों महिलाएं दुग्ध सहकारी समितियों की सक्रिय सदस्य और संचालक हैं。 सहकारी समितियां दूध का भुगतान सीधे महिलाओं के बैंक खातों में करती हैं, जिससे वे आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो रही हैं。 यह न केवल उनके सामाजिक स्तर को ऊंचा उठाता है बल्कि बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव डालता है。
वर्तमान सांख्यिकी और विकास दर (Current Statistics and Trends)
हालिया वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो भारतीय डेयरी क्षेत्र निरंतर नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है:
- वैश्विक हिस्सेदारी: भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश बना हुआ है, जो वैश्विक दुग्ध उत्पादन में 24-25% का योगदान देता है。
- कुल दुग्ध उत्पादन: भारत का वार्षिक दुग्ध उत्पादन 230 मिलियन टन से अधिक के स्तर को पार कर चुका है, जो लगातार बढ़ रहा है。
- प्रति व्यक्ति उपलब्धता: वर्ष 1950-51 में जहाँ भारत में प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता केवल 130 ग्राम प्रति दिन थी, वहीं आज यह बढ़कर 450 ग्राम प्रति दिन से अधिक हो चुकी है, जो विश्व के औसत (लगभग 320 ग्राम) से काफी अधिक है。
- विकास दर: भारतीय डेयरी क्षेत्र पिछले दशक में 5% से 6% की वार्षिक चक्रवृद्धि दर (CAGR) से बढ़ रहा है, जबकि वैश्विक डेयरी विकास दर केवल 1.5% से 2% के आसपास है。
भारतीय डेयरी क्षेत्र की चुनौतियाँ
भले ही भारत दुग्ध उत्पादन में वैश्विक नेता है, लेकिन इसके सामने कई गंभीर चुनौतियाँ भी खड़ी हैं, जिन पर ध्यान देना अत्यंत आवश्यक है:
- प्रति पशु कम उत्पादकता: भारत में दुनिया की सबसे बड़ी मवेशी आबादी है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मानकों की तुलना में यहाँ प्रति पशु दूध उत्पादन की दर काफी कम है。 हमारी sabhi स्वदेशी नस्लों के आनुवंशिक सुधार और बेहतर प्रबंधन की अत्यधिक आवश्यकता है。
- चारे और पोषण की कमी: पशुओं के लिए गुणवत्तापूर्ण हरे चारे और संतुलित पशु आहार की भारी कमी है。 चारे की बढ़ती कीमतों के कारण दुग्ध उत्पादन की लागत में लगातार वृद्धि हो रही है, जिससे किसानों का मुनाफा कम हो रहा है。
- पशु रोग और स्वास्थ्य प्रबंधन: खुरपका-मुंहपका रोग (FMD), थनैला रोग (Mastitis) और हाल के वर्षों में फैला लम्पी स्किन डिजीज (Lumpy Skin Disease) जैसी महामारियां पशुओं के स्वास्थ्य और दूध उत्पादन क्षमता को भारी नुकसान पहुँचाती हैं。 ग्रामीण क्षेत्रों में समय पर पशु चिकित्सा सुविधाओं का अभाव एक बड़ी चुनौती है。
- असंगठित क्षेत्र का दबदबा: आज भी भारत में उत्पादित होने वाले कुल दूध का एक बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र (स्थानीय दूधिये, बिचौलिये) के माध्यम से बेचा जाता है。 इसके कारण उपभोक्ताओं को कभी-कभी मिलावटी दूध मिलता है और किसानों को सही दाम नहीं मिल पाता。 संगठित सहकारी और निजी डेयरी ढांचे को और अधिक विस्तार देने की जरूरत है。
- कोल्ड चेन और प्रसंस्करण बुनियादी ढांचे की कमी: गर्मियों के महीनों में दूध जल्दी खराब हो जाता है。 ग्रामीण स्तर पर बल्क मिल्क कूलर्स (BMC) और आधुनिक रेफ्रिजेरेटेड ट्रांसपोर्टेशन (Cold Chain) की कमी के कारण काफी मात्रा में दूध नष्ट हो जाता है。
भारत सरकार की प्रमुख पहल और योजनाएं
इन चुनौतियों से निपटने और डेयरी क्षेत्र को आधुनिक बनाने के लिए भारत सरकार द्वारा कई महत्वपूर्ण योजनाएं चलाई जा रही हैं:
- राष्ट्रीय गोकुल मिशन (National Gokul Mission): इस मिशन का उद्देश्य स्वदेशी मवेशियों की नस्लों का संरक्षण और विकास करना है。 इसके तहत कृत्रिम गर्भाधान, आईवीएफ (IVF) तकनीक और सेक्स-सॉर्टेड सीमेन के उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि केवल उच्च दुग्ध उत्पादक बछड़ियों का जन्म सुनिश्चित किया जा सके。
- डेयरी प्रसंस्करण और बुनियादी ढांचा विकास कोष (DIDF): इस योजना के तहत सहकारी समितियों को आधुनिक दुग्ध प्रसंस्करण संयंत्र स्थापित करने, चिलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने और मूल्य वर्धित दुग्ध उत्पादों (जैसे पनीर, घी, आइसक्रीम) के निर्माण के लिए रियायती ऋण प्रदान किया जाता है。
- पशुपालन अवसंरचना विकास कोष (AHIDF): यह कोष निजी कंपनियों, एमएसएमई (MSME) और उद्यमी किसानों को पशु आहार संयंत्रों, मूल्य संवर्धन बुनियादी ढांचे और मांस/दूध प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना के लिए वित्तीय सहायता और ब्याज सबवेंशन प्रदान करता है。
- राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम (NADCP): इस महात्वाकांक्षी कार्यक्रम का लक्ष्य खुरपका-मुंहपका रोग (FMD) और ब्रुसेलोसिस (Brucellosis) जैसी बीमारियों का देश से पूर्ण उन्मूलन करना है。 इसके तहत करोड़ों मवेशियों का शत-प्रतिशत मुफ्त टीकाकरण किया जा रहा है。
- किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) का विस्तार: सरकार ने फसलों की तरह ही पशुपालकों और डेयरी किसानों को भी अपनी कार्यशील पूंजी की जरूरतों को पूरा करने के लिए कम ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराने हेतु किसान क्रेडिट कार्ड की सुविधा प्रदान की है。
भविष्य की राह: आधुनिकता और मूल्य संवर्धन (Value Addition)
भारतीय डेयरी उद्योग का भविष्य मूल्य संवर्धन (Value Addition), डिजिटलीकरण और गुणवत्ता नियंत्रण पर निर्भर करता है。 आज के उपभोक्ता स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हो चुके हैं, जिससे ऑर्गेनिक दूध, ए2 (A2) दूध, फोर्टिफाइड दूध और कम वसा वाले दुग्ध उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है。
इसके अतिरिक्त, डेयरी फार्मिंग में तकनीक जैसे इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), एआई (AI) आधारित पशु स्वास्थ्य ट्रैकर और स्वचालित मिल्किंग मशीनों के उपयोग को बढ़ावा देने की जरूरत है。 ब्लॉकचेन तकनीक के माध्यम से दूध के उत्पादन से लेकर उपभोक्ता की मेज तक पहुँचने की यात्रा (Traceability) को पारदर्शी बनाया जा सकता है, जिससे भारतीय दुग्ध उत्पादों की साख अंतरराष्ट्रीय बाजारों में और अधिक मजबूत होगी。
निष्कर्ष
26 नवंबर का ‘राष्ट्रीय दुग्ध दिवस’ केवल एक सरकारी कैलेंडर का दिवस नहीं है, बल्कि यह आत्मनिर्भर भारत के उस संकल्प की विजय का उत्सव है जिसे डॉ. वर्गीज कुरियन ने दशकों पहले देखा था。 श्वेत क्रांति ने यह साबित कर दिया कि जब देश के छोटे किसानों को सही तकनीक, ईमानदार नेतृत्व और सहकारी भावना का साथ मिलता है, तो वे वैश्विक स्तर पर किसी भी चुनौती को पार कर सकते हैं।
दूध पोषण का एक पूर्ण स्रोत है जो देश से कुपोषण को मिटाने में केंद्रीय भूमिका निभाता है。 इस राष्ट्रीय दुग्ध दिवस पर हमारा यह कर्तव्य है कि हम न केवल दूध के उपभोग और इसके स्वास्थ्य लाभों के प्रति सजग हों, बल्कि अपने ग्रामीण अन्नदाताओं और पशुपालकों के प्रति भी संवेदनशील बनें。 सरकार, सहकारी समितियों, निजी उद्यमों और वैज्ञानिकों के समन्वित प्रयासों से हम भारतीय डेयरी उद्योग को और अधिक टिकाऊ, समृद्ध और पर्यावरण के अनुकूल (Sustainable) बना सकते हैं, ताकि भारत दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में वैश्विक पटल पर सदैव अपना शीर्ष स्थान बनाए रखे。
राष्ट्रीय दुग्ध दिवस (National Milk Day) से जुड़े कुछ सबसे महत्वपूर्ण और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs):
1. राष्ट्रीय दुग्ध दिवस कब मनाया जाता है?
भारत में हर साल 26 नवंबर को ‘राष्ट्रीय दुग्ध दिवस’ (National Milk Day) मनाया जाता है।
2. यह दिवस 26 नवंबर को ही क्यों मनाया जाता है?
26 नवंबर को भारत की श्वेत क्रांति के जनक और ‘मिलकमैन ऑफ इंडिया’ डॉ. वर्गीज कुरियन की जयंती (जन्मदिन) होती है। उनके इसी ऐतिहासिक योगदान को सम्मान देने के लिए इस दिन को राष्ट्रीय दुग्ध दिवस घोषित किया गया।
3. राष्ट्रीय दुग्ध दिवस मनाने की शुरुआत कब हुई?
इस दिवस को मनाने की शुरुआत वर्ष 2014 में हुई थी। देश की प्रमुख डेयरी संस्थाओं (NDDB, IDA और GCMMF/Amul) ने मिलकर इसकी पहल की थी।
4. राष्ट्रीय दुग्ध दिवस और विश्व दुग्ध दिवस में क्या अंतर है?
- राष्ट्रीय दुग्ध दिवस: यह केवल भारत में 26 नवंबर को डॉ. वर्गीज कुरियन के सम्मान में मनाया जाता है।
- विश्व दुग्ध दिवस (World Milk Day): यह वैश्विक स्तर पर हर साल 1 जून को संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) द्वारा मनाया जाता है।
5. भारत में ‘श्वेत क्रांति’ या ‘ऑपरेशन फ्लड’ क्या है?
वर्ष 1970 में शुरू हुआ ‘ऑपरेशन फ्लड’ दुनिया का सबसे बड़ा डेयरी विकास कार्यक्रम था, जिसे ‘श्वेत क्रांति’ कहा जाता है। इसका उद्देश्य भारत को दुग्ध उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाना और ग्रामीण किसानों की आय बढ़ाना था।
6. दुग्ध उत्पादन में भारत का विश्व में कौन सा स्थान है?
भारत दुग्ध उत्पादन में विश्व में प्रथम (पहले) स्थान पर है। वैश्विक दुग्ध उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी 24% से अधिक है।
7. अमूल (AMUL) की स्थापना किसने की थी?
अमूल की नींव त्रिभुवनदास पटेल और डॉ. वर्गीज कुरियन के प्रयासों से गुजरात के आणंद (Anand) में एक सहकारी आंदोलन के रूप में रखी गई थी।
8. डॉ. वर्गीज कुरियन का सबसे क्रांतिकारी तकनीकी आविष्कार क्या था?
डॉ. वर्गीज कुरियन और उनके साथी एच.एम. दलाया ने पहली बार भैंस के दूध से स्किम्ड मिल्क पाउडर और कंडेंस्ड मिल्क बनाने की तकनीक खोजी थी, जिसे पहले पूरी दुनिया असंभव मानती थी।
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