जनजातीय गौरव दिवस 2026(Janjatiya Gaurav Divas): भगवान बिरसा मुंडा का जीवन, इतिहास और उलगुलान विद्रोह | Janjatiya Gaurav Divas

महान जनजातीय नायक भगवान बिरसा मुंडा का चित्र और पृष्ठभूमि में पारंपरिक तीर-कमान लिए आदिवासी योद्धाओं का दृश्य।

Table of Contents

जनजातीय गौरव दिवस: भगवान बिरसा मुंडा का जीवन, क्रांतिकारी उलगुलान और जनजातीय अस्मिता का ऐतिहासिक उत्सव

प्रस्तावना

भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल बड़े शहरों या चुनिंदा राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं था। मुख्यधारा के इतिहास से दूर, देश के घने जंगलों, पहाड़ों और दूरदराज के अंचलों में भी आज़ादी की एक ऐसी अलख जल रही थी, जिसने ब्रिटिश हुकूमत की जड़ों को हिलाकर रख दिया था। इस अलख को जगाने वाले थे भारत के वीर जनजातीय योद्धा। सदियों से अपनी जल, जंगल, जमीन और संस्कृति की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने वाले इन नायकों के योगदान को सम्मान देने के लिए भारत सरकार ने एक ऐतिहासिक निर्णय लिया। प्रतिवर्ष 15 नवंबर को पूरे देश में ‘जनजातीय गौरव दिवस’ (Tribal Pride Day) मनाया जाता है। यह विशेष दिन भारतीय इतिहास के महानायक, महान स्वतंत्रता सेनानी और आदिवासी समाज के आराध्य भगवान बिरसा मुंडा की जयंती के उपलक्ष्य में समर्पित है।

15 नवंबर को ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के रूप में घोषित करना केवल एक तिथि का चयन नहीं है, बल्कि यह भारत के समृद्ध सांस्कृतिक ताने-बाने में जनजातीय समुदायों के अद्वितीय योगदान को एक राष्ट्रीय स्वीकृति देना है। भगवान बिरसा मुंडा ने मात्र 25 वर्ष के अपने अल्प जीवनकाल में जो क्रांतियाँ कीं, जो सामाजिक सुधार किए और जिस तरह ब्रिटिश साम्राज्य की क्रूर नीतियों के खिलाफ लोहा लिया, उसने उन्हें लोक-चेतना में ‘भगवान’ और ‘धरती आबा’ (जगत पिता) का स्थान दिलाया। यह दिवस हमें देश की आज़ादी, संस्कृति की रक्षा और पर्यावरण संरक्षण में हमारे आदिवासी भाइयों और बहनों के संघर्ष, बलिदान और उनके गौरवशाली इतिहास की याद दिलाता है।


जनजातीय गौरव दिवस की पृष्ठभूमि और घोषणा

भारतीय स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव के हिस्से के रूप में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 10 नवंबर 2021 को एक ऐतिहासिक प्रस्ताव को मंजूरी दी। इस प्रस्ताव के तहत 15 नवंबर को ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के रूप में घोषित किया गया। इसके बाद 15 नवंबर 2021 को देश में पहला आधिकारिक ‘जनजातीय गौरव दिवस’ बेहद भव्य स्तर पर मनाया गया।

इस दिवस को मनाने के मुख्य उद्देश्य:

  1. ऐतिहासिक न्याय: भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अनगिनत जनजातीय नायकों (जैसे सिधु-कान्हू, टंट्या भील, अल्लूरी सीताराम राजू, रानी गाइदिनल्यू) के संघर्ष को इतिहास के पन्नों में वह स्थान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। यह दिवस उन सभी गुमनाम नायकों को याद करने का राष्ट्रीय मंच है।
  2. सांस्कृतिक संरक्षण: भारत के आदिवासी समुदायों की कला, भाषा, परंपराएं और पर्यावरण के साथ सह-अस्तित्व की जीवनशैली अनमोल है। इस दिवस के माध्यम से नई पीढ़ी को इस विरासत से परिचित कराया जाता है।
  3. संवैधानिक और सामाजिक चेतना: यह दिवस जनजातीय क्षेत्रों के विकास, उनके अधिकारों की रक्षा और मुख्यधारा के विकास में उनकी भागीदारी को मजबूत करने के संकल्प को दोहराने का अवसर है।

भगवान बिरसा मुंडा: एक अल्पायु जीवन, एक अमर गाथा

भगवान बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को तत्कालीन बंगाल प्रेसिडेंसी (अब झारखंड के खूंटी जिले) के उलीहातू नामक गांव में एक गरीब मुंडा आदिवासी परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम सुगना मुंडा और माता का नाम करमी हातू था। उस दौर में छोटानागपुर का पठारी क्षेत्र ब्रिटिश नीतियों और जमींदारों के शोषण से कराह रहा था।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

बिरसा मुंडा बचपन से ही अत्यंत कुशाग्र बुद्धि के थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा सलगा गांव में हुई। बाद में, उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने चाईबासा के जर्मन मिशन स्कूल में दाखिला लिया। मिशनरी स्कूल में पढ़ने के लिए उस समय के नियमों के अनुसार उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया और उनका नाम ‘बिरसा डेविड’ (या दाऊद) रख दिया गया। लेकिन चाईबासा में पढ़ाई के दौरान उन्होंने देखा कि अंग्रेज अधिकारी और मिशनरी भारतीय संस्कृति और विशेषकर आदिवासी परंपराओं का उपहास उड़ाते थे और उनका जबरन धर्म परिवर्तन कराते थे। इस सांस्कृतिक अपमान ने युवा बिरसा के मन में विद्रोह के बीज बो दिए। उन्होंने मिशनरी स्कूल छोड़ दिया, पुनः अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटे और अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष का संकल्प लिया।

एक सामाजिक और धार्मिक सुधारक के रूप में उदय

1890 के दशक की शुरुआत तक, बिरसा मुंडा ने न केवल राजनीतिक स्वतंत्रता बल्कि सामाजिक-धार्मिक सुधारों की आवश्यकता को भी महसूस किया। उन्होंने आदिवासी समाज में व्याप्त अंधविश्वासों, मद्यपान (हड़िया पीना) और पशु बलि जैसी कुप्रथाओं का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने एक नए विचार और पंथ की शुरुआत की, जिसे ‘बिरसाइत’ (Birsaith) कहा जाता है।

  • उन्होंने लोगों को केवल एक ईश्वर (सिंगबोंगा यानी सूर्य देवता) की पूजा करने का उपदेश दिया।
  • उन्होंने मुंडा समुदाय को स्वच्छता से रहने, जनेऊ धारण करने और शाकाहार अपनाने के लिए प्रेरित किया।
  • उनके उपदेशों और उनके भीतर मौजूद अद्भुत नेतृत्व क्षमता के कारण लोग उन्हें साक्षात भगवान का रूप मानने लगे। वे ‘धरती आबा’ के नाम से पुकारे जाने लगे, जिनके एक आह्वान पर हजारों लोग अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार हो जाते थे।

‘उलगुलान’: अंग्रेजों के खिलाफ महान क्रांतिकारी महाविद्रोह

ब्रिटिश हुकूमत ने छोटानागपुर क्षेत्र में ‘जमींदारी व्यवस्था’ और ‘सैल क्रय कानून’ लागू किए थे। इससे आदिवासियों की सदियों पुरानी पारंपरिक भूमि व्यवस्था, जिसे ‘खूंटकट्टी व्यवस्था’ (सामूहिक भूमि स्वामित्व) कहा जाता था, पूरी तरह नष्ट हो गई। अंग्रेजों ने जंगलों पर कानून बनाकर आदिवासियों के प्रवेश को वर्जित कर दिया, जो उनकी आजीविका का एकमात्र साधन थे। इसके अलावा, महाजनों और साहूकारों के कर्ज के जाल ने आदिवासियों को बंधुआ मजदूर बना दिया था।

इन अत्याचारों के खिलाफ भगवान बिरसा मुंडा ने वर्ष 1899-1900 में एक ऐतिहासिक और भीषण सशस्त्र विद्रोह का शंखनाद किया, जिसे मुंडारी भाषा में ‘उलगुलान’ (The Great Tumult या महाविद्रोह) कहा जाता है।

उलगुलान का नारा और रणनीति

बिरसा मुंडा ने अपनी सेना को संगठित किया और अंग्रेजों को अपनी माटी छोड़ने की खुली चुनौती दी। उनका एक प्रसिद्ध नारा आज भी झारखंड के जंगलों में गूंजता है:

“अबूआ दिशुम रे अबूआ राज” (हमारे देश में हमारा राज)
तथा “कटोंग बाबा कटोंग” (साहबों और शोषकों का अंत करो)।

उन्होंने तीरों, कमानों, भालों और पारंपरिक हथियारों से लैस आदिवासियों की एक गुरिल्ला सेना तैयार की। इस सेना ने ब्रिटिश थानों, सरकारी कार्यालयों, रेलवे लाइनों और अंग्रेजों के वफादार जमींदारों पर रणनीतिक हमले शुरू कर दिए। अंग्रेजों की आधुनिक बंदूकों और तोपों के सामने आदिवासियों का यह पारंपरिक साहस अभूतपूर्व था।

डोम्बारी बुरु का ऐतिहासिक संघर्ष

उलगुलान का सबसे निर्णायक और दुखद मोड़ 9 जनवरी 1900 को डोम्बारी बुरु (डोम्बारी पहाड़ी) पर आया। भगवान बिरसा यहाँ हजारों आदिवासियों की एक जनसभा को संबोधित कर रहे थे। ब्रिटिश सेना ने पूरी पहाड़ी को घेर लिया और निहत्थे व पारंपरिक हथियारों से लैस आदिवासियों पर अंधाधुंध गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। इस नरसंहार में सैकड़ों आदिवासी शहीद हो गए। इसे ‘झारखंड का जलियांवाला बाग’ भी कहा जाता है। बिरसा मुंडा किसी तरह वहाँ से सुरक्षित निकलने में सफल रहे, लेकिन अंग्रेजों ने उन पर ₹500 का इनाम घोषित कर दिया (जो उस समय एक बहुत बड़ी राशि थी)।

गिरफ्तारी और शहादत

कुछ गद्दारों की मुखबिरी के कारण 3 मार्च 1900 को चक्रधरपुर के जमकोपाई जंगल से सोते समय भगवान बिरसा मुंडा को गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें रांची की जेल में डाल दिया गया, जहाँ उन पर गुप्त रूप से मुकदमे चलाए गए और अमानवीय यातनाएं दी गईं। जेल में उनका स्वास्थ्य तेजी से बिगड़ा और मात्र 24 वर्ष की आयु में 9 जून 1900 को रांची जेल में संदेहास्पद परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई। अंग्रेजों ने मौत का कारण ‘हैजा’ बताया, लेकिन इतिहासकार इसे राजनीतिक हत्या मानते हैं। भले ही उनका भौतिक शरीर शांत हो गया, लेकिन उलगुलान की चिंगारी अंग्रेजों के सीने में हमेशा के लिए डर बनकर बैठ गई।

उलगुलान का तात्कालिक प्रभाव: छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act)

बिरसा मुंडा का आंदोलन व्यर्थ नहीं गया। उनके सर्वोच्च बलिदान के आगे झुकते हुए ब्रिटिश सरकार को आदिवासियों के भूमि अधिकारों की रक्षा के लिए वर्ष 1908 में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (Chota Nagpur Tenancy Act – CNT Act) पारित करना पड़ा। इस कानून ने गैर-आदिवासियों को आदिवासियों की जमीन खरीदने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया, जो आज भी झारखंड में आदिवासियों का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है।


स्वतंत्रता संग्राम के अन्य महान जनजातीय नायक

‘जनजातीय गौरव दिवस’ केवल भगवान बिरसा मुंडा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत के उन सभी जनजातीय वीरों को नमन करने का दिन है जिन्होंने मातृभूमि के लिए अपना रक्त बहाया:

  • तिल्का मांझी (Baba Tilka Majhi): इन्होंने 1784 में ही ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंक दिया था। वे अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाने वाले पहले स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे, जिन्हें भागलपुर में एक बरगद के पेड़ पर फांसी दे दी गई थी।
  • सिधु, कान्हू, चांद और भैरव (Santhal Rebellion): 1855 में, 1857 की क्रांति से भी पहले, इन भाइयों के नेतृत्व में ‘संथाल हुल’ (विद्रोह) हुआ था, जिसमें 30,000 से अधिक संथालों ने अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना का डटकर मुकाबला किया था।
  • शहीद वीर नारायण सिंह (Chhattisgarh): छत्तीसगढ़ के सोनाखान के जमींदार, जिन्होंने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के गोदामों को लूटकर भूखी जनता में अनाज बांट दिया था और बाद में हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया।
  • अल्लूरी सीताराम राजू (Rampa Rebellion): आंध्र प्रदेश के मन्यम क्षेत्र में आदिवासियों को संगठित कर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ ‘रम्पा विद्रोह’ (1922-24) का नेतृत्व करने वाले महान नायक, जिन्हें ‘मन्यम वीरुडु’ (जंगल का नायक) कहा जाता है।
  • टंट्या भील (Tantya Bhil): मध्य प्रदेश के महान भील योद्धा, जिन्हें ‘इंडियन रॉबिनहुड’ भी कहा जाता है। उन्होंने अंग्रेजों से धन लूटकर गरीब आदिवासियों और असहायों की मदद की थी।
  • रानी गाइदिनल्यू (Rani Gaidinliu): नागालैंड की वीर स्वतंत्रता सेनानी, जिन्होंने मात्र 13 वर्ष की आयु में अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह किया। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें ‘पहाड़ियों की बेटी’ और ‘रानी’ की उपाधि दी थी।

भारतीय अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और सामाजिक ताने-बाने में जनजातीय समुदायों की भूमिका

भारत में जनजातीय आबादी कुल जनसंख्या का लगभग 8.6% (2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 10.4 करोड़) है। देश के विकास और पहचान में इनका योगदान बहुआयामी है:

1. पर्यावरण संरक्षण के सच्चे संरक्षक (Eco-Guardians)

आज जब पूरी दुनिया ‘जलवायु परिवर्तन’ (Climate Change) और ग्लोबल वार्मिंग से जूझ रही है, जनजातीय जीवनशैली दुनिया को जीने का सही रास्ता दिखाती है। आदिवासी समाज प्रकृति को अपनी माता मानता है। वे जंगलों को काटते नहीं, बल्कि उनका पोषण करते हैं। ‘पवित्र उपवन’ (Sacred Groves) की उनकी परंपरा जैविक विविधता को बनाए रखने का सबसे बड़ा उदाहरण है। वे सतत विकास (Sustainable Development) के जीते-जागते मॉडल हैं।

2. समृद्ध सांस्कृतिक और कलात्मक विरासत

भारत की विविधता को मुकम्मल बनाने में जनजातीय कलाओं का बहुत बड़ा योगदान है। चाहे वह महाराष्ट्र की वारली पेंटिंग (Warli Painting) हो, मध्य प्रदेश की गोंड कला (Gond Art) हो, बस्तर का डोकरा क्राफ्ट (Dhokra Craft) हो, या नागालैंड के अद्भुत हस्तशिल्प और वस्त्र हों—ये सभी भारत की वैश्विक पहचान हैं। इनका संगीत, नृत्य (जैसे करमा, छऊ, बिहू) और अद्वितीय त्योहार भारत की आत्मा को जीवंत रखते हैं।

3. आर्थिक क्षमता और लघु वन उपज (MFP)

भारत की ग्रामीण और वन-आधारित अर्थव्यवस्था में जनजातीय समुदायों की बड़ी भूमिका है। महुआ, शहद, चिरौंजी, लाख, जड़ी-बूटियां और बांस जैसी लघु वन उपजों (Minor Forest Produce) का संग्रहण और प्रसंस्करण ग्रामीण बाजारों को गति प्रदान करता है। ट्राइब्स इंडिया (Tribes India) और ट्राइफेड (TRIFED) जैसी संस्थाओं के माध्यम से आज इनके उत्पाद वैश्विक बाजारों तक पहुँच रहे हैं, जिससे करोड़ों रुपयों का व्यापार हो रहा है।


जनजातीय विकास के लिए सरकार की वर्तमान पहलें और योजनाएं

जनजातीय गौरव दिवस के अवसर पर सरकार न केवल अतीत को याद करती है, बल्कि जनजातीय क्षेत्रों के सशक्तिकरण के लिए दूरगामी योजनाओं का खाका भी प्रस्तुत करती है। हाल के वर्षों में कई अभूतपूर्व कदम उठाए गए हैं:

  • पीएम-जनमन योजना (PM-JANMAN): ‘प्रधानमंत्री जनजातीय आदिवासी न्याय महाअभियान’ के तहत देश के अत्यंत पिछड़े जनजातीय समूहों (PVTGs) तक पक्के मकान, स्वच्छ पेयजल, बिजली, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं पहुँचाने के लिए ₹24,000 करोड़ से अधिक का प्रावधान किया गया है।
  • धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान (DAJGUA): भगवान बिरसा मुंडा के सम्मान में शुरू की गई इस व्यापक योजना का उद्देश्य देश के लगभग 63,000 जनजातीय बहुल गांवों का समग्र विकास करना है, जिससे 5 करोड़ से अधिक आदिवासी भाई-बहनों का जीवन स्तर सुधरेगा।
  • एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय (EMRS): जनजातीय बच्चों को गुणवत्तापूर्ण और आधुनिक शिक्षा प्रदान करने के लिए देश भर के जनजातीय ब्लॉकों में सैकड़ों एकलव्य स्कूल खोले गए हैं, जो नवोदय विद्यालयों की तर्ज पर काम करते हैं।
  • जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालय (Tribal Freedom Fighters Museums): देश के विभिन्न राज्यों (जैसे झारखंड के रांची में भगवान बिरसा मुंडा संग्रहालय, गुजरात, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि) में 10 अत्याधुनिक संग्रहालय बनाए जा रहे हैं, जो जनजातीय इतिहास और उनके संघर्षों को डिजिटल व भव्य रूप में प्रदर्शित करते हैं।
  • सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन 2047: जनजातीय समुदायों में आनुवंशिक रूप से पाई जाने वाली ‘सिकल सेल एनीमिया’ बीमारी को पूरी तरह खत्म करने के लिए एक राष्ट्रीय मिशन शुरू किया गया है, जिसके तहत व्यापक स्क्रीनिंग और मुफ्त इलाज की व्यवस्था की जा रही है।
  • वन धन विकास केंद्र (VDVK): आदिवासियों द्वारा एकत्रित की जाने वाली वन उपज को सही मूल्य दिलाने और उनकी उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए देश भर में हजारों वन धन केंद्र स्थापित किए गए हैं, जो ‘वोकल फॉर लोकल’ का बेहतरीन उदाहरण हैं।

भविष्य की चुनौतियाँ और राह

इतने प्रयासों के बावजूद, जनजातीय समाज के पूर्ण उत्थान के मार्ग में कई चुनौतियाँ आज भी विद्यमान हैं:

  1. सघन क्षेत्रों में स्वास्थ्य और कुपोषण: सुदूर वन क्षेत्रों में आज भी आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच कठिन है, जिसके कारण शिशु मृत्यु दर और कुपोषण जैसी समस्याएं बनी हुई हैं।
  2. शिक्षा और डिजिटल डिवाइड: ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के बच्चों को मुख्यधारा की डिजिटल शिक्षा से जोड़ने के लिए बुनियादी ढांचे (इंटरनेट और कंप्यूटर) को और मजबूत करने की आवश्यकता है।
  3. विस्थापन और पुनर्वास: औद्योगिक परियोजनाओं और खनन के कारण जनजातीय समुदायों का अपनी पैतृक भूमि से विस्थापन एक संवेदनशील मुद्दा है। विकास की प्रक्रिया में यह सुनिश्चित किया जाना अनिवार्य है कि उनके अधिकारों का हनन न हो और उन्हें उचित पुनर्वास व रोजगार मिले।

समाधान: इसका एकमात्र मार्ग ‘समावेशी विकास’ (Inclusive Development) है, जहाँ विकास की योजनाएं दिल्ली या राज्यों की राजधानियों में बैठकर नहीं, बल्कि जनजातीय समाज की पारंपरिक ग्राम सभाओं (जैसे पेसा कानून – PESA Act) को विश्वास में लेकर बनाई जाएं। उनका विकास उनकी संस्कृति की कीमत पर नहीं, बल्कि उनकी संस्कृति के संरक्षण के साथ होना चाहिए।


निष्कर्ष

‘जनजातीय गौरव दिवस’ केवल 15 नवंबर की एक तारीख नहीं, बल्कि यह देश के मूल निवासियों के स्वाभिमान, अदम्य साहस और देशभक्ति को समर्पित एक जीवंत राष्ट्रीय उत्सव है। भगवान बिरसा मुंडा का जीवन हमें सिखाता है कि विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी संस्कृति, जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए कैसे सीना तानकर खड़ा रहा जाता है। उन्होंने बंदूकधारियों के सामने तीरों से लड़ाई लड़ी, लेकिन अपने सिद्धांतों और अस्मिता से कभी समझौता नहीं किया।

आज जब भारत वैश्विक पटल पर एक महाशक्ति बनने की राह पर अग्रसर है, तब जनजातीय समुदायों का सशक्तिकरण अत्यंत अनिवार्य है। जनजातीय गौरव दिवस के इस पावन अवसर पर हमारा यह संकल्प होना चाहिए कि हम आदिवासी समाज को केवल इतिहास के पन्नों या संग्रहालयों तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें देश के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक विकास का समान भागीदार बनाएं। भगवान बिरसा मुंडा के ‘अबूआ राज’ (स्वराज) के सपने को सच्चे अर्थों में साकार करना ही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।


जनजातीय गौरव दिवस (भगवान बिरसा मुंडा जयंती) से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1. जनजातीय गौरव दिवस कब मनाया जाता है?
Ans. भारत में प्रतिवर्ष 15 नवंबर को राष्ट्रीय स्तर पर ‘जनजातीय गौरव दिवस’ (Tribal Pride Day) मनाया जाता है।

Q2. यह दिवस 15 नवंबर को ही क्यों मनाया जाता है?
Ans. 15 नवंबर को भारतीय इतिहास के महानायक, महान स्वतंत्रता सेनानी और आदिवासी समाज के आराध्य भगवान बिरसा मुंडा की जयंती (जन्मदिन) होती है। उनके इसी ऐतिहासिक योगदान को सम्मान देने के लिए इस दिन को चुना गया है।

Q3. जनजातीय गौरव दिवस मनाने की शुरुआत कब हुई थी?
Ans. इस दिवस को मनाने की घोषणा केंद्र सरकार द्वारा नवंबर 2021 में की गई थी। इसके बाद देश का पहला आधिकारिक जनजातीय गौरव दिवस 15 नवंबर 2021 को भव्य रूप से मनाया गया था।

Q4. भगवान बिरसा मुंडा का जन्म कहाँ हुआ था?
Ans. उनका जन्म 15 नवंबर 1875 को उलीहातू गाँव में हुआ था। वर्तमान में यह गाँव भारत के झारखंड राज्य के खूँटी जिले (तत्कालीन बंगाल प्रेसिडेंसी) में स्थित है।

Q5. भगवान बिरसा मुंडा को ‘धरती आबा’ क्यों कहा जाता है?
Ans. ‘धरती आबा’ का अर्थ होता है ‘जगत पिता’ या ‘धरती पिता’। आदिवासी समाज में व्याप्त अंधविश्वासों को दूर करने, एक नए मानवतावादी विचार (बिरसाइट पंथ) की शुरुआत करने और जल, जंगल, जमीन के अधिकारों के लिए प्राणों की आहुति देने के कारण लोग उन्हें आदर से ‘धरती आबा’ और ‘भगवान’ कहते हैं।

Q6. ‘उलगुलान’ क्या है और इसका क्या महत्व है?
Ans. ‘उलगुलान’ का अर्थ है ‘महान विद्रोह’ या ‘महाआंदोलन’। यह वर्ष 1899-1900 में ब्रिटिश शासन की दमनकारी नीतियों, जमींदारों द्वारा भूमि हड़पने और बंधुआ मजदूरी के खिलाफ भगवान बिरसा मुंडा के नेतृत्व में चलाया गया एक ऐतिहासिक सशस्त्र जनजातीय आंदोलन था।

Q7. ‘डोम्बारी बुरु’ नरसंहार क्या है और इसे क्या उपमा दी गई है?
Ans. 9 जनवरी 1900 को डोम्बारी पहाड़ी (बुरु) पर बिरसा मुंडा की एक शांतिपूर्ण जनसभा के दौरान ब्रिटिश सेना ने चारों तरफ से घेरकर अंधाधुंध गोलियां चलाई थीं, जिसमें सैकड़ों आदिवासी शहीद हुए थे। इस ऐतिहासिक और दुखद घटना को ‘झारखंड का जलियांवाला बाग’ कहा जाता है।

Q8. छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act) क्या है?
Ans. यह अधिनियम वर्ष 1908 में ब्रिटिश सरकार द्वारा बिरसा मुंडा के उलगुलान आंदोलन के भारी दबाव में पारित किया गया था। इस ऐतिहासिक कानून के तहत गैर-आदिवासी लोगों द्वारा आदिवासियों की जमीन खरीदने या उसे अवैध रूप से हड़पने पर पूरी तरह कानूनी रोक लगा दी गई, जो आज भी झारखंड के आदिवासियों का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है।

Q9. भगवान बिरसा मुंडा की शहादत कब और कहाँ हुई थी?
Ans. अंग्रेजों द्वारा चक्रधरपुर के जंगलों से धोखे से गिरफ्तार किए जाने के बाद, मात्र 24 वर्ष की आयु में 9 जून 1900 को रांची की केंद्रीय जेल में संदेहास्पद परिस्थितियों में उनकी मृत्यु (शहादत) हो गई थी।

Q10. भगवान बिरसा मुंडा के अलावा स्वतंत्रता संग्राम के अन्य प्रमुख जनजातीय नायक कौन हैं?
Ans. भारत के स्वतंत्रता संग्राम में बाबा तिल्का मांझी, सिधु-कान्हू (संथाल हुल), शहीद वीर नारायण सिंह, टंट्या भील (इंडियन रॉबिनहुड), अल्लूरी सीताराम राजू (रम्पा विद्रोह) और नागालैंड की रानी गाइदिनल्यू जैसे महान जनजातीय नायकों का अविस्मरणीय योगदान रहा है।

Q11. पीएम-जनमन (PM-JANMAN) योजना क्या है?भारत में प्रतिवर्ष 15 नवंबर को ‘जनजातीय गौरव दिवस’ (Tribal Pride Day) मनाया जाता है। यह विशेष दिन आदिवासी समाज के आराध्य और महान स्वतंत्रता सेनानी भगवान बिरसा मुंडा की जयंती को समर्पित है। यह लेख उनके गौरवशाली जीवन, सामाजिक सुधारों, अंग्रेजों के खिलाफ ऐतिहासिक ‘उलगुलान’ महाविद्रोह और जनजातीय समाज के अधिकारों की रक्षा पर विस्तार से प्रकाश डालता है।
Ans. इसका पूरा नाम ‘प्रधानमंत्री जनजातीय आदिवासी न्याय महाअभियान’ है। इसका मुख्य उद्देश्य देश के सबसे कमजोर और सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े जनजातीय समूहों (PVTGs – Particularly Vulnerable Tribal Groups) तक पक्के मकान, साफ पानी, बिजली, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं और अधिकार पहुंचाना है।

Q12. जनजातीय बच्चों की शिक्षा के लिए सरकार कौन से विशेष स्कूल चला रही है?
Ans. जनजातीय बहुल क्षेत्रों के प्रतिभाशाली बच्चों को गुणवत्तापूर्ण, आधुनिक और निःशुल्क आवासीय शिक्षा प्रदान करने के लिए नवोदय विद्यालयों की तर्ज पर एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय (EMRS) स्थापित और संचालित किए जा रहे हैं।


#जनजातीयगौरवदिवस, #बिरसामुंडाजयंती, #भगवानबिरसामुंडा, #धरतीआबा, #उलगुलान, #आदिवासीगौरव, #झारखंडइतिहास, #JanjatiyaGauravDivas, #BirsaMundaJayanti, #TribalPrideDay, #DhartiAba

Leave a ReplyCancel reply