सरस्वती शिशु मंदिर (नाल्हीपुर सोनवरसा) की पुनर्स्थापना: पुराने छात्रों और आचार्यों ने मिलकर उठाया ऐतिहासिक कदम
छावनी (बस्ती)। शिक्षा केवल साक्षर होने का साधन नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझने का एक माध्यम है। इसी विचार को धरातल पर उतारने के लिए बस्ती जिले के छावनी क्षेत्र अंतर्गत नाल्हीपुर सोनवरसा स्थित पुरातन सरस्वती शिशु मंदिर परिसर में एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहल की शुरुआत हुई है। लंबे समय से बंद पड़े इस प्रतिष्ठित विद्यालय को दोबारा शुरू करने (पुनर्स्थापना) के लिए पूर्व छात्रों, आचार्यों और स्थानीय प्रबुद्ध जनों ने मिलकर एक नई मुहिम छेड़ी है।
Table of Contents
पुरानी यादों का संगम और सौहार्द वार्ता
हाल ही में नाल्हीपुर सोनवरसा स्थित विद्यालय परिसर में एक विशेष ‘सौहार्द वैचारिक वार्ता संगोष्ठी’ का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का नेतृत्व पूर्व आचार्य कमलेंद्र नारायण चौबे ने किया। वर्षों बाद जब विद्यालय के पुराने छात्र और शिक्षक इस ऐतिहासिक प्रांगण में वापस लौटे, तो माहौल बेहद भावुक और ऊर्जा से भर गया। पूर्व छात्र राहुल त्रिपाठी समेत बड़ी संख्या में आए पुरातन छात्रों ने एक-दूसरे से मिलकर बचपन की यादें ताजा कीं और विद्यालय के सुनहरे दिनों को याद किया।
बंद पड़े विद्यालय को पुनर्जीवित करने का संकल्प
इस संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य केवल पुरानी यादों को साझा करना नहीं था, बल्कि एक बड़ा सामाजिक संकल्प लेना था। नाल्हीपुर सोनवरसा का यह सरस्वती शिशु मंदिर (जो विद्या भारती से सम्बद्ध, जनशिक्षा समिति गोरक्षप्रान्त द्वारा निर्देशित और केशव शिक्षा समिति बस्ती द्वारा संचालित है) पिछले काफी समय से बंद पड़ा है। स्थानीय स्तर पर शिक्षा और संस्कारों के इस केंद्र को फिर से जीवंत करने के लिए सभी पूर्व छात्रों और जिम्मेदारों ने एक सुर में आवाज उठाई।
कार्यक्रम के दौरान पूर्व छात्र और शिक्षक विकास सिंह के माध्यम से विद्या भारती बस्ती के जनपदीय मंत्री हरेंद्र सिंह से पूर्व आचार्य कमलेंद्र नारायण चौबे की फोन पर विशेष वार्ता भी हुई, जिससे इस मुहिम को संगठनात्मक बल मिला है।
“शिक्षा केवल अंक पाने का माध्यम नहीं”: आचार्य चौबे
संगोष्ठी को संबोधित करते हुए पूर्व आचार्य कमलेंद्र नारायण चौबे ने शिक्षा के मूल सिद्धांतों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करना नहीं है। यह व्यक्ति के चरित्र निर्माण, अच्छे संस्कारों के बीजारोपण और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने का ठोस आधार है।” उन्होंने गुरु-शिष्य परंपरा के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि एक शिक्षक और छात्र का संबंध केवल स्कूल की दीवारों या पढ़ाई के वर्षों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह जीवनभर का मार्गदर्शन और प्रेरणास्रोत बना रहता है।
बदलाव की ओर बढ़ते कदम
इस पहल ने क्षेत्र के लोगों में एक नई उम्मीद जगाई है। अपनी पुरानी पाठशाला की जर्जर हो चुकी इमारत के सामने खड़े होकर पूर्व छात्रों और आचार्यों का यह संकल्प दिखाता है कि आज भी समाज में अपनी जड़ों और संस्कारों के प्रति गहरा सम्मान है। यदि यह पहल सफल होती है, तो नाल्हीपुर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों को एक बार फिर मूल्य-आधारित और संस्कारवान शिक्षा मिल सकेगी। पूर्व छात्रों की यह एकजुटता समाज के लिए एक बेहतरीन मिसाल है।
#सरस्वती_शिशु_मंदिर, #विद्या_भारती, #नाल्हीपुर_सोनवरसा, #छावनी_बस्ती, #बस्ती_न्यूज़, #शिक्षा_की_पहल, #पुरातन_छात्र_संगठन, #संस्कार_और_शिक्षा, #चरित्र_निर्माण, #स्कूल_पुनर्स्थापना, #BastiNews, #SaraswatiShishuMandir, #VidyaBharati, #NalhipurSonvarsa, #ChhawaniBasti, #SchoolReopening, #AlumniMeet, #EducationInitiative

