राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस (National Space Day) भारतीय विज्ञान, तकनीकी कौशल और अटूट संकल्प का एक ऐतिहासिक उत्सव है। हर साल 23 अगस्त को मनाया जाने वाला यह विशेष दिन भारत की अंतरिक्ष यात्रा में एक स्वर्णिम मील का पत्थर है। यह वही ऐतिहासिक तारीख है जब भारत के चंद्रयान-3 (Chandrayaan-3) मिशन ने चंद्रमा के रहस्यमयी और दुर्गम दक्षिणी ध्रुव (South Pole) पर सफलतापूर्वक ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ की थी। इस अभूतपूर्व सफलता के साथ ही भारत चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचने वाला दुनिया का पहला और चंद्रमा की सतह पर कदम रखने वाला चौथा देश बन गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस ऐतिहासिक उपलब्धि को अमर बनाने और देश के वैज्ञानिकों के सम्मान में हर साल 23 अगस्त को ‘राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस’ के रूप में मनाने की घोषणा की।
यह दिन केवल एक सफल लैंडिंग का उत्सव नहीं है, बल्कि यह भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO – Indian Space Research Organisation) के उस छह दशक लंबे संघर्ष, समर्पण और दूरदर्शिता का प्रतीक है, जिसने एक साइकिल और बैलगाड़ी पर रॉकेट के पुर्जे ढोने से लेकर अंतरिक्ष में ‘सिल्क रूट’ बनाने तक का सफर तय किया है। आइए, राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस के इस पावन अवसर पर इसरो (ISRO) की इस विस्मयकारी, प्रेरणादायक और गौरवशाली यात्रा का एक अत्यंत विस्तृत और गहन विवरण जानते हैं।
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🌌 इसरो की गौरवशाली यात्रा: एक नज़र में (Overview Table)
इसरो के छह दशकों के सफर के मुख्य मील के पत्थरों को संक्षेप में समझने के लिए नीचे दी गई तालिका देखें:
| कालखंड / मिशन | ऐतिहासिक महत्व और मुख्य उपलब्धियां |
|---|---|
| 15 अगस्त 1969 | डॉ. विक्रम साराभाई के प्रयासों से आधिकारिक तौर पर इसरो (ISRO) की स्थापना। |
| 19 अप्रैल 1975 | भारत का पहला स्वदेशी उपग्रह ‘आर्यभट्ट’ (Aryabhata) सोवियत संघ की मदद से लॉन्च। |
| 18 जुलाई 1980 | SLV-3 रॉकेट द्वारा रोहिणी (Rohini) उपग्रह का सफल प्रक्षेपण। भारत खुद उपग्रह लॉन्च करने वाला देश बना। |
| 1990 का दशक | PSLV (इसरो का वर्कहॉर्स) और GSLV रॉकेट प्रौद्योगिकियों का विकास और प्रभुत्व। |
| 22 अक्टूबर 2008 | चंद्रयान-1 (Chandrayaan-1) का सफल प्रक्षेपण। चंद्रमा पर पानी के अणुओं (Water Molecules) की खोज। |
| 5 नवंबर 2013 | मंगलयान (Mangalyaan – MOM) का प्रक्षेपण। पहले ही प्रयास में मंगल की कक्षा में पहुंचने वाला पहला देश। |
| 15 फरवरी 2017 | एक ही रॉकेट (PSLV-C37) से रिकॉर्ड 104 उपग्रह एक साथ अंतरिक्ष में भेजकर विश्व रिकॉर्ड बनाया। |
| 23 अगस्त 2023 | चंद्रयान-3 की चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सफल लैंडिंग। ‘राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस’ की नींव पड़ी। |
| 2 सितंबर 2023 | भारत का पहला सौर मिशन आदित्य-एल1 (Aditya-L1) का सफल प्रक्षेपण। |
| आगामी मिशन | गगनयान (Gaganaryan – मानव अंतरिक्ष मिशन), शुक्रीयान (शुक्र मिशन) और लूपेक्स (LUPEX)। |
1. इसरो की नींव: एक विज़नरी सोच और साइकिल का सफर (1962 – 1970)
इसरो की कहानी किसी परिकथा से कम नहीं है। इसकी शुरुआत तब हुई जब भारत एक नव-स्वतंत्र राष्ट्र था, जो गरीबी, अकाल और बुनियादी ढांचे की कमी से जूझ रहा था। ऐसे समय में अंतरिक्ष अनुसंधान के बारे में सोचना भी कई लोगों को एक विलासिता (Luxury) लगता था। लेकिन भारत के महान सपूत और दूरदर्शी वैज्ञानिक डॉ. विक्रम साराभाई का मानना था कि यदि भारत को दुनिया के अग्रणी देशों में खड़ा होना है, तो उसे उन्नत तकनीक का सहारा लेना ही होगा।
इनकोस्पर (INCOSPAR) से इसरो (ISRO) तक
- 1962: परमाणु ऊर्जा विभाग के अंतर्गत डॉ. विक्रम साराभाई और डॉ. होमी जहांगीर भाभा के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति (INCOSPAR) का गठन किया गया।
- 21 नवंबर 1963: केरल के तिरुवनंतपुरम के पास एक छोटे से मछुआरों के गांव ‘थुम्बा’ में थुम्बा भू-मध्यरेखीय रॉकेट लॉन्चिंग स्टेशन (TERLS) की स्थापना की गई। यहीं से भारत का पहला ‘साउंडिंग रॉकेट’ (नाइके-अपाचे, जो अमेरिका से लाया गया था) छोड़ा गया।
- साइकिल और बैलगाड़ी का दौर: उस दौर में भारत के पास कोई अत्याधुनिक लैब नहीं थी। रॉकेट के पुर्जों को थुम्बा के एक पुराने चर्च (सेंट मैरी मैग्डलीन चर्च) में असेंबल किया जाता था, और वैज्ञानिकों द्वारा रॉकेट के हिस्सों को साइकिल के कैरियर और बैलगाड़ी पर लादकर लॉन्च पैड तक ले जाया जाता था।
- 15 अगस्त 1969: स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर INCOSPAR को पुनर्गठित कर आधिकारिक रूप से भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की स्थापना की गई, ताकि देश की अंतरिक्ष गतिविधियों को एक नई दिशा दी जा सके।
2. अंतरिक्ष युग में भारत का प्रवेश: आर्यभट्ट से एसएलवी-3 तक (1970 – 1980)
1970 का दशक इसरो के लिए आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम बढ़ाने का काल था। इस दौरान संगठन ने न केवल अपने उपग्रह विकसित करने पर ध्यान केंद्रित किया, बल्कि खुद के लॉन्च व्हीकल (रॉकेट) के निर्माण की दिशा में भी काम शुरू किया।
‘आर्यभट्ट’ – भारत का पहला उपग्रह (1975)
19 अप्रैल 1975 को भारत ने अपना पहला कृत्रिम उपग्रह ‘आर्यभट्ट’ अंतरिक्ष में भेजा। इसका नाम महान प्राचीन भारतीय खगोलशास्त्री और गणितज्ञ आर्यभट्ट के नाम पर रखा गया था। हालांकि इसे सोवियत संघ (USSR) के लॉन्च व्हीकल की मदद से अंतरिक्ष में भेजा गया था, लेकिन इस उपग्रह को पूरी तरह से भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा भारत में ही डिजाइन और निर्मित किया गया था। इस मिशन ने भारत को उपग्रह निर्माण की तकनीक में पूरी तरह पारंगत कर दिया।
डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और एसएलवी-3 की सफलता (1980)
भारत केवल दूसरों के रॉकेट पर निर्भर नहीं रहना चाहता था। इसलिए, देश के महान वैज्ञानिक और भावी राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को भारत के पहले स्वदेशी सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (SLV-3) परियोजना का महानिदेशक बनाया गया।
- 1979 की विफलता: अगस्त 1979 में SLV-3 का पहला परीक्षण विफल हो गया और रॉकेट बंगाल की खाड़ी में जा गिरा। डॉ. कलाम और उनकी टीम निराश नहीं हुई।
- 18 जुलाई 1980 का ऐतिहासिक दिन: कलाम साहब के नेतृत्व में इसरो ने SLV-3 का दूसरा सफल परीक्षण किया। इस रॉकेट ने रोहिणी (RS-1) उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित किया। इस सफलता के साथ ही भारत अंतरिक्ष क्लब (Space Club) का छठा ऐसा सदस्य बन गया, जिसके पास अपनी खुद की उपग्रह प्रक्षेपण क्षमता थी।
3. पीएसएलवी और जीएसएलवी का उदय: इसरो के शक्तिशाली पंख (1990 का दशक)
जैसे-जैसे भारत की आवश्यकताएं बढ़ीं, उसे भारी उपग्रहों को पृथ्वी की ऊंची कक्षाओं (जैसे भू-स्थैतिक कक्षा या जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट) में भेजने के लिए अधिक शक्तिशाली रॉकेटों की आवश्यकता महसूस हुई। इसी आवश्यकता ने इसरो के दो सबसे प्रसिद्ध रॉकेटों को जन्म दिया।
पीएसएलवी (PSLV) – इसरो का सबसे भरोसेमंद साथी
पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (PSLV) का विकास 1990 के दशक में हुआ। अपनी पहली विफलता के बाद, इस रॉकेट ने इतिहास का सबसे शानदार ट्रैक रिकॉर्ड बनाया। इसे आज दुनिया भर में ‘इसरो का वर्कहॉर्स’ (Workhorse of ISRO) कहा जाता है। पीएसएलवी ने न केवल भारत के रिमोट सेंसिंग उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित किया, बल्कि इसी रॉकेट की बदौलत भारत ने चंद्रयान-1 और मंगलयान जैसे ऐतिहासिक अंतरग्रहीय मिशनों को भी अंजाम दिया।
जीएसएलवी (GSLV) और क्रायोजेनिक इंजन का संघर्ष
संचार उपग्रहों को 36,000 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थापित करने के लिए भारत को जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (GSLV) की आवश्यकता थी, जिसके लिए ‘क्रायोजेनिक इंजन’ (एक बेहद जटिल तकनीक जो अत्यधिक ठंडे लिक्विड हाइड्रोजन और ऑक्सीजन पर काम करती है) की जरूरत थी।
- भू-राजनीतिक चुनौतियाँ: 1990 के दशक में अमेरिका ने भू-राजनीतिक दबावों के कारण रूस को यह तकनीक भारत को देने से रोक दिया था।
- भारतीय वैज्ञानिकों का संकल्प: इसरो के वैज्ञानिकों ने इस प्रतिबंध को एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया और दो दशकों की कड़ी मेहनत के बाद पूरी तरह से स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन (CE-20) का विकास किया। आज भारत का LVM3 (GSLV Mk-III) रॉकेट दुनिया के सबसे शक्तिशाली और भरोसेमंद भारी रॉकेटों में से एक है, जिसे प्यार से ‘बाहुबली’ कहा जाता है।
4. अंतरग्रहीय मिशनों का स्वर्ण युग: चंद्रयान और मंगलयान (2008 – 2014)
21वीं सदी में प्रवेश करते ही इसरो ने पूरी दुनिया को अपनी अद्भुत वैज्ञानिक क्षमता और कम लागत (Cost-Effective) में बड़े मिशन करने की कला से चकित कर दिया। भारत ने अब पृथ्वी की कक्षा से बाहर निकलकर ब्रह्मांड के अन्य पिंडों की ओर देखना शुरू किया।
चंद्रयान-1 (2008): चांद पर पानी की खोज
22 अक्टूबर 2008 को पीएसएलवी रॉकेट की मदद से भारत ने अपना पहला चंद्र मिशन चंद्रयान-1 लॉन्च किया। यह एक ऑर्बिटर मिशन था। इस मिशन ने इतिहास रच दिया जब इसके ‘मून इम्पैक्ट प्रोब’ (MIP) ने चंद्रमा की सतह पर उतरकर पानी के अणुओं (H2O) की पुष्टि की। भारत की इस खोज ने चंद्रमा के प्रति पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों का दृष्टिकोण बदल दिया और भविष्य के मून-मिशनों के लिए एक नया रास्ता खोला।
मंगलयान (2013): पहले ही प्रयास में रचा इतिहास
भारत का मार्स ऑर्बिटर मिशन (MOM) यानी ‘मंगलयान’ इसरो के इतिहास के सबसे गौरवशाली अध्यायों में से एक है। 5 नवंबर 2013 को लॉन्च किया गया यह मिशन जब 24 सितंबर 2014 को मंगल की कक्षा में स्थापित हुआ, तो पूरा विश्व स्तब्ध रह गया।
- विश्व रिकॉर्ड: भारत दुनिया का पहला ऐसा देश बना जिसने अपने पहले ही प्रयास में मंगल ग्रह की कक्षा में सफलतापूर्वक प्रवेश किया। अमेरिका, रूस और यूरोपीय संघ भी अपने पहले प्रयास में ऐसा नहीं कर पाए थे।
- कम लागत का चमत्कार: इस पूरे मिशन की लागत लगभग 450 करोड़ रुपये (74 मिलियन डॉलर) थी, जो हॉलीवुड की फिल्म ‘ग्रैविटी’ के बजट से भी कम थी। इसने इसरो को वैश्विक स्तर पर “किफायती और उच्च गुणवत्ता वाले अंतरिक्ष अनुसंधान” के ब्रांड के रूप में स्थापित कर दिया।
5. 23 अगस्त 2023: चंद्रयान-3 और राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस की गौरवगाथा
इसरो की यात्रा का सबसे बड़ा और सबसे भावुक क्षण वर्ष 2019 में चंद्रयान-2 की आंशिक विफलता (लैंडर विक्रम की हार्ड लैंडिंग) के बाद आया। उस समय तत्कालीन इसरो प्रमुख के. सिवन भावुक हो गए थे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें गले लगाकर ढांधस बंधाया था। उस असफलता से सीख लेकर इसरो ने चार साल तक दिन-रात काम किया और चंद्रयान-3 का निर्माण किया।
चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर तिरंगा
- ऐतिहासिक क्षण: 23 अगस्त 2023 को शाम 06 बजकर 04 मिनट पर चंद्रयान-3 के लैंडर ‘विक्रम’ ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव (South Pole) की उबड़-खाबड़ और अंधेरी सतह पर अपनी सॉफ्ट लैंडिंग को सफलतापूर्वक पूरा किया।
- भारत की वैश्विक श्रेष्ठता: चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरना अत्यधिक कठिन माना जाता है क्योंकि वहां सूर्य की रोशनी बेहद कम होती है और गहरे गड्ढे हैं। भारत से ठीक दो दिन पहले रूस का ‘लूना-25’ मिशन इसी क्षेत्र में क्रैश हो गया था। लेकिन भारत के वैज्ञानिकों की सटीक गणना ने कमाल कर दिया।
- शिव शक्ति और तिरंगा प्वाइंट: प्रधानमंत्री मोदी ने घोषणा की कि जिस स्थान पर चंद्रयान-3 उतरा है, उसे ‘शिव शक्ति प्वाइंट’ (Shiv Shakti Point) कहा जाएगा, और चंद्रयान-2 के पदचिह्नों वाले स्थान को ‘तिरंगा प्वाइंट’ नाम दिया गया। इसी महान दिन की याद में हर साल 23 अगस्त को ‘राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस’ घोषित किया गया।
6. वर्तमान और भविष्य के महत्वाकांक्षी मिशन: सूर्य से शुक्र तक (2024 – 2030)
चंद्रयान-3 की सफलता के ठीक बाद इसरो रुका नहीं। संगठन ने तुरंत नए और अधिक चुनौतीपूर्ण वैज्ञानिक अभियानों की ओर अपने कदम बढ़ा दिए हैं, जो भारत को अंतरिक्ष महाशक्ति (Space Superpower) के रूप में स्थापित कर रहे हैं।
आदित्य-एल1 (Aditya-L1): सूर्य का अध्ययन
2 सितंबर 2023 को इसरो ने भारत का पहला सौर मिशन आदित्य-एल1 लॉन्च किया। यह उपग्रह पृथ्वी से लगभग 15 लाख किलोमीटर दूर ‘लैग्रेंजियन बिंदु 1’ (L1) के पास एक हेलो कक्षा में स्थापित हो चुका है। यहाँ से यह बिना किसी ग्रहण या बाधा के सूर्य की बाहरी परतों (कोरोना), सौर तूफानों और चुंबकीय क्षेत्रों का निरंतर अध्ययन कर रहा है।
गगनयान (Gaganyaan): भारत का पहला मानव मिशन
इसरो का सबसे महत्वाकांक्षी आगामी प्रोजेक्ट ‘गगनयान’ है। इस मिशन के तहत भारत अपने स्वयं के रॉकेट (LVM3) की मदद से भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों (जिन्हें ‘गगननॉट्स’ कहा गया है) को पृथ्वी की निचली कक्षा (Low Earth Orbit) में भेजेगा और उन्हें सुरक्षित वापस धरती पर लाएगा। इस मिशन के लिए चार लड़ाकू विमान पायलटों का चयन किया जा चुका है, और इसरो ‘व्योममित्र’ (एक महिला ह्यूमनॉइड रोबोट) की मदद से मानव रहित परीक्षण उड़ानें भी आयोजित कर रहा है।
अन्य आगामी मिशन:
- शुक्रीयान-1 (Shukrayaan): शुक्र ग्रह के वायुमंडल और उसकी सतह के रहस्यों को जानने के लिए एक आगामी मिशन।
- लूपेक्स (LUPEX): जापान की अंतरिक्ष एजेंसी (JAXA) के साथ मिलकर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर एक रोवर भेजने का संयुक्त मिशन।
- भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (BAS): भारत साल 2035 तक अंतरिक्ष में अपना खुद का स्थायी ‘अंतरिक्ष स्टेशन’ स्थापित करने और 2040 तक चंद्रमा पर भारतीय नागरिक को भेजने के लक्ष्य पर काम कर रहा है।
7. इसरो की व्यावसायिक सफलता और सामाजिक योगदान
इसरो केवल विज्ञान के क्षेत्र तक ही सीमित नहीं है; इसका देश के आम नागरिकों के जीवन और वैश्विक अर्थव्यवस्था में भी बहुत बड़ा योगदान है।
- एंट्रिक्स और न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL): इसरो की इन व्यावसायिक शाखाओं ने दुनिया भर के देशों (जैसे अमेरिका, यूके, फ्रांस, सिंगापुर) के उपग्रहों को अपने पीएसएलवी रॉकेट से लॉन्च करके करोड़ों डॉलर की विदेशी मुद्रा अर्जित की है। 104 उपग्रहों को एक साथ छोड़ने का रिकॉर्ड इसका बेहतरीन उदाहरण है।
- आम नागरिक के जीवन में इसरो: हमारे मोबाइल में मौसम का सटीक पूर्वानुमान, चक्रवातों और प्राकृतिक आपदाओं के समय लाखों लोगों की जान बचाना, टीवी और इंटरनेट कनेक्टिविटी, मछुआरों के लिए समुद्र में संभावित मछली पकड़ने वाले क्षेत्रों की मैपिंग, और ‘नाविक’ (NavIC – भारत का अपना जीपीएस सिस्टम) – यह सब इसरो के उपग्रहों की वजह से ही संभव हो पाया है।
- निजी क्षेत्र की भागीदारी: सरकार ने अब अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स (जैसे स्काईरूट एयरोस्पेस, अग्निकुल) के लिए खोल दिया है, जिससे भारत में ‘स्पेस टेक’ का एक नया इकोसिस्टम तैयार हो रहा है।
निष्कर्ष (Conclusion)
साइकिल के कैरियर पर एक छोटे से रॉकेट के पुर्जे लादने से लेकर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर तिरंगा फहराने तक, और सूर्य की दहलीज तक पहुंचने तक, इसरो (ISRO) की यात्रा हर एक भारतीय के लिए अत्यधिक गौरव और प्रेरणा का विषय है। राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस हमारे देश के वैज्ञानिकों की अदम्य इच्छाशक्ति, सीमित संसाधनों में असीमित सफलताएं पाने की कला और उनके अथक परिश्रम को नमन करने का दिन है।
आज इसरो न केवल दुनिया की शीर्ष अंतरिक्ष एजेंसियों (जैसे नासा, रॉसकॉस्मॉस, ईएसए) के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है, बल्कि अपनी कम लागत और अत्यधिक सटीकता के कारण दुनिया का नेतृत्व भी कर रहा है। यह यात्रा दर्शाती है कि जब हौसले बुलंद हों, तो आसमान की ऊँचाइयाँ भी छोटी पड़ जाती हैं।
राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस (National Space Day) और इसरो (ISRO) की यात्रा से जुड़े पाठकों के मन में उठने वाले मुख्य सवालों के विस्तृत जवाब (FAQs):
1. भारत में ‘राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस’ किस तिथि को मनाया जाता है और इसकी शुरुआत कब हुई?
भारत में हर साल 23 अगस्त को ‘राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस’ मनाया जाता है। इसकी शुरुआत वर्ष 2024 में हुई थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगस्त 2023 में चंद्रयान-3 की ऐतिहासिक सफलता के बाद इस दिवस को मनाने की आधिकारिक घोषणा की थी।
2. राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस मनाने के लिए 23 अगस्त की तारीख को ही क्यों चुना गया?
23 अगस्त 2023 को ही इसरो के चंद्रयान-3 मिशन के लैंडर ‘विक्रम’ ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव (South Pole) पर सफलतापूर्वक कदम रखा था। इस दुर्गम क्षेत्र पर पहुंचने वाला भारत दुनिया का पहला देश बना। इसी महान ऐतिहासिक गौरव को अमर बनाने के लिए 23 अगस्त की तिथि चुनी गई।
3. चंद्रमा की सतह पर जहां चंद्रयान-3 और चंद्रयान-2 उतरे थे, उन स्थानों के नाम क्या हैं?
- चंद्रयान-3 की सफल सॉफ्ट लैंडिंग वाले स्थान को ‘शिव शक्ति प्वाइंट’ (Shiv Shakti Point) नाम दिया गया है।
- चंद्रयान-2 के पदचिह्नों (हार्ड लैंडिंग) वाले स्थान को ‘तिरंगा प्वाइंट’ (Tiranga Point) नाम दिया गया है।
4. इसरो (ISRO) की स्थापना कब और किसके प्रयासों से हुई थी?
इसरो की स्थापना आधिकारिक तौर पर 15 अगस्त 1969 को हुई थी। भारत में अंतरिक्ष विज्ञान के जनक माने जाने वाले महान दूरदर्शी वैज्ञानिक डॉ. विक्रम साराभाई के अथक प्रयासों से संगठन की नींव रखी गई थी। इससे पहले इसे ‘INCOSPAR’ के नाम से जाना जाता था।
5. भारत के पहले स्वदेशी उपग्रह का क्या नाम था और इसे कब लॉन्च किया गया था?
भारत के पहले स्वदेशी उपग्रह का नाम ‘आर्यभट्ट’ (Aryabhata) था। इसे 19 अप्रैल 1975 को सोवियत संघ (USSR) के लॉन्च व्हीकल की मदद से अंतरिक्ष में भेजा गया था। हालांकि रॉकेट विदेशी था, लेकिन उपग्रह पूरी तरह भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा निर्मित था।
6. भारत ने अपने दम पर पहला उपग्रह कब और किस रॉकेट से अंतरिक्ष में भेजा था?
भारत ने 18 जुलाई 1980 को अपने पहले स्वदेशी रॉकेट SLV-3 (सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल-3) की मदद से ‘रोहिणी’ (RS-1) उपग्रह को अंतरिक्ष की कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित किया था। इस ऐतिहासिक मिशन के निदेशक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम थे।
7. ‘इसरो का वर्कहॉर्स’ (Workhorse of ISRO) किस रॉकेट को कहा जाता है और क्यों?
इसरो के सबसे भरोसेमंद रॉकेट PSLV (पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल) को ‘वर्कहॉर्स’ कहा जाता है। इसने अपने शानदार ट्रैक रिकॉर्ड के साथ इसरो के लगभग सभी महत्वपूर्ण मिशनों (जैसे चंद्रयान-1, मंगलयान, और एक साथ 104 उपग्रह लॉन्च करने का विश्व रिकॉर्ड) को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है।
8. मंगलयान (Mangalyaan) मिशन की दो सबसे बड़ी वैश्विक उपलब्धियां क्या थीं?
- भारत दुनिया का पहला ऐसा देश बना जिसने अपने पहले ही प्रयास में मंगल ग्रह की कक्षा में सफलतापूर्वक प्रवेश किया।
- यह दुनिया का सबसे कम लागत (लगभग 450 करोड़ रुपये) वाला मार्स मिशन था, जो कई हॉलीवुड फिल्मों के बजट से भी कम था।
9. इसरो का ‘आदित्य-एल1’ (Aditya-L1) क्या है?
आदित्य-एल1 भारत का पहला समर्पित वैज्ञानिक सौर मिशन (Surya Mission) है। इसे 2 सितंबर 2023 को लॉन्च किया गया था। यह पृथ्वी से 15 लाख किलोमीटर दूर ‘लैग्रेंजियन बिंदु 1’ (L1) पर रहकर बिना किसी बाधा के सूर्य की बाहरी परतों और सौर तूफानों का अध्ययन कर रहा है।
10. गगनयान (Gaganyaan) मिशन क्या है और यह भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
गगनयान इसरो का पहला मानव अंतरिक्ष मिशन (Human Spaceflight Mission) है। इसके तहत भारत अपने स्वदेशी रॉकेट (LVM3) से भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों (गगननॉट्स) को पृथ्वी की निचली कक्षा में भेजेगा और सुरक्षित वापस लाएगा। इस सफलता के बाद भारत इंसानों को अंतरिक्ष में भेजने वाला दुनिया का चौथा देश बन जाएगा।
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