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जिसे हम बेकार खरपतवार समझते हैं, जानिए बचपन के उस ‘मकोय और बम्भोला’ के बेमिसाल फायदे!

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बचपन, बम्भोला और मकोय: खेतों की पगडंडियों से खो गया वो अनमोल स्वाद

आज जब हम सुपरमार्केट के एयर-कंडीशनर वाले गालियारे में घूमते हुए विदेशी ‘ब्लूबेरी’ और ‘क्रैनबेरी’ को महंगे दामों पर खरीदते हैं, तो मन अनायास ही तीस-चालीस साल पीछे चला जाता है। उस दौर में, जब न तो हमारे पास ऐसे चमकीले फल थे और न ही उन्हें खरीदने की जेब में ताकत। लेकिन, हमारे पास प्रकृति का एक ऐसा खुला खजाना था, जिसकी समृद्धि के आगे आज के ये पैकेटबंद सुपरफूड्स बेहद बौने नजर आते हैं। वह खजाना था हमारे गांव-जवार के खेतों, मेड़ों और झाड़ियों में उगने वाले लमेरा (जंगली/स्वतः उगने वाले) पौधे और उनके जादुई फल—बम्भोला और मकोय।

यादों की मेड़: हमारे बचपन का सुपरफूड ‘बम्भोला और मकोय’


बचपन की एक बड़ी ही मासूम और खूबसूरत हकीकत होती है। उस उम्र में हमें यह बिल्कुल नहीं पता होता था कि फलां जंगली पौधे का फल, पत्तियाँ या फूल खाने से शरीर को क्या वैज्ञानिक या औषधीय फायदा होता है। हमें विटामिन्स, मिनरल्स या एंटीऑक्सीडेंट्स जैसे भारी-भरकम शब्दों का ककहरा भी नहीं मालूम था। लेकिन हमें इतना बखूबी पता था कि इसका स्वाद अच्छा है, यह मीठा या खट्टा-मीठा है, और इसे खाया जाता है। बस, फिर क्या था! खेलने के दौरान या खेतों की तरफ घूमते हुए जिधर भी ये छोटे-छोटे रंग-बिरंगे फल दिखे, पैर वहीं ठिठक जाते थे। बिना किसी हिचकिचाहट के उन्हें तोड़ा और सीधा मुंह में डाल लिया। न धोने की चिंता, न कीटाणुओं का डर—बस एक बेलौस, अल्हड़ आनंद।


यादों की मेड़ और बाबा-आजी का साथ

वह भी क्या दिन थे, जब कभी-कभी बाबा या आजी संग यूँ ही सुबह या शाम के वक्त खेत की तरफ निकलते थे। बाबा के हाथ में लाठी होती थी और हमारा हाथ उनकी उंगलियों को थामे रहता था। चलते-चलते अचानक मेड़ के किनारे उगी झाड़ियों में मकोय या बम्भोला पका देखकर, पैर जैसे जमीन से चिपक जाते थे। बिना उन्हें तोड़े और खाए आगे बढ़ना जैसे प्रकृति के उस छोटे से उपहार का अपमान करने जैसा था।

बाबा या आजी भी हमें टोकते नहीं थे, बल्कि मुस्कुराकर कहते थे—“खा ले, पेट साफ रहेगा, आंखें तेज होंगी।” बुजुर्गों के पास भले ही कोई बॉटनी (वनस्पति विज्ञान) की डिग्री नहीं थी, लेकिन सदियों के पारंपरिक ज्ञान ने उन्हें सिखाया था कि ये लमेरा पौधे अनमोल औषधियां हैं। बाबा अक्सर अपनी लाठी से कंटीली झाड़ियों को थोड़ा दूर हटा देते थे ताकि हमारे नाजुक हाथों में कांटे न चुभें और हम आराम से उन चमकीले मोतियों जैसे फलों को चुन सकें।


मकोय: खेतों की काली-लाल मणियाँ

वैज्ञानिक भाषा में भले ही इसे सोलेनम नाइग्रम (Solanum nigrum) कहा जाए, लेकिन हमारे लिए तो यह बस ‘मकोय’ या ‘मकोई’ थी। मटर के दाने से भी छोटे आकार के ये फल जब कच्चे होते थे, तो एकदम हरे और कड़वे होते थे। लेकिन जैसे-जैसे ये पकते, इनका रंग बदलकर गहरा बैंगनी, काला या चमकीला लाल हो जाता था।

खेतों की नमी वाली जगहों पर मकोय के पौधे बहुतायत में मिलते थे। खेल-खेल में दोस्तों के साथ यह प्रतियोगिता होती थी कि कौन सबसे ज्यादा काली मकोय ढूंढेगा। काली मकोय का मतलब था—भरपूर मिठास। उंगलियों और जीभ पर मकोय का वह गहरा रंग चढ़ जाना हमारी जीत का प्रतीक होता था। घर लौटते समय मां जब जीभ बाहर निकलवाकर देखती और पूछती, “कहाँ मुंह काला करके आ रहे हो?” तो हम बस मासूमियत से मुस्कुरा देते थे।

आज विज्ञान बताता है कि मकोय लिवर के लिए रामबाण है, यह सूजन को कम करती है और त्वचा रोगों में फायदेमंद है। लेकिन हमारे लिए तो वह बस दोपहर की तपती धूप में मिलने वाली एक ठंडी, मीठी सौगात थी।


बम्भोला: रसभरी का देसी और रहस्यमयी रूप

मकोय के साथ ही जो दूसरा सबसे बड़ा आकर्षण होता था, वह था ‘बम्भोला’। कई इलाकों में इसे ‘मकोइया’, ‘पटपोटनी’ या जंगली ‘रसभरी’ (Physalis minima) भी कहा जाता है। बम्भोला का फल अपने आप में कुदरत की कलाकारी का एक बेहतरीन नमूना है। यह सीधे दिखाई नहीं देता, बल्कि हरे या हल्के भूरे रंग के एक जालीदार, फूले हुए छिलके (कवच) के अंदर छुपा रहता था।

बम्भोला को खाने का अपना एक अलग ही रोमांच और सलीका था। इसे सीधे मुंह में नहीं डाला जाता था। सबसे पहले उस फूले हुए छिलके को दोनों हाथों के बीच रखकर या माथे पर मारकर एक हल्के ‘पटाखे’ जैसी आवाज के साथ फोड़ा जाता था। वह “पट” की आवाज हमारे लिए किसी महंगे खिलौने के बजने से ज्यादा खुशी देती थी। छिलका हटने के बाद अंदर से सोने जैसा पीला-नारंगी, गोल और चमकदार फल निकलता था। इसका स्वाद खट्टा-मीठा और बेहद रसीला होता था। एक बार मुंह में जाते ही जो स्वाद घुलता था, उसकी तुलना आज दुनिया की किसी भी महंगी कैंडी से नहीं की जा सकती।


सौंदर्य प्रसाधन, खेल और लमेरा पौधे

न जाने ऐसे कितने लमेरा पौधे थे जो केवल हमारे खाने का ही नहीं, बल्कि हमारे खेल और सौंदर्य प्रसाधन का भी अहम हिस्सा हुआ करते थे। आज के बच्चे जहां प्लास्टिक के खिलौनों और मोबाइल स्क्रीन में खोए रहते हैं, वहीं हमारा पूरा बचपन इन पौधों के इर्द-गिर्द बीता।


क्या खो दिया हमने?

वक्त बदला, गांवों का शहरीकरण हुआ, और खेती के तौर-तरीके बदल गए। खेतों में अत्यधिक कीटनाशकों और रासायनिक खादों के प्रयोग ने इन मासूम, स्वतः उगने वाले लमेरा पौधों को ‘खरपतवार’ मानकर नष्ट कर दिया। आज की नई पीढ़ी को शायद यह पता भी नहीं होगा कि मकोय या बम्भोला जैसी भी कोई चीज इस धरती पर वजूद रखती है।

हम बच्चों को ‘प्रकृति के करीब’ लाने के लिए उन्हें महंगे नेचर कैंप्स में भेजते हैं, लेकिन हमारे अपने खेतों की मेड़ों पर जो जीवन का संगीत बिखरा था, उसे हमने आधुनिकता की अंधी दौड़ में खो दिया। आज जब हम पुरानी यादों की पोटली खोलते हैं, तो बम्भोला के फटने की वो “पट” वाली आवाज और मकोय का वो खट्टा-मीठा स्वाद आँखों में आंसू और होठों पर एक गहरी मुस्कान छोड़ जाता है।

वे लमेरा पौधे सिर्फ पौधे नहीं थे, वे हमारे बचपन के सच्चे सहचर थे, जो हमें बिना किसी शर्त के खुशियां बांटना सिखाते थे। बाबा की वो लाठी, आजी का वो आंचल और खेतों की वो पगडंडियां शायद अब लौटकर न आएं, लेकिन बम्भोला और मकोय का वो स्वाद हमेशा हमारी रूह में महकता रहेगा।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs):

Q1. मकोय और बम्भोला (जंगली रसभरी) क्या हैं?

ये दोनों ही स्वतः उगने वाले (लमेरा या जंगली) पौधे हैं, जो ग्रामीण इलाकों में खेतों की मेड़ों, बागों और नमी वाली जगहों पर पाए जाते हैं। इनके पौधे छोटे होते हैं और इनमें छोटे, स्वादिष्ट फल लगते हैं।

Q2. बम्भोला को ‘पटपोटनी’ या ‘पटाखा फल’ क्यों कहा जाता है?

बम्भोला का फल एक पतले, गुब्बारे जैसे जालीदार आवरण (छिलके) के अंदर बंद रहता है। बचपन में बच्चे इस फल को खाने से पहले इसके आवरण को हाथ या माथे पर मारकर “पट” की आवाज़ के साथ फोड़ते थे, इसी अनोखे खेल के कारण इसे पटपोटनी या पटाखा फल भी कहा जाता है।

Q3. क्या मकोय स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होती है?

हाँ, आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों में मकोय को बेहद गुणकारी माना गया है। यह विशेष रूप से लीवर (यकृत) की बीमारियों, शरीर की सूजन को कम करने, पेट साफ रखने और त्वचा रोगों के इलाज में एक कारगर औषधि के रूप में काम आती है।

Q4. बम्भोला (Physalis minima) का स्वाद कैसा होता है?

जब बम्भोला का फल कच्चा होता है, तो यह हरा और बहुत खट्टा होता है। लेकिन पूरी तरह पक जाने पर इसका रंग सुनहरा पीला या नारंगी हो जाता है और इसका स्वाद बेहद रसीला और खट्टा-मीठा होता है।

Q5. ‘लमेरा’ शब्द का क्या अर्थ है?

ग्रामीण या आंचलिक भाषा में ‘लमेरा’ उन पौधों या फसलों को कहा जाता है जिन्हें मनुष्य द्वारा खेतों में बोया नहीं जाता, बल्कि वे प्राकृतिक रूप से, हवा, पानी या पक्षियों के माध्यम से मिट्टी में खुद-ब-खुद उग आते हैं।

Q6. आजकल खेतों में मकोय और बम्भोला जैसे पौधे कम क्यों दिखाई देते हैं?

आधुनिक खेती में फसलों को खरपतवार से बचाने के लिए भारी मात्रा में रासायनिक कीटनाशकों और रसायनों का छिड़काव किया जाता है। इन रसायनों के कारण मेड़ों पर स्वतः उगने वाले ये औषधीय और पारंपरिक पौधे अब धीरे-धीरे नष्ट हो रहे हैं।


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