सोहीना (अरबी के पत्तों का रिकवच/पात्रा): उत्तर भारत के गाँवों में स्वाद और परंपरा का एक ऐसा अनूठा संगम, जिसे एक बार खा लेने के बाद इंसान कभी भूल नहीं पाता। शहर की भागदौड़ भरी जिंदगी में जब कोई बेटी अपनी माँ के आँगन में लौटती है, तो वहाँ का चूल्हा और रसोई केवल खाना नहीं बनाते, बल्कि पुरानी यादों और प्रेम का एक नया संसार रच देते हैं।
सोहीना (जिन्हें कई क्षेत्रों में रिकवच, गिरवच, पात्रा या भकोसे भी कहा जाता है) को बनाने की पूरी प्रक्रिया महज़ एक रेसिपी नहीं है; यह ग्रामीण जीवन की जीवंतता, संयुक्त परिवार के तालमेल और सदियों पुराने पारंपरिक ज्ञान का एक सजीव दस्तावेज़ है। आइए जानते हैं कि एक माँ और पूरा परिवार मिलकर इस बेहद स्वादिष्ट और सोंधे पकवान को शुद्ध देसी और पारंपरिक तरीके से कैसे तैयार करते हैं।
Table of Contents
📅 सोहीना (रिकवच) बनाने की पूरी समय-सारणी और मुख्य सामग्रियाँ
इस पारंपरिक पकवान को बनाने में लगने वाली आवश्यक सामग्रियों और उनके सही अनुपात को नीचे दी गई तालिका में संक्षेप में प्रस्तुत किया गया है:
| सामग्री / चरण | विवरण और पारंपरिक नाम | उपयोग और महत्व |
|---|---|---|
| मुख्य पत्ता | अरबी के ताज़ा और बड़े पत्ते | सोहीना का मुख्य आधार, जिसके ऊपर लेप लगाया जाता है। |
| मुख्य दाल | साबुत काली उड़द की दाल | सिल-लोढ़े पर पीसकर गाढ़ी पीठी (पेस्ट) बनाने के लिए। |
| मसाला मिश्रण | गान्ही (नमक, काली मिर्च, जीरा, हींग) | पीठी के भीतर मिलाकर उसे चटपटा और पाचक बनाने के लिए। |
| पारंपरिक औजार | हंसुआ और सिकाउहुली | पत्तों को काटने, साफ करने और भाप देने के लिए। |
| उबालने का पात्र | बड़का बटुला (पीतल या मिट्टी का बर्तन) | पानी गर्म करके भाप (Steam) पैदा करने के लिए। |
| खट्टापन (टैंग) | नरम कल्ली की सूखी खटाई | चटनी बनाने और अरबी की खुजली को काटने के लिए। |
👩हीना की घर वापसी और चूल्हे की पहली तैयारी
कहानी की शुरुआत सुबह की एक चहकती हुई आवाज़ से होती है—“माँ! मैं घर आ रही हूँ! शाम चार बजे तक पहुँच जाऊंगी!” बेटी सोहीना की यह खबर पाते ही माँ का दिल तरंगित हो उठता है। गाँव में बेटियों का आना किसी उत्सव से कम नहीं होता। दोपहर ढलते ही माँ आँगन के कोने में बैठकर उड़द के साबुत दानों को दलने की तैयारी में जुट जाती है। जब शाम को ठीक चार बजे सोहीना घर की चौखट पर कदम रखती है, तो माँ उड़द को दल कर दाल बना रही होती है। दोनों हाथों को आपस में झाड़कर माँ सबसे पहले बेटी को अपनी अंकवार (गले लगाना) में भर लेती है। सफर की सारी थकान माँ की गोदी की उस खुशबू में पल भर में गायब हो जाती है।
🪨 सिल-लोढ़े का जादू: पीठी और मसालों की पिसाई
ग्रामीण पाक-कला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वहाँ मिक्सी का उपयोग वर्जित माना जाता है। उड़द की दाल जब अच्छी तरह धुल जाती है, तो घर की बड़ी बहू (भौजाई) मोर्चा संभालती है।
1. मसालों की सोंधी खुशबू
भौजाई सबसे पहले कुएं के ताज़ा पानी से सिल और लोढ़े को धोकर साफ करती है। ग्रामीण नियमों के अनुसार, दाल पीसने से पहले सूखे मसाले पीसे जाते हैं ताकि उनकी सुगंध पत्थर के रोम-रोम में समा जाए। वे सिल पर जीरा और तीखी काली मिर्च रखकर लोढ़े से बारीक पीसती हैं और उसे उंगली से समेटकर एक छोटी कटोरी में रख देती हैं।
2. उड़द दाल की गाढ़ी पीठी
इसके बाद शुरू होती है भीगी हुई उड़द की दाल की पिसाई। भौजाई थोड़ा-थोड़ा करके दाल सिल पर रखती है और लोढ़े को आगे-पीछे चलाकर एक बेहद चिकनी, चमकदार और गाढ़ी ‘पीठी’ तैयार करती है। उड़द की पीठी जितनी लसदार और गाढ़ी होगी, पत्तों पर उसका लेप उतना ही मजबूत बैठेगा।
👗 पुरानी साड़ी का रहस्य और अरबी के पत्तों की कटाई
उधर जब भौजाई दाल पीस रही होती है, तब तक माँ अपने सबसे महत्वपूर्ण और तकनीकी चरण की ओर बढ़ती है। माँ अपनी अलमारी से निकालकर गहरे रंग की एक पुरानी सूती साड़ी पहनती है।
पुरानी साड़ी पहनना क्यों जरूरी है?
एक महत्वपूर्ण पारंपरिक टिप: अरबी के पत्तों को काटते और लपेटते समय उनमें से एक विशेष प्रकार का दूधिया रस (Latex) निकलता है। यदि यह रस किसी अच्छे या नए कपड़े पर लग जाए, तो उसका इतना गंदा और पक्का दाग पड़ता है जो कई बार धोने के बाद भी कभी नहीं छूटता। इसलिए ग्रामीण महिलाएं सोहीना बनाते समय हमेशा गहरे रंग की पुरानी साड़ी पहनती हैं।
साड़ी पहनने के बाद माँ हाथ में हंसुआ (दरांती) और सिकाउहुली (सफाई का औजार) लेकर बागीचे से अरबी के बड़े-बड़े हरे पत्ते काट लाती है। इन पत्तों को पानी से खूब अच्छी तरह धोया जाता है ताकि धूल पूरी तरह साफ हो जाए। हंसुए की धार से पत्तों के पीछे की कड़क और मोटी नसों को बहुत सावधानी से छीलकर अलग कर दिया जाता है, ताकि लपेटते समय पत्ते बीच से टूटें नहीं।
🌶️ ‘गान्ही’ का मिलान और भाप (स्टीम) की व्यवस्था
जब तक पत्ते साफ होते हैं, तब तक भौजाई की दाल पीसकर तैयार हो जाती है। अब बारी आती है मसालों के सही संतुलन की:
- गान्ही का तड़का: पिसी हुई उड़द की दाल में माँ अपने हाथों से हिसाब के अनुसार नोन (नमक), जीरा, काली मिर्च और शुद्ध हींग मिलाती है। ग्रामीण भाषा में इस पाचक और तीखे मिश्रण को ‘गान्ही’ कहा जाता है। हींग का उपयोग यहाँ बेहद जरूरी है क्योंकि उड़द की दाल स्वाभाव से ‘बादी’ (गैस बनाने वाली) होती है, और हींग इसे सुपाच्य बनाती है।
- बटुले का चूल्हा: इसी बीच घर की छोटी बहन रसोई के चूल्हे को सुलगाती है। वह एक बड़के बटुले (पीतल या भारी मिट्टी के बर्तन) में पानी भरकर चूल्हे की तेज आग पर चढ़ा देती है। बटुले के मुंह के ऊपर छेद वाली सिकाउहुली (फरा बनाने वाली जाली) रख दी जाती है, ताकि नीचे से उठने वाली भाप ऊपर आ सके।
🌀 परात को उल्टा करना और सोहीना लपेटने की कला
यह सोहीना बनाने का सबसे कलात्मक और धैर्यपूर्ण हिस्सा है। माँ आँगन में एक बड़की परात (पीतल की बड़ी थाली) को फर्श पर उल्टा करके रख देती है। उल्टा परात एक समतल और चौड़े चबूतरे की तरह काम करता है।
- पत्तों का बिछाना: माँ सबसे पहले अरबी के सबसे बड़े पत्ते को उल्टा करके परात पर फैलाती है।
- पीठी का लेप: अपने दाहिने हाथ से उड़द की मसालेदार पीठी को लेकर पूरे पत्ते पर एकसमान रूप से लेप (Layer) लगाती है।
- परत दर परत (Layering): इसके ऊपर माँ दूसरा पत्ता रखती है, फिर पीठी लगाती है। इस तरह 5 से 6 पत्तों को एक के ऊपर एक रखकर पीठी का मोटा लेप लगाया जाता है।
- रोल बनाना (लपेटना): जब सभी पत्तों पर लेप लग जाता है, तो माँ दोनों किनारों को अंदर की तरफ मोड़कर उसे एक कड़े और मोटे रोल का आकार देती है। ग्रामीण भाषा में इसी रोल को ‘सोहिना’ कहा जाता है। जैसे ही पहला घान (पहला बैच) लपेटकर तैयार होता है, माँ उसे चूल्हे पर उबल रहे बटुले की सिकाउहुली के ऊपर भाप में पकने के लिए रख देती है।
🧉 नरम कल्ली की खटाई और तीखी चटनी का महासंयोग
जब तक पहला घान सोहीना चूल्हे की धीमी आंच पर भाप में सुलग रहा होता है, तब तक रसोई में चटनी की तैयारी शुरू हो जाती है। अरबी के पत्तों में ‘कैल्शियम ऑक्सलेट’ होता है, जिसके कारण गले में हल्की खुजली या कड़वाहट महसूस हो सकती है। इसे काटने के लिए खटाई का होना अनिवार्य है।
माँ ने पहले से ही नरम कल्ली की सूखी आम की खटाई को पानी में भिगोकर रखा था। भौजाई उस भीगी हुई खटाई को सिल पर रखती है और उसमें सफेद नमक, छिला हुआ लहसुन और तीखी हरी मिर्च डालकर एक गाढ़ी, खट्टी-तीखी चटनी पीस लेती है। कुछ ही देर में चूल्हे से पकते हुए सोहीना की और सिल से खटाई की चटनी की ऐसी सोंधी खुशबू उठती है कि पूरा घर महक उठता है।
🍽️ दो अनोखे स्वाद: उसना हुआ बनाम कड़ाही में तला सोहीना
जब सोहीना भाप में अच्छी तरह पक जाता है (उसन जाता है), तो माँ उसे चूल्हे से उतारकर चाकू से गोल-गोल टुकड़ों (पीस) में काट लेती है। यहाँ घर के सदस्यों की पसंद के अनुसार इसे दो तरीकों से परोसा जाता है:
1. उसना हुआ सोहीना (The Steamed Version)
घर के जिन लोगों को तेल-मसालों से परहेज होता है या जो शुद्ध प्राकृतिक स्वाद पसंद करते हैं, वे भाप में पके हुए इस गर्म-गर्म सोहीना के पीस को सीधे खटाई की तीखी चटनी के साथ खाते हैं। मुँह में जाते ही उड़द का सोंधापन और अरबी के पत्तों का कसैला-खट्टा स्वाद एक अनोखा आनंद देता है।
2. कड़ाही में तला हुआ सोहीना (The Crispy Fried Version)
बाकी लोगों के लिए भौजाई तुरंत चूल्हे पर लोहे की कड़ाही चढ़ाती है और उसमें सरसों का शुद्ध तेल डालती है। सोहीना के गोल टुकड़ों को तेल में डालकर दोनों तरफ से सुनहरा और कुरकुरा (Crispy) होने तक तला जाता है। चाय के साथ यह तला हुआ सोहीना और साथ में लहसुन-मिर्च की चटनी का नाश्ता पाकर सोहीना और पूरे परिवार का मन तृप्त हो जाता है।
🍛 दोपहर का महा-भोज: सोहीना वाली कढ़ी और लपटा
गाँव की रसोई की यह भी विशेषता है कि वहाँ कोई भी चीज़ बर्बाद नहीं होती। सुबह के नाश्ते के बाद सिल पर और कटोरी में थोड़ी सी दाल की पीठी बची रह जाती है। माँ उस बची हुई पीठी को पानी में अच्छी तरह घोल लेती है और कड़ाही में मेथी, हींग और मिर्च का छौंक लगाकर उसे पकने के लिए छोड़ देती है।
धीमी आंच पर पकते-पकते यह घोल एक गाढ़े और बेहद स्वादिष्ट सूप का रूप ले लेता है, जिसे ग्रामीण भाषा में ‘लपटा’ या ‘सकपैता कढ़ी’ कहा जाता है। सुबह नाश्ते से बचा हुआ जो सोहीना था, माँ उसके टुकड़ों को भी इसी उबलते हुए लपटे के अंदर डाल देती है। दोपहर में जब कड़े चूल्हे पर बना गर्म-गर्म भात (उबले हुए चावल) थाली में परोसा जाता है और उसके ऊपर यह सोहीना वाली गाढ़ी कढ़ी डाली जाती है, तो खाने का आनंद सौ गुना बढ़ जाता है।
✍️ निष्कर्ष: मन भरने वाला देसी भोजन
सोहीना बनाने की यह पूरी प्रक्रिया हमें सिखाती है कि भोजन अगर देसी और पारंपरिक तरीके से बना हो, तो पेट भर नहीं बल्कि मन भर खाया जाता है। आज के कृत्रिम पैकेट बंद खानों और रेस्तरां के भोजन में वह तृप्ति कभी नहीं मिल सकती, जो माँ के हाथों से हंसुए से कटे अरबी के पत्तों और भौजाई के सिल-लोढ़े पर पिसी उड़द की कढ़ी-भात में मिलती है। सोहीना की यह यात्रा महज़ एक पकवान की कहानी नहीं, बल्कि हमारे समृद्ध भारतीय ग्रामीण जीवन और बची हुई सांस्कृतिक विरासतों का सबसे खूबसूरत उत्सव है।
धार्मिक एवं सांस्कृतिक अस्वीकरण (Disclaimer):
इस लेख में प्रयुक्त सभी शब्द (जैसे सोहीना, पीठी, गान्ही, नोन, हंसुआ, सिकाउहुली, बटुला, उसनना, लपटा, भात आदि) विशुद्ध रूप से भारतीय ग्रामीण अंचलों की क्षेत्रीय बोलियों और लोक-संस्कृति से लिए गए हैं। अलग-अलग राज्यों या क्षेत्रों (जैसे गुजरात में पात्रा, महाराष्ट्र में अळू वडी) में इसे बनाने की विधि, मसालों के चयन और नामों में आंशिक भिन्नता हो सकती है। यह लेख पारंपरिक खान-पान की धरोहर को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लिखा गया है।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1. सोहीना (Sohina) क्या है और इसे अन्य क्षेत्रों में किन नामों से जाना जाता है?
उत्तर: सोहीना उत्तर भारत (विशेषकर अवध और पूर्वांचल) का एक बेहद लोकप्रिय पारंपरिक व्यंजन है। इसे अरबी के पत्तों और उड़द दाल की पीठी से बनाया जाता है। देश के अन्य हिस्सों में इसे रिकवच, गिरवच, पात्रा (गुजरात), अळू वडी (महाराष्ट्र) या भकोसे के नाम से भी जाना जाता है।
Q2. सोहीना बनाने के दौरान माँ का ‘पुरानी साड़ी’ पहनना क्यों ज़रूरी था?
उत्तर: अरबी के ताज़ा पत्तों को काटते, धोते और मोड़ते समय उनके डंठल से एक विशेष दूधिया रस (Latex) निकलता है। यदि यह रस कपड़ों पर लग जाए, तो बहुत ज़िद्दी और पक्के काले-कत्थई दाग छोड़ देता है, जो धोने से भी नहीं छूटते। इसलिए ग्रामीण महिलाएं इसे बनाते समय हमेशा गहरे रंग की पुरानी सूती साड़ी या कपड़े पहनती हैं।
Q3. पीठी तैयार करते समय मिलाई जाने वाली ‘गान्ही’ क्या है?
उत्तर: ग्रामीण लोक-भाषा में नमक (नोन), साबुत जीरा, काली मिर्च और हींग के पाचक मिश्रण को ‘गान्ही’ कहा जाता है। उड़द की दाल स्वभाव से भारी (बादी) होती है, इसलिए इस मसालेदार गान्ही का मिलना सोहीना को चटपटा बनाने के साथ-साथ सुपाच्य भी बनाता है।
Q4. अरबी के पत्तों से गले में होने वाली खुजली को कैसे दूर किया जाता है?
उत्तर: अरबी के पत्तों में प्राकृतिक रूप से ‘कैल्शियम ऑक्सलेट’ के कण होते हैं, जो गले में हल्की खराश या खुजली पैदा कर सकते हैं। इसे काटने के लिए सोहीना के साथ खटाई (अमचूर), नींबू, इमली या आम की भीगी हुई खटाई की तीखी चटनी का उपयोग अनिवार्य माना जाता है। कढ़ी (लपटा) में भी खट्टापन इसी वजह से डाला जाता है।
Q5. सोहीना से बनने वाले ‘लपटा’ या कढ़ी-भात का क्या महत्व है?
उत्तर: सुबह सोहीना बनाने के बाद सिल-लोढ़े और बर्तन में जो थोड़ी सी दाल की पीठी बची रह जाती है, उसे पानी में घोलकर हींग-मेथी से छौंका जाता है। पकने के बाद यह गाढ़ा सूप ‘लपटा’ कहलाता है। इसमें बचे हुए सोहीना के टुकड़े डालकर कढ़ी तैयार की जाती है, जिसे दोपहर में देसी उबले चावल (भात) के साथ बड़े चाव से खाया जाता है।
#सोहीनारेसिपी, #रिकवच, #देसीरसाई, #पारंपरिकस्वाद, #सिललोढ़ा, #अरबीकेपत्ते, #मांकेहाथकाखाना, #गाँवकाखाना, #देसीकढ़ीभात, #लपटाकढ़ी, #भकोसे, #SohinaRecipe, #Rikwach, #PatraRecipe, #AluVadi, #IndianVillageFood, #TraditionalCooking, #DesiKhana

