करियवा, मिठव्वा से मालदह तक: क्या आपको याद हैं गांव की बगिया के ये 15 देशी आम?
देशी आमों की बहार: गांव की बगिया का स्वाद, परंपरा और रिश्तों की मिठास – आधुनिक फल मंडियों और बड़े शहरों के सुपरमार्केट्स में आज अल्फोंसो, दशहरी, लंगड़ा, चौंसा और सफेदा जैसे गिने-चुने नामों की ही धूम रहती है। लोग इन्हें बड़े चाव से खरीदते हैं और फ्रिज में ठंडा करके खाते हैं। लेकिन भारत के ग्रामीण अंचलों, विशेषकर उत्तर प्रदेश के गोण्डा, बस्ती और अवध-पूर्वांचल के क्षेत्रों में आम का एक अलग ही संसार बसता है। यहाँ हाइब्रिड या विज्ञापनों वाले आम नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चले आ रहे अपनी माटी के ‘देशी आम’ राज करते हैं।
इन देशी आमों के नाम जितने अनोखे और चटपटे हैं, इनका स्वाद, आकार और रंग-रूप भी उतना ही बेमिसाल है। करियवा, खट्टहवा, मिठव्वा… ये सिर्फ आमों की किस्में नहीं हैं, बल्कि यह हर ग्रामीण के बचपन की यादें, आंधी-तूफान का रोमांच और आपस में मिल-बांटकर खाने की उस समृद्ध संस्कृति का हिस्सा हैं, जो सिर्फ हमारे गांवों में ही देखने को मिलती है। आइए, गांव की बगिया के इन अनोखे आमों, उनकी विशेषताओं और उनसे जुड़ी खूबसूरत ग्रामीण जीवनशैली की गहराई में उतरते हैं।
गांव के 15 पारंपरिक देशी आमों के नाम और उनकी अनोखी विशेषताएं जो अब लुप्त हो रही हैं!
नाम के अनुरूप स्वाद: हमारे गांव के अनोखे देशी आम
गांव के बुजुर्गों ने इन आमों के नाम बड़ी ही समझदारी और उनकी खासियतों को देखकर रखे हैं। जितने नाम, उतने स्वाद और उतनी ही अनूठी उनकी पहचान होती है। हमारे गांव की बगिया में मिलने वाले प्रमुख देशी आमों की सूची और उनकी विशेषताएं कुछ इस प्रकार हैं:
- करियवा: इस आम का छिलका पकने के बाद भी गहरा हरा या कुछ कालापन लिए होता है। रंग भले ही सांवला हो, लेकिन इसका स्वाद बहुत लाजवाब होता है।
- खट्टहवा: नाम से ही साफ है—यह आम पकने के बाद भी अपनी हल्की खटास नहीं छोड़ता। इसका उपयोग चटनी, पना या तीखे स्वाद के शौकीनों के लिए बेहतरीन होता है।
- मिठव्वा: यह आम मिठास की खान होता है। चीनी की तरह मीठा यह आम बच्चों का सबसे पसंदीदा होता है।
- चोपिहवा: इस आम को तोड़ते समय या खाते समय इसमें से ‘चोप’ (एक प्रकार का चिपचिपा प्राकृतिक गोंद) अधिक निकलता है। इसे खाने का अपना एक अलग ही देसी अंदाज है।
- सेनुरिहवा: इस आम का रंग सबसे खूबसूरत होता है। पकने पर इसके ऊपरी हिस्से पर सिंदूरी या लाल रंग की आभा बिखर जाती है, जो देखने में बेहद आकर्षक लगती है।
- कोनहवा: यह आम पूरी तरह गोल न होकर कोनों या कोणीय आकार (angular shape) का होता है, जिससे इसकी पहचान दूर से ही हो जाती है।
- बुदबुदीहवा: इसके छिलके पर छोटे-छोटे पानी के बुलबुलों या बूंदों जैसे निशान होते हैं, जिसके कारण इसे यह मजेदार नाम मिला है।
- उजरका: यह आम पकने के बाद भी अंदर और बाहर से बहुत हल्के पीले या उजले (सफेद) रंग का दिखता है।
- बैरिहवा: आकार में बहुत छोटा, लगभग बड़े बेर के बराबर होने के कारण इसे ‘बैरिहवा’ कहा जाता है। इसे एक बार में ही पूरा मुंह में डाला जा सकता है।
- भेलीहवा: गुड़ की भेली की तरह एकदम गाढ़ा, मीठा और गूदेदार आम, जिसे खाते ही मुंह मीठा हो जाता है।
- बताशवा: यह आम मुंह में जाते ही बताशे की तरह घुल जाता है। इसका रसा बेहद हल्का और मीठा होता है।
- झोप्पाहवा: यह आम पेड़ की डालियों पर अकेले नहीं, बल्कि हमेशा गुच्छों (झोप्पा) में फलता है। एक ही जगह कई आम लटके देखना बड़ा सुंदर दृश्य होता है।
- रेवरिहवा: रेवड़ी की तरह छोटा, चपटा और अनोखे स्वाद वाला यह आम भी अपनी एक अलग पहचान रखता है।
- मालदाह: यह देशी आमों का राजा माना जाता है। मालदह की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसका छिलका बेहद पतला और इसके भीतर का गूदा अत्यधिक रसदार व ज्यादा होता है। यही कारण है कि जब यह पेड़ से सीधे जमीन पर गिरता है, तो गिरते ही फट जाता है। इसकी इसी नाजुकता और रसीलेपन के कारण इसे ‘मालदह’ कहते हैं।
- बेलहवा: आकार में यह आम थोड़ा बड़ा और कुछ हद तक बेल के फल जैसा दिखाई देता है, इसलिए इसका नाम बेलहवा पड़ा।
रिश्तों की मिठास: क्यों गांवों में आज भी पेड़ के आम बेचे नहीं, बल्कि बांटे जाते हैं?
पेड़ से टपके आम का असली स्वाद और आंधी का रोमांच
इन सभी देशी आमों को खाने का असली स्वाद तब मिलता है, जब ये पेड़ पर पूरी तरह पककर खुद-ब-खुद नीचे टपकते हैं। इन्हें ‘टपका आम’ कहा जाता है। पाल (भूसे या बोरे) में पकाए गए आमों में वह बात कहाँ, जो डाल के पके टपके आम में होती है! इसकी सोंधी खुशबू और मिठास अमृत जैसी होती है।
इसी टपके आम को पाने के लिए गांवों में एक अनोखी होड़ मचती है। गर्मियों के दिनों में अभी सुबह की पहली किरण भी नहीं फूटती, मुंह अंधेरे ही गांव के लोग, बूढ़े और बच्चे हाथ में टॉर्च लेकर बगिया की तरफ दौड़ लगा देते हैं। उस समय नींद का कोई मोल नहीं होता। आम के सीजन में लोग जमीन पर उगे खर-पतवार, कटीली झाड़ियों और उनके बीच छिपे सांप-बिच्छू जैसे खतरनाक जीवों के डर को भी पूरी तरह भूल जाते हैं। बस ध्यान इस बात पर होता है कि कौन सबसे पहले पेड़ के नीचे पहुंचेगा और टपका हुआ आम बटोरेगा।
इस रोमांच का चरम तब देखने को मिलता है जब आधी रात को अचानक आंधी आ जाती है। जैसे ही तेज हवा चलती है और बादलों की गड़गड़ाहट होती है, लोग अपना गरम बिस्तर छोड़कर सीधे बगिया की तरफ भागते हैं। उस घने अंधेरे में पूरी बगिया में सिर्फ टॉर्च की रोशनी ही रोशनी मंडराती दिखाई देती है। हर पेड़ के नीचे बच्चों का शोर और बड़ों की आवाजें गूंजने लगती हैं। कड़ाके की आंधी और उड़ती धूल के बीच कच्चे-पक्के सारे आम बीनकर बोरे के बोरे भर लिए जाते हैं और सुरक्षित घर लाया जाता है।
बाल्टी की डुबकी और रसोई के पकवान
आंधी के बाद घर लाए गए इन आमों को सीधे नहीं खाया जाता। सबसे पहले पके हुए आमों को पानी से भरी बाल्टी या टब में कुछ घंटों के लिए भिगोकर रखा जाता है। पानी में भिगोने से आम की प्राकृतिक गर्मी (चोप का असर) निकल जाती है और वे ठंडे हो जाते हैं। इसके बाद पूरा परिवार एक साथ बैठकर जी भरकर इन आमों का रस चूसता है।
वहीं दूसरी ओर, बीनकर लाए गए कच्चे आमों का उपयोग रसोई में बड़े पैमाने पर होता है। महिलाएं इन कच्चे आमों को छीलकर सुखाती हैं, जिससे साल भर के लिए ‘खटाई’ (अमचूर) तैयार की जाती है। इसके साथ ही गर्मियों का खास व्यंजन ‘गलका’ (गुड़ और कच्चे आम की खट्टी-मीठी कड़ाही) बनाया जाता है, जिसकी खुशबू पूरी गली में महकती है।
रिश्तों की मिठास: “बेचा नहीं, बांटा जाता है”
गांव की सबसे सुंदर बात यह है कि वहाँ की खुशियाँ और स्वाद कभी भी किसी एक घर की चहारदीवारी तक सीमित नहीं रहते। आम, कटहल, नींबू और आंवला जैसे फल ग्रामीण जीवन में व्यावसायिक वस्तुएं नहीं, बल्कि आपसी प्रेम बढ़ाने का माध्यम हैं।
यदि किसी एक रिश्तेदार या पड़ोसी के घर पर आम या कटहल का बड़ा पेड़ है और उसमें भरपूर फल आए हैं, तो बाकी के अड़ोस-पड़ोस या दूर के रिश्तेदारों को बाजार से उन फलों को खरीदने की कभी जरूरत नहीं पड़ती। हमारे घरों में भी नियम यही रहा है कि अपने उपयोग से अधिक जो भी फल पैदा होता है, उसे कभी भी बाजार में चंद रुपयों के लिए बेचा नहीं जाता। इसके बजाय, उन फलों को टोकरियों और बोरों में भरकर अड़ोस-पड़ोस, पूरे गांव और नजदीक व दूर के सभी रिश्तेदारों के घरों में ‘उपहार’ स्वरूप भिजवा दिया जाता है, ताकि सब लोग मिलकर प्रकृति के इस स्वाद का आनंद ले सकें।
निष्कर्ष: गांव की बात ही निराली है
आज के इस दौर में जहां शहरों में हर चीज पैसों की तराजू पर तौली जाती है, वहीं हमारे गांवों की बात आज भी सबसे निराली है। गांवों में शहरों की तुलना में रुपए बेशक कम हो सकते हैं, लोगों के बैंक बैलेंस छोटे हो सकते हैं, लेकिन वहाँ के लोगों का दिल बहुत बड़ा होता है।
करियवा, मिठव्वा और मालदह जैसे देशी आमों की यह मिठास वास्तव में सिर्फ एक फल का स्वाद नहीं है; यह हमारे गांव के लोगों के बड़े दिल, उनके आपसी भाईचारे और निस्वार्थ प्रेम की मिठास है। आधुनिकता चाहे जितनी बढ़ जाए, लेकिन पेड़ से टपके आम को बीनने का वो रोमांच और अपनों के साथ मिल-बांटकर खाने का वो असीम सुख किसी भी बड़े शहर के वातानुकूलित मॉल में कभी नहीं खरीदा जा सकता।
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