लखनऊ: उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों सबसे बड़ी चर्चा ग्राम पंचायतों को लेकर है। प्रदेश की ग्राम पंचायतों का वर्तमान कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त होने जा रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि चुनाव की तैयारियां अब तक अधूरी हैं। ऐसे में ग्राम प्रधानों का कार्यकाल बढ़ाने या उन्हें प्रशासक नियुक्त करने की सुगबुगाहट तेज हो गई है।
चुनाव में देरी के 3 मुख्य कारण
पंचायती राज विभाग और राज्य निर्वाचन आयोग के सामने कई ऐसी चुनौतियां हैं, जिसकी वजह से समय पर चुनाव कराना लगभग असंभव लग रहा है:
- वोटर लिस्ट का काम अधूरा: राज्य निर्वाचन आयोग ने मतदाता सूची (Voter List) के पुनरीक्षण की समय-सीमा बढ़ा दी है। अब अंतिम सूची का प्रकाशन 10 जून 2026 तक होने की संभावना है। नियमों के अनुसार, वोटर लिस्ट के अंतिम प्रकाशन के बिना चुनाव की अधिसूचना जारी नहीं की जा सकती।
- OBC आरक्षण का पेंच: सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार, पंचायतों में पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण लागू करने के लिए ‘ट्रिपल टेस्ट’ और समर्पित आयोग की सिफारिशें अनिवार्य हैं। इस प्रक्रिया में लगने वाला समय चुनाव की तारीखों को आगे धकेल रहा है।
- न्यायालय में मामला: इलाहाबाद हाईकोर्ट चुनाव कार्यक्रम को लेकर सरकार से जवाब मांग चुका है। चूंकि कार्यकाल 26 मई को खत्म हो रहा है और वोटर लिस्ट जून में आएगी, इसलिए संवैधानिक संकट से बचने के लिए सरकार को बीच का रास्ता निकालना होगा।
सरकार के पास क्या हैं विकल्प?
पंचायती राज अधिनियम के तहत कार्यकाल खत्म होने के बाद गांव की बागडोर ‘प्रशासक’ (Administrator) को सौंपी जाती है। वर्तमान में सरकार दो बड़े विकल्पों पर विचार कर रही है:
- प्रशासकीय समिति का गठन: सरकार एक ऐसी समिति बना सकती है जिसका अध्यक्ष मौजूदा ग्राम प्रधान को ही बनाया जाए। इससे विकास कार्य नहीं रुकेंगे और प्रधानों का दबदबा भी कायम रहेगा।
- प्रशासकों की नियुक्ति: यदि कार्यकाल विस्तार नहीं दिया जाता, तो ब्लॉक स्तर के अधिकारियों (जैसे ADO Panchayat) को गांवों का प्रशासक नियुक्त किया जा सकता है। हालांकि, प्रधानों के संगठन इसका कड़ा विरोध कर रहे हैं।
ग्राम प्रधानों की मांग
उत्तर प्रदेश के ‘राष्ट्रीय पंचायती राज ग्राम प्रधान संगठन’ ने सरकार से अपील की है कि जब तक चुनाव नहीं होते, तब तक प्रधानों को ही काम करने की अनुमति दी जाए। उनका तर्क है कि अफसरों के हाथ में कमान जाने से गांवों के विकास कार्य ठप हो जाते हैं और भ्रष्टाचार की संभावना बढ़ जाती है।
निष्कर्ष
फिलहाल गेंद उत्तर प्रदेश सरकार के पाले में है। अगर 26 मई तक चुनाव नहीं होते, तो सरकार को अध्यादेश या विशेष आदेश के जरिए कार्यकाल पर फैसला लेना होगा। सूत्रों की मानें तो जुलाई 2026 से पहले चुनाव होने की संभावना कम है, जिसका सीधा मतलब है कि मौजूदा प्रधानों को कुछ महीनों की ‘एक्सटेंशन’ मिल सकती है।

