Indian Infantry Day 2026: जानें 27 अक्टूबर 1947 का इतिहास, कश्मीर ऑपरेशन, इंफेंट्री रेजीमेंट्स और मेजर सोमनाथ शर्मा का शौर्य!

पृष्ठभूमि में 1947 के ऐतिहासिक डकोटा विमान और अग्रभूमि में आधुनिक कॉम्बैट गियर व सिग सॉयर राइफल थामे बर्फीली पहाड़ियों पर डटे पराक्रमी भारतीय इन्फैंट्री के जवान।

Table of Contents

भारतीय पैदल सेना (इन्फैंट्री) दिवस (Indian Infantry Day): इतिहास, महत्व, 1947 के कश्मीर का सैन्य पराक्रम और ‘युद्ध के अग्रदूतों’ की वीर गाथा

भारतीय सेना का गौरवशाली इतिहास केवल सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन दुर्गम और असंभव परिस्थितियों में भारत माता के मस्तक को ऊंचा रखने की गाथा है, जहाँ आम इंसानों के हौसले जवाब दे जाते हैं। जब भी देश के सामने कोई अभूतपूर्व संकट आता है, चाहे वह शून्य से नीचे के तापमान वाले बर्फीले पहाड़ हों, थार का तपता हुआ रेगिस्तान हो या फिर उत्तर-पूर्व के घने जंगल—भारतीय सेना की एक ऐसी रीढ़ की हड्डी सबसे आगे खड़ी होती है जिसे सैन्य इतिहास में ‘इन्फैंट्री’ (Infantry) या पैदल सेना कहा जाता है। इन्फैंट्री को सम्मानपूर्वक ‘युद्ध की रानी’ (Queen of the Battle) और सेना के अग्रदूतों के रूप में जाना जाता है।

भारतीय थल सेना के इस सबसे बड़े, सबसे पुराने और सबसे जांबाज लड़ाकू अंग (Combat Arm) के अदम्य साहस, अदम्य संकल्प और मातृभूमि की वेदी पर प्राण न्योछावर करने वाले वीर शहीदों को नमन करने के लिए हर साल 27 अक्टूबर को पूरे देश में ‘भारतीय पैदल सेना (इन्फैंट्री) दिवस’ (Indian Infantry Day) बेहद गौरव, सम्मान और सैन्य परंपराओं के साथ मनाया जाता है।

यह विशेष दिन स्वतंत्र भारत के इतिहास के सबसे पहले, सबसे कठिन और सबसे निर्णायक मोड़ से जुड़ा हुआ है — वर्ष 1947 का भारत-पाकिस्तान युद्ध और कश्मीर को बचाने का ऐतिहासिक सैन्य ऑपरेशन। इस विस्तृत लेख में हम भारतीय पैदल सेना दिवस के गौरवशाली इतिहास, 1947 में कश्मीर घाटी में पहले इन्फैंट्री जवानों की लैंडिंग, मेजर सोमनाथ शर्मा (भारत के पहले परमवीर चक्र विजेता) का अद्वितीय पराक्रम, समकालीन राष्ट्रीय सुरक्षा में पैदल सेना का महत्व और आधुनिक हाइब्रिड युद्ध के युग में उनके सामने आने वाली चुनौतियों पर 1500 से अधिक शब्दों में व्यापक चर्चा करेंगे।


1. भारतीय पैदल सेना दिवस का संक्षिप्त विवरण (Overview)

भारतीय पैदल सेना दिवस का प्राथमिक उद्देश्य देश के नागरिकों के भीतर राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति चेतना जगाना, पैदल सेना के वीर जवानों और शहीदों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना और देश की संप्रभुता व क्षेत्रीय अखंडता को बनाए रखने के उनके अटूट संकल्प को दोहराना है।

महत्वपूर्ण पहलूविवरण
उत्सव का नामभारतीय पैदल सेना (इन्फैंट्री) दिवस (Indian Infantry Day)
आयोजन की तिथि27 अक्टूबर (प्रतिवर्ष)
ऐतिहासिक संदर्भ27 अक्टूबर 1947 (सिख रेजीमेंट के जवानों की श्रीनगर में पहली लैंडिंग)
मुख्य नोडल केंद्रीय निकायभारतीय थल सेना (Indian Army) और रक्षा मंत्रालय
सर्वोच्च सैन्य सम्मान संदर्भमेजर सोमनाथ शर्मा (4 कुमाऊं) — भारत के प्रथम परमवीर चक्र (PVC) विजेता
मुख्य नारा / संदेश“इन्फैंट्री — युद्ध की रानी, राष्ट्र की ढाल”

2. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 27 अक्टूबर 1947 का वह निर्णायक दिन

पैदल सेना दिवस को मनाए जाने की कहानी स्वतंत्र भारत के पहले और सबसे बड़े भू-राजनीतिक व सैन्य संकट से जुड़ी हुई है। 15 अगस्त 1947 को जब भारत आजाद हुआ, तब देश का विभाजन भी हुआ। जम्मू-कश्मीर रियासत के महाराजा हरि सिंह ने उस समय तक न तो भारत में शामिल होने का फैसला किया था और न ही पाकिस्तान में। वे असमंजस की स्थिति में थे।

क. पाकिस्तानी कबाइलियों का विश्वासघाती हमला:

इस असमंजस का लाभ उठाते हुए, पाकिस्तान की सेना ने कबाली पठानों और आतंकवादियों (लड़ाकों) के छद्म भेष में 22 अक्टूबर 1947 को जम्मू-कश्मीर पर एक बड़ा और विश्वासघाती आक्रमण बोल दिया। इस ऑपरेशन को पाकिस्तान ने ‘ऑपरेशन गुलमर्ग’ नाम दिया था। आधुनिक हथियारों से लैस हजारों कबाली हमलावर मुजफ्फराबाद और बारामूला को तहस-नहस करते हुए बहुत तेजी से श्रीनगर की ओर बढ़ रहे थे। उनका मुख्य उद्देश्य श्रीनगर हवाई अड्डे पर कब्जा करना और पूरी कश्मीर घाटी को भारत से अलग करना था। महाराजा की स्थानीय राज्य सेना इस भारी हमले के सामने टिक नहीं सकी।

ख. विलय पत्र पर हस्ताक्षर और नेहरू सरकार का फैसला:

संकट को भांपते हुए महाराजा हरि सिंह ने भारत सरकार से सैन्य मदद की गुहार लगाई। 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा ने आधिकारिक तौर पर भारत के साथ ‘विलय पत्र’ (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर कर दिए। जैसे ही कश्मीर कानूनी तौर पर भारत का अभिन्न अंग बना, तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में कैबिनेट ने तुरंत कश्मीर की रक्षा के लिए भारतीय सेना को भेजने का ऐतिहासिक और साहसिक फैसला लिया।

ग. 27 अक्टूबर 1947: सिख रेजीमेंट की ऐतिहासिक एयर-लैंडिंग:

उस समय कश्मीर तक जाने के लिए कोई पक्की सड़क नहीं थी। जवाहरलाल नेहरू के आदेश पर भारतीय वायु सेना (IAF) और निजी विमानन कंपनियों के डकोटा विमानों (Dakota Aircraft) की मदद से एक अभूतपूर्व एयरलिफ्ट ऑपरेशन शुरू किया गया। 27 अक्टूबर 1947 के तड़के भारतीय सेना की 1 सिख रेजीमेंट की पहली टुकड़ी, जिसका नेतृत्व लेफ्टिनेंट कर्नल दीवान रंजीत राय कर रहे थे, श्रीनगर हवाई अड्डे पर उतरी।

यह स्वतंत्र भारत का पहला सैन्य ऑपरेशन था। अगर हमारे इन्फैंट्री के जवान उस दिन कुछ घंटे भी देरी से पहुँचते, तो श्रीनगर हवाई अड्डे पर पाकिस्तान का कब्जा हो चुका होता और कश्मीर का इतिहास कुछ और होता। सिख रेजीमेंट के इन वीर जवानों ने हवाई अड्डे पर उतरते ही तुरंत मोर्चा संभाला और दुश्मन को श्रीनगर की सीमाओं के बाहर खदेड़ना शुरू कर दिया। इस शुरुआती और सफल ऑपरेशन के कारण ही 27 अक्टूबर को हर साल ‘इन्फैंट्री दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।


3. बडगाम की लड़ाई (Battle of Badgam) और मेजर सोमनाथ शर्मा का अमर बलिदान

श्रीनगर हवाई अड्डे को सुरक्षित करने के बाद, भारतीय पैदल सेना के सामने सबसे बड़ी चुनौती दुश्मन को पूरी तरह से रोकना था। इसी सिलसिले में 3 नवंबर 1947 को कश्मीर के सैन्य इतिहास की सबसे प्रसिद्ध और रक्तरंजित लड़ाई लड़ी गई, जिसे ‘बडगाम की लड़ाई’ (Battle of Badgam) कहा जाता है।

क. 4 कुमाऊं रेजीमेंट का मोर्चा:

4 कुमाऊं रेजीमेंट की ‘डी’ कंपनी, जिसका नेतृत्व मेजर सोमनाथ शर्मा कर रहे थे, को बडगाम क्षेत्र में गश्त और हवाई अड्डे की सुरक्षा का जिम्मा सौंपा गया था। मेजर सोमनाथ शर्मा का दाहिना हाथ पहले से ही खेल के दौरान लगी चोट के कारण प्लास्टर में बंधा हुआ था, लेकिन उन्होंने अपनी कंपनी के साथ मोर्चे पर जाने की कड़ा जिद की थी।

ख. 700 हमलावरों के खिलाफ मात्र 50 जवान:

बडगाम में अचानक तीन तरफ से 700 से अधिक पाकिस्तानी हमलावरों ने भारी मोर्टार और स्वचालित हथियारों से मेजर सोमनाथ की टुकड़ी पर हमला बोल दिया। भारतीय जवानों की संख्या मात्र 50 के आस-पास थी, यानी दुश्मन हमसे 10 गुना से भी अधिक शक्तिशाली था। संख्या बल में भारी कमी के बावजूद मेजर सोमनाथ ने पीछे हटने से साफ मना कर दिया। उन्होंने अपने घायल हाथ की परवाह न करते हुए स्वयं जवानों के लिए लाइट मशीन गन (LMG) की मैगजीन भरना शुरू किया।

ग. अंतिम रेडियो संदेश और शहादत:

जब दुश्मन उनकी चौकी के बिल्कुल करीब पहुँच गया, तब मेजर सोमनाथ शर्मा ने ब्रिगेड मुख्यालय को अपना अंतिम और ऐतिहासिक रेडियो संदेश भेजा था, जो आज भी भारतीय सेना की रगों में दौड़ता है:

“दुश्मन हमसे केवल 50 गज की दूरी पर है। हमारी संख्या बहुत कम रह गई है। हम भयानक गोलाबारी के अधीन हैं। लेकिन मैं एक इंच भी पीछे नहीं हटूंगा और अपनी आखिरी गोली व आखिरी जवान तक लड़ता रहूंगा।”

इसके तुरंत बाद एक मोर्टार का गोला उनकी चौकी पर आकर गिरा, जिससे मेजर सोमनाथ शर्मा वीरगति को प्राप्त हो गए। लेकिन उनके इस अदम्य साहस और जवानों के बलिदान ने दुश्मन को इतनी देर तक रोक कर रखा कि भारत से अतिरिक्त कुमुक (सैनिक सहायता) वहाँ पहुँच गई और श्रीनगर हवाई अड्डा पूरी तरह सुरक्षित रहा। मेजर सोमनाथ शर्मा को उनकी इस अद्वितीय वीरता और सर्वोच्च राष्ट्रभक्ति के लिए मरणोपरांत स्वतंत्र भारत का पहला ‘परमवीर चक्र’ (Paramilitary Cross / PVC) प्रदान किया गया।


4. इन्फैंट्री (पैदल सेना) क्या है और थल सेना में इसकी क्या भूमिका है?

सैन्य शब्दावली में इन्फैंट्री (Infantry) थल सेना का वह मुख्य लड़ाकू अंग है जिसके जवान पैदल चलकर या आधुनिक बख्तरबंद वाहनों (Mechanized Infantry) के जरिए सीधे आमने-सामने की लड़ाई (Close Combat) में दुश्मन से लोहा लेते हैं।

क. ‘बूट्स ऑन द ग्राउंड’ (Boots on the Ground) का महत्व:

आधुनिक युद्धों में भले ही गगनचुंबी मिसाइलें, अत्याधुनिक सुखोई लड़ाकू विमान या भारी टैंक कितनी भी बमबारी कर लें, लेकिन सैन्य विज्ञान का यह बुनियादी नियम है कि जब तक इन्फैंट्री का कोई जवान अपने पैरों पर चलकर दुश्मन के बंकर पर तिरंगा नहीं लहराता, तब तक उस जमीन पर वास्तविक विजय (Territorial Control) हासिल नहीं मानी जाती। इन्फैंट्री ही वह अंतिम बल है जो जमीन पर कब्जा करता है और उसे बनाए रखता है।

ख. भारतीय सेना की प्रमुख इन्फैंट्री रेजीमेंट्स:

भारतीय इन्फैंट्री का ढांचा इसकी ऐतिहासिक और वीर रेजीमेंट्स के गौरव पर टिका है, जिनमें से प्रत्येक का अपना एक समृद्ध इतिहास, युद्धघोष (War Cry) और पराक्रम की गाथा है:

  • राजपूत रेजीमेंट, सिख रेजीमेंट, कुमाऊं रेजीमेंट, गढ़वाल राइफल्स, गोरखा राइफल्स, मराठा लाइट इन्फैंट्री, मद्रास रेजीमेंट, डोगरा रेजीमेंट, राजपूताना राइफल्स, और बिहार रेजीमेंट आदि।
    इन सभी रेजीमेंट्स ने 1965, 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध, 1999 के कारगिल युद्ध और चीनी सीमाओं पर रेजांग ला व गलवान घाटी के संघर्षों में अपने पराक्रम का लोहा मनवाया है।

5. समकालीन भारत और नियंत्रण रेखा (LoC) पर इन्फैंट्री की भूमिका

आजादी के बाद से आज तक, भारत की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा की अग्रिम पंक्ति में हमारी पैदल सेना ही तैनात है। उनके योगदान को निम्नलिखित मोर्चों से समझा जा सकता है:

  • सियाचिन ग्लेशियर (दुनिया का सबसे ऊंचा युद्धक्षेत्र): समुद्र तल से 20,000 फीट की ऊंचाई पर, जहाँ तापमान शून्य से नीचे 50 डिग्री सेल्सियस तक चला जाता है, जहाँ सांस लेने के लिए ऑक्सीजन नहीं है और बर्फीले तूफान (Blizzards) आम बात हैं, वहाँ इन्फैंट्री (जैसे लद्दाख स्काउट्स, गोरखा, मद्रास रेजीमेंट) के जवान हाड़ कँपा देने वाली ठंड में मुस्तैदी से सीमाओं की रखवाली करते हैं।
  • काउंटर-इंसर्जेंसी (आतंकवाद विरोधी अभियान): जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा (LoC) पर घुसपैठ को रोकने (Anti-Infiltration Grid) और घाटी के भीतर आतंकवादियों का सफाया करने में भारतीय पैदल सेना की विशेष विंग ‘राष्ट्रीय राइफल्स’ (Rashtriya Rifles – RR) और पूर्वोत्तर में ‘असम राइफल्स’ अग्रिम भूमिका निभाती हैं। उनके त्वरित और सटीक ऑपरेशन्स के कारण ही देश के भीतर शांति व्यवस्था बनी रहती है।
  • कारगिल युद्ध (1999) की विजय: कारगिल की दुर्गम और सीधी पहाड़ियों (जैसे तोलोलिंग, टाइगर हिल) पर पाकिस्तानी सेना ने बंकर बना लिए थे। भारतीय इन्फैंट्री के जवानों ने (जैसे 18 ग्रेनेडियर्स के कैप्टन विक्रम बत्रा, 2 राजपूताना राइफल्स के मेजर विवेक गुप्ता) नीचे से ऊपर की ओर चढ़ाई करते हुए, आमने-सामने की संगीन लड़ाई (Hand-to-Hand Combat) लड़कर उन चोटियों को दुश्मन से मुक्त कराया था।

6. आधुनिक हाइब्रिड युद्ध (Hybrid Warfare) और पैदल सेना की समसामयिक चुनौतियाँ

21वीं सदी में युद्ध का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। आधुनिक युग में केवल गोलियों और तोपों से लड़ाई नहीं होती, बल्कि यह तकनीकी और डिजिटल रूप ले चुकी है। इस बदलते परिदृश्य में भारतीय इन्फैंट्री के सामने कई बड़ी चुनौतियाँ हैं:

क. ड्रोन (Drones) और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध का खतरा:

आधुनिक युद्धक्षेत्रों (जैसे हाल के रूस-यूक्रेन या मध्य पूर्व के संघर्षों) में छोटे आत्मघाती ड्रोन (Kamikaze Drones) और थर्मल इमेजिंग कैमरों के कारण जमीन पर चल रहे पैदल सैनिकों को आसानी से निशाना बनाया जा सकता है। भारतीय इन्फैंट्री को अब ड्रोन-विरोधी तकनीकों (Anti-Drone Systems) और जैमर्स से लैस करने की तत्काल आवश्यकता है।

ख. आधुनिकीकरण (Future Infantry Soldier – F-INSAS):

भारतीय सेना अब अपने पैदल सैनिकों को ‘फ्यूचर इन्फैंट्री सोल्जर’ (F-INSAS) प्रोग्राम के तहत अपग्रेड कर रही है। इसके तहत प्रत्येक जवान को आधुनिक सिग सॉयर (SIG Sauer) राइफलें, हल्के वजन वाले बुलेटप्रूफ जैकेट, अत्याधुनिक नाइट विजन हेलमेट (जिसमें होलोग्राफिक डिस्प्ले और संचार उपकरण लगे हों) प्रदान किए जा रहे हैं, ताकि वे किसी भी हाई-टेक युद्ध में दुश्मन पर भारी पड़ सकें।

ग. शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का प्रबंधन:

लगातार दुर्गम क्षेत्रों में तैनाती, परिवारों से महीनों दूर रहना और अत्यधिक तनावपूर्ण वातावरण के कारण जवानों के मानसिक स्वास्थ्य (PTSD) का प्रबंधन करना सैन्य नेतृत्व के लिए एक बड़ी जिम्मेदारी बन चुका है।


7. 27 अक्टूबर को आयोजित होने वाले मुख्य सैन्य समारोह

इस गौरवशाली दिन पर देश भर के सैन्य प्रतिष्ठानों में कई अत्यंत गरिमापूर्ण और औपचारिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है:

  • राष्ट्रीय युद्ध स्मारक (National War Memorial) पर श्रद्धांजलि: नई दिल्ली में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS), थल सेनाध्यक्ष (Army Chief) और इन्फैंट्री के वरिष्ठतम अधिकारी अमर चक्र पर पुष्पचक्र अर्पित कर वीर शहीदों को श्रद्धांजलि देते हैं।
  • दिग्गजों (Veterans) का सम्मान: इस दिन सेना के सेवानिवृत्त इन्फैंट्री अधिकारियों और परमवीर चक्र, महावीर चक्र विजेताओं को विशेष रूप से आमंत्रित कर सम्मानित किया जाता है और उनके अनुभवों को युवा अधिकारियों के साथ साझा किया जाता है।
  • रेजीमेंटल सेंटर्स पर परेड: देश भर के सभी इन्फैंट्री रेजीमेंटल सेंटर्स (जैसे कुमाऊं सेंटर रानीखेत, सिख सेंटर रामगढ़) में भव्य सैन्य परेड और हथियारों की प्रदर्शनियों का आयोजन किया जाता है।

निष्कर्ष (Conclusion)

भारतीय पैदल सेना का प्रत्येक जवान केवल खाकी या कॉम्बैट वर्दी में लिपटा एक सैनिक नहीं है, वह भारत माता की अखंडता का साक्षात सुरक्षा कवच है। उनका त्याग और समर्पण आम इंसानों की कल्पना से परे है। जब हम अपने परिवारों के साथ सुरक्षित माहौल में त्योहारों की खुशियां मना रहे होते हैं, तब ये जांबाज सैनिक माइनस डिग्री तापमान में बर्फीली चोटियों पर हाथ में राइफल थामे रात-दिन जाग रहे होते हैं।

भारतीय पैदल सेना दिवस पूरी मानवता और भारतीय समाज को यह याद दिलाने का अवसर है कि हमारी स्वतंत्रता और संप्रभुता की जो कीमत इन वीर शहीदों ने अपने प्राणों से चुकाई है, उसका सम्मान करना हमारा सबसे बड़ा नागरिक कर्तव्य है। आइए, इस 27 अक्टूबर को हम सब मिलकर 1947 के उन जांबाज सिपाही भाइयों, मेजर सोमनाथ शर्मा और देश के सभी वीर इन्फैंट्री जवानों के शौर्य को शत-शत नमन करें, और सेना के इन अग्रदूतों के प्रति अपनी अटूट कृतज्ञता व्यक्त करते हुए एक सशक्त, सुरक्षित और गौरवान्वित भारत के निर्माण का अटूट संकल्प लें।

“वीर भोग्या वसुंधरा — भारतीय पैदल सेना (इन्फैंट्री) दिवस की सभी वीर जवानों और देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं!”


भारतीय पैदल सेना (इन्फैंट्री) दिवस (Indian Infantry Day) से जुड़े कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण और अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs):

Q1. भारतीय पैदल सेना (इन्फैंट्री) दिवस हर साल 27 अक्टूबर को ही क्यों मनाया जाता है?

उत्तर:27 अक्टूबर 1947 को स्वतंत्र भारत का पहला सैन्य ऑपरेशन शुरू हुआ था। इसी दिन भारतीय थल सेना की 1 सिख रेजीमेंट की पहली सैन्य टुकड़ी डकोटा विमानों के जरिए श्रीनगर हवाई अड्डे पर उतरी थी। इन जवानों ने पाकिस्तानी कबीलाई हमलावरों से कश्मीर घाटी और श्रीनगर को पूरी तरह सुरक्षित किया था। पैदल सेना के इसी ऐतिहासिक पराक्रम की याद में प्रतिवर्ष 27 अक्टूबर को यह दिवस मनाया जाता है।

Q2. स्वतंत्र भारत का पहला ‘परमवीर चक्र’ (PVC) किसे मिला था और उनका संबंध किस लड़ाई से था?

उत्तर: स्वतंत्र भारत का पहला परमवीर चक्र 4 कुमाऊं रेजीमेंट के मेजर सोमनाथ शर्मा को मरणोपरांत मिला था। उनका संबंध 3 नवंबर 1947 को लड़ी गई ‘बडगाम की लड़ाई’ से था, जहाँ उन्होंने मात्र 50 जवानों के साथ 700 से अधिक पाकिस्तानी हमलावरों का डटकर सामना किया था और श्रीनगर हवाई अड्डे की रक्षा करते हुए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था।

Q3. सैन्य विज्ञान में इन्फैंट्री (Infantry) को ‘युद्ध की रानी’ (Queen of the Battle) क्यों कहा जाता है?

उत्तर: सैन्य इतिहास और रणनीति में इन्फैंट्री को ‘युद्ध की रानी’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि हवाई हमलों, तोपों और टैंकों की भारी बमबारी के बावजूद, युद्ध के मैदान में वास्तविक और अंतिम विजय (Territorial Control) तभी सुनिश्चित होती है जब पैदल सेना का जवान जमीन पर अपने कदम रखता है (‘boots on the ground’) और दुश्मन के बंकरों पर भौतिक रूप से कब्जा करता है। इन्फैंट्री ही सेना का सबसे अनिवार्य और निर्णायक अंग है।

Q4. भारतीय थल सेना के ‘फ्यूचर इन्फैंट्री सोल्जर’ (F-INSAS) प्रोग्राम का क्या उद्देश्य है?

उत्तर:F-INSAS (Future Infantry Soldier as a System) प्रोग्राम का मुख्य उद्देश्य भारतीय पैदल सेना के जवानों को आधुनिक हाइब्रिड और डिजिटल युद्धक्षेत्रों के अनुकूल पूरी तरह से हाई-टेक बनाना है। इसके तहत सैनिकों को अत्याधुनिक सिग सॉयर राइफलें, हल्के वजन के बैलिस्टिक बुलेटप्रूफ जैकेट, थर्मल इमेजिंग कैमरे, और संचार प्रणालियों से लैस आधुनिक हेलमेट प्रदान किए जा रहे हैं।

Q5. जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियानों के लिए विशेष रूप से गठित इन्फैंट्री की विंग का क्या नाम है?

उत्तर: जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों और नियंत्रण रेखा (LoC) पर घुसपैठ को नाकाम करने के लिए विशेष रूप से गठित की गई इन्फैंट्री की विंग का नाम ‘राष्ट्रीय राइफल्स’ (Rashtriya Rifles – RR) है। इसी प्रकार पूर्वोत्तर भारत की पहाड़ियों में उग्रवाद से लड़ने के लिए ‘असम राइफल्स’ तैनात है।

Q6. मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री (Mechanized Infantry) क्या होती है?

उत्तर: पारंपरिक पैदल सेना जहाँ पूरी तरह अपने पैरों पर चलकर या सामान्य वाहनों से लड़ती है, वहीं मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री आधुनिक बख्तरबंद लड़ाकू वाहनों (जैसे BMP Infantry Combat Vehicles) से लैस होती है। ये जवान टैंकों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर बहुत तेज गति से दुश्मन के इलाकों में प्रवेश करते हैं और बख्तरबंद सुरक्षा के साथ सीधे गोलाबारी के बीच मैदान में उतरकर क्लोज कॉम्बैट लड़ सकते हैं।


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