पशुधन एवं डेयरी विकास योजनाएं उत्तर प्रदेश: गांवों में श्वेत क्रांति और पशुपालकों की आय दोगुनी करने का नया डिजिटल रोडमैप

उत्तर प्रदेश में नंद बाबा दुग्ध मिशन के तहत आधुनिक और स्वच्छ डेयरी फार्म में उन्नत नस्ल की स्वदेशी गायों के साथ मुस्कुराता हुआ भारतीय पशुपालक (A smiling Indian dairy farmer with high-yield indigenous cows inside a modern and clean dairy farm in Uttar Pradesh under the Nand Baba Milk Mission)

Table of Contents

उत्तर प्रदेश में पशुधन एवं डेयरी विकास योजनाएं: श्वेत क्रांति, ग्रामीण उद्यमिता और किसानों की आर्थिक समृद्धि का नया रोडमैप

१. प्रस्तावना (Introduction)

उत्तर प्रदेश केवल जनसंख्या और भूगोल के दृष्टिकोण से ही देश का सबसे बड़ा राज्य नहीं है, बल्कि यह भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि परिदृश्य का भी मुख्य इंजन है। राज्य की लगभग ७० प्रतिशत से अधिक आबादी ग्रामीण अंचलों में निवास करती है, जिनकी आजीविका का प्राथमिक स्रोत कृषि है। हालांकि, केवल पारंपरिक खेती (Farming) पर निर्भर रहकर ग्रामीण आय को दोगुना करना और आर्थिक स्थिरता प्राप्त करना अत्यंत कठिन है। मौसम की मार, कभी सूखा तो कभी अत्यधिक बाढ़ और फसलों के अनिश्चित बाजार मूल्यों के बीच पशुपालन (Animal Husbandry) और डेयरी विकास (Dairy Development) किसानों के लिए एक मजबूत आर्थिक सुरक्षा कवच (Safety Net) प्रदान करते हैं।

उत्तर प्रदेश देश में सर्वाधिक पशुधन (Livestock Population) और शीर्ष दुग्ध उत्पादक (Milk Producer) राज्यों में से एक है। ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालन न केवल भूमिहीन, लघु और सीमांत किसानों को नियमित दैनिक आय (Daily Income) प्रदान करता है, बल्कि महिला सशक्तिकरण और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने में भी अग्रणी भूमिका निभाता है। इस क्षेत्र की अपार संभावनाओं को देखते हुए, उत्तर प्रदेश सरकार के पशुधन विभाग और दुग्ध विकास विभाग ने ‘पशुधन एवं डेयरी विकास योजनाएं’ (Livestock and Dairy Development Schemes) बड़े पैमाने पर शुरू की हैं। पूरी तरह से डिजिटल गवर्नेंस और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) पर आधारित ये योजनाएं उत्तर प्रदेश के गांवों में एक नई ‘श्वेत क्रांति’ (White Revolution) का सूत्रपात कर रही हैं।


२. योजना की पृष्ठभूमि और प्रशासनिक संकल्पना

उत्तर प्रदेश में पशुपालन और डेयरी विकास को वैज्ञानिक और व्यावसायिक रूप देने के लिए एक बहुआयामी प्रशासनिक ढांचा तैयार किया गया है। इसके तहत राज्य सरकार ‘राष्ट्रीय गोकुल मिशन’ (Rashtriya Gokul Mission), ‘पशुधन अवसंरचना विकास निधि’ (AHIDF) जैसी केंद्रीय योजनाओं को राज्य की विशिष्ट प्राथमिकताओं के साथ एकीकृत करके चला रही है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने राजकोष से भारी बजटीय आवंटन करके नस्ल सुधार (Breed Improvement), पशु स्वास्थ्य, दुग्ध प्रसंस्करण (Milk Processing) और विपणन (Marketing) के लिए एक सुदृढ़ इकोसिस्टम तैयार किया है। सबसे बड़ा प्रशासनिक सुधार इन योजनाओं को ऑनलाइन पोर्टल्स (जैसे सरल और पारदर्शी डीबीटी पोर्टल) पर लाना है, जिससे पशुपालकों को मिलने वाले अनुदान, लोन और पशु चिकित्सा सेवाओं में बिचौलियों का नेटवर्क पूरी तरह ध्वस्त हो गया है।


३. प्रमुख पशुधन विकास योजनाएं (Core Livestock Schemes)

उत्तर प्रदेश सरकार ने गोवंश (Cattle) और महिषवंश (Buffalo) के संरक्षण, नस्ल सुधार और पशुपालकों की आय बढ़ाने के लिए कई क्रांतिकारी योजनाएं शुरू की हैं:

क) मुख्यमंत्री प्रगतिशील पशुपालक प्रोत्साहन योजना

इस योजना का मुख्य उद्देश्य राज्य के पशुपालकों को स्वदेशी उन्नत नस्ल की गायों (जैसे साहीवाल, गीर, थारपारकर, हरियाणा और गंगातीरी) को पालने के लिए प्रोत्साहित करना है।

  • वित्तीय प्रोत्साहन: यदि कोई पशुपालक इन स्वदेशी नस्ल की गायों से उच्च दुग्ध उत्पादन प्राप्त करता है, तो सरकार उसे ₹१०,००० से लेकर ₹१५,००० तक का नकद पुरस्कार और प्रशस्ति पत्र प्रदान करती है।
  • इससे राज्य में उच्च आनुवंशिक क्षमता (High Genetic Merit) वाले स्वदेशी गोवंश की संख्या में भारी वृद्धि हो रही है।

ख) नंद बाबा दुग्ध मिशन (Nand Baba Milk Mission)

उत्तर प्रदेश को दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में देश का सबसे अग्रणी और आत्मनिर्भर राज्य बनाने के लिए ₹१,००० करोड़ के बजटीय परिव्यय के साथ ‘नंद बाबा दुग्ध मिशन’ का संचालन किया जा रहा है।

  • इसके तहत ग्रामीण क्षेत्रों में ‘नंदी प्रोग्रेसिव फार्मर्स क्लब’ बनाए जा रहे हैं।
  • पशुपालकों को उन्नत नस्ल के दुधारू पशु खरीदने के लिए भारी सब्सिडी दी जा रही है।
  • गांवों में ही दूध की बिक्री के लिए डिजिटल दूध संग्रह केंद्र (Amul / Parag डेयरी के सहयोग से) स्थापित किए जा रहे हैं, ताकि किसानों को उनके दूध का सही और पारदर्शी मूल्य मिल सके।

ग) मुख्यमंत्री स्वदेशी गौ-संवर्धन योजना

यह योजना विशेष रूप से ग्रामीण युवाओं और महिला स्वयं सहायता समूहों (SHGs) को पशुपालन के माध्यम से उद्यमी बनाने के लिए डिज़ाइन की गई है।

  • इसके तहत यदि कोई व्यक्ति अन्य राज्यों से उन्नत नस्ल की स्वदेशी गाएं (गीर, साहीवाल आदि) खरीदकर लाता है, तो उसे परिवहन, पशु बीमा और खरीद लागत पर ४० प्रतिशत तक की भारी सब्सिडी (अधिकतम ₹८०,००० तक) दी जाती है।
  • यह योजना ग्रामीण क्षेत्रों में रिवर्स माइग्रेशन (Reverse Migration) को बढ़ावा दे रही है, जहां युवा शहरों की नौकरी छोड़कर गांवों में उन्नत डेयरी फार्म खोल रहे हैं।

घ) पशुधन स्वास्थ्य एवं रोग नियंत्रण योजना (Mobile Veterinary Units)

पशुओं को बीमारियों से बचाने और सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में पशु चिकित्सा सेवा पहुंचाने के लिए यह एक अत्यंत मानवीय और प्रभावी योजना है।

  • सरकार ने राज्य में सैकड़ों ‘मोबाईल वेटरनरी यूनिट्स’ (MVUs) या एम्बुलेंस सेवाएं शुरू की हैं।
  • किसान केवल एक टोल-फ्री नंबर (1962) पर कॉल करके अपने घर पर ही सरकारी पशु चिकित्सक और मुफ्त दवाएं प्राप्त कर सकता है।
  • इसके अलावा, खुरपका-मुंहपका (FMD) और ब्रुसेलोसिस जैसी घातक बीमारियों के खिलाफ शत-प्रतिशत निःशुल्क टीकाकरण (Vaccination) अभियान चलाया जा रहा है।

४. डेयरी विकास और प्रसंस्करण योजनाएं (Dairy Development Model)

केवल दूध का उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, जब तक कि उसके प्रसंस्करण (Processing) और मूल्य संवर्धन (Value Addition) की मजबूत व्यवस्था न हो। इसके लिए उत्तर प्रदेश सरकार निम्नलिखित योजनाएं संचालित कर रही है:

क) उत्तर प्रदेश दुग्धशाला विकास एवं दुग्ध उत्पाद प्रोत्साहन नीति

इस नीति के अंतर्गत राज्य में लघु और मध्यम स्तर के डेयरी उद्योग स्थापित करने के लिए निवेशकों और पशुपालकों को अभूतपूर्व प्रोत्साहन दिए जा रहे हैं:

  • पूंजीगत अनुदान (Capital Subsidy): डेयरी प्रोसेसिंग यूनिट, चिलिंग सेंटर (Bulk Milk Coolers), और दुग्ध उत्पादों (घी, पनीर, मक्खन) के निर्माण संयंत्र स्थापित करने पर कुल परियोजना लागत का १०% से २५% तक का अनुदान दिया जाता है।
  • ब्याज सबवेंशन (Interest Subvention): बैंकों से लिए गए ऋण के ब्याज पर ५% तक की छूट दी जाती है।
  • स्टाम्प ड्यूटी में छूट: डेयरी उद्योग के लिए भूमि खरीदने या लीज पर लेने पर १००% स्टाम्प ड्यूटी माफ की जाती है।

ख) बालकृष्ण दुग्ध उत्पादक प्रोत्साहन योजना

यह योजना विशेष रूप से सहकारी दुग्ध समितियों (Cooperative Milk Societies) को मजबूत करने के लिए शुरू की गई है। इसके तहत गांवों में ‘पराग’ (Parag) या अन्य सहकारी समितियों को दूध देने वाले छोटे दुग्ध उत्पादकों को प्रति लीटर दूध पर सरकार की तरफ से अतिरिक्त बोनस या प्रोत्साहन राशि सीधे उनके बैंक खातों (DBT) में भेजी जाती है।

ग) गो-आश्रय स्थल और निराश्रित गोवंश सहभागिता योजना

उत्तर प्रदेश में बेसहारा गोवंश प्रबंधन एक बड़ी सामाजिक और कृषि चुनौती रहा है। इससे निपटने के लिए सरकार ने दोतरफा रणनीति अपनाई है:

  1. वृहत गो-संरक्षण केंद्र: राज्य भर में हजारों आधुनिक गो-आश्रय स्थल बनाए गए हैं, जहां बेसहारा पशुओं के चारे और चिकित्सा की व्यवस्था की जाती है।
  2. सहभागिता योजना: यदि कोई ग्रामीण किसान गो-आश्रय स्थल से किसी बेसहारा गाय को गोद लेकर उसकी देखरेख करता है, तो सरकार उसे पशु के चारे के लिए ₹५० प्रति पशु प्रतिदिन (यानी ₹१,५०० प्रति माह) की वित्तीय सहायता सीधे डीबीटी के माध्यम से प्रदान करती है। इससे किसानों को अतिरिक्त आय मिलती है और आवारा पशुओं की समस्या का भी समाधान होता है।

५. पात्रता के मानदंड और आवश्यक दस्तावेज (Eligibility & Documents)

इन योजनाओं का लाभ पारदर्शी तरीके से केवल वास्तविक पशुपालकों और ग्रामीण युवाओं तक पहुंचाने के लिए कृषि विभाग की तर्ज पर पशुधन विभाग ने भी कड़े नियम बनाए हैं:

  • मूल निवास: आवेदक अनिवार्य रूप से उत्तर प्रदेश का स्थायी निवासी होना चाहिए।
  • भूमि और शेड की उपलब्धता: डेयरी फार्मिंग या स्वदेशी गौ-संवर्धन योजना के लिए किसान के पास पशुओं को रखने के लिए पर्याप्त भूमि और पक्के शेड की व्यवस्था (या उसका प्रस्ताव) होना आवश्यक है।
  • पशु टैगिंग (Animal Tagging): योजना के तहत खरीदे जाने वाले या लाभ पाने वाले प्रत्येक पशु का ‘इनाफ’ (INAPH) पोर्टल पर डिजिटल पंजीकरण और कान में १२ अंकों का ‘यूआईडी टैग’ (UID Tag) होना अनिवार्य है। बिना टैगिंग वाले पशुओं पर कोई सब्सिडी या बीमा मान्य नहीं होता।
  • अनिवार्य दस्तावेज:
    1. आधार कार्ड (मोबाइल नंबर से लिंक)
    2. बैंक खाता पासबुक (NPCI मैपिंग के साथ डीबीटी हेतु)
    3. भूमि के स्वामित्व का प्रमाण (खतौनी या लीज एग्रीमेंट)
    4. पशु चिकित्सा अधिकारी द्वारा जारी स्वास्थ्य प्रमाण पत्र।

६. पारदर्शी डिजिटल आवेदन और बैंक लिंकेज प्रक्रिया

भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद को समाप्त करने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने पशुधन और डेयरी योजनाओं के आवेदन को पूरी तरह से ऑनलाइन कर दिया है।

क्रियान्वयन की चरण-दर-चरण प्रक्रिया:

  1. ऑनलाइन पंजीकरण: इच्छुक लाभार्थी पशुधन विभाग के आधिकारिक वेब पोर्टल पर जाकर अपनी व्यक्तिगत जानकारी, भूमि विवरण और बैंक खाते के साथ ऑनलाइन आवेदन करते हैं।
  2. स्क्रूटनी और जिला स्तरीय चयन: मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी (CVO) की अध्यक्षता में गठित जिला स्तरीय समिति आवेदनों की तकनीकी और वित्तीय व्यवहार्यता (Feasibility) की जांच करती है और योग्य आवेदकों को शॉर्टलिस्ट करती है।
  3. बैंक लोन स्वीकृति: यदि योजना ऋण-आधारित है (जैसे डेयरी फार्मिंग), तो विभाग आवेदन को संबंधित वाणिज्यिक या ग्रामीण बैंक को अग्रसारित करता है। बैंक द्वारा लोन की स्वीकृति मिलने के बाद लाभार्थी को अपना हिस्सा (कृषक अंश) जमा करना होता है।
  4. भौतिक सत्यापन और जिओ-टैगिंग: पशुओं की खरीद और शेड के निर्माण के बाद, पशु चिकित्सा अधिकारी मौके पर जाकर पशुओं के स्वास्थ्य, उनके कानों के टैग नंबर की जांच करते हैं और पूरे सेटअप की जियो-टैग्ड (Geo-tagged) फोटो पोर्टल पर अपलोड करते हैं।
  5. सब्सिडी का डीबीटी: भौतिक सत्यापन की सफल रिपोर्ट के बाद, सरकार द्वारा स्वीकृत सब्सिडी की राशि सीधे लाभार्थी के बैंक लोन खाते में या उसके बचत खाते में ट्रांसफर कर दी जाती है।

७. ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने पर क्रांतिकारी प्रभाव

उत्तर प्रदेश में इन पशुधन और डेयरी विकास योजनाओं के लागू होने से ग्रामीण क्षेत्रों में अभूतपूर्व सामाजिक-आर्थिक प्रगति देखी गई है:

१. नियमित दैनिक तरलता (Daily Cash Flow)

कृषि में किसानों को फसल कटने के बाद ३ से ६ महीने में एक बार पैसा मिलता है। लेकिन डेयरी विकास योजनाओं के कारण पशुपालकों को हर दिन सुबह-शाम दूध बेचने पर तत्काल नकद या साप्ताहिक भुगतान प्राप्त होता है। इस नियमित कैश फ्लो ने ग्रामीण परिवारों की दैनिक आवश्यकताओं—जैसे ताजी सब्जियां, चिकित्सा और बच्चों की स्कूल फीस का भुगतान—को बेहद आसान बना दिया है।

२. महिला सशक्तिकरण और स्वयं सहायता समूहों (SHGs) का उत्थान

ग्रामीण उत्तर प्रदेश में पशुपालन का लगभग ६० से ७० प्रतिशत कार्य महिलाओं द्वारा ही संभाला जाता है। ‘राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन’ (UPSRLM) के सहयोग से स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं ने ब्लॉक स्तर पर महिला दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियां (जैसे ‘बलिणी मिल्क प्रोड्यूसर कंपनी’ बुंदेलखंड में) स्थापित की हैं। आज ग्रामीण महिलाएं दूध के व्यापार का पूरा वित्तीय और प्रशासनिक प्रबंधन खुद संभाल रही हैं, जिससे उनका सामाजिक स्तर बहुत ऊंचा हुआ है।

३. जैविक खेती (Organic Farming) और प्राकृतिक इनपुट्स को बढ़ावा

पशुओं की संख्या बढ़ने से ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचुर मात्रा में गोबर और गोमूत्र की उपलब्धता बढ़ी है। किसान अब रासायनिक खादों पर निर्भरता कम करके ‘वर्मीकंपोस्ट’ (केंचुआ खाद) और जीवामृत का निर्माण कर रहे हैं। इससे एक ओर जहां कृषि की लागत कम हुई है, वहीं दूसरी ओर भूमि की उर्वरा शक्ति में भी सुधार हुआ है।

४. कुपोषण के खिलाफ लड़ाई में सफलता

डेयरी विकास योजनाओं के माध्यम से गांवों में दूध की उपलब्धता बढ़ने से ग्रामीण बच्चों, गर्भवती महिलाओं और किशोरियों के पोषण स्तर (Nutritional Status) में व्यापक सुधार हुआ है, जो राज्य के स्वास्थ्य संकेतकों के लिए एक अत्यंत सकारात्मक संकेत है।


८. सफल क्रियान्वयन के मार्ग में प्रमुख चुनौतियाँ

इतनी शानदार उपलब्धियों के बावजूद, जमीनी स्तर पर इस क्षेत्र में कुछ ढांचागत और व्यावहारिक चुनौतियाँ अभी भी मुंह बाए खड़ी हैं:

  • हरे चारे और भूसे की बढ़ती कीमतें: शहरीकरण और पारंपरिक फसलों के रकबे में बदलाव के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में हरे चारे (Green Fodder) और भूसे की कीमतें आसमान छू रही हैं। इससे पशुओं के रख-रखाव की लागत बढ़ जाती है, जिससे छोटे पशुपालकों का मुनाफा कम हो जाता है।
  • बैंकों की उदासीनता: छोटे और सीमांत किसानों या भूमिहीन मजदूरों को नया डेयरी फार्म शुरू करने के लिए बैंकों से लोन (Collateral Free Loan) प्राप्त करने में भारी कठिनाई होती है। बैंक अक्सर कागजी औपचारिकताओं के नाम पर आवेदनों को लंबित रखते हैं।
  • कोल्ड चेन अवसंरचना (Cold Chain Infrastructure) की कमी: उत्तर प्रदेश के सुदूर और अत्यधिक गर्म इलाकों (जैसे बुंदेलखंड और पूर्वांचल के कुछ भाग) में गर्मियों के दिनों में बिजली कटौती के कारण दूध के खराब होने का खतरा रहता है। ब्लॉक स्तर पर ‘बल्क मिल्क कूलर्स’ (BMCs) और रेफ्रिजरेटेड वैन की संख्या अभी भी मांग के मुकाबले कम है।
  • कृत्रिम गर्भाधान (AI) सेवाओं की गुणवत्ता: ग्रामीण स्तर पर पशुओं के नस्ल सुधार के लिए दी जाने वाली कृत्रिम गर्भाधान सेवाओं में कई बार समय पर रिस्पॉन्स न मिलने या कुशल पैरा-वेट्स (Para-vets) की कमी के कारण पशुओं के गर्भधारण की सफलता दर (Conception Rate) प्रभावित होती है।

९. भविष्य की राह और सुधारात्मक उपाय (Way Forward)

उत्तर प्रदेश के पशुधन और डेयरी क्षेत्र को वैश्विक मानकों के अनुरूप और पूरी तरह संकट-मुक्त बनाने के लिए भविष्य में निम्नलिखित रणनीतियों पर काम करना अत्यंत आवश्यक है:

  1. ‘सेंस्ड सीमेन’ (Sex-Sorted Semen) तकनीक का व्यापक प्रसार: बेसहारा गोवंश और अनुपयोगी नर बछड़ों की समस्या को स्थायी रूप से हल करने के लिए सरकार को ‘सेक्स-सॉर्टेड सीमेन’ तकनीक पर १००% तक की सब्सिडी देनी चाहिए। इस तकनीक से कृत्रिम गर्भाधान कराने पर केवल बछिया (Female Calf) ही पैदा होती है, जिससे भविष्य में दुधारू पशुओं की संख्या बढ़ेगी और आवारा पशुओं की समस्या स्वतः समाप्त हो जाएगी।
  2. दूध के मूल्य संवर्धन (Value Addition) पर जोर: ग्रामीण सहकारी समितियों को केवल कच्चा दूध बेचने तक सीमित न रखकर उन्हें खोया, पनीर, पेड़ा, घी और छाछ बनाने के छोटे प्रसंस्करण यंत्र (Mini Processing Units) उपलब्ध कराए जाने चाहिए। प्रसंस्कृत उत्पादों को बेचने से किसानों को कच्चे दूध की तुलना में दोगुना मुनाफा मिल सकता है।
  3. ‘चारा बैंक’ (Fodder Banks) की स्थापना: सूखे के दिनों में चारे के संकट से निपटने के लिए सरकार को प्रत्येक तहसील स्तर पर आधुनिक ‘चारा बैंक’ और साइलेज (Silage – आचार चारा) बनाने की इकाइयाँ स्थापित करनी चाहिए, जहाँ से किसानों को रियायती दरों पर पौष्टिक चारा साल भर मिल सके।
  4. डिजिटल पशु स्वास्थ्य कार्ड (E-Pashu Chikitsa): प्रत्येक पंजीकृत पशु का एक डिजिटल हेल्थ कार्ड होना चाहिए, जिसमें उसके टीकाकरण, कृत्रिम गर्भाधान, और बीमारियों का पूरा इतिहास ऑनलाइन दर्ज हो। मोबाइल ऐप के माध्यम से किसानों को अगले टीकाकरण या गर्भाधान की तिथि का अलर्ट एसएमएस (SMS) द्वारा मिलना चाहिए।

१०. निष्कर्ष (Conclusion)

संक्षेप में कहा जाए तो, उत्तर प्रदेश पशुधन एवं डेयरी विकास योजनाएं राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के कायाकल्प और ग्रामीण भारत के स्वावलंबन का एक सबसे सशक्त और विश्वसनीय माध्यम साबित हुई हैं। इन योजनाओं ने पारंपरिक खेती की सीमाओं को तोड़कर पशुपालन को एक संगठित, आधुनिक और अत्यधिक लाभकारी व्यवसाय (Commercial Enterprise) के रूप में स्थापित किया है। डीबीटी, जियो-टैग्डिंग और मोबाइल वेटरनरी यूनिट्स के डिजिटल पहरे ने इस क्षेत्र में सुशासन और पारदर्शिता की नई मिसाल पेश की है।

यद्यपि, चारे की उपलब्धता बढ़ाने और कोल्ड चेन के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने जैसी व्यावहारिक ढांचागत चुनौतियों पर निरंतर बजटीय और नीतिगत सुधारों की आवश्यकता हमेशा बनी रहेगी, परंतु ‘नंद बाबा दुग्ध मिशन’ और ‘स्वदेशी गौ-संवर्धन योजना’ जैसी पहलों ने उत्तर प्रदेश के गांवों में समृद्धि और आत्मविश्वास की जो नई ‘श्वेत धारा’ बहाई है, वह अद्वितीय है। नारी शक्ति और ग्रामीण युवाओं के श्रम के सहयोग से संचालित यह मूक क्रांति आने वाले समय में उत्तर प्रदेश को न केवल देश का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक हब बनाएगी, बल्कि इसे एक विकसित और समृद्ध आत्मनिर्भर राज्य के रूप में स्थापित करने में सबसे मजबूत मील का पत्थर साबित होगी।


उत्तर प्रदेश की पशुधन एवं डेयरी विकास योजनाओं से जुड़े कुछ सबसे महत्वपूर्ण और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs):

  • प्रश्न १: उत्तर प्रदेश नंद बाबा दुग्ध मिशन (Nand Baba Milk Mission) का मुख्य उद्देश्य क्या है?
    • उत्तर: इस मिशन का मुख्य उद्देश्य उत्तर प्रदेश को दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में देश का सबसे अग्रणी राज्य बनाना है। इसके तहत ग्रामीण क्षेत्रों में दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियों को मजबूत किया जाता है, उन्नत नस्ल के दुधारू पशुओं की खरीद पर सब्सिडी दी जाती है और किसानों को उनके दूध का उचित व पारदर्शी मूल्य गांव में ही उपलब्ध कराया जाता है।
  • प्रश्न २: ‘मुख्यमंत्री स्वदेशी गौ-संवर्धन योजना’ का लाभ किसे और कैसे मिल सकता है?
    • उत्तर: यह योजना मुख्य रूप से ग्रामीण युवाओं, महिला स्वयं सहायता समूहों (SHGs) और प्रगतिशील पशुपालकों के लिए है। इसके तहत यदि कोई लाभार्थी दूसरे राज्यों से उन्नत नस्ल की स्वदेशी गाएं (जैसे गीर, साहीवाल, थारपारकर) खरीदकर लाता है, तो उसे पशु की खरीद लागत, बीमा और परिवहन पर ४० प्रतिशत तक की भारी सब्सिडी (अधिकतम ₹८०,००० तक) सीधे बैंक खाते में दी जाती है।
  • प्रश्न ३: ‘मोबाईल वेटरनरी यूनिट’ (MVU) योजना क्या है और इसका लाभ कैसे लें?
    • उत्तर: ग्रामीण और सुदूर क्षेत्रों में बीमार पशुओं को अस्पताल तक ले जाने की समस्या को दूर करने के लिए सरकार ने पशु चिकित्सा एम्बुलेंस सेवा शुरू की है। किसान टोल-फ्री हेल्पलाइन नंबर १९६२ (1962) पर कॉल करके अपने घर पर ही सरकारी पशु चिकित्सक, मुफ्त दवाएं और प्राथमिक उपचार की सुविधा प्राप्त कर सकते हैं।
  • प्रश्न ४: निराश्रित गोवंश सहभागिता योजना के तहत प्रति पशु कितनी धनराशि मिलती है?
    • उत्तर: आवारा और बेसहारा पशुओं के प्रबंधन के लिए शुरू की गई इस योजना के तहत यदि कोई ग्रामीण किसान या पशुपालक सरकारी गो-आश्रय स्थल से किसी बेसहारा गाय को गोद लेकर अपने घर पर उसकी देखरेख करता है, तो सरकार उसे चारे के खर्च के लिए ₹५० प्रति पशु प्रतिदिन (यानी ₹१,५०० प्रति माह) की वित्तीय सहायता सीधे डीबीटी (DBT) के माध्यम से प्रदान करती है।
  • प्रश्न ५: पशुधन योजनाओं का लाभ लेने के लिए ‘पशु टैगिंग’ (Animal Tagging) क्यों अनिवार्य है?
    • उत्तर: पशुधन विभाग की किसी भी योजना, सब्सिडी या पशु बीमा का लाभ उठाने के लिए पशु के कान में १२ अंकों वाला यूआईडी प्लास्टिक टैग (UID Tag) लगा होना अनिवार्य है, जिसे ‘इनाफ’ (INAPH) पोर्टल पर डिजिटल रूप से दर्ज किया जाता है। यह पशु की पहचान सुनिश्चित करने और किसी भी प्रकार के वित्तीय फर्जीवाड़े को रोकने के लिए आवश्यक है।
  • प्रश्न ६: स्वदेशी नस्ल की गायों से अधिक दूध उत्पादन करने पर क्या कोई विशेष पुरस्कार मिलता है?
    • उत्तर: हाँ, ‘मुख्यमंत्री प्रगतिशील पशुपालक प्रोत्साहन योजना’ के तहत स्वदेशी नस्ल (जैसे साहीवाल, गीर, हरियाणा आदि) की गायों से उच्च दुग्ध उत्पादन प्राप्त करने वाले प्रगतिशील पशुपालकों को सरकार द्वारा प्रोत्साहित करने के लिए ₹१०,००० से लेकर ₹१५,००० तक का नकद पुरस्कार और प्रशस्ति पत्र दिया जाता है।
  • प्रश्न ७: डेयरी प्रोसेसिंग यूनिट या चिलिंग सेंटर स्थापित करने पर कितनी सब्सिडी मिलती है?
    • उत्तर: ‘उत्तर प्रदेश दुग्धशाला विकास एवं दुग्ध उत्पाद प्रोत्साहन नीति’ के अंतर्गत यदि कोई निवेशक या कॉपरेटिव समूह ग्रामीण क्षेत्रों में बल्क मिल्क कूलर (BMC), चिलिंग प्लांट या पनीर-घी बनाने का प्रसंस्करण संयंत्र लगाता है, तो उसे कुल परियोजना लागत पर १०% से २५% तक का पूंजीगत अनुदान (Capital Subsidy) और बैंक लोन के ब्याज पर ५% तक की छूट दी जाती है।

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