मां स्कंदमाता पूजा और उपांग ललिता व्रत: नवरात्रि का पांचवां दिन, महत्व और पूजा विधि

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मां स्कंदमाता पूजा एवं उपांग ललिता व्रत: नवरात्रि का पांचवां दिन, महत्व, कथा, पूजा विधि, मंत्र और आरती
सनातन धर्म में चैत्र और शारदीय नवरात्रि को शक्ति उपासना, आत्मिक चेतना के जागरण और दैवीय कृपा प्राप्त करने का सबसे पावन पर्व माना जाता है। नवदुर्गा के नौ रूप चेतना के विभिन्न स्तरों और शक्तियों को दर्शाते हैं। नवरात्रि के पांचवें दिन (पंचमी तिथि) को आदिशक्ति के परम वात्सल्यमयी स्वरूप मां स्कंदमाता की पूजा-अर्चना की जाती है। इसके साथ ही, आश्विन मास की शरद नवरात्रि की पंचमी तिथि को एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्रत ‘उपांग ललिता व्रत’ (Upang Lalita Vrat) भी रखा जाता है, जो भक्तों के जीवन में सुख, सौभाग्य और दिव्य ज्ञान का संचार करता है।
जहाँ चौथे दिन मां कुष्मांडा की पूजा से साधक सृष्टि की रचनात्मक ऊर्जा से जुड़ता है, वहीं पांचवें दिन मां स्कंदमाता का स्वरूप भक्त को परम शांति, वात्सल्य, और मोक्ष का मार्ग दिखाता है। भगवान शिव और माता पार्वती के कार्तिकेय (स्कंद) नाम के पुत्र हैं। स्कंद की माता होने के कारण ही इन्हें ‘स्कंदमाता’ कहा जाता है।
इस विस्तृत पौराणिक और आध्यात्मिक लेख में हम मां स्कंदमाता के दिव्य स्वरूप, तारकासुर वध की पौराणिक कथा, उपांग ललिता व्रत का रहस्य, ज्योतिषीय व आध्यात्मिक महत्व, संपूर्ण पूजा विधि, शक्तिशाली मंत्रों, प्रिय भोग और पावन आरती के बारे में सविस्तार जानेंगे।
1. मां स्कंदमाता का दिव्य व वात्सल्यमयी स्वरूप (Divine Form of Maa Skandamata)
मां स्कंदमाता का स्वरूप अन्य रूपों की तुलना में अत्यंत ममतामयी, शांत और वात्सल्य से परिपूर्ण है। वे ममता की साक्षात प्रतिमूर्ति हैं और युद्ध के हथियारों के स्थान पर अपनी गोद में संतान को धारण किए हुए हैं।
- चतुर्भुजी स्वरूप: माता स्कंदमाता की चार भुजाएं हैं। वे अपने दक्षिण (दाहिने) तरफ की ऊपर वाली भुजा से बालरूप स्कंद को गोद में पकड़े हुए हैं और नीचे वाली भुजा में कमल का पुष्प धारण करती हैं। वाम (बाईं) तरफ की ऊपर वाली भुजा वरदमुद्रा में रहती है और नीचे वाली भुजा में भी कमल का पुष्प सुशोभित है।
- पद्मासना देवी: यद्यपि माता का वाहन एक पराक्रमी सिंह है, परंतु वे कमल के आसन पर भी विराजमान रहती हैं। इसी कारण इन्हें ‘पद्मासना देवी’ भी कहा जाता है।
- सौरमंडल की अधिष्ठात्री: देवी स्कंदमाता सौरमंडल की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं, जिससे उनके चारों ओर एक अलौकिक और सूर्य के समान तेजस्वी आभा मंडल दिखाई देता है।
2. पौराणिक कथा: कार्तिकेय का जन्म और तारकासुर का वध (Legend of Maa Skandamata)
पौराणिक ग्रंथों और शिव महापुराण के अनुसार, एक समय तारकासुर नाम के एक शक्तिशाली दैत्य ने कठोर तपस्या करके ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त कर लिया था। उसने वरदान मांगा कि उसकी मृत्यु केवल भगवान शिव की संतान के हाथों ही हो सके। तारकासुर जानता था कि सती के आत्मदाह के बाद भगवान शिव घोर वैराग्य में चले गए हैं और वे कभी विवाह या संतानोत्पत्ति नहीं करेंगे।
देवताओं की व्याकुलता और शिव-पार्वती विवाह
वरदान मिलते ही तारकासुर ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया। उसने देवताओं को स्वर्ग से निष्कासित कर दिया। सभी देवता व्याकुल होकर भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी के पास पहुंचे। तब देवताओं की प्रार्थना और सती के पुनर्जन्म के रूप में माता पार्वती की कठिन तपस्या के फलस्वरूप भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ।
स्कंद का प्राकट्य और महायुद्ध
शिव और पार्वती के मिलन से एक परम तेजस्वी ऊर्जा उत्पन्न हुई, जिससे कुमार कार्तिकेय (स्कंद) का प्राकट्य हुआ। जब कार्तिकेय बाल्यकाल में थे, तब माता पार्वती ने उन्हें युद्ध कला और ज्ञान की दीक्षा दी। माता पार्वती ने अपने इस रूप में कार्तिकेय को अपनी गोद में बिठाकर वात्सल्य प्रदान किया, जिसके कारण वे स्कंदमाता कहलाईं।
जब तारकासुर के वध का समय आया, तब देवताओं ने कुमार कार्तिकेय को अपना सेनापति नियुक्त किया। माता स्कंदमाता की प्रेरणा और आशीर्वाद से बाल स्कंद ने युद्ध भूमि में राक्षसों की सेना पर आक्रमण कर दिया और अंततः क्रूर राक्षस तारकासुर का वध करके ब्रह्मांड को उसके अत्याचारों से मुक्त कराया। इसी कारण संतान की रक्षा और विजय की कामना के लिए मां स्कंदमाता की पूजा अत्यंत फलदायी मानी जाती है।
3. उपांग ललिता व्रत का महत्व (Significance of Upang Lalita Vrat)
शारदीय नवरात्रि की पंचमी तिथि को उपांग ललिता व्रत रखने का विधान है। यह व्रत विशेष रूप से त्रिपुर सुंदरी मां ललिता को समर्पित है।
उपांग ललिता व्रत के लाभ
[भक्तों को सुख-समृद्धि] ---> [अखंड सौभाग्य की प्राप्ति]
[संतान को दीर्घायु] ---> [आकर्षण और ओजस्वी वाणी]
- पवित्र ग्रंथ ललिता सहस्रनाम: इस दिन मां ललिता के एक हजार नामों (ललिता सहस्रनाम) का पाठ किया जाता है।
- अखंड सौभाग्य: मान्यता है कि जो महिलाएं इस दिन उपांग ललिता का व्रत रखती हैं, उन्हें अखंड सौभाग्य, सुखी वैवाहिक जीवन और संतान सुख की प्राप्ति होती है।
- भक्तों के कष्टों का निवारण: यह व्रत जीवन के सभी बड़े आर्थिक संकटों को दूर करने और मानसिक शांति प्रदान करने में सहायक माना जाता है।
4. ज्योतिषीय और आध्यात्मिक महत्व (Astrological & Spiritual Significance)
नवरात्रि के पांचवें दिन की साधना भक्त की चेतना को सांसारिक बंधनों से ऊपर उठाने का कार्य करती है।
विशुद्ध चक्र का जागरण (Awakening of Vishuddha Chakra)
योग साधना और चक्र विज्ञान के अनुसार, नवरात्रि की पंचमी तिथि पर साधक का मन ‘विशुद्ध चक्र’ (Vishuddha Chakra) में प्रवेश करता है। यह चक्र हमारे कंठ (गले) के केंद्र में स्थित होता है और इसका संबंध वाणी, अभिव्यक्ति, कला और आंतरिक शुद्धि से है।
- मां स्कंदमाता की आराधना से विशुद्ध चक्र सक्रिय और जागृत होता है।
- इसके जाग्रत होने से साधक की वाणी में अद्भुत आकर्षण, मधुरता और ओज उत्पन्न होता है।
- साधक के भीतर के सभी प्रकार के संशय, भ्रम और नकारात्मक विचार शांत हो जाते हैं और वह परम चैतन्य की ओर अग्रसर होता है।
बुद्ध ग्रह की शांति (Astrological Remedy for Mercury)
ज्योतिष शास्त्र के दृष्टिकोण से मां स्कंदमाता बुध ग्रह (Mercury) को नियंत्रित और संचालित करती हैं।
- जिन जातकों की कुंडली में बुध ग्रह कमजोर हो, जिसके कारण वाणी में दोष हो, व्यापार में लगातार हानि हो रही हो या शिक्षा व एकाग्रता में बाधा आ रही हो, उन्हें इस दिन माता की विशेष पूजा करनी चाहिए।
- देवी की कृपा से बुध जनित दोष शांत होते हैं।
- व्यक्ति की तार्किक क्षमता, व्यापारिक बुद्धि, गणितीय कौशल और त्वचा से जुड़े रोगों में अभूतपूर्व सुधार होता है।
5. मां स्कंदमाता की संपूर्ण पूजा विधि (Complete Step-by-Step Puja Vidhi)
नवरात्रि की पंचमी तिथि और उपांग ललिता व्रत के दिन पूजा की प्रक्रिया इस प्रकार होनी चाहिए:
- प्रातः काल स्नान और संकल्प: सुबह सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं। स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इस दिन सफेद (White), पीले (Yellow) या ग्रे (Grey) रंग के वस्त्र पहनना अत्यंत शुभ माना जाता है।
- कलश व विग्रह पूजन: पूजा स्थान पर बैठकर गणेश जी और कलश देवता का पूजन करें। इसके बाद मां स्कंदमाता की प्रतिमा या चित्र के सामने घी का दीपक जलाएं।
- गंगाजल से अभिषेक: माता की मूर्ति पर गंगाजल छिड़कें। यदि धातु की मूर्ति हो तो दूध, दही, शहद से स्नान कराएं।
- श्रृंगार और तिलक: माता को कुमकुम, चंदन, सिंदूर और अक्षत का तिलक लगाएं। बाल स्कंद को भी तिलक लगाएं। देवी को लाल या पीली चुनरी अर्पित करें।
- पुष्प अर्पण: मां स्कंदमाता को कमल का फूल अत्यंत प्रिय है। उन्हें श्वेत या नीले रंग के कमल, चमेली या पीले गेंदे के फूल अर्पित करें।
- उपांग ललिता पूजन (यदि व्रत रख रहे हैं): ललिता माता के चित्र के सम्मुख एक तांबे के पात्र में जल भरकर रखें, माता को रोली-मोली चढ़ाएं और ललिता सहस्रनाम या ललिता चालीसा का पाठ करें।
- मंत्र जाप: शांत मन से माता के बीज मंत्रों और ध्यान मंत्रों का कम से कम 108 बार जाप करें।
- आरती और शंखनाद: कपूर और घी के दीपक से माता की आरती करें। आरती के बाद पूरे घर में शंख बजाएं जिससे सकारात्मकता का संचार हो।
6. माता का प्रिय भोग और शुभ रंग (Favorite Bhog and Color)
माता स्कंदमाता को प्रसन्न करने के लिए पंचमी तिथि पर इन विशेष वस्तुओं का अर्पण करें:
- प्रिय भोग: मां स्कंदमाता को केले (Banana) का भोग लगाना अत्यंत प्रिय और शुभ माना गया है। इसके अतिरिक्त, माता को दूध से बनी हुई खीर, मिश्री, या पेड़े का भोग भी लगाया जा सकता है। केले का भोग लगाने से व्यक्ति का स्वास्थ्य उत्तम रहता है और संतान पर आने वाले संकट दूर होते हैं।
- शुभ रंग: नवरात्रि के पांचवें दिन के लिए ग्रे (Grey) या श्वेत (White) रंग को बेहद पसंद किया जाता है। ग्रे रंग संतुलन और परिपक्वता का प्रतीक है, जबकि सफेद रंग शांति और सात्विकता को दर्शाता है।
7. मां स्कंदमाता के सिद्ध मंत्र (Powerful Mantras)
पूजा के समय इन पवित्र मंत्रों का श्रद्धापूर्वक उच्चारण करने से मोक्ष और सुख की प्राप्ति होती है:
ध्यान मंत्र (Dhyan Mantra)
वंदे वांछित कामार्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहारूढ़ा चतुर्भुजा स्कन्दमाता यशस्विनीम्॥
- प्रार्थना मंत्र (Prarthana Mantra)
सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥
स्तुति (Stuti)
या देवी सर्वभूतेषु मां स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
बीज मंत्र (Beej Mantra)
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं स्कन्दमातर्ये नमः॥
8. मां स्कंदमाता की पावन आरती (Maa Skandamata Aarti)
जय तेरी हो स्कंदमाता।
पांचवा नाम तुम्हारा आता॥सब के मन की जानन हारी।
जग जननी सब की महतारी॥तेरी जोत जलाता रहूं मैं।
हरदम शीश नवाता रहूं मैं॥कई नामों से तुझे पुकारा।
मुझे एक है तेरा सहारा॥कही पहाड़ों पर है डेरा।
कई शहरों में रूप है तेरा॥नव्य रूप में तुम मुस्काओ।
दुखों को मेरे दूर भगाओ॥इंद्र आदि देवता सारे।
कांप रहे थे दैत्य के मारे॥रणभूमि में तुम प्रकटी आई।
दुष्ट असुर की शामत आई॥स्कंद की मां कृपा हम पर कीजो।
ज्ञान और मुक्ति का वर दीजो॥
निष्कर्ष (Conclusion)
मां स्कंदमाता और उपांग ललिता व्रत की आराधना हमें यह सिखाती है कि परम शक्तिमान होने के बाद भी अपने आश्रितों और संतानों के प्रति मन में करुणा, दया और ममता का भाव रखना ही सच्ची मानवता है। माता का यह स्वरूप भौतिक संसार के सभी सुखों को प्रदान करते हुए अंत में मोक्ष का द्वार खोलता है।
जो भी श्रद्धालु नवरात्रि की पंचमी तिथि पर निष्काम भाव से और पूर्ण पवित्रता के साथ मां स्कंदमाता की शरण में जाते हैं, उनके जीवन से अज्ञानता का अंधकार मिट जाता है। माता उन्हें ओजस्वी वाणी, तेज बुद्धि, और सुखी संतान का आशीर्वाद देकर जीवन को सफल बनाती हैं।
मां स्कंदमाता पूजा, उपांग ललिता व्रत और नवरात्रि पंचमी से जुड़े कुछ सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)
1. मां स्कंदमाता को ‘स्कंदमाता’ क्यों कहा जाता है?
भगवान शिव और माता पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र कुमार कार्तिकेय का एक नाम ‘स्कंद’ भी है। स्कंद (कार्तिकेय) की माता होने के कारण ही आदिशक्ति के इस पांचवें स्वरूप को ‘मां स्कंदमाता’ कहा जाता है।
2. उपांग ललिता व्रत क्या है और यह कब रखा जाता है?
उपांग ललिता व्रत नवरात्रि के पांचवें दिन (पंचमी तिथि) को रखा जाता है। यह व्रत मां ललिता त्रिपुर सुंदरी को समर्पित है। इस दिन व्रत रखने और ललिता सहस्रनाम का पाठ करने से भक्तों को अखंड सौभाग्य, सुख-समृद्धि और संतान सुख की प्राप्ति होती है।
3. नवरात्रि के पांचवें दिन माता को किस चीज का भोग लगाना चाहिए?
मां स्कंदमाता को केला (Banana) अत्यंत प्रिय है। इसलिए पंचमी तिथि पर माता को पके हुए केलों का भोग लगाना सबसे उत्तम माना जाता है। इसके अलावा आप दूध से बनी खीर या सफेद खोए के पेड़े का भोग भी लगा सकते हैं।
4. मां स्कंदमाता की पूजा के लिए कौन सा रंग सबसे शुभ माना गया है?
नवरात्रि की पंचमी तिथि के लिए ग्रे (Grey) और श्वेत (White) रंग को सबसे शुभ माना गया है। भक्त इस दिन ग्रे या सफेद रंग के वस्त्र पहनकर पूजा कर सकते हैं। यह रंग जीवन में संतुलन, परिपक्वता और सात्विकता का संचार करता है।
5. कुंडली के किस ग्रह दोष को शांत करने के लिए मां स्कंदमाता की पूजा की जाती है?
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, मां स्कंदमाता बुध ग्रह (Mercury) को नियंत्रित करती हैं। जिन जातकों की कुंडली में बुध कमजोर हो, जिसके कारण व्यापार में घाटा, वाणी दोष या बुद्धि की कमी हो, उन्हें बुध ग्रह को मजबूत करने के लिए पांचवें दिन माता की विशेष उपासना करनी चाहिए।
6. विशुद्ध चक्र का मां स्कंदमाता की पूजा से क्या संबंध है?
योग साधना के अनुसार, नवरात्रि के पांचवें दिन साधक का ध्यान कंठ में स्थित ‘विशुद्ध चक्र’ (Vishuddha Chakra) पर केंद्रित होता है। मां स्कंदमाता की कृपा से यह चक्र जागृत होता है, जिससे साधक की वाणी में मधुरता, ओज और गजब की तार्किक क्षमता का विकास होता है।
7. मां स्कंदमाता को ‘पद्मासना देवी’ क्यों कहा जाता है?
यद्यपि मां स्कंदमाता का वाहन एक पराक्रमी सिंह (शेर) है, लेकिन वे अपने दिव्य स्वरूप में श्वेत कमल के आसन पर भी विराजमान रहती हैं। कमल पर बैठने के कारण ही उन्हें ‘पद्मासना देवी’ के नाम से भी जाना जाता है।
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