मां चंद्रघंटा पूजा: नवरात्रि का तीसरा दिन, महत्व, पौराणिक कथा और पूजा विधि

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मां चंद्रघंटा पूजा: नवरात्रि का तीसरा दिन, महत्व, पौराणिक कथा, पूजा विधि, मंत्र और आरती
हिंदू धर्म में शारदीय और चैत्र नवरात्रि के पावन दिनों को आध्यात्मिक ऊर्जा और शक्ति संचय का सबसे पवित्र समय माना जाता है। माँ दुर्गा के नौ दिव्य स्वरूपों की आराधना का यह महापर्व भक्तों के जीवन से अंधकार, भय और दरिद्रता को मिटाकर प्रकाश, साहस और समृद्धि का संचार करता है। नवरात्रि के तीसरे दिन (तृतीया तिथि) को आदिशक्ति के एक अत्यंत पराक्रमी, तेजस्वी और कल्याणकारी स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना की जाती है।
जहाँ नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा से हमें तप और वैराग्य की सीख मिलती है, वहीं तीसरे दिन मां चंद्रघंटा का स्वरूप हमें वीरता, अदम्य साहस और मानसिक सौम्यता का संतुलन सिखाता है। इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है, जिसके कारण इन्हें ‘चंद्रघंटा’ कहा जाता है। मान्यताओं के अनुसार, इनकी आराधना करने से साधक को अलौकिक शक्तियों का आभास होता है और उसके मार्ग में आने वाले सभी प्रकार के भय और पाप नष्ट हो जाते हैं।
इस विस्तृत लेख में हम मां चंद्रघंटा के अलौकिक स्वरूप, उनकी पौराणिक गाथा, पूजा के ज्योतिषीय व आध्यात्मिक महत्व, चरणबद्ध पूजा विधि, शक्तिशाली मंत्रों, प्रिय भोग और पावन आरती के बारे में सविस्तार जानेंगे।
1. मां चंद्रघंटा का अलौकिक व वीर स्वरूप (Divine Form of Maa Chandraghanta)
मां चंद्रघंटा का स्वरूप मां दुर्गा के अन्य सौम्य रूपों की तुलना में अधिक युद्धप्रिय और शक्तिशाली है। वे अपने भक्तों के लिए जितनी करुणामयी और सौम्य हैं, दुष्टों व राक्षसों के लिए उतनी ही भयानक और संहारक हैं।
- घंटे के आकार का अर्धचंद्र: माता के ललाट पर रत्नजड़ित अर्धचंद्र स्थित है, जिसकी आकृति एक मंदिर के घंटे जैसी दिखाई देती है। इसी घंटे की भयानक ध्वनि से अत्याचारी राक्षस थर-थर कांपते हैं।
- दशभुजाधारी स्वरूप: माता चंद्रघंटा की दस भुजाएं हैं। उनके हाथों में त्रिशूल, गदा, तलवार, धनुष, बाण, खड्ग, ढाल और कमल का फूल सुशोभित है। वहीं उनके शेष हाथ भक्तों को आशीर्वाद और अभय प्रदान करने की मुद्रा में रहते हैं।
- सिंह की सवारी: माता का वाहन एक अत्यंत पराक्रमी सिंह (शेर) है। सिंह पर सवार देवी का यह रूप वीरता और पराक्रम का साक्षात प्रतीक है।
- स्वर्ण सी चमक: माता का पूरा शरीर सोने के समान चमकीला और दिव्य आभा से युक्त है। उनके मुखमंडल पर एक अद्भुत तेज है जो साधक के मन से हीनभावना को समाप्त कर देता है।
2. पौराणिक कथा: महिषासुर का वध और मां का प्राकट्य (Legend of Maa Chandraghanta)
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक समय देवताओं और असुरों के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया था। असुरों का राजा महिषासुर अत्यंत शक्तिशाली और क्रूर हो गया था। उसने अपनी आसुरी सेना के बल पर स्वर्ग लोक पर आक्रमण कर दिया और देवताओं के राजा इंद्र को परास्त कर स्वयं स्वर्ग का सिंहासन हथिया लिया। महिषासुर के अत्याचारों से तंग आकर सभी देवता त्राहि-माम करते हुए त्रिदेवों—भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शिव) की शरण में पहुंचे।
त्रिदेवों के क्रोध से दिव्य शक्ति का उदय
देवताओं ने अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा कि महिषासुर के आतंक के कारण वे पृथ्वी पर विचरण करने को विवश हैं और स्वर्ग के सभी द्वारों पर असुरों का कब्जा हो चुका है। देवताओं के कष्टों को सुनकर त्रिदेव अत्यंत क्रोधित हो उठे। उसी समय भगवान विष्णु, शिव और ब्रह्मा जी के मुख से एक महान तेज (ऊर्जा) उत्पन्न हुआ। इसके साथ ही समस्त दिशाओं से देवताओं का तेज भी उस दिव्य प्रकाश में आकर मिल गया।
यह सम्मिलित तेज देखते ही देखते एक विशाल पर्वत के समान दैदीप्यमान हो गया और उसमें से आदिशक्ति मां चंद्रघंटा प्रकट हुईं। भगवान शिव ने उन्हें अपना त्रिशूल भेंट किया, भगवान विष्णु ने अपना चक्र दिया, देवराज इंद्र ने उन्हें अपना वज्र और एक दिव्य घंटा प्रदान किया। इसी प्रकार सभी देवताओं ने माता को अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र सौंपे।
घंटे की ध्वनि और महिषासुर का अंत
माता चंद्रघंटा जब अपने विशाल सिंह पर सवार होकर युद्ध भूमि में पहुंचीं, तो उन्होंने अपने मस्तक पर स्थित घंटे को जोर से झंकृत किया। उस घंटे से उत्पन्न हुई भयानक और भयंकर ध्वनि से पूरा ब्रह्मांड गूंज उठा। उस प्रचंड नाद को सुनकर महिषासुर के सेनापति और राक्षस सेना भयभीत हो गए।
महिषासुर की विशाल सेना ने माता को चारों ओर से घेर लिया, लेकिन देवी ने अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करके क्षण भर में असुरों के दल का संहार कर दिया। अंत में माता ने अत्याचारी महिषासुर का वध करके देवताओं को पुनः स्वर्ग लोक वापस दिलाया और ब्रह्मांड में धर्म की स्थापना की। तभी से भय से मुक्ति पाने के लिए माता के इस वीर स्वरूप की पूजा की जाती है।
3. ज्योतिषीय और आध्यात्मिक महत्व (Astrological & Spiritual Significance)
नवरात्रि की तृतीया तिथि पर साधना करने का चक्र विज्ञान और ज्योतिष शास्त्र दोनों में विशेष महत्व बताया गया है।
मणिपुर चक्र का जागरण (Awakening of Manipura Chakra)
अध्यात्मिक साधकों के लिए यह दिन ऊर्जा को ऊपर उठाने का होता है। नवरात्रि के तीसरे दिन साधक का मन ‘मणिपुर चक्र’ (Manipura Chakra) में प्रवेश करता है। यह चक्र हमारे नाभि स्थान पर स्थित होता है और इसका संबंध हमारे आत्मबल, तेज और आंतरिक अग्नि से है।
- मां चंद्रघंटा की आराधना से मणिपुर चक्र सक्रिय और संतुलित होता है।
- इसके जाग्रत होने से साधक के भीतर का संकोच, झिझक, ईर्ष्या और कमजोरी समाप्त होती है।
- साधक को दिव्य ध्वनियों (अनहद नाद) का अनुभव होता है और उसकी आत्मिक शक्ति कई गुना बढ़ जाती है।
शुक्र ग्रह की शांति (Astrological Remedy for Venus)
ज्योतिषीय दृष्टिकोण से मां चंद्रघंटा शुक्र ग्रह (Venus) को नियंत्रित करती हैं।
- यदि किसी व्यक्ति के जीवन में भौतिक सुख-सुविधाओं की कमी है, वैवाहिक जीवन में तनाव है, या कला-साहित्य के क्षेत्र में बाधा आ रही है, तो इसका कारण कुंडली में शुक्र का कमजोर होना हो सकता है।
- नवरात्रि के तीसरे दिन माता की विशेष पूजा करने से शुक्र ग्रह के सभी अशुभ प्रभाव दूर होते हैं।
- जीवन में ऐश्वर्य, सौंदर्य, प्रेम, कलात्मक क्षमता और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
4. मां चंद्रघंटा की संपूर्ण पूजा विधि (Step-by-Step Puja Vidhi)
नवरात्रि की तृतीया तिथि पर मां चंद्रघंटा की पूजा में शुद्धता और सात्विकता का विशेष ध्यान रखा जाता है। पूजा की विधि नीचे दी गई है:
- प्रातः कालीन स्नान: सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इस दिन सुनहरे, पीले या भूरे रंग के वस्त्र पहनना अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है।
- कलश पूजन: सबसे पहले अपने पूजा स्थान पर विराजमान कलश देवता, भगवान गणेश और नवग्रहों की पूजा करें। उन्हें रोली, अक्षत, धूप और दीप अर्पित करें।
- माता का ध्यान और आवाहन: हाथ में गंगाजल, अक्षत और पुष्प लेकर मां चंद्रघंटा का ध्यान करें और उनसे अपनी पूजा स्वीकार करने की प्रार्थना करें।
- स्नान और श्रृंगार: माता के चित्र या मूर्ति को गंगाजल से शुद्ध करें। इसके बाद माता को कुमकुम, सिंदूर, चंदन और अक्षत लगाएं। देवी को लाल या सुनहरे रंग की चुनरी ओढ़ाएं और उनका पूर्ण श्रृंगार करें।
- पुष्प और सुगंध: मां चंद्रघंटा को कमल का फूल, लाल गुलाब या गेंदे के फूल अर्पित करें। माता को चमेली या केवड़े का इत्र लगाना भी बहुत शुभ माना जाता है।
- धूप-दीप और भोग: माता के सामने शुद्ध गाय के घी का दीपक जलाएं। इसके बाद माता को उनका प्रिय भोग (दूध या दूध से बनी मिठाई) अर्पित करें।
- मंत्र जाप: एकाग्रचित्त होकर माता के सिद्ध मंत्रों का कम से कम 108 बार जाप करें। जाप के लिए लाल चंदन या रुद्राक्ष की माला का उपयोग कर सकते हैं।
- आरती और शंखनाद: पूजा के समापन पर माता की आरती गाएं। आरती के समय घंटा और शंख अवश्य बजाएं, क्योंकि माता को घंटे की ध्वनि अत्यंत प्रिय है। अंत में आरती लेकर अपनी भूलों के लिए क्षमा मांगें।
5. माता का प्रिय भोग और रंग (Favorite Bhog and Color)
मां चंद्रघंटा को प्रसन्न करने के लिए उनके प्रिय भोग और रंग का चयन इस प्रकार करना चाहिए:
- प्रिय भोग: मां चंद्रघंटा को दूध और दूध से बनी हुई वस्तुएं बेहद प्रिय हैं। नवरात्रि तृतीया पर माता को गाय के दूध से बनी मखाने की खीर, खोए के पेड़े या रबड़ी का भोग लगाना चाहिए। इसके अलावा, माता को शहद (Honey) का भोग लगाना भी बहुत उत्तम माना गया है। इससे साधक को साहस और आरोग्य की प्राप्ति होती है।
- शुभ रंग: नवरात्रि के तीसरे दिन के लिए सुनहरा (Golden), पीला (Yellow) और भूरा (Brown) रंग बेहद शुभ माना जाता है। इस दिन इन रंगों के वस्त्र पहनने से मानसिक शांति मिलती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
6. मां चंद्रघंटा के सिद्ध मंत्र (Powerful Mantras)
पूजा के समय इन मंत्रों का शांत मन से उच्चारण करने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं:
ध्यान मंत्र (Dhyan Mantra)
वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहारूढ़ा चण्डरूपा चन्द्रघण्टा यशस्विनीम्॥
प्रार्थना मंत्र (Prarthana Mantra)
पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥
स्तुति (Stuti)
या देवी सर्वभूतेषु मां चन्द्रघण्टा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
बीज मंत्र (Beej Mantra)
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चन्द्रघण्टायै नमः॥
7. मां चंद्रघंटा की पावन आरती (Maa Chandraghanta Aarti)
जय मां चंद्रघंटा सुख धाम।
पूर्ण कीजो मेरे सभी काम॥मस्तक पर है अर्धचंद्र सोहे।
छवि देखत जन का मन मोहे॥सिंह वाहिनी दुर्गा माता।
संकट हरनी सुख की दाता॥दस भुजाएं अस्त्र-शस्त्र धारी।
दुष्टों का संहारक अवतारी॥घंटा बाजे मधुर सुहाना।
असुरों का मन कापें पुराना॥नाम तुम्हारा जो जन ध्यावे।
शक्ति और संपत्ति वह पावे॥मणिपुर चक्र तुम्हारा वासा।
पूरण कीजो मेरी आसा॥क्रोध और भय को दूर भगाओ।
नम्रता और प्रेम हृदय में जगाओ॥शरण पड़े की लाज बचाना।
संकट से माता पार लगाना॥
निष्कर्ष (Conclusion)
मां चंद्रघंटा का पावन स्वरूप हमें संदेश देता है कि संसार में रहते हुए जब कभी भी अन्याय या संकट सामने आए, तो हमें दुर्बलों की रक्षा के लिए सिंह के समान साहसी बनना चाहिए। माता की आराधना से न केवल बाहरी शत्रुओं और बाधाओं का नाश होता है, बल्कि मनुष्य के भीतर बैठे आंतरिक शत्रु जैसे क्रोध, अहंकार, भय और ईर्ष्या का भी समूल नाश हो जाता है।
जो भी भक्त नवरात्रि की तृतीया तिथि पर पूर्ण श्रद्धा, पवित्रता और विश्वास के साथ मां चंद्रघंटा का पूजन और शंखनाद करते हैं, उनका जीवन आत्मबल, ऐश्वर्य और असीम शांति से सराबोर हो जाता है। माता अपने बच्चों को निर्भयता का वरदान देकर समाज में यश और कीर्ति प्रदान करती हैं।
मां चंद्रघंटा पूजा और नवरात्रि तृतीया से जुड़े कुछ सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs) :
1. मां चंद्रघंटा को ‘चंद्रघंटा’ क्यों कहा जाता है?
माता के मस्तक (ललाट) पर घंटे के आकार का एक सुंदर अर्धचंद्र सुशोभित है। इसी अनूठी और दिव्य आकृति के कारण इन्हें ‘मां चंद्रघंटा’ के नाम से पुकारा जाता है।
2. नवरात्रि के तीसरे दिन माता को किस चीज का विशेष भोग लगाना चाहिए?
मां चंद्रघंटा को दूध और दूध से बनी वस्तुएं अत्यंत प्रिय हैं। इस दिन मुख्य रूप से मखाने की खीर, खोए के पेड़े, रबड़ी या मिश्री युक्त दूध का भोग लगाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, माता को शहदमिश्री (Honey) का भोग लगाना भी बहुत शुभ माना जाता है।
3. मां चंद्रघंटा की पूजा के लिए कौन सा रंग सबसे उत्तम माना गया है?
नवरात्रि की तृतीया तिथि पर पूजा के लिए सुनहरा (Golden), पीला (Yellow) और भूरा (Brown) रंग सर्वोत्तम माना जाता है। भक्त इस दिन सुनहरे या पीले रंग के वस्त्र पहनकर पूजा कर सकते हैं, जिससे सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
4. कुंडली के किस ग्रह को संतुलित करने के लिए मां चंद्रघंटा की आराधना की जाती है?
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, मां चंद्रघंटा शुक्र ग्रह (Venus) का प्रतिनिधित्व और नियंत्रण करती हैं। जिन जातकों की कुंडली में शुक्र कमजोर हो, उन्हें सुख-समृद्धि, ऐश्वर्य, सौंदर्य और वैवाहिक जीवन में मधुरता लाने के लिए तीसरे दिन माता की विशेष पूजा करनी चाहिए।
5. मां चंद्रघंटा की पूजा से चक्र विज्ञान का क्या संबंध है?
योग और अध्यात्मिक साधना में नवरात्रि के तीसरे दिन साधक का मन ‘मणिपुर चक्र’ (Manipura Chakra) में स्थित होता है। यह चक्र नाभि स्थान पर होता है। माता की पूजा से यह चक्र जाग्रत होता है, जिससे साधक के भीतर का भय, झिझक और संकोच दूर होता है तथा आत्मविश्वास बढ़ता है।
6. मां चंद्रघंटा का वाहन क्या है और उनके हाथों में कौन से अस्त्र हैं?
मां चंद्रघंटा का वाहन एक विशाल और पराक्रमी सिंह (शेर) है। वे दस भुजाओं वाली देवी हैं। उनके हाथों में त्रिशूल, गदा, तलवार, धनुष, बाण, खड्ग, ढाल और कमल का फूल सुशोभित है, जो वीरता का प्रतीक है।
7. पूजा के समय घंटा बजाना क्यों अनिवार्य माना जाता है?
माना जाता है कि माता के मस्तक पर स्थित घंटे की भयानक और प्रचंड ध्वनि से ही दुष्ट राक्षसों का नाश हुआ था। माता को घंटे की नाद अत्यंत प्रिय है, इसलिए उनकी पूजा और आरती के समय घंटा और शंख बजाने से घर की नकारात्मक शक्तियां तुरंत दूर हो जाती हैं।
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