छठ पूजा 2026: नहाय-खाय, खरना, संध्या अर्घ्य की सही तिथि और सूर्योदय समय

नदी के पवित्र जल में खड़ी एक व्रती महिला जो उगते सूर्य देव को तांबे के लोटे और पारंपरिक बांस के सूप से अर्घ्य दे रही है, सूप में ठेकुआ और मौसमी फल सजे हैं।

💥 सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति में ‘छठ पूजा’ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि लोक आस्था, प्रकृति के प्रति अगाध कृतज्ञता और आत्मशुद्धि का सबसे बड़ा महापर्व है। मुख्य रूप से बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल) से शुरू हुआ यह पर्व आज अपनी दिव्यता, सादगी और कड़े नियमों के कारण पूरे विश्व में पहचान बना चुका है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाने वाला यह महाव्रत भगवान सूर्य देव और उनकी शक्ति ‘छठी मइया’ (उषा और प्रत्युषा) को समर्पित है। यह दुनिया का एकमात्र ऐसा त्योहार है जहाँ ढलते (डूबते) हुए सूर्य को भी अर्घ्य देकर उनकी आराधना की जाती है।

वर्ष 2026 में छठ पूजा का सबसे मुख्य दिन यानी संध्या अर्घ्य 15 नवंबर (रविवार) को मनाया जाएगा। इस महालेख में हम छठ पूजा के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और सामाजिक रहस्यों, चार दिनों के कड़े अनुष्ठान (नहाय-खाय से उषा अर्घ्य तक), छठी मइया से जुड़ी पौराणिक कथाओं, सूर्य देव को अर्घ्य देने के सटीक समय और इसकी संपूर्ण विधि-विधान का गहराई से विश्लेषण करेंगे।


छठ पूजा का व्रत बेहद कठिन माना जाता है, जिसे ‘महाव्रत’ भी कहते हैं। यह पूरे चार दिनों तक चलता है, जिसमें व्रती (व्रत रखने वाले) लगभग 36 घंटे से अधिक समय तक निर्जला (बिना पानी के) उपवास रखते हैं। वर्ष 2026 में इस महापर्व की समय-सारणी इस प्रकार है:

तिथि (Date)दिन (Day)छठ पूजा चरण (Phases of Chhath)पंचांग तिथि (Tithi)
12 नवंबर 2026गुरुवारनहाय-खाय (Nahay Khay)कार्तिक शुक्ल चतुर्थी
13 नवंबर 2026शुक्रवारखरना / लोहंडा (Kharna)कार्तिक शुक्ल पंचमी
15 नवंबर 2026रविवारछठ पूजा (संध्या अर्घ्य – मुख्य दिन)कार्तिक शुक्ल षष्ठी
16 नवंबर 2026सोमवारउषा अर्घ्य (पारन – समापन)कार्तिक शुक्ल सप्तमी

नोट: हिंदू पंचांग के अनुसार तिथियों के घटने-बढ़ने के कारण 14 नवंबर को पंचमी तिथि की समाप्ति और षष्ठी के प्रारंभ का संधिकाल रहेगा, जिसके कारण मुख्य संध्या अर्घ्य का उत्सव 15 नवंबर को मनाया जाएगा।


Table of Contents

पहला दिन: नहाय-खाय (12 नवंबर 2026, गुरुवार)

छठ पूजा की शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को ‘नहाय-खाय’ के साथ होती है। यह दिन पूरी तरह से शारीरिक और मानसिक शुद्धि का दिन होता है।

  • नियम व विधि: इस दिन व्रती अपने पूरे घर की गहन सफाई करते हैं। इसके बाद किसी पवित्र नदी, तालाब या घर पर ही गंगाजल मिलाकर स्नान करते हैं।
  • सात्विक भोजन: स्नान के बाद व्रती पूरी शुद्धता के साथ मिट्टी के चूल्हे पर या नए बर्तनों में सात्विक भोजन तैयार करते हैं। इसमें मुख्य रूप से कद्दू (लौकी) की सब्जी, चने की दाल और अरवा चावल का भात बनाया जाता है। भोजन में सेंधा नमक का उपयोग होता है। व्रती के भोजन ग्रहण करने के बाद ही परिवार के अन्य सदस्य भोजन करते हैं।

दूसरा दिन: खरना या लोहंडा (13 नवंबर 2026, शुक्रवार)

कार्तिक शुक्ल पंचमी के दिन ‘खरना’ का अनुष्ठान होता है। इसी दिन से व्रती का कठिन निर्जला उपवास शुरू होता है।

  • नियम व विधि: व्रती दिनभर पूरी तरह से निर्जला व्रत रखते हैं। शाम के समय (सूर्यास्त के बाद) विशेष पूजा की तैयारी की जाती है।
  • प्रसाद का निर्माण: रसियाव (गुड़ और नए चावल से बनी खीर) और गेहूं के आटे की सादी पूरियां (या रोटी) बनाई जाती हैं। पूजा के बाद व्रती एकांत शांत कमरे में इस प्रसाद को ग्रहण करते हैं। व्रती के भोजन करने के दौरान घर में पूर्ण शांति रखी जाती है। इस भोजन के बाद से ही व्रती का 36 घंटे का निर्जला उपवास शुरू हो जाता है।

तीसरा दिन: संध्या अर्घ्य (15 नवंबर 2026, रविवार) – मुख्य दिन

यह छठ पूजा का सबसे महत्वपूर्ण और विहंगम दिन होता है। इस दिन चारों तरफ केवल छठी मइया के मधुर लोकगीत गूंजते हैं।

  • दौरा सजाना: दोपहर के समय पीतल या बांस के सूप और ‘दौरा’ (बड़ी टोकरी) में विशेष प्रसाद सजाया जाता है। इसमें सबसे मुख्य प्रसाद ‘ठेकुआ’ (गुड़ और आटे से बना पारंपरिक पकवान) होता है। इसके अलावा गन्ना, डाभ नींबू, नारियल, केला, सेब और ऋतु के अन्य फल रखे जाते हैं।
  • घाट की ओर प्रस्थान: शाम को पूरा परिवार गाजे-बाजे और छठ गीतों के साथ नदी, तालाब या जलाशय के घाट की ओर बढ़ता है। व्रती जल में खड़े होकर अस्ताचलगामी (डूबते हुए) सूर्य देव को पूरी श्रद्धा के साथ अर्घ्य देते हैं।

चौथा दिन: उषा अर्घ्य और पारन (16 नवंबर 2026, सोमवार)

कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह इस महापर्व का समापन होता है।

  • नियम व विधि: रातभर घाट पर रुकने या सुबह सूर्योदय से पहले दोबारा घाट पर पहुँचने की परंपरा है। व्रती उगते हुए सूर्य (उषा) की प्रतीक्षा करते हैं। जैसे ही सूर्य की पहली किरण दिखाई देती है, तांबे के पात्र या सूप से सूर्य देव को कच्चे दूध और जल से उषा अर्घ्य दिया जाता है।
  • व्रत का समापन: अर्घ्य पूरा होने के बाद व्रती घाट पर ही छठी मइया की कथा सुनते हैं, प्रसाद बांटते हैं और फिर अदरक व पानी पीकर अपना 36 घंटे का कठिन व्रत खोलते हैं (पारन करते हैं)।

छठ पूजा के संदर्भ में हमारे शास्त्रों और लोक कथाओं में कई अत्यंत पावन प्रसंग मिलते हैं:

1. छठी मइया और राजा प्रियंवद की कथा

देवी भागवत पुराण के अनुसार, ब्रह्मा जी की मानस पुत्री का नाम देवसेना है। प्रकृति के छठे अंश से प्रकट होने के कारण इन्हें ‘षष्ठी देवी’ या लोकभाषा में ‘छठी मइया’ कहा जाता है। वे बच्चों की रक्षा करने वाली और उन्हें दीर्घायु बनाने वाली देवी हैं।

  • राजा प्रियंवद की कोई संतान नहीं थी। महर्षि कश्यप के यज्ञ के प्रभाव से रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया, लेकिन वह मृत पैदा हुआ। राजा इस दुख से व्याकुल होकर श्मशान में अपने प्राण त्यागने लगे।
  • तभी आकाश से देवी षष्ठी प्रकट हुईं। उन्होंने राजा से कहा, “मैं प्रकृति की छठी देवी हूँ। तुम मेरी पूजा करो और प्रजा में इसका प्रसार करो।” राजा ने पूरी श्रद्धा से देवी का व्रत किया और उनका मृत पुत्र पुनः जीवित हो उठा।

2. रामायण काल: माता सीता द्वारा सूर्य पूजा

एक अन्य मान्यता के अनुसार, जब भगवान श्रीराम लंकापति रावण का वध करके अयोध्या लौटे, तो ब्रह्महत्या के दोष से मुक्ति पाने के लिए ऋषियों ने उन्हें राजसूय यज्ञ करने की सलाह दी। मुनि मुद्गल के आश्रम में माता सीता ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि को सूर्य देव की उपासना की थी और नदी में खड़े होकर अर्घ्य दिया था।

3. महाभारत काल: दानवीर कर्ण और द्रौपदी

महाभारत में सूर्यपुत्र कर्ण को सूर्य देव का सबसे बड़ा उपासक माना गया है। वह रोज घंटों नदी के पानी में खड़े होकर सूर्य की पूजा करते थे और अर्घ्य देते थे। माना जाता है कि कर्ण के माध्यम से ही इस पूजा का व्यापक प्रचार हुआ। इसके अतिरिक्त, जुए में अपना सब कुछ हार जाने के बाद पांडवों के कष्ट दूर करने के लिए द्रौपदी ने भी छठ का कठिन व्रत किया था, जिसके प्रभाव से पांडवों को उनका राजपाठ वापस मिला।


छठ पूजा में समय की शुद्धता का बहुत बड़ा महत्व है। वर्ष 2026 में भारत के मध्य और पूर्वी क्षेत्रों (जैसे पटना, रांची, वाराणसी, दिल्ली) के अनुसार संभावित अर्घ्य का समय इस प्रकार रहेगा:

  • 15 नवंबर (संध्या अर्घ्य समय): शाम 05:15 बजे से शाम 05:35 बजे के बीच (सूर्यास्त का समय)। व्रतियों को दोपहर 04:00 बजे से ही घाटों पर अपनी वेदी (सिरसोपा) सजा लेनी चाहिए।
  • 16 नवंबर (उषा अर्घ्य समय): सुबह 06:18 बजे से सुबह 06:40 बजे के बीच (सूर्योदय का समय)।

छठ पूजा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा वैज्ञानिक आधार और सामाजिक समरसता का संदेश छिपा है:

  1. पर्यावरण और जल स्रोतों की सुरक्षा: इस त्योहार का मुख्य केंद्र नदियाँ और तालाब होते हैं। छठ पूजा से पहले पूरा समाज मिलकर नदियों, घाटों और जल स्रोतों की सफाई करता है। यह प्रकृति को स्वच्छ रखने का सबसे बड़ा सामूहिक उदाहरण है।
  2. सौर ऊर्जा का वैज्ञानिक लाभ (Solar Therapy): नदी के जल में खड़े होकर डूबते और उगते सूर्य की किरणों को देखना शरीर के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है। विज्ञान के अनुसार, इस समय सूर्य की किरणों से निकलने वाला विटामिन डी और विशेष तरंगें मानव शरीर के प्रतिरोधी तंत्र (Immunity) को मजबूत करती हैं और त्वचा रोगों से बचाती हैं।
  3. समानता का संदेश (No Caste Barrier): छठ पूजा में किसी पुरोहित या पंडित की अनिवार्यता नहीं होती। राजा हो या रंक, सब एक साथ एक ही नदी के घाट पर कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होते हैं। मिट्टी के चूल्हे और बांस के सूप का उपयोग यह दिखाता है कि ईश्वर की नजर में सादगी और शुद्धता ही सबसे बड़ी पूजा है।

छठ पूजा हमें सिखाती है कि जीवन देने वाली प्रकृति और सूर्य देव का सम्मान करना हमारा परम कर्तव्य है। वर्ष 2026 की यह छठ पूजा आपके परिवार में सुख, अटूट समृद्धि, बच्चों को दीर्घायु और समाज में शांति लेकर आए, यही हमारी मंगल कामना है।

छठी मइया की जय! जय छठी मइया!


1. वर्ष 2026 में छठ पूजा का मुख्य दिन (संध्या अर्घ्य) किस तारीख को है?

साल 2026 में छठ पूजा का सबसे मुख्य दिन (संध्या अर्घ्य) 15 नवंबर (रविवार) को मनाया जाएगा। इस दिन व्रती शाम के समय नदी या तालाब के पानी में खड़े होकर डूबते हुए सूर्य को पहला अर्घ्य देंगे।

2. छठ पूजा के व्रत को इतना कठिन क्यों माना जाता है?

छठ पूजा के व्रत में कड़े नियमों का पालन करना होता है। इसमें व्रती लगातार 36 घंटे से अधिक समय तक निर्जला (बिना पानी के) उपवास रखते हैं। इसके अलावा, भोजन पूरी तरह सात्विक होता है, प्रसाद केवल मिट्टी के चूल्हे और आम की लकड़ी पर बनता है, और व्रती को जमीन पर कंबल बिछाकर सोना होता है।

3. छठ पूजा में डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देने का क्या रहस्य है?

सनातन धर्म में सूर्य को जीवन का आधार माना गया है। डूबते सूर्य को अर्घ्य (प्रत्युषा को अर्घ्य) देना यह दर्शाता है कि जिसका अंत हुआ है, उसका उदय भी निश्चित है। यह सुख और दुख दोनों परिस्थितियों में समान रहने और प्रकृति के हर स्वरूप के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का संदेश है।

4. ‘ठेकुआ’ क्या है और इसे छठ पूजा का मुख्य प्रसाद क्यों माना जाता है?

ठेकुआ गेहूं के आटे, गुड़ (या चीनी), घी और सूखे मेवों के मिश्रण से बना एक पारंपरिक पकवान है, जिसे विशेष सांचों पर डिजाइन करके शुद्ध घी में तला जाता है। यह पूरी तरह से प्राकृतिक, पौष्टिक और शुद्ध होता है। नई फसल के गेहूं और गुड़ को भगवान सूर्य को अर्पित करना समृद्धि का सूचक माना जाता है।

5. क्या कोई भी व्यक्ति छठ पूजा का व्रत शुरू कर सकता है?

हाँ, छठ पूजा का व्रत कोई भी महिला या पुरुष पूरी श्रद्धा और शुद्धता के साथ रख सकता है। इसके लिए किसी जाति या वर्ग का कोई बंधन नहीं है। हालांकि, एक बार व्रत शुरू करने के बाद इसे हर साल नियमपूर्वक निभाना अनिवार्य माना जाता है, जब तक कि घर की अगली पीढ़ी को यह जिम्मेदारी न सौंप दी जाए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQs)

1. वर्ष 2026 में छठ पूजा की मुख्य तिथियां (नहाय-खाय और अर्घ्य) क्या हैं?

साल 2026 में छठ पूजा का महापर्व 12 नवंबर से 16 नवंबर तक चलेगा। मुख्य तिथियां इस प्रकार हैं:

  • 12 नवंबर (गुरुवार): नहाय-खाय (महापर्व का पहला दिन)
  • 13 नवंबर (शुक्रवार): खरना (लोहंडा – निर्जला व्रत की शुरुआत)
  • 15 नवंबर (रविवार): छठ पूजा का मुख्य संध्या अर्घ्य (डूबते सूर्य को अर्घ्य)
  • 16 नवंबर (सोमवार): उषा अर्घ्य (उगते सूर्य को अर्घ्य और पारन)

2. छठ पूजा का व्रत इतने दिनों तक और इतना कठिन क्यों होता है?

छठ पूजा को ‘महाव्रत’ कहा जाता है क्योंकि इसमें शुद्धता के सबसे कड़े नियमों का पालन करना होता है। व्रती (व्रत रखने वाले) लगातार 36 घंटे से अधिक समय तक निर्जला (बिना पानी के) उपवास रखते हैं। इस दौरान सात्विक भोजन केवल मिट्टी के चूल्हे और आम की लकड़ी पर बनता है, लहसुन-प्याज का प्रयोग वर्जित होता है, और व्रती को फर्श पर कंबल या चटाई बिछाकर सोना पड़ता है।

3. छठ महापर्व में डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देने का क्या धार्मिक रहस्य है?

सनातन संस्कृति में सूर्य को साक्षात दृश्य देवता और संपूर्ण जीवन का आधार माना गया है। डूबते सूर्य (प्रत्युषा) को अर्घ्य देना यह संदेश देता है कि सुख और दुख जीवन के दो चक्र हैं। जिसका आज अस्त हुआ है, उसका कल उदय होना निश्चित है। यह पूरी दुनिया में अकेला ऐसा पर्व है जो ढलते हुए सूर्य देव की भी उतनी ही श्रद्धा से पूजा करना सिखाता है जितनी उगते हुए सूर्य की।

4. ‘ठेकुआ’ क्या है और इसे छठ पूजा का सबसे प्रमुख प्रसाद क्यों माना जाता है?

ठेकुआ गेहूं के आटे, गुड़ (या चीनी), शुद्ध घी और सूखे मेवों के मिश्रण से बना एक विशेष पारंपरिक महाप्रसाद है, जिसे लकड़ी के सुंदर सांचों (ठोकना) पर डिजाइन करके घी में तला जाता है। यह पूरी तरह से प्राकृतिक और शुद्ध होता है। नई फसल के अनाज और गुड़ को सूर्य देव को समर्पित करना कृषि संस्कृति और समृद्धि के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का सूचक है।

5. क्या छठ पूजा की शुरुआत करने के लिए किसी पुरोहित या विशेष पंडित की आवश्यकता होती है?

जी नहीं, छठ पूजा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें किसी पुरोहित, पंडित या बिचौलिए की आवश्यकता नहीं होती। यह पूरी तरह से प्रकृति और भक्त के बीच का सीधा संवाद है। कोई भी व्यक्ति (महिला या पुरुष) पूरी आस्था और कायदे-कानून के साथ स्वयं जलाशय के किनारे खड़े होकर सूर्य देव और छठी मइया की आराधना कर सकता है।

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