वर्ष 2026 में देवशयनी एकादशी का अत्यंत पावन और महत्वपूर्ण व्रत 25 जुलाई 2026, शनिवार को रखा जाएगा। [1] सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार, आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की इस एकादशी को ‘हरिशयनी एकादशी’, ‘आषाढ़ी एकादशी’ या ‘पद्मनाभा एकादशी’ के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से यह तिथि संपूर्ण वर्ष की सबसे महत्वपूर्ण तिथियों में से एक मानी जाती है, क्योंकि इसी दिन से चातुर्मास (चार महीनों का पवित्र नियम) प्रारंभ हो जाता है। देवशयनी एकादशी के दिन सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु राजा बलि के पाताल लोक में चार महीनों के लिए योग निद्रा में चले जाते हैं। भगवान के शयनकाल में जाने के कारण ही इस एकादशी को ‘देवशयनी’ कहा जाता है और इसके बाद से विवाह, मुंडन, यज्ञोपवीत और गृह प्रवेश जैसे सभी मांगलिक कार्यों पर पूरे चार महीनों के लिए पूर्ण विराम लग जाता है।
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देवशयनी एकादशी 2026: सटीक तिथियाँ और शुभ मुहूर्त (Shubh Muhurat 2026)
हिंदू धर्म में किसी भी व्रत का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए पंचांग के अनुसार तिथि के प्रारंभ, समाप्ति और पारण के सटीक समय का ज्ञान होना अनिवार्य है। वर्ष 2026 के लिए पंचांगीय गणना इस प्रकार है:
| व्रत और मुहूर्त विवरण | तिथि और सटीक समय |
|---|---|
| व्रत की तारीख | 25 जुलाई 2026, शनिवार |
| एकादशी तिथि प्रारंभ | 24 जुलाई 2026 को रात 08:45 बजे से |
| एकादशी तिथि समाप्त | 25 जुलाई 2026 को शाम 06:30 बजे तक |
| एकादशी व्रत पारण (Parana) तिथि | 26 जुलाई 2026, रविवार |
| पारण का शुभ समय | सुबह 05:39 बजे से सुबह 08:24 बजे तक |
| पारण के दिन द्वादशी समाप्ति | 26 जुलाई 2026 को दोपहर 03:55 बजे |
(विशेष नोट: हिंदू धर्म में उदयातिथि की महत्ता होने के कारण 25 जुलाई को सूर्योदय के समय एकादशी तिथि मौजूद रहेगी, इसलिए पूरे देश में वैष्णव और समार्त दोनों ही संप्रदायों के लोग 25 जुलाई, शनिवार को ही यह पावन व्रत रखेंगे।)
देवशयनी एकादशी का गहरा आध्यात्मिक और पौराणिक महत्व
देवशयनी एकादशी का महत्व स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को महाभारत काल में समझाया था। पद्म पुराण के अनुसार, इस व्रत को करने से व्यक्ति के ज्ञात-अज्ञात में किए गए सभी प्रकार के पापों का सर्वनाश हो जाता है और मृत्यु के पश्चात जीव को बैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है।
चातुर्मास का आरंभ और वैज्ञानिक दृष्टिकोण
देवशयनी एकादशी से शुरू होकर कार्तिक मास की देवउठनी एकादशी तक की चार महीनों की अवधि को ‘चातुर्मास’ कहा जाता है। इन चार महीनों में भगवान विष्णु के शयन में रहने के कारण सृष्टि के संचालन और सुरक्षा का उत्तरदायित्व देवाधिदेव महादेव (भगवान शिव) संभालते हैं।
अगर आध्यात्मिक के साथ-साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए, तो चातुर्मास के दौरान वर्षा ऋतु अपने चरम पर होती है। इस समय सूर्य और चंद्रमा की किरणें पृथ्वी पर मंद हो जाती हैं, जिससे मनुष्यों की पाचन शक्ति (जठराग्नि) कमजोर पड़ जाती है। साथ ही, वातावरण में बैक्टीरिया और कीड़े-मकोड़ों की संख्या बढ़ जाती है। यही कारण है कि हमारे ऋषियों-मुनियों ने इस दौरान संयम, उपवास, और सात्विक जीवन शैली अपनाने का नियम बनाया ताकि मनुष्य का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य उत्तम बना रहे।
देवशयनी एकादशी की संपूर्ण और अचूक पूजा विधि (Step-by-Step Puja Vidhi)
यदि आप देवशयनी एकादशी का व्रत रख रहे हैं या घर पर भगवान नारायण की विशेष कृपा पाना चाहते हैं, तो शास्त्रों के अनुसार बताई गई इस प्रामाणिक पूजा विधि का पालन करें:
पूजा विधि के मुख्य चरण (Sopanam):
├── 1. ब्रह्म मुहूर्त में स्नान और व्रत का संकल्प
├── 2. पीला वस्त्र धारण और पूजा स्थल की शुद्धि
├── 3. शंखोदक से भगवान विष्णु का अभिषेक
├── 4. धूप, दीप, पीले पुष्प और तुलसी दल अर्पण
└── 5. एकादशी व्रत कथा श्रवण और शयन रस्म
1. सुबह की तैयारी और संकल्प (Morning Routine)
- एकादशी के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से लगभग 1.5 घंटे पहले) उठें। घर की सफाई करें और पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर स्नान करें।
- स्नान के पश्चात भगवान सूर्य देव को तांबे के पात्र से जल अर्पित करें और पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- अपने दाहिने हाथ में जल, अक्षत (बिना टूटे चावल), और फूल लेकर भगवान विष्णु के सम्मुख व्रत का संकल्प लें: “हे लक्ष्मीपति भगवान नारायण, मैं आज आपकी प्रसन्नता और पापों की मुक्ति के लिए देवशयनी एकादशी का निराहार/फलाहार व्रत रखने का संकल्प लेता/लेती हूँ। मेरी पूजा स्वीकार करें।”
2. पूजा स्थल की स्थापना और अभिषेक
- घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) या पूजा मंदिर में एक साफ लकड़ी की चौकी रखें। उस पर पीला रेशमी कपड़ा बिछाएं।
- चौकी पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
- भगवान श्रीहरि को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, और शक्कर का मिश्रण) से स्नान कराएं। उसके बाद गंगाजल से अभिषेक करें। यदि आपके पास दक्षिणावर्ती शंख हो, तो उससे जल अर्पित करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
3. दिव्य श्रृंगार और नैवेद्य अर्पण
- भगवान विष्णु को पीले चंदन का तिलक लगाएं और माता लक्ष्मी को कुमकुम अर्पित करें।
- श्रीहरि को पीले रंग के वस्त्र, पीले फूल, गेंदे की माला, गोपीचंदन, धूप और गाय के शुद्ध घी का दीपक अर्पित करें।
- इसके बाद भगवान को मौसमी फलों (जैसे केला, आम) और पीले रंग की सात्विक मिठाई या खीर का भोग लगाएं।
- सबसे महत्वपूर्ण नियम: भगवान विष्णु के भोग में तुलसी का पत्ता (तुलसी दल) अवश्य रखें। शास्त्रों के अनुसार, तुलसी के बिना भगवान विष्णु किसी भी प्रकार का नैवेद्य या भोग स्वीकार नहीं करते हैं।
4. कथा श्रवण और आरती
- भगवान के सम्मुख बैठकर देवशयनी एकादशी की प्रामाणिक व्रत कथा का पाठ करें या श्रद्धापूर्वक सुनें।
- कथा के पूर्ण होने के बाद विष्णु सहस्रनाम या “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें।
- अंत में कपूर और घी के दीपक से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आरती उतारें और अंजाने में हुई भूलचूक के लिए क्षमा प्रार्थना करें।
5. भगवान विष्णु को सुलाने की विशेष रस्म
चूंकि इस दिन के बाद भगवान चार महीनों के लिए निद्रा में जाते हैं, इसलिए शाम की पूजा के बाद भगवान के विग्रह को एक छोटे से सुंदर गद्दे और तकिये वाले पालने या बिस्तर पर लिटाया जाता है। उन्हें पीला पीतांबर उड़ाकर नीचे दिए गए पौराणिक मंत्र का जाप करते हुए सुलाने की रस्म निभाई जाती है:
“सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम्। विबुद्धे त्वयि बुध्येत जगत्सर्वं चराचरम्॥”
अर्थात: हे जगन्नाथ! आपके सो जाने पर यह पूरी सृष्टि सो जाती है और आपके जाग जाने पर यह संपूर्ण चराचर संसार जाग जाता है।
देवशयनी एकादशी व्रत की प्रामाणिक पौराणिक कथा (Vrat Katha)
पौराणिक काल में मांधाता नाम का एक अत्यंत चक्रवर्ती, सत्यवादी और प्रतापी राजा राज करता था। वह अपनी प्रजा को अपनी संतान के समान पालता था, जिससे उसके राज्य में कभी कोई कष्ट या अकाल नहीं पड़ता था। लेकिन एक समय दैवीय विधान के कारण उस राजा के राज्य में लगातार तीन वर्षों तक भयंकर अकाल पड़ा। वर्षा न होने के कारण नदियाँ, तालाब सूख गए, यज्ञ-अनुष्ठान बंद हो गए और प्रजा भूख से तड़पने लगी।
अपनी प्रजा का दुख देखकर राजा मांधाता अत्यंत व्याकुल हो उठे। वे इस समस्या का समाधान खोजने के लिए अपनी सेना के साथ घने जंगलों की ओर चल दिए। जंगलों में भटकते हुए वे ब्रह्मा जी के मानस पुत्र महान ऋषि अंगिरा के आश्रम पहुँचे। राजा ने ऋषि के चरणों में प्रणाम किया और अपने राज्य की व्यथा सुनाई।
राजा की बातें सुनकर ऋषि अंगिरा ने कहा, “हे राजन! यह सतयुग का समय है, जिसमें धर्म अपने चारों चरणों पर खड़ा है। इस युग में केवल ब्राह्मणों को ही तपस्या करने का अधिकार है, लेकिन तुम्हारे राज्य में एक शूद्र वर्ण का व्यक्ति छिपकर कठिन तपस्या कर रहा है। उसी के अधर्म के कारण तुम्हारे राज्य में वर्षा नहीं हो रही है। यदि तुम उसका वध कर दोगे, तो अकाल समाप्त हो जाएगा।”
राजा मांधाता ने अत्यंत विनम्रता से कहा, “हे महर्षि! मैं किसी निरपराध तपस्वी की हत्या सिर्फ इसलिए नहीं कर सकता क्योंकि वह निम्न वर्ण का है। कृपया मुझे कोई ऐसा धार्मिक और कल्याणकारी उपाय बताएं जिससे किसी का प्राण भी न जाए और मेरी प्रजा का संकट भी दूर हो जाए।”
तब ऋषि अंगिरा ने मुस्कुराते हुए कहा, “यदि तुम ऐसा चाहते हो, तो आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी का व्रत पूरी निष्ठा और विधि-विधान के साथ करो। यह व्रत सिद्धियों को देने वाला और समस्त संकटों का नाश करने वाला है। जब तुम, तुम्हारे मंत्री और तुम्हारी प्रजा मिलकर यह व्रत रखेंगे, तो भगवान नारायण की कृपा से निश्चित ही तुम्हारे राज्य में मूसलाधार वर्षा होगी और सुख-समृद्धि वापस आ जाएगी।”
राजा मांधाता वापस अपने राज्य लौटे। उन्होंने ऋषि के कथनानुसार अपनी पूरी प्रजा, मंत्रियों और रानियों के साथ देवशयनी एकादशी का निराहार व्रत रखा और भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा की। व्रत के प्रभाव से राज्य में घने बादल छा गए और भारी वर्षा हुई। पूरा राज्य धन-धान्य से भर गया और प्रजा सुखी हो गई। तभी से इस एकादशी का व्रत रखने की परंपरा निरंतर चली आ रही है।
देवशयनी एकादशी के दिन क्या करें और क्या न करें? (Do’s & Dont’s)
एकादशी का व्रत अत्यंत कड़े नियमों के तहत किया जाता है। व्रत के दौरान निम्नलिखित बातों का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है:
नियमों का संतुलन (Ritual Matrix):
├── क्या करें: दान-पुण्य, रात्रि जागरण, विष्णु मंत्र जाप, ब्रह्मचर्य का पालन
└── क्या न करें: चावल का सेवन, तुलसी तोड़ना, क्रोध/परनिंदा, तामसिक भोजन
- चावल का सेवन पूर्णतः वर्जित: एकादशी तिथि के दिन घर में किसी भी सदस्य को चावल (भात) का सेवन नहीं करना चाहिए। पौराणिक मान्यता है कि एकादशी के दिन चावल खाने वाला व्यक्ति रेंगने वाले जीव की योनि में जन्म लेता है।
- तुलसी दल पहले ही तोड़ लें: एकादशी के दिन तुलसी के पौधे में जल चढ़ाना और उसकी पत्तियां तोड़ना सख्त वर्जित होता है। इसलिए भगवान विष्णु के भोग के लिए एक दिन पहले (दशमी तिथि को) ही तुलसी की पत्तियां तोड़कर रख लेनी चाहिए।
- सात्विकता बनाए रखें: इस दिन लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा या किसी भी तामसिक भोजन का प्रयोग घर में बिलकुल न करें। व्रत रखने वाले व्यक्ति को झूठ बोलने, गुस्सा करने और किसी की बुराई (परनिंदा) करने से बचना चाहिए।
- रात्रि जागरण का फल: एकादशी की रात को सोना नहीं चाहिए। पूरी रात भगवान विष्णु के भजनों, कीर्तनों या विष्णु सहस्रनाम का पाठ करते हुए रात्रि जागरण करने से कई गुना अधिक पुण्य फल की प्राप्ति होती है।
देवशयनी एकादशी 2026 (25 जुलाई, शनिवार) से जुड़े कुछ सबसे महत्वपूर्ण और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs) दिए गए हैं:
तिथि और शुभ मुहूर्त (Date & Shubh Muhurat)
- वर्ष 2026 में देवशयनी एकादशी कब है?
वैदिक पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में देवशयनी एकादशी का पावन व्रत 25 जुलाई 2026, शनिवार को रखा जाएगा। - एकादशी तिथि कब शुरू और समाप्त होगी?
- तिथि प्रारंभ: 24 जुलाई 2026 को रात 08:45 बजे से।
- तिथि समाप्त: 25 जुलाई 2026 को शाम 06:30 बजे तक।
- व्रत खोलने (पारण) का शुभ समय क्या है?
अगले दिन, यानी 26 जुलाई 2026 (रविवार) को व्रत पारण का शुभ समय सुबह 05:39 बजे से सुबह 08:24 बजे तक रहेगा।
धार्मिक महत्व और चातुर्मास (Significance & Chaturmas)
- देवशयनी एकादशी का क्या अर्थ है और इसे यह नाम क्यों मिला?
‘देवशयनी’ का अर्थ है ‘देवताओं का सोना’। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस तिथि से ब्रह्मांड के पालनहार भगवान विष्णु चार महीनों के लिए राजा बलि के पाताल लोक में योग निद्रा (शयन) में चले जाते हैं, इसलिए इसे देवशयनी एकादशी कहा जाता है। - चातुर्मास क्या है और यह कब से कब तक रहेगा?
देवशयनी एकादशी से शुरू होकर कार्तिक मास की देवउठनी एकादशी तक की चार महीनों की अवधि को ‘चातुर्मास’ कहा जाता है। वर्ष 2026 में चातुर्मास 25 जुलाई से शुरू होकर 21 नवंबर 2026 तक रहेगा। इस दौरान विवाह, मुंडन और गृह प्रवेश जैसे सभी मांगलिक कार्य पूरी तरह वर्जित रहेंगे।
पूजा विधि और कड़े नियम (Puja Vidhi & Ritual Rules)
- भगवान विष्णु को सुलाने का पौराणिक मंत्र कौन सा है?
शाम की पूजा के बाद भगवान श्रीहरि को सुलाते समय इस मंत्र का जाप किया जाता है:“सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम्। विबुद्धे त्वयि बुध्येत जगत्सर्वं चराचरम्॥” - क्या एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते तोड़े जा सकते हैं?
नहीं। एकादशी तिथि के दिन तुलसी के पौधे में जल अर्पित करना और पत्तियां तोड़ना पूरी तरह वर्जित होता है। भगवान के भोग के लिए एक दिन पहले (दशमी तिथि को) ही तुलसी दल तोड़कर रख लेना चाहिए। - एकादशी के दिन चावल क्यों नहीं खाना चाहिए?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एकादशी के दिन चावल का सेवन वर्जित माना गया है। शास्त्रों में वर्णित है कि इस दिन चावल खाने वाला व्यक्ति रेंगने वाले जीव की योनि में जन्म लेता है, इसलिए घर के सभी सदस्यों को इस दिन चावल से दूर रहना चाहिए।
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