साल 2026 में गंगा दशहरा का पावन पर्व उदयातिथि और ज्योतिषीय गणना के अनुसार 25 मई 2026, सोमवार को मनाया जाएगा। हिंदू पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला यह त्योहार सनातन धर्म में बेहद विशेष स्थान रखता है। इस दिन मां गंगा का स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरण हुआ था, इसलिए इसे गंगा अवतरण दिवस भी कहा जाता है।
इस वर्ष तारीख को लेकर लोगों में कुछ असमंजस की स्थिति बनी हुई थी कि यह त्योहार 25 मई को है या 26 मई को। धार्मिक विद्वानों और वैदिक पंचांग के अनुसार, दशमी तिथि का सूर्योदय 25 मई को हो रहा है, जिसके कारण सभी प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान, गंगा स्नान और दान-पुण्य इसी दिन किए जाएंगे।
गंगा दशहरा 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त (Ganga Dussehra 2026 Shubh Muhurat)
पंचांगीय गणना के अनुसार, ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि की शुरुआत और समाप्ति का समय नीचे दी गई तालिका में देख सकते हैं:
| विशेष घटना | दिनांक और सटीक समय |
|---|---|
| दशमी तिथि का प्रारंभ | 25 मई 2026 को सुबह 04:30 बजे से |
| दशमी तिथि का समापन | 26 मई 2026 को सुबह 05:10 बजे तक |
| मुख्य पर्व की तारीख | 25 मई 2026 (सोमवार) |
| ब्रह्म मुहूर्त स्नान समय | सुबह 04:04 बजे से सुबह 04:45 बजे तक |
| अभिजित मुहूर्त (पूजा समय) | सुबह 11:51 बजे से दोपहर 12:46 बजे तक |
रवि योग और हस्त नक्षत्र का महासंयोग
साल 2026 में गंगा दशहरा पर एक अत्यंत दुर्लभ और शुभ संयोग बन रहा है। इस दिन रवि योग का निर्माण हो रहा है जो रविवार सुबह से लेकर मंगलवार सुबह तक रहेगा। इसके साथ ही इस दिन हस्त नक्षत्र की उपस्थिति इस पर्व की शुभता को कई गुना बढ़ा देती है। मान्यता है कि इस महासंयोग में किए गए पूजन और स्नान का फल कभी निष्फल नहीं होता।
गंगा दशहरा का पौराणिक और धार्मिक महत्व (Significance of Ganga Dussehra)
सनातन परंपरा में गंगा नदी को केवल एक जलधारा नहीं, बल्कि साक्षात देवी और जननी का दर्जा प्राप्त है।
राजा भगीरथ की कठोर तपस्या
पौराणिक कथाओं के अनुसार, इक्ष्वाकु वंश के राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों (राजा सगर के 60,000 पुत्रों) की आत्माओं की शांति और उनके उद्धार के लिए हजारों वर्षों तक कठिन तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने मां गंगा को पृथ्वी पर भेजने की अनुमति दी।
भगवान शिव की जटाओं में आश्रय
गंगा का वेग इतना तीव्र था कि यदि वह सीधे पृथ्वी पर गिरतीं, तो पूरी सृष्टि जलमग्न हो सकती थी। इस विनाश को रोकने के लिए राजा भगीरथ ने भगवान शिव से प्रार्थना की। शिव जी ने गंगा के वेग को नियंत्रित करने के लिए उन्हें अपनी जटाओं में धारण कर लिया। इसके बाद ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन भगवान शिव ने अपनी एक जटा खोली और मां गंगा पृथ्वी पर प्रवाहित हुईं। इसी कारण इस दिन को पतितपावनी गंगा के अवतरण उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
10 पापों का नाश करता है यह पर्व
‘दशहरा’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है- ‘दश’ यानी दस और ‘हरा’ यानी नष्ट करना। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस पवित्र दिन गंगा नदी में डुबकी लगाने से मनुष्य के 10 प्रकार के पापों का शमन होता है। ये पाप तीन श्रेणियों में विभाजित हैं:
- कायिक पाप (शरीर द्वारा किए गए 3 पाप): किसी जीव की हत्या करना, चोरी करना और पराई स्त्री या पुरुष पर कुदृष्टि डालना।
- वाचिक पाप (वाणी द्वारा किए गए 4 पाप): कटु वचन बोलना, झूठ बोलना, किसी की पीठ पीछे निंदा (चुगली) करना और व्यर्थ की बातें करना।
- मानसिक पाप (मन द्वारा किए गए 3 पाप): दूसरे की संपत्ति हड़पने का विचार करना, किसी का अहित सोचना और धर्म विमुख होकर नास्तिकता का भाव रखना।
गंगा दशहरा पूजा और स्नान विधि (Ganga Dussehra Puja Vidhi)
गंगा दशहरा के दिन पूजा, स्नान और ध्यान की एक विशेष पद्धति शास्त्रों में बताई गई है:
- गंगा स्नान: इस दिन हरिद्वार, वाराणसी, ऋषिकेश या प्रयागराज जैसे पवित्र तीर्थों पर जाकर गंगा नदी में स्नान करना सर्वोत्तम माना गया है।
- घर पर स्नान का नियम: यदि किसी कारणवश आप पवित्र नदियों के तट पर नहीं जा सकते, तो निराश होने की आवश्यकता नहीं है। अपने घर पर ही सामान्य जल की बाल्टी में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर “हर हर गंगे” बोलते हुए स्नान करें, इससे भी समान पुण्य मिलता है।
- मंत्र का जाप: स्नान करते समय मां गंगा के इस पवित्र मंत्र का जाप करना चाहिए:“ॐ नमो भगवति हिलि हिलि मिली मिली गंगे पावय पावय स्वाहा”
- अर्घ्य और पूजन: स्नान के बाद तांबे के पात्र में जल लेकर सूर्य देव और मां गंगा को अर्घ्य दें। घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें और भगवान शिव तथा माता गंगा की आरती करें।
- दीपदान: संध्याकाल के समय किसी नदी के किनारे या घर के मुख्य द्वार और तुलसी के समीप दीपदान अवश्य करना चाहिए, इससे पितृ दोष से मुक्ति मिलती है।
दान-पुण्य में ’10’ के अंक का विशेष नियम (Importance of Number 10)
गंगा दशहरा के पर्व में दान का बहुत बड़ा महत्व है। चूंकि यह दस पापों को हरने वाला दिन है, इसलिए इस दिन दान में दी जाने वाली वस्तुओं की संख्या भी 10 होनी चाहिए।
दान करने योग्य प्रमुख वस्तुएं:
भक्तों को अपनी क्षमता के अनुसार नीचे दी गई सामग्रियों में से किन्हीं भी चीजों का 10 की संख्या में दान करना चाहिए:
- शीतलता प्रदान करने वाली चीजें: मिट्टी का मटका (घड़ा), हाथ का पंखा, खरबूजा, पानी से भरी सुराही और छाता।
- खाद्य सामग्रियां: सत्तू, गुड़, अनाज, मौसमी फल और जल।
- अन्य वस्तुएं: वस्त्र, चप्पल/जूते, और सुहाग की सामग्री।
यदि आप किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को दान दे रहे हैं, तो 10 ब्राह्मणों को भोजन कराना या 10 प्रकार के अन्न का दान करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
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