मणिकर्णिका घाट बनारस के सबसे प्रसिद्ध घाटों में से एक है क्यों? क्योंकि यहां मोक्ष (जन्म–मृत्यु) के चक्र से मुक्ति मिलती है,जहां मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार करने से आत्मा सीधे स्वर्ग लोक की प्राप्ति करती है, और माना जाता है कि पौराणिक कथाओं के अनुसार यह वह स्थान है ,जहां देवी सती (पार्वती) की मणिकर्णिका (कान की बाली) यहीं पर गिरी थी, जिसके कारण इसका नाम “मणिकर्णिका” पड़ा और यहां निरंतर “चिता” की अग्नि जलती रहती है जो कभी नहीं बुझती है | प्रसिद्धि के मुख्य कारण:
मोक्ष का द्वार: यह हिंदुओं के लिए सबसे पवित्र श्मशान घाट माना गया है, जहां दाह संस्कार से आत्मा को परम मोक्ष मिलता है। पौराणिक कथाएं:
सती का कर्णफूल: माना जाता है कि यहां देवी सती पार्वती के कान की बाली “मणिकर्णिका” यही गिरी थी,जिससे यह स्थान पवित्र हो गया।
विष्णु की तपस्या: एक कथा के अनुसार भगवान हरि ने तपस्या की और तपस्या के दौरान अपनी मणि यहां गिरा दी जिससे इसका नाम मणिकर्णिका पड़ा।
अग्नि का निरंतर प्रवाह: इस घाट कि यह विशेषता है कि यहां निरंतर चिताएं जलती रहती हैं और कभी बुझती नहीं ।
ऐतिहासिक महत्व: इसे पुराने घाटों में से एक माना जाता है जिस पर देवी अहिल्याबाई होल्कर ने विकास के कार्य कराए थे।
जीवन मृत्यु का उत्सव: यह घाट मृत्यु के भाई को दूर करता है जहां हर दिन हजारों सैकड़ों की संख्य में अंतिम संस्कार होते हैं ।
मणिकर्णिका घाट का रहस्य: यह मोक्ष का सबसे बड़ा पवित्र स्थान माना गया है और यहां लगातार चिताएं जलती रहती हैं, मान्यता है कि चीता की राख पर “94” लिखने का एक गहरा अर्थ है जो मनुष्य के कर्मों से जुड़ा है ।
शिवजी का वरदान और तारक मंत्र: कहते हैं कि भगवान “शिव” यहां स्वयं अंतिम संस्कार में उपस्थित होकर मृत शरीर के कान में “तारक मंत्र” का उच्चारण करते हैं जिससे मृत्यु व्यक्ति को “मोक्ष” की प्राप्ति मिलती है।
राजा हरिश्चंद्र और डोम राजा: प्राचीन तथा पौराणिक ग्रंथों के अनुसार राजा हरिश्चंद्र यही दाह संस्कार का कार्य किया करते थे और इस घाट का स्वामी चांडाल था जिसने राजा हरिश्चंद्र को खरीदा था।
94 का रहस्य: इस घाट पर चिता के अंतिम संस्कार के बाद चिता की राख पर 94 लिखने की प्रथम है जिसका अर्थ यह है कि मनुष्य के 100 में से 94 कर्म उसके हाथ में होते हैं ।
मणिकर्णिका घाट का निर्माण:
मणिकर्णिका घाट वाराणसी (बनारस) में स्थित गंगा नदी का एक घाट है इसका निर्माण महाराजा “इंदौर” ने करवाया था। पौराणिक मान्यताओं से जुड़े मणिकर्णिका घाट में मरणोपरांत अंतिम संस्कार से महत्व रखता है, इस घाट की गणना काशी के पंचतीर्थों में की जाती है। मणिकर्णिका घाट पर स्थित भवनों का निर्माण पेशवा “बाजीराव” तथा “अहिल्याबाई होल्कर” ने करवाया था। बनारस (काशी) में गंगा तट पर अनेक सुंदर घाट बने हैं। यह सभी घाट किसी न किसी पौराणिक कथाओं या धार्मिक कथाओं से संबंधित हैं। वाराणसी (बनारस) में लगभग 84 घाट हैं। वाराणसी (बनारस) के 84 घाटों में से पांच घाट बहुत पवित्र माने जाते हैं। अस्सी घाट, दशामेश्वर घाट, केशव घाट ,पंचगंगा घाट तथा मणिकर्णिका घाट इन्हें सामूहिक रूप से पंच तीर्थ के नाम से जाना जाता है।
कुछ विशेष बातें:
काशी में माँ गंगा के किनारे पर स्थित मणिकर्णिका घाट पर वाराणसी के आस-पास के जिलों से लोग अपने प्रियजनों की अंतिम क्रिया के लिए आते हैं।
यह घाट अत्यंत पुरातन है; पौराणिक भी। इस घाट पर दशकों नहीं सदियों से बड़ी संख्या में रात-दिन दाह संस्कार चलता रहता है।
मैं काशी और उसके घाटों से भलीभांति परिचित हूँ। अपने परिवार के कई स्वर्गीय लोगों की अंतिम क्रिया के लिए भी मैं मणिकर्णिका घाट पर कई बार गया हूँ। निरंतर आने वाले हर शव के साथ 25 से 100 व्यक्ति भी आते हैं। साथ आए लोगों के बैठने के लिए कोई जगह नहीं होती है। इतना ही नहीं कई बार शवों को जलाने के लिए भी उचित जगह मिलने में समय लगता है। साथ ही शव जलाने की प्रक्रिया में निकली राख और छूटे हुए अवशेषों की सफाई भी नहीं हो पाती है।
इस पुरातन घाट की इन समस्याओं से परिचित तो सभी हैं लेकिन किसी सरकार या जनप्रतिनिधि ने इसे सुलझाने का प्रयास नहीं किया। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने वाराणसी का सांसद बनने के बाद काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, रिंग रोड, जल परिवहन टर्मिनल और अमूल डेरी सहित अनेक कार्य करके काशी की भव्यता और दिव्यता में नया अध्याय जोड़ा है।
विरासत के साथ विकास की इसी कड़ी में काशी के नमो घाट, अस्सी घाट सहित अनेक घाटों का भी जीर्णोद्धार और विकास उन्होंने करवाया है।
हाल में मणिकर्णिका घाट की सुंदरता, व्यवस्था और सुविधा बढ़ाने का कार्य आरम्भ हुआ है। घाट पर आने वाले पौराणिक मंदिरों एवं चिन्हों का समुचित संरक्षण करते हुए घाट पर अंतिम संस्कार हेतु आने वाले बड़ी संख्या में लोगों के लिए बुनियादी व्यवस्थाओं का विकास करने की दृष्टि से यह कार्य हो रहा है। जिन लोगों के कई दशकों के शासनकाल में मणिकर्णिका घाट पर एक ईंट तक नहीं रखी गई न ही बदली गई वो लोग यहाँ चल रहे पुनर्निर्माण कार्य के संबंध में मीडिया में भ्रामक खबरें फैला रहे हैं। सच्चाई यह है कि इस घाट पर स्थित सभी पौराणिक मंदिरों का समुचित संरक्षण करते हुए घाट पर अंतिम संस्कार हेतु बड़ी संख्या में आने वाले लोगों की सुविधा के लिए और भविष्य की आवश्यकताओं के दृष्टिगत व्यवस्थाओं का विकास किया जा रहा है।
वर्तमान कार्य योजना के अंतर्गत घाट पर प्लेटफार्म विकसित कर शवदाह स्थल, लकड़ी स्टोर, पूजा सामग्री स्टोर, मुंडन स्थल आदि का विकास किया जा रहा है। परियोजना में घाट पर स्थित मढ़ी का भी पुनर्निर्माण किया जाएगा।
सोशल मीडिया में प्रसारित किए जा रहे कई वीडियो एवं फोटो सीढ़ियों एवं मढ़ी पर बने विभिन्न कलाकृतियों के हैं। जो मशीन से कार्य कराए जाने के दौरान थोड़ी-बहुत प्रभावित हुई हैं। जिनको पृथक से सुरक्षित कर रखवाया गया है। इन्हें मढ़ी के पुनर्निर्माण में पुनर्स्थापित किया जाएगा। कोई मंदिर इस प्रक्रिया में प्रभावित नहीं हुआ है। मणिकर्णिका घाट पर स्थित सभी मंदिरों और पुण्यश्लोक रानी अहिल्याबाई होलकर जी वाली कृतियों सहित सभी पुरातन धरोहरों का संरक्षण समुचित रूप से करते हुए घाट का पुनर्निर्माण एवं विकास किया जा रहा है।
माननीय प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में पुण्यश्लोक रानी अहिल्याबाई होलकर जी की 300वीं जयंती पूरे देश सहित उत्तर प्रदेश में भी उत्साह के साथ मनाई गई। काशी के इतिहास और उसके विकास में लोकमाता का बहुत ही बड़ा योगदान है और इसके लिए हम सब उनके कृतज्ञ हैं। उनकी या उनपर बनी कृतियों का सम्मान हम करते हैं और करते रहेंगे। यही निर्देश सभी कर्मियों को भी दिए गए हैं।
‘खेलब न खेले देब खेलिए बिगाड़ब’ की राह पर चलने वाले विपक्ष के कुछ नेता मणिकर्णिका घाट पर हाल में चल रहे पुनर्निर्माण और पुनःस्थापना की निष्ठापूर्ण प्रक्रिया को अनावश्यक तोड़-मरोड़कर प्रेषित कर जनता को भ्रमित कर रहे हैं।
पहले वो जनता को ये बतावें कि:
– क्या इस घाट पर बड़ी संख्या में अंतिम क्रिया हेतु आने वालों को असुविधा नहीं होती थी?
– 70 वर्ष के अपने लंबे शासनकाल में पुरातन काशी, उसके मंदिरों या उसके घाटों के लिए आपने क्या किया।
– पौराणिक काशी की दिव्यता, भव्यता या बुनियादी सुविधा बढ़ाने के लिए आपने क्या -क्या किया।
– जब वही मणिकर्णिका घाट कोरोना काल में लाशों से पटा रहता था तब आपने क्षेत्र जे लोगों के लिए क्या किया ।
– क्या आपने ऐसा ही विरोध विश्वनाथ कॉरिडोर के विकास के समय नहीं किया था? आज उसकी प्रशंसा हो रही है या नहीं?
मणिकार्णिका घाट: बनारस के घाटों में क्यों प्रसिद्ध है ?

मणिकार्णिका घाट
